Friday, 26 May 2017

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के जन्मदिवस के पावन पर्व पर

 आल्हा छंद - 16/15 -$।

एक बार फिर तुम आ जाओ

एक बार फिर तुम आ जाओ, समझाओ माटी का मोल
हम - सोए हैं हमें - जगाओ, करो हमारा बिस्तर - गोल ।

राह - झलमला दिखलाता है, बन - जाता है - ज्ञानालोक
फिर भी मंजिल दूर भगाती, बिखर-बिखर जाता है श्लोक।

कैसे - हो साहित्य - साधना, कहाँ हो गयी - हमसे - भूल
हम - ज़मीन से दूर हो गए, भूल - गए  हैं निर्मल - मूल ।

सरस्वती के वरद - पुत्र - तुम, दे - कर गए हमें  वरदान
जानें माटी की महिमा हम, जाग - उठे यह हिन्दुस्तान ।

छ्त्तीसगढ की गोद - बुलाए, आओ फिर से पुन्ना- लाल
सोंधी- सोंधी खुशबू -आए, चमक - उठे भारत का भाल ।

शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छ्त्तीसगढ

Tuesday, 2 May 2017

गौतम बुद्ध

गौतम तुम चिन्तन की गहराई लेकर
ज्ञान - मार्ग में प्रवृत्त हो गए ।
तुमने संसार को नई दृष्टि दी,
तुमने हमें बताया कि हम सम्पूर्ण हैं ।

हमें कहीं जाने की आवश्यकता नही,
तुम्हारा वह मूल - मंत्र हमें याद है -
" अप्प दीपो भव ।"
अपना दीपक तुम स्वयं बनो ।
कहीं कुछ खोजने की आवश्यकता नहीं है,
जो भी पाना चाहते हो, अपने आप से पाओ ।
यही तो है  "अहं ब्रह्मास्मि" का सत्य ।

शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छ्त्तीसगढ

Saturday, 22 April 2017

धरा दिवस है आज

                            कुण्डलियाँ

 धारण करती है धरा, नमन करो तुम आज
कृतज्ञता मन में धरो, समझे सकल समाज ।
समझे-सकल समाज, रो रही धरती - माता
धरा - दिवस में आज, पुत्र मन को तरसाता ।
हरियाली है - ढाल, धरा - बरबस - कहती है
समझो - मेरा - हाल, धरा - धारण करती है ।

पुन: बचाओ यह धरा, अनगिन - अत्याचार
जय - चन्दों की फौज है, बेबस हर - सरकार ।
बेबस हर सरकार, समझ फिर आया - गोरी
पृथ्वी - की फिर - हार, चाँद से कहे - चकोरी ।
कहाँ - गए कवि  राज, चन्द बरदायी आओ
धरा  दिवस पर आज, धरा को पुन: बचाओ ।

शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छ्त्तीसगढ





Sunday, 9 April 2017

सार छंद

               महावीर

महावीर जो बन जाता है, सदा - सजग रहता है
धरा गगन सब अपनाता है, दया- मया धरता है ।

अपना प्राण सभी को प्यारा, जीव - जीव हैं भाई
सबकी रक्षा धर्म - हमारा, सबकी करो - भलाई ।

दुख में जैसे हम सब - रोते , सभी - जीव रोते हैं
सुख में जैसे हम - हँसते हैं, वह भी खुश होते हैं ।

कभी किसी को दुख ना देना, खुद भी दुख पाओगे
सभी जीव को अपना लेना, भव से तर जाओगे ।

भाव- भावना निर्मल रखकर, जीवन जीते जाओ
जीवों को परिवार मानकर, अपनापन अपनाओ।

देह - छोडना ही पडता है, मन को याद - दिलाना
कर्म- भोग सबको मिलता है, कहीं भूल ना जाना।

नर जीवन सुन्दर अवसर है, यह सार्थक हो जाए
समझाता मन का हरिहर है, बात समझ में आए ।

जीव - जन्तु से प्रेम करें हम, है दायित्व - हमारा
जीते हैं हम पशु - पक्षी सम, देख - सोच दो-बारा ।

शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छ्त्तीसगढ   
    

Thursday, 30 March 2017

काश्मीरज की सूखी क्यारी

     सार छंद

देख रही है लीला फिर भी, मानव - मन भरमाए
घाटी में बिखरी केशर भी, दिल के घाव दिखाए ।

काश्मीरज की सूखी - क्यारी, भारत - माँ रोती है
सुत - नालायक - हैं  बेचारी, देख - दुखी होती है ।

मासूमों को ढाल - बना - कर, देश - द्रोह करते हैं
अपना मुखडा बचा छिपा कर, अपराधी पलते हैं ।

लूट - रहे  हैं अपने - घर को, खुद ही  बने - लुटेरे
चौकीदार क्या - कहे उसको, मन भर वही घुटे रे ।

रोती - है  केशर की क्यारी, उसको कौन - बचाये
बेटे का बल पाय - पडोसी, आँचल को सरकाये ।

शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छ्त्तीसगढ
मो.- 93028 30030

Sunday, 19 March 2017

आल्हा

समाधान बन जाए ज़िंदगी, हे  भगवन दे - दो वर-दान
यही ज़िन्दगी बने बन्दगी, विनती सुन लो हे भगवान ।

काल - देव तुम मुझे बताओ, क्या है जीवन का आधार
पहिली से तुम मुझे पढाओ, पा -जाऊँ जीवन का सार ।

एक - एक दिन करके पूरा, अपना जीवन जाता बीत
फिर भी है यह काम अधूरा, नहीं जानता क्या है गीत।

धूप - छाँव में जीवन जाता, चलते - चलते थकता पाँव
राह भटक कर रोता - गाता, नहीं पहुँचता अपने गाँव ।

हरियाली  है सब को प्यारी, वही  बुलाती अपने - पास
पर - हरियाली  है बेचारी, रखना - पडता  है उप- वास ।

भूखी - प्यासी हुई अध-मरी, कैसे - दे वह पावन - प्रान
मति बेचारी हुई सिर फिरी, क्या जाने वह प्राण उदान ।

असमञ्जस की पीडा - भारी, तुम्हीं बचाओ हे भगवान
समाधान की दो फुल- वारी, यही माँगते हैं अनु - दान ।

कहाँ जा रही है यह दुनियाँ, तुम्हीं बनाओ नवा - विधान
मुर्झाती हैं नन्हीं_ कलियाँ, उन्हें बचाओ दया - निधान ।

गो - माता की हत्या - रोको, गाय बचे - कैसे गो - पाल
चक्र - सुदर्शन से अब टोको, बचे अवध्या दीन- दयाल ।

शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छ्त्तीसगढ
मो.- 93028 30030

Thursday, 16 March 2017

विष्णुपद छंद

      विधि निषेध कहती

जग गुरु की धरती पर देखो, महापुरुष कितने 
देव-गिरा की गरिमा परखो, अपराधी इतने ।

पञ्चतंत्र है कहाँ विष्णु है, विष्णु छंद कहता 
नीति नेम जो सिखलाती है, वह पुनीत समता ।

पहली गुरु तो माता ही है, विधि निषेध कहती 
समय समय पर ढाल बनी है, वह बचाव करती ।

उसने कई सूत्र बतलाए, जग जीवन चहका 
कई सीख मन में बैठाए, मन उपवन महका ।

कई सूक्ति ने पथ दिखलाया, तमस दूर कर के 
गुरु-जन ने कुछ पाठ पढाया, आँसू भर भर के ।

गुरु - लाघव गुरु ही समझाते, फर्ज अदा करते 
बार - बार हमको रटवाते, हम मन में - धरते ।

बचपन की वह मीठी - यादें, मन में हैं रहती 
अपनी वह भोली - फरियादे, जेहन में बसती ।

गुरु - के दिव्य - गुणों को गाये, संचित है गठरी  
हम भी निज दायित्व निभाये, वही अनल जठरी ।


शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छ्त्तीसगढ
मो- 93028 30030

Sunday, 26 February 2017

कोदूराम दलित की साहित्य साधना







 मनुष्य भगवान की अद्भुत रचना है, जो कर्म की तलवार और कोशिश की ढाल से, असंभव को संभव कर सकता है । मन और मति के साथ जब उद्यम जुड जाता है तब बडे - बडे तानाशाह को झुका देता है और लंगोटी वाले बापू गाँधी की हिम्मत को देख कर, फिरंगियों को हिन्दुस्तान छोड कर भागना पडता है । मनुष्य की सबसे बडी पूञ्जी है उसकी आज़ादी,जिसे वह प्राण देकर भी पाना चाहता है, तभी तो तुलसी ने कहा है - ' पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं ।' तिलक ने कहा - ' स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर रहेंगे ।' सुभाषचन्द्र बोस ने कहा - ' तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा ।' सम्पूर्ण देश में आन्दोलन हो रहा था, तो भला छ्त्तीसगढ स्थिर कैसे रहता ? छ्त्तीसगढ के भगतसिंह वीर नारायण सिंह को फिरंगियों ने सरेआम फाँसी पर लटका दिया और छ्त्तीसगढ ' इंकलाब ज़िंदाबाद ' के निनाद से भर गया, ऐसे समय में ' वंदे मातरम् ' की अलख जगाने के लिए, कोदूराम 'दलित' जी आए और उनकी छंद - बद्ध रचना को सुनकर जनता मंत्र - मुग्ध हो गई -

" अपन - देश आज़ाद  करे -  बर, चलो  जेल - सँगवारी
 कतको झिन मन चल देइन, आइस अब - हम रो- बारी।
जिहाँ लिहिस अवतार कृष्ण हर,भगत मनन ला तारिस
दुष्ट- जनन ला मारिस अउ,   भुइयाँ के भार - उतारिस।
उही  किसम जुर - मिल के हम, गोरा - मन ला खेदारी
अपन - देश आज़ाद  करे  बरचलो - जेल - सँगवारी।"

15 अगस्त सन् 1947 को हमें आज़ादी मिल गई, तो गाँधी जी की अगुवाई में दलित जी ने जन - जागरण को संदेश दिया -
" झन सुत सँगवारी जाग - जाग, अब तोर देश के खुलिस भाग
सत अउर अहिंसा सफल रहिस, हिंसा के मुँह मा लगिस आग।
जुट - मातृ - भूमि के सेवा मा, खा - चटनी बासी - बरी - साग
झन सुत सँगवारी जाग - जाग, अब तोर देश के खुलिस भाग।
उज्जर हे तोर- भविष्य - मीत,फटकार - ददरिया सुवा - राग
झन सुत सँगवारी जाग - जाग अब तोर देश के खुलिस भाग ।"

हमारे देश की पूँजी को लूट कर, लुटेरे फिरंगी ले गए, अब देश को सबल बनाना ज़रूरी था, तब दलित ने जन -जन से, देश की रक्षा के लिए, धन इकट्ठा करने का बीडा उठाया -
" देने का समय आया, देओ दिल खोल कर, बंधुओं बनो उदार बदला ज़माना है
देने में ही भला है हमारा औ तुम्हारा अब, नहीं देना याने नई आफत बुलाना है।
देश की सुरक्षा हेतु स्वर्ण दे के आज हमें, नए- नए कई अस्त्र- शस्त्र मँगवाना है
समय को परखो औ बनो भामाशाह अब, दाम नहीं अरे सिर्फ़ नाम रह जाना है।"

छ्त्तीसगढ के ठेठ देहाती कवि कोदूराम दलित ने विविध छंदों में छ्त्तीसगढ की महिमा गाई है। भाव - भाषा और छंद का सामञ्जस्य देखिए -
                          चौपाई छंद

"बन्दौं छ्त्तीसगढ शुचिधामा, परम - मनोहर सुखद ललामा
जहाँ सिहावादिक गिरिमाला, महानदी जहँ बहति विशाला।
जहँ तीरथ राजिम अति पावन, शबरीनारायण मन भावन
अति - उर्वरा - भूमि जहँ केरी, लौहादिक जहँ खान घनेरी ।"

                       कुण्डली

" छ्त्तीसगढ पैदा - करय अडबड चाँउर - दार
हवयँ लोग मन इहाँ के, सिधवा अऊ उदार ।
सिधवा अऊ उदार हवयँ दिन रात कमावयँ
दे - दूसर ला मान अपन मन बासी खावयँ ।
ठगथें ए बपुरा- मन ला वञ्चक मन अडबड
पिछडे हावय अतेक इही कारण छ्त्तीसगढ ।"

                         सार - छंद

" छ्न्नर छ्न्नर चूरी बाजय खन्नर खन्नर पइरी
हाँसत कुलकत मटकत रेंगय बेलबेलहिन टूरी ।
काट काट के धान - मढावय ओरी - ओरी करपा
देखब मा बड निक लागय सुंदर चरपा के चरपा ।
लकर धकर बपरी लइकोरी समधिन के घर जावै
चुकुर - चुकुर नान्हें बाबू ला दूध पिया के आवय।
दीदी - लूवय धान खबा-खब भाँटो बाँधय - भारा
अउहाँ झउहाँ बोहि - बोहि के भौजी लेगय ब्यारा।"

खेती का काम बहुत श्रम - साध्य होता है, किंतु दलित जी की कलम का क़माल है कि वे इस दृश्य का वर्णन, त्यौहार की तरह कर रहे हैं। इन आठ पंक्तियों से सुसज्जित सार छंद में बारह दृश्य हैं, मुझे ऐसा लगता है कि दलित जी की क़लम में एक तरफ निब है और दूसरी ओर तूलिका है, तभी तो उनकी क़लम से लगातार शब्द - चित्र बनते रहते है और पाठक भाव - विभोर हो जाता है, मुग्ध हो जाता है ।

निराला की तरह दलित भी प्रगतिवादी कवि हैं । वे समाज की विषमता को देखकर हैरान हैं, परेशान हैं और सोच रहें हैं कि हम सब, एक दूसरे के सुख - दुख को बाँट लें तो विषमता मिट जाए -

                             मानव की

" जल पवन अगिन जल के समान यह धरती है सब मानव की
हैं  किन्तु कई - धरनी - विहींन यह करनी है सब - मानव की ।
कर - सफल - यज्ञ  भू - दान विषमता हरनी है सब मानव की
अविलम्ब - आपदायें - निश्चित ही हरनी - है सब- मानव की ।"

                                     श्रम का सूरज

" जाग रे भगीरथ - किसान धरती के लाल आज तुझे ऋण मातृभूमि का चुकाना है
आराम - हराम वाले मंत्र को न भूल तुझे आज़ादी की - गंगा घर - घर पहुँचाना है ।
सहकारिता से काम करने का वक्त आया क़दम - मिला के अब चलना - चलाना है
मिल - जुल कर उत्पादन बढाना है औ एक - एक दाना बाँट - बाँट - कर खाना है ।"

                                     सवैया

" भूखों - मरै उत्पन्न करै जो अनाज पसीना - बहा करके
बे - घर हैं  महलों को बनावैं जो धूप में लोहू - सुखा करके ।
पा रहे कष्ट स्वराज - लिया जिनने तकलीफ उठा - करके
हैं कुछ चराट चलाक उडा रहे मौज स्वराज्य को पा करके ।"

गरीबी की आँच को क़रीब से अनुभव करने वाला एक सहृदय कवि ही इस तरह, गरीबी को अपने साथ रखने की बात कर रहा है । आशय यह है कि - " गरीबी ! तुम यहाँ से नहीं जाओगी, जो हमारा शोषण कर रहे हैं, वे तुम्हें यहाँ से जाने नहीं देंगे और जो भूखे हैं वे भूखे ही रहेंगे ।" जब कवि समझ जाता है कि हालात् सुधर नहीं सकते तो कवि चुप हो जाता है और उसकी क़लम उसके मन की बात को चिल्ला - चिल्ला कर कहती है -

                                      गरीबी

" सारे गरीब नंगे - रह कर दुख पाते हों तो पाने दे
दाने दाने के लिए तरस मर जाते हों मर जाने दे ।
यदि मरे - जिए कोई तो इसमें तेरी गलती - क्या
गरीबी तू न यहाँ से जा ।"

कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि गाय जो हमारे जीवन की सेतु है, जो ' अवध्या' है, उसी की हत्या होगी और सम्पूर्ण गो - वंश का अस्तित्व ही खतरे में पड जाएगा । दलित जी ने गो - माता की महिमा गाई है । बैलों की वज़ह से हमें अन्न - धान मिल जाता है और गो -रस की मिठास तो अमृत -तुल्य होती है। दलित जी ने समाज को यह बात बताई है कि-"गो-वर को केवल खाद ही बनाओ,उसे छेना बना कर अप-व्यय मत करो" -

                                    गो - वध बंद करो

" गो - वध बंद करो जल्दी अब, गो - वध बंद करो
भाई इस - स्वतंत्र - भारत में, गो - वध बंद करो ।
महा - पुरुष उस बाल कृष्ण का याद करो तुम गोचारण
नाम पडा गोपाल कृष्ण का याद करो तुम किस कारण ?
माखन- चोर उसे कहते हो याद करो तुम किस कारण
जग सिरमौर उसे कहते हो, याद करो तुम किस कारण ?
मान रहे हो देव - तुल्य उससे तो तनिक-- डरो ॥

समझाया ऋषि - दयानंद ने, गो - वध भारी पातक है
समझाया बापू ने गो - वध राम राज्य का घातक है ।
सब  - जीवों को स्वतंत्रता से जीने - का पूरा - हक़ है
नर पिशाच अब उनकी निर्मम हत्या करते नाहक हैं।
सत्य अहिंसा का अब तो जन - जन में भाव - भरो ॥

जिस - माता के बैलों- द्वारा अन्न - वस्त्र तुम पाते हो
जिसके दही- दूध मक्खन से बलशाली बन जाते हो ।
जिसके बल पर रंगरलियाँ करते हो मौज - उडाते हो
अरे उसी - माता के गर्दन- पर तुम छुरी - चलाते हो।
गो - हत्यारों चुल्लू - भर - पानी में  डूब - मरो
गो -रक्षा गो - सेवा कर भारत का कष्ट - हरो ॥"

शिक्षक की नज़र पैनी होती है । वह समाज के हर वर्ग के लिए सञ्जीवनी दे - कर जाता है । दलित ने बाल - साहित्य की रचना की है, बच्चे ही तो भारत के भविष्य हैं -

                    वीर बालक

"उठ जाग हिन्द के बाल - वीर तेरा भविष्य उज्ज्वल है रे ।
मत हो अधीर बन कर्मवीर उठ जाग हिन्द के बाल - वीर।"

अच्छा बालक पढ - लिख कर बन जाता है विद्वान
अच्छा बालक सदा - बडों का करता  है सम्मान ।
अच्छा बालक रोज़ - अखाडा जा - कर बनता शेर
अच्छा बालक मचने - देता कभी नहीं - अन्धेर ।
अच्छा बालक ही बनता है राम लखन या श्याम
अच्छा बालक रख जाता है अमर विश्व में नाम ।"

अब मैं अपनी रचना की इति की ओर जा रही हूँ, पर दलित जी की रचनायें मुझे नेति - नेति कहकर रोक रही हैं । दलित जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं । समरस साहित्यकार, प्रखर पत्रकार, सजग प्रहरी, विवेकी वक्ता, गंभीर गुरु, वरेण्य विज्ञानी, चतुर चित्रकार और कुशल किसान ये सभी उनके व्यक्तित्व में विद्यमान हैं, जिसे काल का प्रवाह कभी धूमिल नहीं कर सकता । हरि ठाकुर के शब्दों में -
" दलित जी ने सन् -1926 से लिखना आरम्भ किया उन्होंने लगभग 800 कवितायें लिखीं,जिनमें कुछ कवितायें तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई और कुछ कविताओं का  प्रसारण आकाशवाणी से हुआ । आज छ्त्तीसगढी में लिखने वाले निष्ठावान साहित्यकारों की पूरी पीढी सामने आ चुकी है किंतु इस वट - वृक्ष को अपने लहू - पसीने से सींचने वाले, खाद बन कर, उनकी जडों में मिल जाने वाले साहित्यकारों को हम न भूलें।"

साहित्य का सृजन, उस परम की प्राप्ति के पूर्व का सोपान है । जब वह अपने गंतव्य तक पहुँच जाता है तो अपना परिचय कुछ इस तरह देता है, और यहीं पर उसकी साधना सम्पन्न होती है -

                              आत्म परिचय

" मुझमें - तुझमें सब ही में रमा वह राम हूँ- मैं जगदात्मा हूँ
सबको उपजाता हूँ पालता- हूँ करता सबका फिर खात्मा हूँ।
कोई मुझको दलित भले ही कहे पर वास्तव में परमात्मा हूँ
तुम ढूँढो मुझे मन मंदिर में मैं मिलूँगा तुम्हारी ही आत्मा हूँ।"

शकुन्तला शर्मा, भिलाई                                                   
मो. 93028 30030                                                          
                                           
सन्दर्भ ग्रंथ
1- बहुजन हिताय बहुजन सुखाय - कवि - कोदूराम दलित
2- छ्त्तीसगढ के कुछ महत्वपूर्ण कवि - डा. बल्देव
3- सियानी गोठ - कवि -  कोदूराम दलित .  

  

Tuesday, 14 February 2017

आल्हा छंद

दिव्य - गुणों को ही अपनाओ, जीवन बन जाए वरदान
हे प्रभु बस इतना समझाओ, सार्थक हो जाए अभियान ।

यह मानव अद्भुत प्राणी है, यह कर सकता है सब काम
करुणा दया मधुर - बानी है, जग में कर सकता है नाम ।

कुछ भी होता नहीं असंभव, दिव्य - गुणों का है भण्डार
बन सकता है तत्सम - तद्भव, अद्भुत है इसका - संसार ।

आँख - देखती है सब कुछ - पर, नहीं देख पाती है - नैन
बस ऐसा ही है अपना - घर, सब कुछ है पर नहीं है चैन ।

दृष्टि - सृष्टि को समझाती हो, दे - दो ऐसा अनुपम ज्ञान
तथ्य समझ कर अपनाती हो, ऐसी वाणी बोल - बखान।

बहुत हो गया आना - जाना, अब तो हो जाए सम्भाव्य
मानव खुद है बडा - खज़ाना, आ - जाए मन में वैराग्य ।

कर्म - धर्म को समझें - जानें, ऐसा हो अद्भुत - आधार
जो सम्यक् है उसको - मानें, आदर्शों - की हो - पतवार ।

रोते - रोते हम आए - हैं, अब - जायेंगे - ले कर - हास
दास - कबीरा से पाए हैं, यह अद्भुत - अनुपम - विश्वास ।
 

Monday, 23 January 2017

कुण्डली

छन्द की बात अलग है, लिखती - हूँ  मै छन्द     
मिलन की रात विलग है ,मुझे मिला मकरंद।
मुझे- मिला - मकरन्द ,छन्द  में आकर्षण  है
अद्भुत  है आनन्द, छन्द  में  सम - अर्पण है ।
सुरति निरति का कंद,अजब आभास अमल है
लिखती हूँ  मैं छन्द ,छन्द की बात अलग  है ।

शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छ्त्तीसगढ

नमामि गंगे

किसने  मैली  की  है गंगा इसको अब स्वच्छ करेगा कौन
हमने  ही  मैली  की  है  गंगा  मान लो अब तोडो यह मौन ।

मुँह  में  राम  बगल  में छूरी कथनी - करनी का अन्तर है
ले - डूबा  सम्पूर्ण  देश  को अब अनुभव  होता अक्सर  है ।

गंगा  पर  शव - दाह  मत  करो इससे मोक्ष नहीं मिलता है
मनुज कर्म से पुण्य कमाता मानस कमल तभी खिलता है ।

अस्थि - विसर्जन  से अब  कैसे  बचे  बेचारी  गंगा - माई
खुद मैली हो गई है देखो रोई फिर हमें गुहार गुहार लगाई ।

ऑचल - उज्ज्वल  हो  गंगा  का  ऐसी  कोई युक्ति बताओ
मन में गंगा - पूजन  हो बस यही  बात सबको समझाओ ।

गंगा सम यदि मन हो पावन कठौती में आ जाती है गंगा
यही  प्रयास  करें  हम  हरदम  सदा  हमारा  मन हो चंगा ।

भारत की हर नदिया गंगा है रखना है  इसका  भी  ध्यान
हर नदिया हो स्वच्छ हमारी चलता रहे सतत अभियान ।

फूट - फूट कर यह रोती है थक- कर हुई स्वतः अब मौन 
किसने मैली की है गंगा अब इसको स्वच्छ करेगा कौन ?