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Friday, 5 September 2014

शिक्षक - दिवस

शिक्षक कुम्हार गीली मिट्टी को
             देता  है सुन्दर - तम आकार ।
क्षणिक भले वह दुख देता हो
             पर  करता  हम  पर उपकार ।
कष्ट  उठा - कर दीक्षा  देता
              जीवन  समुचित  गढता  है ।
दिन रात साधना वह करता
               तभी शिष्य आगे बढता  है ।
वह अपना कर्तव्य समझ कर
                अपना दायित्व निभाता है ।
सम्यक रूप आकार प्राप्त कर
                 राष्ट्र  तभी  गौरव  पाता है ।
शकुन्तला शर्मा , भिलाई , मो.09302830030     

Sunday, 22 June 2014

निद्रा

जीव - मात्र को गोद में अपनी प्रतिदिन तुम्हीं सुलाती हो 
व्यथा  सभी  की हर लेती हो स्वप्न - नए दिखलाती हो ।

चेतन  होते  थके -  हुए  जन  नव - जीवन  पा  जाते  हैं
पा उमँग का उत्स तुम्हीं से नव- राग-रागिनी गाते  हैं ।

दुख  से  जब  घिर जाता मानव तुम्हीं सान्त्वना देती हो
दुख  से   भूख से नींद बडी है स्वयं - सिध्द कर देती हो ।

शिशु  जब  रो - रो  कर   थक जाता गोद में तेरी जाता है 
निद्रा से  विश्राम  प्राप्त  कर  व्यथा - मुक्त  हो  जाता  है ।

देह  में  जब  पीडा  होती  है  तुम्हीं  कष्ट  को  हरती  हो 
मन - बहला - कर धीरे - धीरे घाव मनुज का भरती हो ।

राजा   हो  या  रंक  सभी  को  गोद  तुम्हारी  प्यारी  है 
सभी  प्यार  करते  हैं  तुमसे  तेरी  महिमा   न्यारी है ।

जिजीविषा  तेरा  -  प्रसाद  है आकॉक्षा  तेरा  वर  - दान 
तुम ही तो जय की माध्यम हो कृतज्ञता का होता भान ।

प्राण - शक्ति का क्षरण रोकती माता - सम तुम हो सबकी
तुमसे ऊर्जा पाकर हम दुख अर्पित करते  निज- उर की ।

प्रिय - जन भी जब साथ छोडते तुम देती हो अपना ऑचल
बॉह - पकड आश्रय देती हो होता है जब अन्तर - व्याकुल ।

जब  शरीर  का  क्षय  होता  है  जरा - जीर्ण  हो   जाता देह 
सदा - सदा के लिए पकड कर ले जाती हो तुम निज-गेह ।

जीवन  का संग्राम  झेल कर जब यह तन - थक जाता है 
महा - नींद  में तुम्हीं  सुलाती  तभी शान्ति वह पाता  है ।

जब  वह  पुनः जन्म  लेता  है तब  भी  साथ  निभाती  हो 
जन्मान्तर भी आश्रय देकर  तुम  दिव्यता  सिखाती  हो ।