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Monday, 11 January 2016

भूमिका

      बेटी बचाओ

" बेटी बचाओ "  नारा देश को संयमित - संतुलित करने का संदेश सम्प्रेषित करता है । अजन्मी - बेटी को दुनियॉ देखने के पूर्व मार डालना,जघन्य हत्या तो है ही, सामन्ती सोच की शोषण - वृत्ति और रूढिग्रस्त पारम्परिक प्रवृत्ति का पोषण भी है जो प्रकारांतर में पुरुषवादी समाज के अहं की तुष्टि का कुत्सित स्वरूप दिग्दर्शित करता है । जन्म लेते ही बेटे और बेटी में अंतर निर्दिष्ट करना और जीवन पर्यन्त इस भेद को बनाए - बढाए रखना निम्न - निकृष्ट व सीमित - संकुचित दृष्टि का प्रतिफलन है जो अद्य - पर्यन्त अक्षुण्ण है । शिक्षा - शास्त्री और मनोवैज्ञानिक इस विषय को वैचारिक वितान विनिर्मित कर विवेचित विश्लेषित करते हैं जबकि एक कवि संवेदना से संपृक्त कर इस तरह प्रस्तुत करता है कि वह सीधा मर्म को स्पर्श करता है । ' बेटी ' वह भी यदि विकलॉग हो तो भावना की छलॉग कविता में, आख्यानकता का आश्रय ढूँढती है और यदि लेखनी कवयित्री की हो तो 'सोने में सुहागा ' का मुहावरा मूर्त्त हो जाता है ।

एक महिला साहित्यकार के रूप में शकुन्तला शर्मा देश - विदेश में छत्तीसगढ का नाम रोशन कर रही हैं । इनकी रचनाओं में इक्कीसवीं सदी के नव्य स्पर्श  "विकलॉग - विमर्श  " का  वृत्त विनिर्मित करने का उद्यम उपस्थित है । छत्तीसगढी की विकलॉग -विमर्ष-विषयक लघु-कथाओं का संग्रह  "करगा" इनकी चर्चित कृति है और अब इसके बाद  "बेटी बचाओ " शीर्षक  से विकलॉग विमर्श के आख्यानक गीतों का संग्रह प्रस्तुत हो जाना महत्वपूर्ण घटना का सूत्रपात ही कहा जाएगा। कवयित्री की घुमक्कड-वृत्ति और अकादमिक, साहित्यिक,सामाजिक  संस्थाओं  के  आमंत्रण पर सहर्ष उपस्थित होने की प्रवृत्ति ने उन्हें अनुभव का जो व्यापक धरातल दिया उससे उनके विषय को भी असीम आकाश मिला । " जिन खोजा तिन पाइयॉ " के अनुरूप रुचि -प्रवृत्ति की नींव " जहॉ चाह वहॉ राह "  के भवन को आकार देती है तदनुरूप शकुन्तला शर्मा जो देखना चाह रही हैं, वह दृश्य उनके समक्ष प्रस्तुत हो जाता है । आसपास से लेकर प्रदेश और देश - विदेश - पर्यन्त   उन्हें जितने भी विकलॉग मिले उन्होंने उनके जीवन को जाँचकर और आदमियत को ऑक कर आख्यानक गीतों का जो ताना - बाना रचा, वह हिन्दी काव्य - जगत के लिए भी नयी भाव - भूमि प्रदान करती है । उन्होंने संग्रहीत इंक्यावन विकलॉगजन्य आख्यानक गीत लिखकर विकलॉगों का जो जीवन -दर्शन प्रस्तुत किया वह अनुपम - अद्भुत है । इन कथा - गीतों में कहीं भी विकलॉग - जन, दया या कृपा के पात्र नहीं हैं । वे सभी आत्मबल के पथ से, आत्मनिर्भरता का गन्तव्य ही प्राप्त नहीं करते अपितु उत्कट - जिजीविषा के जज़्बे को  अक्षुण्ण रखकर उत्कर्ष को स्पर्श कर लेने का माद्दा भी रखते हैं । वे सकलॉगों की तरह न शार्टकट का सहारा लेते हैं न और न ही बेईमानी और भ्रष्टाचार की सीढी से आगे बढने का तिकडम करते हैं । सत्कर्म से सद्गति को सिद्ध करने और प्रतिभा तथा मेधा के आश्रय से, गतिमान होने के लिए वे साधनामय कर्मठ को लक्ष्य बनाते हैं । अंग विशेष की अल्पता या शिथिलता के कारण, प्रकृति ने इन्हें जो अतिरिक्त शक्ति - क्षमता प्रदान की है,उसे सक्रिय करके वे जटिल - जीवन को विरल तथा प्रतिकूल स्थिति को अनुकूल बना लेने में सिद्ध - हस्त होते हैं । ऐसे चरित्रों को खोजकर, प्रसंगों तथा घटनाओं को उकेर कर, आख्यान के रूप में अधिष्ठित कर, संवेदना के सॉचे में ढालकर, काव्य के रूप में, अभिव्यक्त कर देना सरल कार्य नहीं है । यह शकुन्तला शर्मा जैसी सिद्ध कवयित्री से ही सम्भव है ।

विकलॉग को सहानुभूति नहीं,समानुभूति चाहिए जो कवयित्री के मन में भरी हुई है -

' सरगुजा में एक संगवारी है पर उसके नहीं हैं दोनों हाथ ।
वैसे तो हम दूर - दूर हैं पर मन से रहते हैं साथ - साथ ॥ '

निशक्त निर्विवाद रूप से अशक्त नहीं,सशक्त हैं जो अपनी प्रतिभा का लाभ समाज को समर्पित कर देते हैं -

' जिसको क़मज़ोर समझते थे वह धुरी पडी सब पर भारी ।
उससे साक्षात्कार हो गया यह भी है तकदीर हमारी ॥
वह दुनियॉ - भर में जानी जाती औषधि अन्वेषण करती है
नवजीवन जग को देती है सञ्जीवनी रग में भरती है ॥'

विकलॉगों की कर्मठता, ईमानदारी सच्चरित्रता, उदारता, कृतज्ञता आदि नानाविध दिव्य - गुणों को अनावृत्त करके कवयित्री ने उनके साथ जो संलग्नता और अंतरंगता दिखलाई है, यही विकलॉग - विमर्श का गन्तव्य - मन्तव्य है । उल्लेखनीय है कि सामान्य सी चोट या चुभन हमारा धीरज छीन लेती है परिणामतः हम उपचार और आराम करते हैं, जबकि एक अंग की अनुपस्थिति के बाद भी विकलॉग - जन अपने कार्य को कुशलता पूर्वक अर्थात् सहर्ष सम्पादित कर लेते हैं -
' छोटी सी चोट से हम चिल्लाते लेते नहीं धैर्य से काम
कुछ भी काम नहीं कर पाते करते हैं दिन भर आराम ।
पर बिना हाथ की होकर भी वह पैरों से करती है काम
जिजीविषा उसकी प्रणम्य है करती हूँ मैं उसे प्रणाम ॥'

विकलॉगों के मन में परोपकारिता व पर दुख कातरता है, वह सहज रूप से सकलॉगों में सम्भव नहीं है -
' वाणी - वैभव से वञ्चित बुधिया इतना सब कुछ करती है
आओ उससे जाकर पूछें वह मन में क्या गुनती रहती है ।
उसने लिख कर मुझे बताया यह जीवन है पर - उपकार
परोपकार में सच्चा सुख है यह ही है जीवन का आधार ॥'

विकलॉग पुष्पा सी. बी. आई. में अधिकारी है, जिसने डाकुओं से, रेल - यात्रियों को बचा कर स्फूर्ति - साहस और विवेक - युक्ति का जो करतब दिखाया, वह सन्तुलन - कुशलता व प्रबन्धन - पटुता सचमुच प्रणम्य है -'उस दिन पुष्पा ने मुझे बचाया मुझ पर है उसका एहसान
एक - हाथ वाली लडकी पर अब मुझको भी है अभिमान ।
त्वरित सोच से ही दिखलाया अद्भुत अनुपम आस अदम्य
पराक्रमी  है  मेरी  पुष्पा  वह  हस्ताक्षर  है  एक  प्रणम्य । '
विकलॉग किसी के आश्रय का मोहताज़ नहीं होना चाहता । वह अपना रास्ता बनाने और उस पर स्वतः प्रस्थित होने का पक्षपाती है -
' मदद किसी की लिए बिना ही देखो उसके उच्च - विचार
अपना काम स्वयं करती  है नहीं किसी पर  है वह भार ।'
एक ही भाव - भूमि पर रचित कविताओं में पुनरुक्ति का प्रश्रय सहज है लेकिन यह दोष के रूप में नहीं, अपितु विभिन्न - प्रसंगों में उसे पुष्ट करने की दृष्टि से प्रयुक्त है । इसी तरह लोक - कथाओं के  'लोक - अभिप्राय ' की तरह वर्णन - साम्य [ पुनरुक्ति - प्रयोग ]  काव्य को दुर्बल नहीं प्रत्युत सबल - समर्थ बनाने का संयोजन सिद्ध हुआ है -
' रात के पीछे  दिन आता  है दिन  के पीछे आती रात
एक एक दिन करते करते बीत गई कितनी बरसात ।'

भाषा पर कवयित्री का जबर्दस्त अधिकार है । सरल - सहज होते हुए भी इनकी भाषा सरल - सुबोध है । अरबी - फारसी और अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्दों के समाहार और यथावसर यत्किंचित् ऑचलिकता के व्यवहार से भाषा, भावों - विचारों को सम्प्रेषित कर पाने में सक्षम - समर्थ है । अलंकार भावोत्कर्ष में सहायक और छ्न्द, भावों के विधायक रूप में अलंकृत है । इस अभिनव कृति से यदि पाठकों को नयी दशा व दिशा की ओर मंथन करने का सुअवसर प्राप्त हुआ तो यह इस कृति के प्रकाशन की सार्थकता होगी । शुभ कामनाओं सहित -
सी- 62, अज्ञेय नगर ,                                                          डा. विनय कुमार पाठक
बिलासपुर छ्त्तीसगढ                                                     एम. ए., पी. एच. डी., डी. लिट् [ हिन्दी ] 
मो- 092298 79898                                                      पी. एच. डी., डी. लिट् [ भाषा विज्ञान ]
                                                                                         निदेशक प्रयास प्रकाशन

Tuesday, 19 May 2015

हिन्दुस्तान बहुत सुन्दर है

हिन्दुस्तान  - बहुत - सुन्दर  है  पर  सुन्दर  है  हैदराबाद
हैदराबाद  में  घूम  रही  थी  एक - घटना  मुझको है याद ।

मुझको मोती खरीदना था थी चारमीनार के पास दुकान
मोती - पिरो  रही  थी लडकी  पर देख - रही थी मैं हैरान ।

उसके  दोनों - हाथ  नहीं  थे पॉवों से वह करती थी काम
जल्दी - जल्दी पिरो रही थी निपटाती थी काम - तमाम ।

कई - मोतियों  की  मालायें  मैंने -  मन  से मोल - लिया
भाव  नहीं  कम - करवाए  थे सबका वाज़िब दाम - दिया ।

मन था एक - बार  लडकी  से  बात  करूँ मैं अपने - आप
पर परेशान न कर दे मालिक़  इस डर से लौटी - चुपचाप ।

छोटी सी चोट से हम - चिल्लाते लेते  नहीं  धैर्य से काम
कुछ  भी  काम  नहीं कर पाते करते हैं दिन - भर आराम ।

पर  बिना - हाथ  की होकर भी वह पैरों से करती है काम
जिजीविषा  उसकी  प्रणम्य  है  करती  हूँ  मैं उसे प्रणाम ।

हम सबका दायित्व यही  है  हम - सब इनके काम आयें
सुख - साधन उन तक पहुँचायें उनसे जुडकर हाथ बँटायें ।

मन में हाहाकार मचा है जब से उससे मिल - कर आई हूँ
सम्  - भाषण भी हुआ नहीं है मैं बहुत - बहुत पछताई हूँ ।


Friday, 15 May 2015

अमर रहे यह हिन्दुस्तान

अरुणाचल में  एक  लडकी है पर वह देख नहीं सकती है
पर उसको सुर मिला  है सुन्दर  वह हरदम गाती रहती है ।

बारह - बरस की है वह लडकी नाम मिला है उसको माया
मन में गीत स्वयं  रचती  है मधुर - विरासत उसने पाया ।

माया की मॉ सुन्दर - गाती है उसको मिला वही - उपहार
अरुणाचल में  सब कुछ अच्छा है मगर -पडोसी है बेकार ।

आए - दिन  दुन्दुभि - बजाते  वे  भारत  में  घुस आते  है
सौ -बार दिखाया सरहद उनको पर वे समझ नहीं पाते हैं ।

पन्द्रह - अगस्त के मौके पर अरुणाचल जश्न  मनाता  है
यदि प्रधान अरुणाचल जाता तो दुखी पडोसी हो जाता है ।

इस अवसर पर माया को भी कहनी  है  कुछ मन की बात
सुर  में पिरो - दिया  शब्दों  को ' बोलो कितनी है औकात ।'

घुसे - चले आते  हो  हरदम  यह  कैसी  है  रण  की  नीत
हम तो  कभी नहीं घुसते हैं हमने तो सदा  निभाई - प्रीत ।

दुनियॉ - भर में पटा - हुआ है बस  तेरे  ही  घर  का  माल
फिर  भी  कैसी  दरिद्रता  है  सबसे बडा  है  यही - सवाल ।

हम - उद्यम करते  हैं घर में  नहीं  झॉकते किसी का  घर
तुम  भी अपनी - सीमा  में ही सदा सिमट कर रहो मगर ।

रक्त - पात  हम  नहीं  चाहते मगर नहीं हैं हम - क़मज़ोर
सज्जनता और  कायरता  में अन्तर  होता  है  पर - घोर ।

यह वसुधा कुटुम्ब है मेरा ऋषि - मुनियों की हम संतान
इम्तिहान न  लो  धीरज  का जाग - गया  है हिन्दुस्तान ।'

यह उद् बोधन  गीत अद्भुत था मंत्र मुग्ध सुन रहे थे लोग
करतल ध्वनि तब गूँज उठी है यह है माया का सुर- योग ।

मन्त्री  जी  थे  वहॉ उपस्थित  मिला  है माया को उपहार
पॉच - लाख  का  चेक  मिला  है यह है माया पर उपकार ।

माया को अब पंख - लग गए बढा है खुद पर  ही विश्वास
'मैं अब कुछ भी कर सकती  हूँ मैं भी बन सकती हूँ खास ।'

देश - प्रेम  बस  गया है  मन में ऐसा है मेरा देश - महान
सब कुछ इसके लिए समर्पित अमर रहे यह हिन्दुस्तान ।

 

Tuesday, 5 May 2015

मेहनत का फल मीठा होता

घर - भर में सन्नाटा - छाया कानी - खोरी- छोरी जन्मी है
मॉ  की  छाती - पर  पत्थर है उसके मुँह में जमा - दही है ।

ढेली उसका - नाम  पड - गया  पहली - कक्षा  में आई  है
वैद -  विदुषी  है  उसकी  मॉ अपनी - मॉ  की  परछाईं  है ।

मोती - जैसे सुन्दर - अक्षर  हैं  वह पढने में  होशियार  है 
मन में पीडा अनुभव - करती कडुवे सच पर वह सवार है ।

दृष्टि - कोण है निरा - निराला वह स्वभाव से ही खोजी है
कौतूहल  है  मन  में  इतना  वह अद्वितीय  है  जो  भी  है ।

रात  के  पीछे  दिन आता  है  दिन  के पीछे आती है रात
एक - एक  दिन करते - करते  बीत गई कितनी बरसात ।

ढेली अब - कॉलेज़ में पढती है बायो की वह - विद्यार्थी है
कुछ कुछ नया खोजती रहती अन्वेषण की अभिलाषी है ।

मॉ के संग  संग लगी है ढेली वह औषधि-शोधन करती है
बरसों से वह लगी हुई है कुछ - प्रयोग करती - रहती है ।

एक - अनार के पौधे - पर वह डाल - रही है औषधि - एक
जिससे - पौधा थोडे - दिन में देगा - बडे - अनार - अनेक ।  

Friday, 17 April 2015

जो साहस से कदम बढाता

भवतरा में एक लंगडी लडकी है उसका नाम सहोदरा है
सहोदरा  को सभी  चिढाते पर सहोदरा बस  सहोदरा है ।

सबका ध्यान सदा रखती है सबके प्रति सुंदर व्यवहार
दसवीं - कक्षा में वह पढती है सुन्दर है आचार  विचार ।

पढने में वह होशियार है अपनी कक्षा में अव्वल आती
संस्कृत के मन्त्रों को सुंदर वह लय में गाकर दोहराती ।

षोडश - संस्कार  करवाती  गॉव - गॉव में वह जाती है
पूरी - श्रद्धा से वह  सब  का संस्कार  खुद - करवाती है । 

जो कुछ  इससे मिल जाता है घर में चूल्हा - जलता है
सब्ज़ी - भाजी आ जाती है मॉ -  बेटी का पेट पलता है ।

बडी  हो  रही  है  सहोदरा  बडा  हो  रहा उसका -  नाम
बारहवीं पास किया है उसने मिला तिपहिए का ईनाम ।

अब सहोदरा की चर्चा होती  पूरी - दुनियॉ भर में आज
मन्त्रों का सुंदर उच्चारण सुनता है यह सकल- समाज ।

सहोदरा की सी.  डी.बिकती दुनियॉ ध्यान से सुनती है
अनुष्ठान है मानव - जीवन वह अपने मन में गुनती  है ।

सम्बल - बार - गॉव में रहता सहोदरा से करता - प्यार
सहोदरा  से  मिलने आया कर बैठा  फिर वह - इज़हार ।

सहोदरा  मन ही मन हँसती सम्बल अच्छा लगता  है
जो साहस से क़दम - बढाता सम्बल उसको मिलता है ।



Saturday, 11 April 2015

बिन ऑखों की इस बच्ची ने

सोनी - गोवा  में  रहती  है  पर  वह  देख  नहीं  सकती है
पर - तैराकी  में अव्वल है  वह  पुरस्कार - पाती रहती  है ।

बारह - बरस की हुई  है सोनी स्वीमिंग ही है उसका काम
यही जल  - परी जन - प्रिय  भी  है तैराकी में बडा है नाम ।

बडी - बडी  स्पर्धा  में  भी  वह  पाती - रहती  है  पुरस्कार
टी - वी - चैनल  पर  वह  छाई  नहीं  जानती  है वह - हार ।

कठिन - परिश्रम वह करती है उसका गुरु केवल अभ्यास
प्रैक्टिस - पर  है उसे  भरोसा  उस - पर  है  पूरा - विश्वास ।

उसे - देख सब प्रेरित होते वह सबको  प्रोत्साहित  करती
हम सबको अचरज होता है पर सोनी  की  हिम्मत बढती ।

छोटे - छोटे - बच्चों  को  वह  तैराकी के गुर - सिखलाती
बहुत - प्यार  से  उन  बच्चों को तैराकी के गुण बतलाती ।

सरकार से सुविधा मिलती है बस एक सुनहरा अवसर हो
विविध - विधा के पुल हों पर वह एक  कैंपस के भीतर हो ।

सोनी  ने  जो  सपना देखा था उसका  पूरा  हुआ है सपना
हर - बच्चा  पुल  में आता  है देश  का हर बच्चा है अपना ।

बिन ऑखों की इस बच्ची ने खोल दी सबकी ऑखें -आज
संकल्प - सभी  के पूरे  होंगे जब जागेगा सकल - समाज ।

मन भर खीर - सोंहारी खाओ

सुकमा जिले में रहती  सरला पर वह बोल  नहीं  पाती  है
पर उसके  हाथ में जादू  है वह  खुमरी - सुघर  बनाती  है ।

दायी के साथ लगी रहती  है  छोटी  है  मेहनत - करती है
नवमी - कक्षा  में  पढती  है  घर आ कर खुमरी  बुनती है ।

बस्तर  में  बस्तर  के  बाहर  खुमरी  बहुत लोक - प्रिय है
खुमरी  सब  से बढिया - रक्षक  मॉग - बढेगी  निश्चित  है ।

छतरी - टोपी का विकल्प यह कितना  सुन्दर  दिखता है
आकर्षित  करता  वह  सबको और धडल्ले से  बिकता  है ।

एक - एक दिन  करते - करते  बीत  गई कितनी बरसात
सरला  ने  फैक्ट्री - डाली है खुमरी बनता दिन और - रात ।

घर  की  हालत  हुई - सुनहरी हँसता है वह घर चुप - चाप
सरला  भी  हँसती रहती पर निपट - अकेली अपने - आप ।

सावन उसका सह - पाठी  है  फैक्ट्री  में वह करता - काम
उन  दोनों का घर आस - पास  है दोनों का है  'स' से  नाम ।

सावन - सरला एक - दूजे को करते  हैं  मन  ही मन प्यार
चुगल - खोर  हैं  ऑखें उनकी  कर  बैठी  हैं  अब - इज़हार ।

'शबरी' नदिया की कल कल भी जान गई है प्यार की बात
दौड - दौड कर सबसे - कहती  प्यार  की  बातें सारी - रात ।

सरला - सावन के बिहाव में तुम भी आमन्त्रित हो आओ
खुमरी का आनन्द - उठाओ मन भर खीर -सोंहारी खाओ ।

Wednesday, 1 April 2015

मुझको आज समझ में आया

पटाया - तट - पर  देखा  मैंने  लडकी  मजे  से तैर रही है
जब  मैं  उसके  पास  गई  तो  देखा  वह लडकी लंगडी है ।

बैंकाक  की  वही  जल - परी  पाती  है अनगिन सम्मान
ज़ेन  नाम  है उस - बच्ची  का अभी  हुई  उससे  पहचान ।

जब  मैं  उसके  पास  गई  तब  पास आई  तैरते -  तैरते
दोनों - हाथ  जुडे  थे  उसके  किया  नमस्ते हँसते - हँसते ।

प्रतिदिन तीन- चार घंटे वह स्वीमिंग का करती अभ्यास
ओलम्पिक  में  मैडल  लाना  है  ऐसा है उसको - विश्वास ।

मैं भी सुन  कर दंग रह गई ज़ेन की उमर है सोलह साल
पर कर रही तपस्या ऐसी मन में अनगिन कठिन सवाल ।

ज़ेन  की  जिजीविषा  है  ऐसी  जो  क़मज़ोरी  पर भारी  है
ओलम्पिक  में  जाए  न जाए बहुत है अब तक जो पाई है ।

दया कर रही  थी मैं उस पर उसने मुझे किया विषयान्तर
'यह तो कुछ भी नहीं है ऑटी ' समझाया था ऐसा कहकर ।

तन पर मन पडता है भारी ज़ेन  ने  ही  मुझको समझाया
मन मेरा कितना अतुल्य है मुझको आज समझ में आया । 

Monday, 23 March 2015

क्वाला लम्पुर में एक लडकी

क्वाला - लम्पुर  में  एक  लडकी  बेच  रही  थी आइसक्रीम
हँस - हँस कर वह कहती सबको खाओ आइसक्रीम सलीम ।

एक - हाथ  ही  था  लडकी  का  पर  चेहरे  पर  थी मुस्कान
'खाओ  तुम आइसक्रीम  हमारा  तुम  हो  मेरे  ही मेहमान ।

दो - रिंगिट  है  इसकी  कीमत तुम खाकर देखो एक - बार
टेस्टी  हो  तब  रिंगिट देना'  लडकी  कहती  थी  बार - बार ।

हम  सब  ने  तो  सोच  लिया  था आइसक्रीम सभी खायेंगे
दो - रिंगिट  ही  देंगे  उस  को  दाम  नहीं  कम - करवायेंगे ।

लडकी  ने  फिर  हमें  बताया  'मैं  भी  तो  हूँ  हिन्दुस्तानी
पूर्वज  यहॉ  बसे  थे आ -  कर  यही  कहा  करती  है  नानी ।'

लाजो  नाम था उस लडकी का हिन्दी बढिया बोल रही थी
सुन्दर  सुघर  सलोनी थी वह हम सबको वह तौल रही थी ।

'लाजो  घर  में  कौन - कौन हैं ' 'मैं  मॉ के साथ में रहती हूँ
मेरी अम्मा   सर्विस  करती  है  मैं  आइसक्रीम  बेचती  हूँ ।'

'पीडा  सबकी  एक  है लाजो हो मलेशिया या हिन्दुस्तान
चलो  बुलाता  देश  तुम्हारा एक ही मॉ की हम - सन्तान ।'

लाजो  की ऑखों  में ऑसूँ  थे अपने - पन ने उसे रुलाया
अपने  वतन  लौट आए  हम  पर  लाजो को नहीं भुलाया ।

मन  से  कितनी  समर्थ है लाजो यद्यपि तन से है लाचार
कर्म - मार्ग  पर  जो  चलता  है उसका होता है बेडा - पार ।


Saturday, 21 March 2015

केरल कितना हरा - भरा है

केरल कितना हरा - भरा है खाने को मिलता काजू -केला
ओणम  में  केरल आ जाओ घर - ऑगन में लगता मेला ।

केरल में रहती है कविता पर उसके दोनों - हाथ  नहीं  हैं
पॉव - हाथ  बन  गए  हैं उसके हो जाता हर काम सही है ।

कविता खुश है आज है ओणम नवा धान पाने का अवसर
ऑगन में अल्पना सजेगी चौक  फूल  से  बनती अक्सर ।

कविता  ने  अपने ऑगन  में  फूलों  से अल्पना - बनाई
फिर  पत्तों  को ऑचल  जैसे  वह अपनी अल्पना सजाई ।

इतनी सुंदर बनी अल्पना अद्भुत अद्वितीय और अनुपम
उसकी कला के कायल सब है  बनी अल्पना  सुन्दरतम ।

दुनियॉ भर में अब है चर्चित कविता की वह सुंदर रचना
कविता ने सोचा भी न था कभी भी ऐसा सुन्दर - सपना ।

हर  कोई  यह  जान  गया  है नहीं  हैं उस के दोनों - हाथ
फिर  भी लडकों में होड मची है सभी चाहते उसका साथ ।

कविता बोझ बनी थी घर पर आज सभी को है अभिमान
पॉच - लाख देकर केरल ने किया है कविता का सम्मान ।

वैभव - लक्ष्मी घर में आई घर का  बदल  गया  व्यवहार
कल  तक  भोजन  के  लाले  थे अब  मिलता है फलाहार ।

शब्द - सयाना  सा  लडका है वह कविता से करता प्यार
दो -  बीघा  ज़मीन  है  उसकी  कर  बैठा  है  वह  इज़हार ।

दोनों  का  घर आसपास  है  एक - दूजे  से  वे परिचित हैं
शब्द  भा  गया  है  कविता को आगे दोनों की किस्मत है ।

घर  भी  खुश  है  इस  रिश्ते  से  बहुत  पुरानी  है पहचान
गुण - दोषों  पर  भारी पडता गुण की परख भी है आसान ।

फिर अल्पना बनेगी सुन्दर कविता का है आज निश्चयम
दूल्हा - सजा - धजा  बैठा  है  बाराती  हैं  आप  और  हम ।  

Wednesday, 18 March 2015

उपहार

कोलकाता में एक लडकी है उस बच्ची का प्रिया नाम है
प्रिया  के  दोनों  हाथ  नहीं हैं उस पर टूटा - आसमान है ।

प्रिया बोझ है पिता के लिए मॉ भगवान को हो गई प्यारी
प्रिया  बहुत  ही  समझदार  है  ईश्वर  की लीला है न्यारी ।

उसके पॉव ही हाथ बन गए पेपर - पेन्सिल से लिखती है
अनजाने  में  कुछ चित्र बन गए प्रिया उसी से बोलती है ।

अभ्यास ही सबसे बडा गुरु है उसका तो बस वही है खेल
घर  में अकेली  ही  रहती  है  है  पेपर - पेन्सिल  से मेल ।

कुत्ता - बिल्ली बहुत बनाई और  बनाई सुन्दर - चिडिया
पॉव  में आती  गई  सफाई  चित्र बने हैं बढिया - बढिया ।

एक  दिन  मॉ  का  चित्र  बनाई  रोना आया उसे देखकर
पिता को उसने दिखलाया है सुंदर कहा पिता ने हँस कर ।

पंख  लग  गए तभी प्रिया के उसे मिल गई है सञ्जीवनी
उसने  पिता का चित्र बनाया कला में होती ऊर्जा कितनी ?

बहुत खुश हुए पापा उसके ड्राइंग का दिया सभी - सामान
अब तो प्रिया की बन आई है अब चित्र बनाना है आसान ।

उसने  मोदी  का चित्र बनाया वह चित्र बहुत ही सुन्दर है
फिर पिता ने नेट में डाल दिया यह एक अद्भुत अवसर है ।

नरेन्द्र - भाई ने इसको देखा 'अद्भुत है यह कौन बनाया '
जब  मोदी  जी ने पता किया तब पूरा सच सामने आया ।

कोलकाता आ  गए  हैं  मोदी  प्रिया से उनको मिलना है
प्रिया के घर पर भीड लगी है प्रिया को भी कुछ कहना है ।

' कलाकार  है  प्रिया  हमारी मैं लेकर आया हूँ  पुरस्कार
आज  से  यह  मेरी  बेटी  है' मिला कला को यह उपहार ।

'कला में यह बच्ची प्रवीण है बच्ची का हो सदा उन्नयन
हर  सुविधा  उपलब्ध  इसे  हो हँसता हुआ मिले ऑगन ।'

बच्ची  हँसती  है जोर - जोर  से और ठुमकने  लगती  है
किंतु ऑख सबकी भर आई भरी ऑख भी कुछ कहती है । 

Sunday, 15 March 2015

कल्हण का काश्मीर

कल्हण के कश्मीर का केशर कितना सुंदर कितना सुखकर
' राजतरंगिणी ' की तरंग भी सब कुछ कहती है चुप रह कर ।

' मैं  तो  कालजयी - रचना  हूँ  कोई  मुझे  भूल नहीं सकता
अद्भुत - निधि  हूँ  मैं  पूर्वज की हर कोई अभिनन्दन करता ।

पहल - गॉव  की  बात  बताऊँ आओ  अब  वहॉ  घुमा लाऊँ
जाफरीन  नामक  लडकी  है  उस  बच्ची  की  बात - बताऊँ ।

देख  नहीं  सकती  है  बच्ची  पर  करती  है  मन्त्र -उच्चार
वैदिक - मंत्र  याद  हैं  उसको  वेद -  ऋचा  से  करती  प्यार ।

ऑखें  सुन्दर  हैं  दृष्टि  नहीं  है  पर  बडे  ध्यान से सुनती है
जो  भी  एक - बार  सुनती  है उसको  फिर मन में गुनती है ।

फिर  हू - ब - हू उसे  दोहराती अचरज  करते  हैं  सब  लोग
जाफरीन  है  गार्गी  जैसी  जीवन का  करती सत - उपयोग ।

सत्य - नारायण  की  पूजा  हो  या  हो  वैभव - लक्ष्मी पूजा
यज्ञ - होम  हो जन्म - दिवस  हो  ज़ाफरीन  करवाती  पूजा ।

ज़ाफरीन  है  श्रेष्ठ  - पुरोहित  वह  सुन्दर  पूजा - करवाती
दान - दक्षिणा  जो  मिलती  है अम्मी  के हाथों में पकडाती ।

घर  का  खर्च  निकल  जाता  है  पर अम्मी करती  है फिक्र
कैसे  हो  निकाह  बच्ची  का  जब  ज़ाफरीन का होता ज़िक्र ।

काल - चक्र  चलता  रहता  है  करता  नहीं  कभी - विश्राम
दिन  के  बाद  रात आती  है  समय - चक्र  चलता अविराम ।

ज़ाफरीन अब बडी  हो गई पर अम्मी अब  हो  गई  हैं पस्त
जस -  पडोस  में  ही  रहता  है  ज़ाफरीन  का  वह  है  दोस्त ।

दोनों  का  व्यवहार  देख  कर  लगता  है  वे  सहज  नहीं  हैं
पता  नहीं  क्या  हुआ  है  इन्हें  कुछ  शुभ है जो हुआ सही है ।

पर अम्मी  सब  समझ  गई हैं वे  पहुँची  हैं  जस के घर पर
उसकी  मॉ  से  बात  हुई है शुभ शुभ हुआ  है जस के घर पर ।

धूम - धाम  से  ब्याह  हो  गया  सब ने आशीर्वाद  दिया  है
' एक  दूजे  के  लिए  बने  हो ' सब  ने  उन से  यही  कहा  है ।

Thursday, 12 March 2015

नीली

सोन में एक लंगडी लडकी है और नीली है उसका नाम
मिमीकरी करती है नीली हँसना - हँसाना उसका काम ।

चौथी - कक्षा  में  पढती है उसको कोई भी नहीं चिढाता
नीली  में  कुछ  बात है ऐसी हइ कोई उसका बन जाता ।

छोटा - बडा हर कोई उसकी हाजिर जवाब का कायल है
सबकी हूबहू नकल करती  सबके नयनों की काजल है ।

गुरुजी हों या हो चपरासी उसकी नकल से बचा नहीं है
अनुष्का  हो  या  करीना  हो उसका  सानी कहीं नहीं है ।

हँसा - हँसा  के लोट - पोट  कर  देना  उसकी आदत  है
हँसना  कौन  नहीं  चाहेगा  यह  भी  तो एक इबादत है ।

राखी  हो  या  हो  ऐश्वर्या  उससे  कोई  बच  नहीं  पाया
आमिर  हो या हो वह माला उसने सबको बहुत हँसाया ।

नेता - गण  भी  बचे  नहीं  हैं  नीली  ने सबको धोया है
पेट - पकड कर हँसते हैं सब हँसी - बीज उसने बोया है ।

आस - पास  के  गॉवों में भी उसकी चर्चा होती अक्सर
नीली  कहते  ही  सब  हँसते हँसने का ही होता अवसर ।

पूरे - गॉव  की  बेटी  है  वह  हर  घर  है उसका  परिवार
मुखिया ने कह दिया है सबसे गॉव ही है उसका आधार ।

बडे  - गुरुजी  पिता  सदृश  हैं आज  तिपहिया  लाए  हैं
जन्म - दिवस  के अवसर  पर  नीली  को  देने आए  हैं ।

नीली सबकी सञ्जीवनी  है उसको प्यार सभी  करते हैं
पर जो औरों को अपना ले उसे  दण्डवत  हम  करते  हैं ।

Tuesday, 10 March 2015

जय जय जय हो हिन्दुस्तान

बेटी बचाओ ऑदोलन से जन - सामान्य बेखबर है
बहू नहीं मिलती बेटे को ऑदोलन यहॉ बेअसर है ।

बेटी ऑगन की फुलवारी  पुलकित परम्परा  है पावन
उससे  ही  घर में रौनक  है वह ही लेकर आती सावन ।

मोहित के घर बेटी आई पर वह देख नहीं सकती है
कितनी  सुंदर ऑखें  हैं  पर उन ऑखों में दृष्टि नहीं है ।

मोहित है एक वंशी - वादक रोज बजाता राग विहाग
खुद भी रसास्वादन करता राग से है उसको अनुराग ।

काल - चक्र चलता रहता है कभी नहीं करता विश्राम
दिन के बाद रात आती है रात के बाद भोर- अभिराम ।

बारह - बरस  की  हो गई बेटी पर स्कूल नहीं जाती है
पूरे - दिन  बॉसुरी  बजाती और  कभी  गाना गाती  है ।

पिता  की  तरह  वह  गाती  है वैसी ही बॉसुरी बजाती
पूरे  गॉव में पता  है सबको लता लता जैसी  ही गाती ।

सॉसद जमुना को भी उसके मीठे सुर की भनक मिली
मोहित के घर आई जमुना लता की मन-कली खिली ।

उसके स्वर की सीडी.लेकर जमुना दुनियॉ में पहुँचाई
लता खास बन गई स्वयं ही आज लता की बारी आई ।

अखबारों में टीवी में भी उसका इन्टर - व्यू छपता है
गॉव गॉव घर घर में भी अब उसके गीतों से सजता है ।

अब  तो  पैसा  लगा  बरसने  मोहित के घर आई कार
बेटी  ने  शोहरत  दिलवाई  वायु - यान में हुआ सवार ।

लता  बहुत  सुन्दर  गाती  है  लेती  है मुरकियॉ मधुर
दिया विधाता ने है उसको बहुत मधुर और अद्भुत सुर ।

दुनियॉ - भर  के  नाम  चीन मञ्चों में होता है प्रोग्राम
विविध राग रागिनियों का आया है यह दिन अभिराम ।

देश की पावन परम्परा का विश्व - पटल पर होता गान
आरंभ होता देस राग से जय जय जय हो हिन्दुस्तान ।

शहनाई

सभी  कोसते  हैं  बच्ची  को  बोल  नहीं  पाती है 'पाई '
पर  सुनती  है  बहुत ध्यान से और बजाती है शहनाई ।

पिता बजाते जब शहनाई तब बडे ध्यान से सुनती है
वह चुपके से रियाज़ करती रागों की कडियॉ बुनती है ।

उसका मन भी करता है कि वह प्रति - दिन जाए स्कूल
सब  बच्चों  के  संग  पढे वह कभी भी कोई हो न भूल ।

'पाई' शहनाई बजा रही थी तो मास्टर जी ने देख लिया
बडे गुरु जी के संग आए 'पाई ' के पिता से बात किया ।

'पाई' का फिर हुआ दाखिला बेहद खुश है ' पाई ' आज
ठुमक ठुमक कर नाच रही है मिला हो जैसे कोई ताज़ ।

पढने  में  है  तेज बहुत वह बहुत ध्यान  से  सुनती  है
उससे  जब  पूछा  जाता  है  तब  उत्तर  में  लिखती है ।

वक्त भागता अपनी गति से पर है समय बडा- बलवान
रुकता  नहीं  कभी  भी  लेक़िन चलने में है पहलवान ।

'पाई' अब कॉलेज में आई उसका परिचय भी आया है
कइयों  ने उपहास  किया  है  तो बहुतों ने अपनाया है ।

तुलसी - जयन्ती मना रहे हैं 'पाई' के कॉलेज में आज
मानस पर शहनाई वादन पर खुल सकता है यह राज़ ।

'पाई'  की शहनाई सुन कर पूरा कॉलेज आनन्दित  है
बहुत दिनों के बाद मिला यह कलाकार अभिनंदित है ।

'पाई' सबकी मीत बन गई 'पाई' बनी आज सिरमौर
अपने घर में मिली प्रतिष्ठा 'पाई' पर सबने किया गौर ।

सब अखबारों पर छाई है 'पाई'  की सुमधुर  शहनाई
शहनाई  है 'पाई'  या  फिर 'पाई' ही  बन गई शहनाई ।

'पाई' के घर के आगे है मिलने वालों की भारी भीड
हाथ जोड अभिवादन करती गदगद है 'पाई' का नीड ।

एक बडा अधिकारी तब ही  'पाई' से मिलने आया है
उसने कहा  दूर - दर्शन में सर्विस का ऑफर लाया है ।

'पाई' करने लगी नौकरी फिर घर की हालत ठीक़ हुई
गाडी  पटरी  पर आई  है  घर  की काया निखर - गई ।

पावस नामक लडके से फिर 'पाई' का मनमेल हो गया 
जल तरंग वादक है पावस पनप रहा  है  दया -  मया ।

संग - संग अक्सर दिखते हैं वे दोनों पावस और पाई
इस  दुनियॉ  की जीभ बताती बजने वाली है शहनाई ।
 

Monday, 9 March 2015

दिए तुम्हारे सुन्दर हैं

एक  किशोरी  है  सुन्दर  सी  वह  दिया  बेचने आई  है
' दिए  तुम्हारे  सुन्दर  हैं'  यह सुन  कर वह शर्मायी है ।

मैंने  सौ  दिए  खरीद  लिए  मैंने  सोचा  दाम  सही  है
नज़र पडी उसके हाथों पर उसके तो दोनों हाथ नहीं हैं ।

मेरी ऑखें भर आईं  थीं 'साथ  तुम्हारे अभी  कौन  है ?'
' अकेली  हूँ  मॉ  घर  पर  है 'आधा उत्तर अभी मौन है ।

'मॉ ने  दिया बनाया होगा यहॉ से कितनी दूर है घर ?'
बच्ची  मुस्काई  फिर  बोली 'चलिए यहीं पास  है घर ।'

मैंने जल्दी से फिर उसका मोल ले लिया सब सामान
उसको अपने साथ बिठाई यही लगा मुझको आसान ।

उसके घर पहुँचे थे जब हम उसकी मॉ बिस्तर पर थी
उसकी  तबियत ठीक नहीं थी वह बुखार से बेदम थी ।

बिन पूछे ही मुझे बताया 'मॉ की तबियत ठीक नहीं है
मेरी मॉ देख नहीं सकती घर में कुछ  भी ठीक नहीं है ।

हम  दोनों  घर  पर  रहते  हैं और  हमारा  नहीं है कोई '
इन शब्दों को कहते  कहते लडकी फूट - फूट कर रोई ।

मैंने  वैद्य  तुरन्त  बुलाया उसने आ कर  मुझे  बताया
' प्राण नहीं है शेष देह में ' तब मुझको भी रोना आया ।

भगवान भास्कर के जाने में समय शेष था उसी समय
कुछ लोग आए देह ले गए माटी - माटी में हुई विलय ।

गॉव के मुखिया को समझाई लडकी को मैं घर ले आई
बच्ची आने को उत्सुक  थी उसकी यह बात मुझे भाई ।

अपने छोटे - छोटे पॉवों से दिया बनाती थी खुद बच्ची
बडे गर्व से मुझे बताया बात है उसकी बिल्कुल सच्ची ।

'शिल्पी' नाम दिया है मैंने अब वह मेरी ही बिटिया  है
मेरा घर अब तक सूना था उसने सूनापन दूर किया है ।

आज मेरे घर दीवाली  है लक्ष्मी खुद चल कर आई  है
मेरे घने - अँधेरे घर में  शिल्पी  ही उजियारा  लाई  है ।
   
 

Sunday, 8 March 2015

चौदह अगस्त की सन्ध्या थी

चौदह अगस्त की संध्या थी वह देस  राग की ही बहार थी
विचित्र - वीणा  का वादन  था विभावरी वह कलाकार थी ।

हम  पहुँचें  इसके  पहले ही विभा वहॉ पर विराजमान थी
वीणा उसके  हाथों  में  थी  सरस्वती - सम  विद्यमान थी ।

प्रोग्राम  बहुत  ही  दिलकश  था नाम था उसका 'देस राग'
शीर्षक सबको  खूब  जँचा था जैसे पंखुडियों - बीच पराग ।

परिचय  की  मोहताज़  नहीं  थी  विभावरी  ने छेडी - तार
जब  वीणा  के  छिडे  तार  तो  अद्भुत  थी  उसकी  झंकार ।

आसा  ने आलाप  लिया  था  'चिट्ठी आई है'  वाला गीत
जनता  खोई  थी उस  धुन  में तभी  हो गया गीत अतीत ।

करतल ध्वनि से हॉल भर गया यद्यपि ऑखें भर आई थीं
वीणा  चुप  हो  गई किन्तु अब दर्शक  -  दीर्घा हर्षायी थी ।

तभी  विभा  का  परिचय  देने  आसा  वरी  वहॉ  आई  है
उसने  कहा  " विभा  अँधी  है "  वह  मेरी  ही  सहोदरा है ।

" मैं  भी  देख  नहीं  सकती  हूँ  पर  मैं  भी  गाती  हूँ गीत
विभावरी -  वीणा  पर  होती  मन  -  बहलाता  है  संगीत ।"

सन्नाटा  छा  गया  हॉल  में  पसरा  था  बस  केवल मौन
यह  क्या  हुआ  क्यों  हुआ  ऐसा ऐसी सज़ा दिया है कौन ?

आसा - विभावरी  बहनों  में  ऐसी  विचित्र  सी  थी झंकार
शब्द - तार  मिल  गए  परस्पर अद्भुत था  यह चमत्कार ।

बिन ऑखों  की  दो - बहनों  ने नयनों में भर दिया है जल
पर अद्भुत वरदान मिल गया अब उज्ज्वल है उनका कल ।

जया की जीत

जया  नाम  है  उस  लडकी  का  जेसलमेर में रहती है
बचपन  से  ही  वह  लंगडी  है उसकी अम्मॉ कहती है ।

पॉच  ऊँट  हैं उसके  घर  पर  ऊँट - सवारी  करती  है
सैलानी  को  वह खूब घुमाती  मॉड सुनाया  करती  है ।

जया खुश मिज़ाज़ है लेक़िन सबको वह खुश रखती है
दसवीं  कक्षा  में  पढती  है  खेल  में  भी आगे रहती है ।

काल - चक्र  चलता  रहता  है कभी नहीं करता विश्राम
दिन के बाद रात आती है पल- पल चलता है अविराम ।

बी. ए. पास  हो  गई  बिटिया पर ऊँट - सवारी करती है
यह उसकी रोज़ी - रोटी  है घर का ध्यान वही रखती है ।

घर में मॉ - बेटी रहती हैं पर  घर की हालत  पतली  है
मॉ  पडोस  में  बर्तन - धोती गाडी ले - दे कर चलती है ।

जया के ऊँट बहुत अच्छे हैं स्वामि - भक्त हैं वे सब ऊँट
जया  उन्हें  भाई  कहती  है  कभी  नहीं  कहती  है  ऊँट ।

जया ने मन में कुछ सोचा है अपने काम में देगी ध्यान
जब तक सर्विस नहीं मिली है चलेगा ऐसा ही अभियान ।

सैलानी आते ही रहते हैं  वह  ऊँट - सवारी भी करते हैं
पैसे  भी  मिल  ही  जाते  हैं पर जया से लडके जलते हैं ।

'लडकी हो एहसास करो तुम जया छोड दो अब यह काम
ऊँट  -  तुम्हारे  हम  देखेंगे  देते  रहेंगे  वाज़िब  -  दाम ।'

जया को यह मंज़ूर नहीं है  'मैं अपना  काम समझती हूँ
मुझ पर क्यों एहसान करोगे मैं अच्छे से जी  सकती  हूँ ।'

जया को अब मिल गई नौक़री वह लोकगीत में माहिर है
दूर - दर्शन में मिली नौक़री यह भी अब जग - जाहिर है ।

टी. वी.ऑफिस का एक सैलानी ऊँट - सवारी करने आया
जया का ऊँट ही उसको भाया उसने उसको मॉड सुनाया ।

उसके भीतर के गायक को जीवन ने भी भॉप लिया था
घर की माली- हालत को वह अच्छे से पहचान गया था ।

अच्छी - खासी मिली नौक़री अब उनका घर हँसता  है
अब  भी  है  संघर्ष  किन्तु  वह  थोडा  हल्का  लगता है ।

जया बहुत सुन्दर दिखती है उसे चाहने लगा है जीवन
मुँह से कभी नहीं बोला पर मन में ही है भारी- उलझन ।

जया के मुँह पर तो ताला है पर जीवन ने चुप्पी- तोडी
'बहुत प्यार करता हूँ तुमसे '  नेह  कडी उसने ही जोडी ।

जया का मुख हो गया गुलाबी तब जीवन ने थामा हाथ
जया के घर की ओर गए हैं वे दोनों हैं अब साथ - साथ ।

शकुन्तला शर्मा , भिलाई [ छ. ग . ]

 

देस - राग

सबसे सुन्दर देश हमारा
    सुन्दरतम है पर काश्मीर ।
माला एक लंगडी लडकी है
        रहती है सरहद के तीर ।

गोला - बारी होती रहती
      आए दिन सरहद के पास ।
बचपन से वह देख रही है
        नहीं सुधरने की है आस ।

माला सैनिक की बेटी है
      सुनती है वह भी ललकार ।
मन में वह सोचा करती है
    सौ - सौ बार तुझे धिक्कार ।

तभी धुँधलके में माला ने
       काले साए को देख लिया ।
बंदूक तानकर फिर माला ने
         उस साए को मार दिया ।

घर में घुसी तुरंत और वह
      लेट गई बिल्कुल चुपचाप ।
जब कोलाहल हुआ तभी वह
        उठ कर आई अपने आप ।

पिता ने जब पूछा ऑखों से
     माला ने स्वीकार किया था ।
हाथ पीठ पर रखा पिता ने
      साहस का ईनाम दिया था ।

सरहद समीप रहने वाले भी
    सैनिक सम कर्तव्य निभाते ।
ईनाम भले ही मिले न मिले
       मातृभूमि के वे काम आते ।

माला भीड से घिरी हुई है
         कोई भी नहीं देखता पॉव ।
उसकी बहादुरी दिखती है
           भौचक है अब पूरा गॉव ।

शकुन्तला शर्मा , भिलाई

Saturday, 7 March 2015

छत्तीसगढ में एक गॉव है

छत्तीसगढ  में  एक  गॉव  है  जिसका  नाम  कोसला  है
कौशल्या  का  पीहर  है  वह  सरोवरों  के  बीच  पला  है ।

उसी  गॉव  में  लूली -  लँगडी  एक  लडकी  है  सुकवारा
सब  उसको अपमानित  करते  कहते  हैं  फोकट - पारा ।

किसी  तरह  पॉचवीं पास की अब घर - वाले हार गए हैं
नहीं  पढा  सकते अब आगे कह - कर उसे पछाड गए हैं ।

सुकवारा  में  हुनर  बहुत  है  सबका करती सहज नकल
तोता  कोयल  चिडिया  बन्दर  सुकवारा  है सदा सफल ।

कुत्ता - बिल्ली या उल्लू हो मुश्किल है फर्क समझ पाना
बडी  सहजता  से  करती  है  नकल हमेशा सोलह आना ।

केजरीवाल हो या मोदी हो सोनिया हो या फिर अमिताभ
सुकवारा  सब  में पारंगत है इसी हुनर का मिलता लाभ ।

सुकवारा  के  संग  कला  भी  प्रतिदिन  रूप  बदलती  है
सुकवारा की कला दिन ब दिन और भी खूब निखरती है ।

बडे - बडे  शहरों  में उसका  होता  रहता हरदम  प्रोग्राम
मिमिक़री  है  बहुत  लोकप्रिय  इसका मिलता है ईनाम ।

उससे  मिलने  वालों  की अब  लम्बी  लाइन  लगती  है
विकलॉगता  नज़र  नहीं आती  हुनर की तूती बोलती है ।

वाणी का  वैभव अतुलित  है  इसमें  है  अद्भुत - सम्मान
उद्यम से सब कुछ संभव  है जीवन बन जाता  है वरदान ।