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Sunday, 23 March 2014

सूक्त - 105

[ऋषि- पर्वत- नारद । देवता- पवमान सोम । छन्द- उष्णिक् ।] 

8681
तं वः सखायो मदाय पुनानमभि गायत ।
शिशुं  न  यज्ञैः  स्वदयन्त  गूर्तिभिः ॥1॥

प्रभु की महिमा का जो मानव सुमिरन सदा किया करता है ।
वह साधक पावन मन पाकर प्रभु की कृपा प्राप्त करता है॥1॥

8682
सं वत्सइव मातृभिरिन्दुर्हिन्वानो अज्यते ।
देवावीर्मदो मतिभिः परिष्कृतः ॥2॥

आलोक-रूप है वह परमात्मा हम जिसकी पूजा करते हैं ।
निर्मल मन वाले सज्जन का सुमिरन साधक करते हैं॥2॥

8683
अयं दक्षाय साधनोSयं शर्धाय वीतये ।
अयं देवेभ्यो मधुमत्तमः सुतः ॥3॥

अत्यन्त दक्ष है वह परमात्मा वह बलशाली आनन्द-मय है।
यदि उनसे कुछ पाना चाहें मञ्जिल शरणमात्र में तय है॥3॥

8684
गोमन्न इन्द्रो अश्ववत्सुतः सुदक्ष धन्व ।
शुचिं ते वर्णमधि गोषु दीधरम् ॥4॥

सभी जगह अभिव्यक्ति तुम्हारी तुम कण-कण में रहते हो ।
हम में जो थोडा सा गुण है उसको रेखाञ्कित  करते  हो॥4॥

8685
स नो हरीणां पत इन्दो देवप्सरस्तमः ।
सखेव सख्ये नर्यो रुचे भव ॥5॥

आलोक लुटाता जैसे  सूरज हम सबको मुखर बनाता है । 
वैसे ही सबके ज्ञान- कोष को प्रभु ही प्रखर बनाता है ॥5॥

8686
सनेमि त्वमस्मदॉ अदेवं कं चिदत्रिणम् ।
साह्वॉ इन्दो परि बाधो अप द्वयुम् ॥6॥

हे प्रभु दया-दृष्टि तुम देना तुम हम सबकी रक्षा करना ।
दुष्टों से तुम हमें बचाना वरद-हस्त हम पर रखना ॥6॥ 

   

Saturday, 22 March 2014

सूक्त - 106

[ऋषि- चक्षुमानव । देवता- पवमान सोम । छन्द- उष्णिक् ।]

8687
इन्द्रमच्छ सुता इमे वृषणं यन्तु हरयः ।
श्रुष्टी जातास इन्दवः स्वर्विदः ॥1॥

परब्रह्म  सर्वत्र  व्याप्त  है  सत्कर्म  मार्ग  पर  वह  रहता है ।
उसको उद्योगी अति प्रिय है वह सबकी विपदा हरता है॥1॥

8688
अयं भराय सानसिरिन्द्राय पवते सुतः ।
सोमो   जैत्रस्य  चेतति  यथा  विदे ॥2॥

परम ईष्ट है वह  परमात्मा  पूजनीय  है  वह  प्रणम्य  है ।
वह सज्जन के साथ खडा है वही परम है वह वरेण्य है॥2॥

8689
अस्येदिन्द्रो मदेष्वा ग्राभं गृभ्णीत सानसिम् ।
वज्रं च वृषणं भरत्समप्सुजित् ॥3॥

प्रभु ही हैं सबके सुख- दाता सबसे प्रेम वही करते हैं ।
कर्म-योग के राही को वे अपने साथ सदा रखते हैं॥3॥

8690
प्र धन्वा सोम जागृविरिन्द्रायेन्दो परि स्त्रव ।
द्युमन्तं शुष्ममा भरा स्वर्विदम् ॥4॥

जो  प्राणी  उद्यम  करता  है  प्रभु  उसको  सब  कुछ  देते  हैं ।
सबको सत्पथ पर प्रेरित करते सज्जन को अपना लेते हैं॥4॥

8691
इन्द्राय वृषणं मदं पवस्व विश्वदर्शतः ।
सहस्त्रयामा पथिकृद्विचक्षणः ॥5॥

कर्म  मार्ग  पर  हर  मानव  को  अपना अभीष्ट  मिल  जाता है ।
सान्निध्य उसे प्रभु का मिलता है मन में आनन्द समाता है॥5॥

8692
अस्मभ्यं गातुवित्तमो देवेभ्यो मधुमत्तमः ।
सहस्त्रं याहि पथिभिः कनिक्रदत् ॥6॥

प्रभु पथ को आलोकित करता भक्तों का करता बेडा-पार ।
निराकार है  वह  परमेश्वर फिर भी आता है कई बार ॥6॥

8693
पवस्व देववीतय इन्दो धाराभिरोजसा ।
आ कलशं मधुमान्त्सोम नः सदः॥7॥

वह परमात्मा परमानन्द है वह ही है रस से भर-पूर ।
भक्तों को दर्शन देता है यद्यपि रहता है  बहुत  दूर ॥7॥

8694
तव द्रप्सा उदप्रुत इन्द्रं मदाय वावृधुः ।
त्वां देवासो अमृताय कं पपुः ॥8॥

सर्वोत्तम  रस  है ब्रह्मानन्द उद्योगी  इस  रस  को  पाता  है ।
योगी को मिलता अमृत-रस कर्मयोग यह समझाता है॥8॥

8695
आ नः सुतास इन्दवः पुनाना धावता रयिम् ।
वृष्टिद्यावो रीत्यापः स्वर्विदः ॥9॥

अनन्त शक्तियॉ क्रीडा करतीं पृथ्वी पर होती बरसात ।
ज्ञानी के मन में रस वर्षा हो सकती है अकस्मात ॥9॥

8696
सोमः पुनान ऊर्मिणाव्यो वारं वि धावति ।
अग्रे वाचः पवमानः कनिक्रदत् ॥10॥

वह  परमेश्वर  गुण - ग्राही  है  उसने  सब  देखा - परखा  है ।
हम सबके अत्यंत निकट है कर्मानुरूप लेखा-जोखा है॥10॥

8697
धीभिर्हिन्वन्ति वाजिनं वने क्रीळन्तमत्यविम् ।
अभि त्रिपृष्ठं मतयः समस्वरन् ॥11॥

अति समर्थ है वह परमात्मा नहीं है कोई समय का बन्धन ।
देश-काल से परे है वह प्रभु ऐसा अद्भुत है आनन्द-घन॥11॥

8698
असर्जि कलशॉ अभि मीळ्हे सप्तिर्न वाजयुः ।
पुनानो वाचं जनयन्नसिष्यदत् ॥12॥

वैसे परमात्मा सर्व-व्याप्त है पर निर्मल मन में  रहता है ।
कर्म-योग की राह चलो तुम वह हम सबसे कहता है॥12॥

8699
पवते हर्यतो हरिरति ह्वरांसि रंह्या ।
अभ्यर्षन्त्स्तोतृभ्यो वीरवद्यशः॥13॥

कर्म-वीर ही पा सकता है उसका  सरल  सहज  व्यवहार ।
वह अवगुण को हर लेता है सद्-गति का देता उपहार॥13॥

8700
अया पवस्व देवयुर्मधोर्धारा असृक्षत ।
रेभन्पवित्रं पर्येषि विश्वतः॥14॥

पावन मन वाला मानव ही पा सकता है प्रभु  का  प्यार ।
हे परमेश्वर सब प्राणी को दे देना समुचित व्यवहार॥14॥   

   

Friday, 21 March 2014

सूक्त - 107

[ऋषि- सप्तर्षि । देवता- पवमान सोम । छन्द- बृहती- गायत्री- पंक्ति ।]

8701
परीतो षिञ्चता सुतं सोमो य उत्तमं हविः ।
दधन्वॉ यो नर्यो अप्स्व1न्तरा सुषाव सोममद्रिभिः॥1॥

सोम सृजन का ही माध्यम है यह सौम्य-स्वभाव बनाता है ।
सोम - रूप प्रभु सर्व-व्याप्त है योगी प्रभु - दर्शन पाता  है ॥1॥

8702
नूनं पुनानोSविभिः परि स्त्रवादब्धः सुरभिन्तरः ।
सुते चित्त्वाप्सु मदामो अन्धसा श्रीणन्तो गोभिरुत्तरम्॥2॥

परमात्मा तुम आनन्द-रूप  हो  हे  प्रभु  मेरे  मन  में  आओ ।
हम प्रेम से आमन्त्रित करते हैं तुम ही आकर हमें जगाओ॥2॥

8703
परि      सुवानश्चक्षसे      देवमादनः      क्रतुरिन्दुर्विचक्षणः ।

परमेश्वर ज्ञानी को सुख देता जो निराकार का करता ध्यान ।
साधक आनन्द अनुभव करता परमानन्द का होता भान॥3॥

8704
पुनानः सोम धारयापो वसानो अर्षसि ।
आ रत्नधा योनिमृतस्य सीदस्युत्सो देव हिरण्ययः॥4॥

प्रभु  हमको  सत्कर्म  सिखाओ तुम  मेरे  मन  में  बस  जाओ ।
ज्योति-रूप तुम्हीं विराजे अज्ञान-तमस को तुम्हीं मिटाओ॥4॥

8705
दुहान  ऊधर्दिव्यं  मधु  प्रियं  प्रत्नं  सधस्थमासदत् ।
आपृच्छ्यं धरुणं वाज्यर्षति नृभिर्धूतो विचक्षणः॥5॥

अन्तरिक्ष प्रभु को अति-प्रिय है नभ असीम का द्योतक है ।
हम भी तुमको पा सकते हैं वह भी जो तेरा उपासक है॥5॥

8706
पुनानः सोम जागृविरव्यो वारे परि प्रियः ।
त्वं विप्रो अभवोSङ्गिरस्तमो मध्वा यज्ञं मिमिक्ष नः॥6॥

प्रभु  पावन - दृष्टि  मुझे  देना  मेरे  अन्तः पुर  में  आना ।
तुम प्राणों के प्राण प्रभु जी आनन्द-वर्षा करते जाना ॥6॥

8707
सोमो मीढ्वान्पवते गातुवित्तम ऋषिर्विप्रो विचक्षणः ।
त्वं  कविरभवो  देववीतम आ  सूर्यं  रोहयो  दिवि ॥7॥

परमेश्वर ज्ञानी के मन को दिव्य-तेज से  भर  देते हैं ।
मनोकामना पूरी करते सबका अवगुण हर लेते हैं॥7॥

8708
सोम उ षुवाणः सोतृभिरधि ष्णुभिरवीनाम् ।
अश्वयेव हरिता याति धारया मन्द्रया याति धारया॥8॥

जैसे बिजली सुख-साधन देती जीवन को सरल बनाती  है।
प्रभु अन्वेषण-बल देना जो जन-जन के काम आती है॥8॥

8709
अनूपे  गोमान्गोभिरक्षा:   सोमो   दुग्धाभिरक्षा: ।
समुद्रं न संवरणान्यग्मन्मन्दी मदाय तोशते॥9॥

परमेश्वर  सज्जन  को  देते  हैं  पावन  परमानन्द  प्रसाद ।
सरिता सागर से मिलती है मन का मिटता है अवसाद॥9॥

8710
आ   सोम   सुवानो  अद्रिभिस्तिरो   वाराण्यव्यया ।
जनो न पुरि चम्वोर्विशध्दरिःसदो वनेषु दधिषे॥10॥

प्रभु तुम सबकी रक्षा करते सत्-पथ  पर  पहुँचाते  हो ।
ज्ञान-प्रकाश तुम्हीं देते हो सबकी प्यास बुझाते हो॥10॥

8711
स मामृजे  तिरो अण्वानि  मेष्यो  मीळ्हे  सप्तिर्न  वाजयुः ।
अनुमाद्यःपवमानो मनीषिभिः सोमो विप्रेभिरृक्वभिः॥11॥

वह  ही  सर्वो - परि  सत्ता  है  वह  निराकार  है  अद्वितीय ।
वह उपासना से मिलता है वह है अद्भुत-अनिवर्चनीय॥11॥

8712
प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा ।
अंशोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोशं मधुश्चुतम्॥12॥

सर्व - व्याप्त  है  वह  परमात्मा  वह  आनन्द का सागर है ।
वह  निर्मल मन में रहता है वह हम सबका सहचर है ॥12॥

8713
आ हर्यतो अर्जुने अत्के अव्यत  प्रियः सूनुर्न  मर्ज्यः ।
तमीं हिन्वन्त्यपसो यथा रथं नदीष्वा गभस्त्योः॥13॥

कर्म-निरूपण वे करते हैं  हम  सब  पाते  कर्मों  का  फल ।
सत्पथ पर वे प्रेरित करते जिससे मिले सभी को हल॥13॥

8714
अभि सोमास आयवः पवन्ते मद्यं मदम् ।
समुद्रस्याधि विष्टपि मनीषिणो मत्सरासः स्वर्विदः ॥14॥

विज्ञानी - ज्ञानी  दोनों  करते  अपना - अपना अन्वेषण ।
प्राप्ति हेतु यह आवश्यक है होते रहें  सफल  प्रक्षेपण॥14॥

8715
तरत्समुद्रं   पवमान  ऊर्मिणा   राजा   देव   ऋतं   बृहत् ।
अर्षन्मित्रस्य वरुणस्य धर्मणा प्र हिन्वान ऋतं बृहत्॥15॥

आलोक-प्रदाता  परमात्मा  का   हमसे  होता  है सम्भाषण ।
पण्डित के प्रवचन में होता उसका सुखद-सहज संप्रेषण॥15॥

8716
नृभिर्येमानो  हर्यतो  विचक्षणो  राजा  देवः  समुद्रियः ॥16॥

प्रभु से प्रेरित होकर हम सब विविध -विधा से फल पाते हैं ।
सत्पथ के सब पथिक वस्तुतःमन की प्यास बुझाते हैं॥16॥

8717
इन्द्राय पवते मदः सोमो मरुत्वते सुतः ।
सहस्त्रधारो  अत्यव्यमर्षति  तमी  मृजन्त्यायवः॥17॥

कर्म - योग के पावन-पथ पर परमात्मा रक्षा करते  हैं ।
मनो-कामना पूरी करते मन की व्यथा समझते हैं॥17॥

8718
पुनानश्च  जनयन्मतिं  कविः सोमो  देवेषु  रण्यति ।
अपो वसानः परि गोभिरुत्तरः सीदन्वनेष्वव्यत॥18॥

प्रभु कर्मों के अधिपति हैं हम कर्मानुरूप फल चखते हैं ।
जीव - जगत  दोनों की रक्षा परमेश्वर ही करते हैं ॥18॥

8719
तवाहं सोम रारण सख्य इन्द्रो दिवेदिवे ।
पुरूणि बभ्रो नि चरन्ति मामव परिधिँरति तॉ इहि॥19॥

दुष्ट - दमन अति आवश्यक  है  बढाना  है आयुध  का  मान ।
प्रभु असुरों से रक्षा करना जीव-जगत का रखना ध्यान॥19॥

8720
उताहं नक्तमुत सोम ते दिवा सख्याय बभ्र ऊधनि ।
घृणा तपन्तमति सूर्यं परः शकुना इव पप्तिम॥20॥

हे   देदीप्यमान   परमेश्वर  तुम   ही   हो  आलोक -  प्रदाता ।
तुमसे मिलने को आतुर हैं तुम्हीं पिता हो तुम हो माता॥20॥

8721
मृज्यमानः सुहस्त्य समुद्रे वाहमिन्वसि ।
रयिं पिशङ्ग बहुलं पुरुस्पृहं पवमानाभ्यर्षसि॥21॥

सर्व   समर्थ   तुम्हारी   सत्ता  वाणी  का  दे  दो  वर - दान ।
प्रज्ञा-धन ही मुझको प्रिय है प्रभु मुझको दे देना ज्ञान ॥21॥

8722
मृजानो वारे पवमानो अव्यये वृषाव चक्रदो वने ।
देवानां सोम पवमान निष्कृतं गोभिरञ्जानो अर्षसि ॥22॥

तुम्हीं  सुरक्षा  देना  प्रभु - वर  सत्कर्मों  की बात बताना ।
मैं पावन-मन कैसे पाऊँ ज्ञानामृत से तुम समझाना ॥22॥

8723
पवस्व वाजसातयेSभि विश्वानि काव्या ।
त्वं  समुद्रं  प्रथमो   वि  धारयो  देवेभ्यः  सोम  मत्सरः ॥23॥  

उज्ज्वल  भाव  सदा  हो  मन  में  ऐसी  कोई  जुगत बताना ।
यश-वैभव हमको देना प्रभु ज्ञान-योग हमको समझाना॥23॥

8724
स  तू  पवस्व  परि  पार्थिवं  रजो  दिव्या  च  सोम  धर्मभिः ।
त्वां विप्रासो मतिभिर्विचक्षण शुभ्रं  हिन्वन्ति धीतिभिः॥24॥

धरा  प्रदूषित  हुई  जा  रही  अब  क्या  होगा तुम्हीं  बताओ ।
कर्म-योग हम कैसे सीखें तुम्हीं  प्रेम से अब समझाओ ॥24॥

8725
पवमाना असृक्षत पवित्रमति धारया ।
मरुत्वन्तो मत्सरा इन्द्रिया  हया  मेधामभि  प्रयांसि च ॥25॥

ध्यान-धारणा क्या  जानें  हम क्रिया - योग   हम  कैसे जानें ।
आकर तुम्हीं हमें सिखलाओ तभी तुम्हें हम अपना मानें॥25॥

8726
अपो वसानः परि कोशमर्षतीन्दुर्हियानः सोतृभिः ।
जनयञ्ज्योतिर्मन्दना अवीवशद्गा:कृण्वानो न निर्णिजम्॥26॥

कर्म-योग के पथ पर ही सब मानव तुम्हें जान पाते हैं ।
वरद-हस्त हम पर भी रखना बिन तेरे हम अकुलाते हैं ॥26॥             
      
   

Thursday, 20 March 2014

सूक्त - 108

[ऋषि- गौरिवीति शाक्त्य । देवता- पवमान सोम । छन्द- बृहती-पंक्ति-गायत्री ।]

8727
पवस्व    मधुमत्तम    इन्द्राय    सोम    क्रतुवित्तमो    मदः ।
महि द्युक्षतमो मदः ॥1॥

हे  परम - मित्र   हे  परमेश्वर  शुभ - कर्मों  के  प्रेरक  बनना ।
कर्म-योग को हम भी जानें मन में शुभ भाव तुम्हीं भरना॥1॥

8728
यस्य   ते   पीत्वा   वृषभो   वृषायतेSस्य   पीता   स्वर्विदः ।
स     सुप्रकेतो    अभ्यक्रमीदिषोSच्छा    वाजं    नैतशः॥2॥

तन और मन दोनों के बल से कर्म - योग को समझें  जानें ।
हम जीवन- रण में जीतें मन-मति की महिमा को मानें॥2॥

8729
त्वं    ह्य1ङ्ग    दैव्या    पवमान    जनिमानि    द्युमत्तमः ।
अमृतत्वाय घोषयः ॥3॥ 

सत्कर्मी सदा सफल होता है प्रभु करते सबका कल्याण ।
प्रभु ही पालन-पोषण करते परमेश्वर हैं प्राणों के प्राण॥3॥

8730
येना    नवग्वो   दध्यङ्ङपोर्णुते    येन    विप्रास  आपिरे ।
देवानां  सुम्ने  अमृतस्य  चारुणो  येन  श्रवांस्यानशुः॥4॥

परमात्मा  प्रेरित  करते  हैं  वे  सत्पथ  पर  ले  जाते  हैं ।
सत्मर्म सभी को सिखलाते सुख-सागर में नहलाते हैं॥4॥

8731
एष स्य धारया सुतोSव्यो वारेभिः पवते मदिन्तमः ।
क्रीळन्नूर्मिरपामिव ॥5॥

जैसे हम सहज श्वास लेते हैं वैसे ही प्रभु  रचना  करते  हैं ।
हम भी उनके ही स्वरूप हैं हम अन्वेषण कर सकते हैं॥5॥

8732
य  उस्त्रिया  अप्या  अन्तरश्मनो  निर्गा  अकृन्तदोजसा ।
अभि  व्रजं तत्निषे  गव्यमश्व्यं  वर्मीव  धृष्णवा  रुज ॥6॥

कण- कण में वह विद्यमान है घट-घट में है उसका वास ।
वह सब प्राणी को सुख देता है यहीं हमारे आस- पास॥6॥

8733
आ सोता  परि  षिञ्चताश्वं  न  स्तोममप्तुरं  रजस्तुरम् ।
वनक्रक्षमुदप्रुतम् ॥7॥

श्रध्दा - सरिता का जल लेकर हम उसका अभिषेक करें ।
हम नूतन आविष्कार करें मन के वृन्दावन में विचरें॥7॥

8734
सहस्त्रधारं    वृषभं    पयोवृधं    प्रियं    देवाय   जन्मने ।
ऋतेन य ऋतजातो विवावृधे  राजा  देव  ऋतं  बृहत्॥8॥

हे  प्रभु अन्न और  धन देना मनो - कामना पूरी करना ।
तुमसे बस एक निवेदन है मुझ पर दया-दृष्टि रखना॥8॥

8735
अभि   द्युम्नं   बृहद्यश   इषस्पते   दिदीह   देव   देवयुः ।
वि कोशं मध्यमं युव ॥9॥

हे  पूजनीय  हे परमेश्वर तुम अपने - पन से अपना लेना ।
यह जीवन सार्थक हो जाए अपना सान्निध्य हमें देना॥9॥

8736
आ वच्यस्व सुदक्ष चम्वोः सुतो विशां वह्निर्न विश्पतिः ।
वृष्टिं दिवः पवस्य रीतिमपां जिन्वा गविष्टये धियः॥10॥

हे प्रभु तुम सर्वत्र व्याप्त हो सज्जन को प्रेरित करते  हो ।
योगी को सद्गति देते हो सत्पथ पर प्रेषित करते हो॥10॥

8737
एतमु   त्यं   मदच्युतं   सहस्त्रधारं   वृषभं   दिवो   दुहुः ।
विश्वा वसूनि बिभ्रतम् ॥11॥

अनन्त-शक्तियों के स्वामी हो तुम हो आनन्द के आगार।
हम भी आनन्द पा सकते हैं कोटि-कोटि तेरा आभार॥11॥ 

8738
वृषा  वि  जज्ञे  जनयन्नमर्त्यः  प्रतपञ्ज्योतिषा  तमः ।
स  सुष्टुतः  कविभिर्निर्णिजं दधे त्रिधात्वस्य दंससा॥12॥

वह अनन्त है वह अमर्त्य है अज्ञान- तमस को हरता है ।
सबका सुख -साधन वह ही है सबके मन में रहता है॥12॥

8739
स   सुन्वे   यो   वसूनां   यो   रायामानेता   य  इळानाम्  ।
सोमो यः सुक्षितीनाम् ॥13॥

तुम ही जगती के सर्जक हो तुम ही यश-वैभव के स्वामी ।
हमें ज्ञान - धन देना प्रभु जी हम हैं तेरे ही अनुगामी॥13॥

8740
यस्य  न  इन्द्रः पिबाद्यस्य  मरुतो यस्य वार्यमणा भगः । 
आ   येन   मित्रावरुणा   करामह   एन्द्रमवसे   महे ॥14॥

तुम ही आनन्द के सागर हो सज्जन पाते सँग तुम्हारा ।
सद्विद्या के तुम स्वामी हो हम सबके हो तुम्हीं सहारा॥14॥

8741
इन्द्राय   सोम   पातवे   नृभिर्यतः  स्वायुधो   मदिन्तमः ।
पवस्व मधुमत्तमः ॥15॥

हे आनन्द- जनक  परमात्मा  हम भी पायें सँग तुम्हारा ।
ज्ञान-कर्म से जुड जायें हम हो जाए कल्याण हमारा॥15॥

8742
इन्द्रस्य  हार्दि  सोमधानमा  विश  समुद्रमिव  सिन्धवः ।
जुष्टो  मित्राय  वरुणाय  वायवे दिवो विष्टम्भ उत्तमः॥16॥

हे पावन पूजनीय परमेश्वर यह हवि-भोग ग्रहण कर लेना।
प्रश्न कई हैं मन के भीतर मुझको अन्वेषण बल देना॥16॥      

Wednesday, 19 March 2014

सूक्त - 109

[ऋषि-अग्नि धिष्ण्य ईश्वर । देवता- पवमान सोम । छन्द- गायत्री ।]

8743
परि  प्र  धन्वेन्द्राय  सोम  स्वादुर्मित्राय  पूष्णे  भगाय ॥1॥

उद्योगी नर ही पा सकता है विविध भॉति के फल और फूल ।
धर्म अर्थ और काम मोक्ष में रहता  है  वह  ही अनुकूल ॥1॥

8744
इन्द्रस्ते सोम सुतस्य पेया: क्रत्वे दक्षाय विश्वे च देवा: ॥2॥

सरल  सहज  सज्जन  साधू  ही  पा सकता है परमानन्द ।
ज्ञान- कर्म  दोनों  उत्तम  हैं  इन्हीं  मार्ग पर है आनन्द॥2॥

8745
एवामृताय  महे  क्षयाय  स  शुक्रो अर्ष  दिव्यः पीयूषः ॥3॥

आनन्द - अमृत  भी  कहते  हैं   अपर नाम है परमानन्द ।
विविध नाम से अभिहित होता बस वह ही है ब्रह्मानन्द॥3॥

8746
पवस्य सोम महान्त्समुद्रःपिता देवानां विश्वाभि धाम ॥4॥

व्योम  रूप  में  वही  व्याप्त  है  वह है परम पिता परमेश्वर ।
उपासना से वह मिलता है नर उद्यम करता जीवन भर॥4॥

8747
शुक्रः पवस्य देवेभ्यः सोम  दिवे  पृथिव्यै शं च प्रजायै ॥5॥

आनन्द का  वह श्रोत हमारा सबके सुख का रखता ध्यान ।
ऊर्मि उफन कर उठती-गिरती होता ब्रह्मानन्द का भान॥5॥

8748
दिवो धर्तासि शुक्रः पीयूषः सत्ये विधर्मन्वाजी पवस्व ॥6॥

वह अनन्त अमृत-मय आभा अतुलित बल का है स्वामी ।
वह ईश्वर ही ईष्ट - देव है जन-जन है उसका अनुगामी ॥6॥

8749
पवस्व   सोम  द्युम्नी  सुधारो  महामवीनामनु   पूर्व्यः ॥7॥

यश - वैभव  का  वह  स्वामी है सर्वो - परि है उसकी सत्ता ।
वह ही रक्षक है हम सबका उसका वैभव स्वयं थिरकता॥7॥

8750
नृभिर्येमानो जज्ञानः पूतः क्षरद्विश्वानि मन्द्रः स्वर्वित् ॥8॥

जो  भोले  हैं  अत्यन्त  सरल  हैं  वे प्रभु का दर्शन पाते हैं ।
दिव्य-शक्ति के श्रोत वही हैं प्रेम के पथ पर पहुँचाते हैं ॥8॥

8751
इन्दुः पुनानः प्रजामुराणः करद्विश्वानि द्रविणानि नः ॥9॥

परमेश्वर  प्रेरक  हैं  मेरे  शुभ - चिन्तक  हैं  वही  हमारे ।
आलोक प्रदान वही करते हैं वे हैं सबके सखा- सहारे॥9॥

8752
पवस्व सोम क्रत्वे दक्षायाश्वो न निक्तो वाजी धनाय ॥10॥

जैसे  सूरज  तमस  मिटाता  घर-घर  मैं  देता  उजियारा ।
वह ही सत्पथ पर ले जाता सुखमय होता जीवन सारा॥10॥

8753
तं  ते  सोतारो रसं मदाय पुनन्ति सोमं  महे  द्युम्नाय ॥11॥

प्रभु के विराट-रूप का साधक मन में ध्यान किया करता है।
यह श्रध्दा की गली अनोखी मानव सत्पथ पर चलता है॥11॥

8754
शिशुं जज्ञानं हरिं मृजन्ति पवित्रे सोमं देवेभ्य इन्दुम् ॥12॥

ऋतु आती  है और  जाती  है  हर  ऋतु  में  होती  उपासना ।
परमेश्वर की महिमा अद्भुत पूरी होती है मनो- कामना॥12॥

8755
इन्दुः    पविष्ट     चारुर्मदायापामुपस्थे     कविर्भगाय ॥13॥

सज्जन सत्कर्म किया करते हैं होता रहता उनका उत्थान ।
उनको यश-वैभव मिलता है करते हैं परमानन्द- पान॥13॥

8756
बिभर्ति  चार्विन्द्रस्य  नाम  येन  विश्वानि  वृत्रा जघान ॥14॥

सभी जीव  को  देह  प्राप्त  है  पर उद्यम  की  है भारी महिमा ।
कर्म-मार्ग मै ज्ञान भरा है यह है कर्म-योग की  गरिमा॥14॥

8757
पिबन्त्यस्य विश्वे देवासो गोभिः श्रीतस्य नृभिःसुतस्य॥15॥

उद्यम  ही  गुरु - वर  है  मेरा  बिन  प्रयास  है  जीवन  व्यर्थ ।
चिन्तन मनन निदिध्यासन से बन सकते हैं सभी समर्थ॥15॥

8758
प्र सुवानो अक्षा: सहस्त्रधारस्तिरः पवित्रं वि वारमव्यम् ॥16॥

जब   अज्ञान तमस  मिटता  है  होता  है  चहुँदिशि  उजियारा ।
तन-मन-जीवन उज्ज्वल होता बहती है आनन्द की धारा॥16॥

8759
स  वाज्यक्षा:  सहस्त्ररेता अद्भिर्मृजानो  गोभिः  श्रीणानः ॥17॥

जब साधक समाधान पाता है आनन्द - ऊर्मि मिल जाती है ।
वह अभिषिक्त हुआ जाता है तब उपासना फल पाती  है॥17॥

8760
प्र  सोम  याहीद्रस्य   कुक्षा नृभिर्येमानो अद्रिभिः  सुतः ॥18॥

जो ईश्वर का सान्निध्य चाहते वे लक्ष्य- मार्ग पर चलते हैं ।
परमेश्वर सबकी अभिलाषा हर युग में  पूरी  करते  हैं ॥18॥

8761
असर्जि  वाजी   तिरः पवित्रमिन्द्रा  सोमः सहत्रधारः ॥19॥

अति समर्थ है वह परमात्मा उसकी  बनी   नहीं परिभाषा ।
पर हम उसको पा सकते हैं वही समझता प्रेम की भाषा॥19॥

8762
अञ्जन्त्येनं मध्वो रसेनेन्द्राय वृष्ण इन्दुं मदाय ॥20॥

परमात्मा को कई उपासक ज्ञान-मार्ग से भी पाते हैं ।
वे आनन्द - लहर की महिमा में अवगाहन करते जाते हैं॥20॥ 

8763
देवेभ्यस्त्वा  वृथा  पाजसेSपो  वसानं  हरिं  मृजन्ति ॥21॥

विद्या बल यश वैभव पाना नहीं असम्भव किन्तु विरल है ।
ज्ञान-कर्म की युति हो जाए तो यह थोडा सहज-सरल है॥21॥

8764
इन्दुरिन्द्राय तोशते नि तोशते श्रीणन्नुग्रो रिणन्नपः ॥22॥

जैसी  मन  की अभिलाषा  है उसी  दिशा  में  हम  जाते  हैं ।
सुख अपने हाथों में ही है कर्मानुसार हम फल  पाते  हैं॥22॥         

Tuesday, 18 March 2014

सूक्त - 110

[ऋषि- त्र्यरुण त्रसदस्यु । देवता- पवमान सोम । छन्द- अनुष्टुप् - बृहती ।]

8765
पर्यू षु प्र धन्व वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः ।
द्विषस्तरध्या ऋणया न ईयसे ॥1॥

ब्रह्म  परायण  नर  ही  सचमुच  परमेश्वर  को  पाता  है ।
वही वीर फिर दुष्ट-दलन कर देश को सबल बनाता है॥1॥

8766
अनु हि त्वा सुतं सोम मदामसि महे समर्यराज्ये ।
वाजॉ अभि पवमान प्र गाहसे ॥2॥

सर्व  समर्थ  वही  सत्ता  है  वह  ही  यश- वैभव  की  खान ।
कर्मानुरूप सुख- दुख मिलता है चिंतन से होता है भान॥2॥

8767
अजीजनो हि पवमान सूर्यं विधारे शक्मना पयः ।
गोजीरया रंहमाणः पुरन्ध्या ॥3॥

वह  दामिनी  प्रभा  का  दाता  बिना  श्रेय  के  सब  देता  है ।
गति-यति दोनों में माहिर है अपने-पन से अपना लेता है॥3॥

8768
अजीजनो अमृत मर्त्येष्वॉ ऋतस्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः ।
सदासरो वाजमच्छा सनिष्यदत् ॥4॥

जन - जन उसके  लिए  बराबर  दृष्टि  सभी  पर  रहती  है ।
दया-दृष्टि हम पर भी रखना मन-मैना तुझ में रमती है ॥4॥

8769
अभ्यभि हि श्रवसा ततर्दिथोत्सं न कं चिज्जनपानमक्षितम्।
शर्याभिर्न भरमाणो गभस्त्योः ॥5॥

रवि की किरणें सब विकार को बिना-विलम्ब मिटा देती हैं ।
ऐसे ही सज्जन की भूलों को देव- शक्तियॉ  हर  लेती  हैं ॥5॥

8770
आदीं के चित्पश्यमानास आप्यं वसुरुचो दिव्या अभ्यनूषत् ।
वारं न देवः सविता व्यूर्णुते ॥6॥

रवि-किरणें हर जगह पहुँचतीं ज्ञानी कण-कण में प्रभु पाता है।
घट-घट में प्रभु दर्शन करके वह आनन्द से  भर  जाता  है ॥6॥

8771
त्वे सोम प्रथमा वृक्तबर्हिषो महे वाजाय श्रवसे धियं दधुः ।
स त्वं वीर वीर्याय चोदय ॥7॥

हे प्रभु हम सत्पथ पर चल-कर बन जायें धीर-वीर -उत्साही ।
तुम वरद-हस्त हम  पर  रखना  हम  हैं  चरैवेति के राही ॥7॥

8772
दिवः पीयूषं पूर्व्यं यदुक्थ्यं महो गाहाद्दिव आ निरधुक्षत ।
इन्द्रमभि जायमानं समस्वरन् ॥8॥

परमात्मा अमृत - स्वरूप है यह  जगती  है  उसका  रूप ।
सर्व-व्याप्त है वह परमेश्वर वह है अनन्त अद्भुत अनूप॥8॥

8773
अध यदिमे पवमान रोदसी इमा च विश्वा भुवनाभि मज्मना।
यूथे न निःष्ठा वृषभो वि तिष्ठसे ॥9॥

हम  सबको  अपना  बल  देकर  उसने  हमें  समर्थ  बनाया ।
फिर भी स्वाधीन रखा है उसने यह है बस उसकी ही माया ॥9॥

8774
सोमः  पुनानो  अव्यये  वारे  शिशुर्न  क्रीळन्पवमानो  अक्षा:  ।
सहस्त्रधारः शतवाज इन्दुः ॥10॥ 

वह अनन्त बल का स्वामी  है  सब  सद्गुण  का  वही  निधान ।
विविध - अनन्त  रूप  हैं  उसके  ऐसा है अपना भगवान ॥10॥

8775
एष   पुनानो   मधुमॉ   ऋतावेन्द्रायेन्दुः   पवते   स्वादुरूर्मिः । 
वाजसनिर्वरिवोविद्वयोधा: ॥11॥

जो  ज्ञान - कर्म  से  आगे  बढते  उनको  प्रभु  मिल  जाते  हैं ।
तब सबका प्यार उन्हें मिलता वे अनुपम आनन्द पाते हैं॥11॥

8776
स    पवस्व    सहमानः   पृतन्यून्त्सेधन्रक्षांस्यप    दुर्गहाणि ।  
स्वायुधः सासह्वान्त्सोम शत्रून् ॥12॥

जननी - जन्मभूमि रक्षित हो अतुलित आयुध का अन्वेषण हो ।
देश- भूमि यह  रहे सुरक्षित हर हाल में इसका संरक्षण हो ॥12॥  
    

Monday, 17 March 2014

सूक्त - 111

[ऋषि- अनानत पारुच्छेपि । देवता- पवमान सोम । छन्द- अत्यष्टि ।]

8777
अया रुचा हरिण्या पुनानो विश्वा द्वेषांसि तरति स्वयुग्वभिः सूरो न स्वयुग्वभिः।
धारा सुतस्य रोचते पुनानो अरुषो हरिः ।
विश्वा  यद्रूपा  परियात्यृक्वभिः  सप्तास्येभिरृक्वभिः ॥1॥

शूर  सूर्य - सम  ही  होता  है  वह  भी  तमस  मिटाता  है ।
वह अपनी तेजस्वी छवि से दुष्टों को सबक सिखाता है॥1॥

8778
त्वं त्यत्पणीनां विदो वसु सं मातृभिर्मर्जयसि स्व आ दम ऋतस्य धीतिभिर्दमे।
परावतो न साम तद्यत्रा रणन्ति धीतयः ।
त्रिधातुभिररुषीभिर्वयो दधे रोचमानो वयो दधे ॥2॥

भिन्न-भिन्न  प्रतिभा  से  मानव  दुनियॉ  में  जगह  बनाता  है ।
प्रभु ने हमको जो प्रतिभा दी है वह व्यक्तित्व में नजर आता है॥2॥

8779
पूर्वामनु प्रदिशं याति चेतितत्सं रश्मिभिर्यतते दर्शतो रथो दैव्यो 
दर्शतो रथः । अग्मन्नुक्थानि पौंस्येन्द्रं जैत्राय हर्षयन् ।
वज्रश्च   यद्भवथो   अनपच्युता   समत्स्वनपच्युता  ॥3॥

दिव्य तेज हो हर मानव में अन्धकार  भी  डर-कर  भागे ।
हर प्राणी यश-वैभव पाए तमो-निशा से हर कोई जागे॥3॥    

सूक्त - 112

[ऋषि- शिशु आङ्गिरस । देवता- पवमान सोम । छन्द- पंक्ति ।]

8780
नानानं वा उ नो धियो वि व्रतानि जनानाम् ।
तक्षा रिष्टं रुतं भिषग्ब्रह्मा सुन्वन्तमिच्छतीन्द्रायेन्दो परि स्त्रव॥1॥

कलाकार रचना करता है  प्रतिभा  से  ही  होता  निर्माण ।
अपनी गति अपने हाथों है हो सकता है नूतन निर्वाण॥1॥

8781
जरतीभिरोषधीभः पर्णेभिः शकुनानाम् ।
कार्मारो अश्मभिर्द्युभिर्हिरण्यवन्तमिच्छतीन्द्रायेन्दो परिस्त्रव॥2॥

जो  पवन-वेग  से  उडता  है  उत्तम आयुध  सँग  रहता  है ।
उस पर आशीष बरसता है जो भी सत्पथ पर चलता है॥2॥

8782
कारुरहं ततो भिषगुपलप्रक्षिणी नना ।
नानाधियो वसूयवोSनु गा इव तस्थिमेन्द्रायेन्दो परि स्त्रव॥3॥

जीवन  का  उद्देश्य  परम हो मन को आकर्षित  करती  माया ।
तब भी प्रभु तुम प्रेरित करना बंधन  से उबरे  मेरी  काया ॥3॥

8783
अश्वो वोळ्हा सुखं रथं हसनामुपमन्त्रिणः ।
शेपो रोमण्वन्तौ भेदौ वारिन्मण्डूक इच्छतीन्द्रायेन्दो परि स्त्रव॥4॥

स्तर - अनुरूप   कर्म   होते   हैं   परस्पर   प्रिय   करते   परिहास ।
हे प्रभु जीवन- लक्ष्य  बताना  मैं  स्वयं  न  बन  जाऊँ  उपहास॥4॥  

Sunday, 16 March 2014

सूक्त - 113

[ऋषि- कश्यप मारीच । देवता- पवमान सोम । छन्द- पंक्ति ।]

8784
शर्यणावति सोममिन्द्रः पिबतु वृत्रहा ।
बलं दधान आत्मनि करिष्यन्वीर्यं महदिन्द्रायेन्दो परि स्त्रव॥1॥

जब  राजा  कर्म - ज्ञान  दोनों  में  ब्रह्मानन्द -  पान  करता  है ।
वह  राजा  वास्तव  में  वरेण्य  है जो ज्ञान-कर्म  में रमता है॥1॥

8785
आ पवस्व दिशां पत आर्जीकात्सोम मीढ्वः ।
ऋतवाकेन सत्येन श्रध्दया तपसा सुत इन्द्रायेन्दो परि स्त्रव ॥2॥

सरल  सहज  सत  का  प्रहरी  जो  जन-प्रिय  हो  वह  राजा  हो ।
सन्तान- सदृश जो प्रजा को पाले ऐसा गुण वाला ही राजा हो॥2॥

8786
पर्जन्यवृध्दं महिषं तं सूर्यस्य दुहिताभरत् ।
तं गन्धर्वा:प्रत्यगृभ्णन्तं सोमे रसमादधुरिन्द्रायेन्दो परि स्त्रव॥3॥

यश - वैभव  का  वह  स्वामी  हो  खुद   पर   हो  उसको  विश्वास ।
पूरे  मन  से  कर्तव्य  निभाए अभिमान  न फटके आस-पास ॥3॥

8787
ऋतं वदन्नृतद्युम्न सत्यं वदन्त्सत्यकर्मन् ।
श्रध्दां वदन्त्सोम राजन्धात्रा सोम परिष्कृत इन्द्रायेन्दो परि स्त्रव॥4॥

यज्ञ  सदृश  पावन - जीवन  हो  सत्पथ  का  ही  वह  राही  हो ।
ऐसा  ही  राजा  यश  पाता  है  जो गो-पालक गुण-ग्राही हो ॥4॥

8788
सत्यमुग्रस्य बृहतः सं स्त्रवन्ति संस्त्रवा: ।
सं यन्ति रसिनो रसा: पुनानो ब्रह्मणा हर इन्द्रायेन्दो परि स्त्रव॥5॥

वेद - विज्ञ  हो  जिसका  गुरु- वर  सत्य - धर्म का अनुगामी  हो ।
अक्षुण्ण अभेद्य राजधानी हो विविध सुखों का वह स्वामी  हो ॥5॥

8789
यत्र ब्रह्मा पवमान छन्दस्यां3 वाचं वदन् ।
ग्राव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन्निन्द्रायेन्दो परि स्त्रव्॥6॥

सरल सहज सज्जन संन्यासी जो वेद-ऋचा सँग  जीता  है ।
नृप उसका सम्मान करे जो ज्ञानामृत अविरल पीता है ॥6॥

8790
यत्र ज्योतिरजस्त्रं यस्मिँल्लोके स्वर्हितम् ।
तस्मिन्मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परि स्त्रव्॥7॥

परमेश्वर तुम ही प्रणम्य हो ज्ञान-कर्म पथ पर ले चलना ।
हमको वाणी का वैभव देना वेद - ज्ञान हो मेरा गहना ॥7॥

8791
यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः ।
यत्रामूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्त्रव्॥8॥

सत्यासत्य  भान हो हमको ज्ञान - योग  हो  धर्म  हमारा ।
धर्म -विवेक जहॉ रहता हो वही राज्य सबको है प्यारा ॥8॥

8792
यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः ।
लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्त्रव॥9॥

ज्ञानी चिन्ता-मुक्त विचरता बन्धन- मुक्त  वही  जीता है ।
जल-धारा सँग वह बहता है वह ही प्रेम-सुधा पीता है ॥9॥

8793
यत्र कामा निकामाश्च  यत्र ब्रध्नस्य विष्टपम् ।
स्वधा च यत्र तृप्तिश्च तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्त्रव॥10॥

ब्रह्म - बोध  ही  मनुज - लक्ष्य  है  प्रभु  पायें  हम  परमानन्द ।
जिसको  पाकर  दुख  मिट  जाए मुझको दो ऐसा आनन्द ॥10॥

8794
यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ।
कामस्य यत्राप्ता:कामास्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्त्रव॥11॥

सभी  कामना   पूर्ण  करो  प्रभु  हम  सबको  दो   ऐसा   ज्ञान ।
आनन्द  समाए  भीतर -  बाहर  देना  वही  भक्ति - भगवान ॥11॥           

सूक्त - 114

[ऋषि- कश्यप मारीच । देवता- पवमान सोम । छन्द- पंक्ति ।]

8795
य इन्द्रोः पवमानस्यानु धामान्यक्रमीत् ।
तमाहुः सुप्रजा इति यस्ते सोमाविधन्मन इन्द्रायेन्दो परि स्त्रव॥1॥

जब  कोई  अनुष्ठान  करता  है  उपासना  में  रत  रहता  है ।
तब नित-नूतन अनुभव होते मन में प्रभु-प्रेम उमडता है॥1॥

8796
ऋषे मंत्रकृतां स्तोमैः कश्यपोद्वर्धयन्गिरः ।
सोमं नमस्य राजानं यो जज्ञे वीरुधां पतिरिन्द्रायेन्दो परि स्त्रव॥2॥

परमेश्वर तुम ही प्रणम्य हो तुम हमें ज्ञान का दे  दो  दान ।
वाणी के वैभव के द्वारा हे प्रभु  मुझे  सिखा  दो  ध्यान ॥2॥

8797
सप्त दिशो नानासूर्या: सप्त होतार ऋत्विजः ।
देवा आदित्या ये सप्त तेभिःसोमाभि रक्ष न इन्द्रायेन्दो परि स्त्रव॥3॥

दिव्य- दृष्टि  मिल जाती उसको जो मनुज मुक्त  हो  जाता है ।
सात-लोक शुभ- फल देते हैं मन-वृन्दावन बन  जाता  है॥3॥

8798
यत्ते राजञ्छृतं हविस्तेन सोमाभि रक्ष नः ।
अरातीवा मा नस्तारीन्मो च नःकिं चनाममदिन्द्रायेन्दो परि स्त्रव॥4॥

हे   परमेश्वर  तुम   रक्षा  करना  सतत  सफल  हो  अनुष्ठान ।
वरद-हस्त तुम हम पर रखना मिले मुक्ति हे कृपा-निधान॥4॥

॥ इति नवमं मण्डलम् समाप्तम् ॥     

Tuesday, 24 December 2013

सूक्त- 82

[ऋषि- विश्वकर्मा भौवन । देवता- विश्वकर्मा । छन्द- त्रिष्टुप् ।]

9646
चक्षुषः पिता  मनसा  हि  धीरो  घृतमेने  अजनन्नम्नमाने ।
यदेदन्ता अददृहन्त  पूर्व आदिद्  द्यावापृथिवी अप्रथेताम्॥1॥

पूर्व  समय  में  जब  पृथ्वी  और  द्यावा  का विस्तार  हुआ था ।
आलोक लिए आदित्य आ गए दिग्दर्शन भी तभी हुआ था॥1॥

9647
विश्वकर्मा  विमना  आद्विहाया  धाता विधाता परमोत संदृक् ।
तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषीन्पर एकमाहुः॥2॥

विश्वकर्मा  हैं  सृजन - देव  जग - रचना  का  श्रेय  उन्हें  है ।
वे महाप्रतापी अद्वितीय हैं अपने अभीष्ट का ध्येय विदित है॥2॥

9648
यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा ।
यो  देवानां  नामधा  एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या॥3॥

परमेश्वर जीवन - दाता  है  वह  ही  पालन-पोषण  करता  है ।
एक ही है पर विविध नाम से वह हम सबका दुख हरता है॥3॥

9649
त आयजन्त  द्रविणं समस्मा ऋषयः पूर्वे जरितारो न भूना ।
असूर्ते सूर्ते रजसि निषत्ते ये भूतानि समकृण्वन्निमानि ॥4॥

अंतरिक्ष  में  वह  रहता  है  उसने  ही  की  है  जग-रचना ।
पञ्च-भूत  भी  हमें  दिया है सब पा-कर मौन हुई रसना ॥4॥

9650
परो  दिवा  पर  एना  पृथिव्या  परो  देवेभिरसुरैर्यदस्ति ।
कं स्विद्गर्भं प्रथमं दध्र आपो यत्र देवा: समपश्यन्त विश्वे॥5॥

वह  प्रभु  मेरे  भीतर  बैठा है आकाश-अवनि से वह है दूर ।
वह सुर-असुरों से भी परे है पर कण-कण में वह है ज़रूर॥5॥

9651
तमिद्गर्भं प्रथमं दध्र आपो यत्र देवा: समगच्छन्त विश्वे ।
अजस्य नाभावध्येकमर्पितं यस्मिन्विश्वानि भुवनानि तस्थुः॥6॥

हिरण्य- गर्भ  में  छिपा हुआ वह सभी शक्तियों का आश्रय है ।
चर-अचर नियंता-मात्र वही है उसी परम का यह परिचय है॥6॥

9652
न   तं   विदाथ   य   इमा   जजानान्यद्युष्माकमन्तरं   बभूव ।
नीहारेण   प्रावृता   जल्प्या   चासुतृप    उक्थशासश्चरन्ति॥7॥

परमेश्वर की  इस प्रबभुता को कौन भला कह - सुन सकता है ।
सबसे परे  है  वह  परमात्मा पर सबके  भीतर वह रहता है॥7॥    
 

Saturday, 14 December 2013

सूक्त -91

[ऋषि- अरुण वैतहव्य । देवता- अग्नि । छन्द- जगती- त्रिष्टुप् ।]

9815
सं   जागृवद्भिर्जरमाण  इध्यते  दमे  दमूना   इषयन्निळस्पदे ।
विश्वस्य होता हविषो वरेण्यो विभुर्विभावा सुषखा सखीयते॥1॥

हे  अग्नि - देव  हे  परम - मित्र  तुम अन्न-धान से घर भरना ।
आलोकवान तुम हो तेजस्वी हवि - भोग ग्रहण करते रहना॥1॥

9816
स   दर्शतश्रीरतिथिर्गृहेगृहे     वनेवने    शिश्रिये    तक्ववीरिव ।
जनञ्जनं जन्यो नाति मन्यते विश आ क्षेति विश्यो3विशंविशम्॥॥2॥

तुम  ही  विद्वान  विभूतिवान  हो  सबसे  मिलता  है  सम्मान ।
घर हो वन हो या आश्रम हो सब जगह पूज्य हो एक समान॥2॥

9817
सुदक्षो  दक्षैः क्रतुनासि  सुक्रतुरग्ने  कविः काव्येनासि  विश्ववित्।
वसुर्वसूनां क्षयसि त्वमेक इद् द्यावा च यानि पृथिवी च पुष्यतः॥3॥

तुम नचिकेता नीति-निपुण हो कर्तव्य--कर्म कमनीय-काव्य हो।
समर्थ  सार  सर्वज्ञ  तुम्हीं  हो अक्षय - अक्षत - अद्वितीय हो ॥3॥

9818
प्रजानन्नग्ने  तव योनिमृत्वियमिळायास्पदे घृतवन्तमासदः ।
आ  ते  चिकित्र  उषसामिवेतयोSरेपसः  सूर्यस्येव  रश्मयः ॥4॥

उषा - काल की प्रभा - गुलाबी रवि - रश्मियॉं सदृश चञ्चल हो ।
औषधियों की समिधा से  ही देदीप्यमान आभा उज्ज्वल हो॥4॥

9819
तव  श्रियो  वर्ष्यस्येव  विद्युतश्चित्राश्चिकित्र  उषसां  न  केतवः ।
यदोषधीरभिसृष्टो वनानि  च  परि  स्वयं चिनुषे अन्नमास्ये॥5॥

जब  तुम  हविष्यान्न  लेते  हो  स्वयमेव  पवन होता है पावन ।
प्राण - वायु तुम  ही  देते  हो  रहे सुरक्षित सबका तन - मन ॥5॥

9820
तमोषधीर्दधिरे गर्भमृत्वियं तमापो अग्निं जनयन्त मातरः ।
तमित्समानं वनिनश्च वीरुधोSन्तर्वतीश्च सुवते च विश्वहा॥6॥

अग्निदेव  की  महिमा  भारी  सब  सुख  देते ऋतु - अनुसार ।
वे  ही सबके शुभ - चिन्तक हैं पग-पग पाया प्रेम - प्रभार ॥6॥

9821
वातोपधूत  इषितो  वशॉं  अनु  तृषु  यदन्ना  वेविषद्वितिष्ठसे ।
आ ते यतन्ते रथ्यो3यथा पृथक् शर्धांस्यग्ने अजराणि धक्षतः॥7॥

अग्नि - देव  अति  तेजस्वी  हैं  सूर्य - सदृश  है  उनका  रूप ।
जठरानल  से  मानव - तन  में अग्नि - देव का है स्वरूप ॥7॥

9822
मेघाकारं विदथस्य प्रसाधनमग्निं होतारं परिभूतमं मतिम् ।
तमिदर्भे हविष्या समानमित्तमिन्महे वृणते नान्यं त्वत्॥8॥

वे  ऋतम्भरा - प्रज्ञा  देते  हैं  रिपु - दल  को  करते  हैं  दूर ।
आओ हवि - भोग ग्रहण कर लो सुख देना सबको भरपूर॥8॥

9823
त्वामिदत्र   वृणते   त्वायवो   होतारमग्ने   विदथेषु   वेधसः ।
यद्देवयन्तो दधति प्रयॉंसि ते हविष्मन्तो मनवो वृक्तबर्हिषः॥9॥

हे अग्नि - देव  तुम  ही वरेण्य हो हम आवाहन तेरा करते हैं ।
आहुतियॉं   तुमको  देते  हैं  बारम्बार   नमन   करते   हैं ॥9॥

9824
तवाग्ने  होत्रं  तव  पोत्रमृत्वियं  तव  नेष्ट्रं  त्वमग्निदृतायतः ।
तव प्रशास्त्रं त्वमध्वरीयसि ब्रह्मा चासि गृहपतिश्च नो दमे॥10॥

यज्ञ - हवन  में  तुम  ही  भगवन सब दायित्व निभाते हो ।
विविध रूप में तुम ही प्रभु जी धर्म-कर्म सब सिखलाते हो॥10॥

9825
यस्तुभ्यमग्ने अमृताय मर्त्यः समिधा दाशदुत वा हविष्कृति।
तस्य होता भवसि यासि दूत्य1मुप ब्रूषे यजस्यध्वरीयसि॥11॥

सुधा-स्वरूप तुम्हीं हो भगवन तुम ही मातृ - सदृश सेते हो ।
यजमान रूप में हवि देते हो अग्नि - रूप में हवि लेते हो ॥11॥

9826
इमा अस्मै मतयो वाचो अस्मदॉं ऋचो गिरःसुष्टुतयःसमग्मत।
वसूयवो वसवे जातवेदसे वृध्दासु चिद्वर्धनो यासु चाकनत्॥12॥

अग्नि- देव  के  हेतु  ऋचा  का  समवेत - स्वरों में होता गान ।
अग्नि- देव धन - वैभव देते अग्नि - देव  देते  धन - धान ॥12॥

9827
इमां  प्रत्नाय  सुष्टुतिं  नवीयसीं  वोचेयमस्मा उशते शृणोतु नः ।
भूया अन्तरा हृद्यस्य निस्पृशे जायेव पत्य उशती सुवासा:॥13॥

विविध  विधा  में  भॉंति - भॉंति  से  वेद - मंत्र सब कोई गाओ ।
पावक-पावन पूजन स्वीकारो अग्निदेव मन में बस जाओ॥13॥

9828
यस्मिन्नश्वास ऋषभास उक्षणो वशा मेषा अवसृष्टास आहुता:।
कीलालपे सोमपृष्ठाय वेधसे हृदा मतिं जनये  चारुमग्नये॥14॥

हवि - भोग  ग्रहण  करने  वाले  हे  बुध्दि - श्रेष्ठ हे अग्नि - देव ।
सोमाहुति स्वीकार करो प्रभु मति पावन कर दो अग्निदेव॥14॥ 

9829
अहाव्यग्ने   हविरास्ये   ते   स्त्रुचीव   घृतं   चम्वीव   सोमः ।
वाजसनिं रयिमस्ये सुवीरं प्रशस्तं धेहि यशसं बृहन्तम्॥15॥

प्रज्वलित अग्नि ही तेरा मुख है हवि-भोग प्रेम से खा लेना ।
यश-वैभव प्रदान करना और अन्न - धान सबको देना ॥15॥ 
              

Monday, 18 November 2013

सूक्त - 118

[ऋषि-उरुक्षय आमहीयव । देवता- अग्नि ।छन्द- गायत्री ।]

10141
अग्ने हंसि न्य1त्रिणं दीद्यन्मर्त्येष्वा । स्वे क्षये शुचिव्रत॥1॥

हे  अग्नि - देव  हे  तेज - पुञ्ज  तम  से  तुम्हीं  बचाते  हो ।
रोगाणु  नष्ट  तुम  ही  करते  हो  निरोगी  हमें बनाते हो ॥1॥

10142
उत्तिष्ठसि स्वाहुतो घृतानि प्रति मोदसे । यत्त्वा स्त्रुचःसमस्थिरन् ॥2॥

घृत - आहुति  है  तुम्हें  समर्पित  सादर  ग्रहण करो भगवन ।
श्रध्दा से अर्पित करते हैं भली-भॉंति हो अग्नि-प्रज्ज्वलन॥2॥

10143
स आहुतो वि रोचतेSग्निरीळेन्यो गिरा । स्त्रुचा प्रतीकमज्यते ॥3॥

सादर  आवाहन  है  प्रभुवर  स्तवन  प्रेम  से  हम  पढते  हैं ।
घृत-आहुति हम सर्व-प्रथम हे अग्नि-देव अर्पित करते हैं ॥3॥

10144
घृतेनाग्निः समज्यते मधुप्रतीक आहुतः। रोचमानो विभावसु:॥4॥

हविष्यान्न  जब  तुम  लेते  हो  और  तृप्त  जब  हो  जाते  हो ।
स्तुति से आहुति से प्रदीप्त तुम प्रकाश-पुञ्ज बन जाते हो ॥4॥

10145
जरमाणः समिध्यसे देवेभ्यो हव्यवाहन । तं त्वा हवन्त मर्त्या:॥5॥

तुम  देवों के हवि-वाहक हो  स्तुति से  तुम्हें  नमन  करते हैं ।
हम बहुत प्रभावित हैं तुमसे  हम आवाहन  करते रहते हैं ॥5॥

10146
तं मर्ता अमर्त्यं घृतेनाग्निं सपर्यत ।अदाभ्यं गृहपतिम् ॥6॥

हे  अग्नि-देव  हे  अविनाशी  तुम  ही  गृहपति  हो  भगवन ।
तुम  सदा  हमारी रक्षा करना हम करते हैं पूजन-अर्चन ॥6॥

10147
अदाभ्येन शोचिषाग्ने रक्षस्त्वं दह।गोपा ऋतस्य दीदिहि॥7॥

असुर - वृत्ति  से  करो  सुरक्षा  तुम  हो  अतिशय  बलशाली ।
तुझ में अदम्य तेज है प्रभु सज्जनता की करते रखवाली ॥7॥ 

10148
स त्वमग्ने प्रतीकेन प्रत्योष यातुधान्यः। उरुक्षयेषु दीद्यत्॥8॥

सहज - स्वाभाविक  रूप  तुम्हारा  रोगों  से  हमें  बचाता  है ।
निर्धारित  स्थानों  में  रहकर  जग  को  नीरोग  बनाता है ॥8॥

10149
तं त्वा गीर्भिरुरुक्षया हव्यवाहं समीधिरे।यजिष्ठं मानुषे जने॥9॥

निवास  तुम्हारा  अति  विस्तृत  है  तुम  ही  हवि के वाहक हो ।
हम वेद- मंत्र से तुम्हें बुलाते तुम जीव-जगत के पालक हो ॥9॥ 

Friday, 15 November 2013

सूक्त - 121

[ऋषि- हिरण्यगर्भ प्राजापत्य । देवता- कौन । छन्द- त्रिष्टुप ।]

10172
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे  भूतस्य  जातः  पतिरेक आसीत् ।
स दाधारः पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥1॥

एक ही परमपिता है जग में सुख - स्वरूप सबका स्वामी है ।
वही  पिता है हम सबका भी भक्ति - स्वरूप देव-धामी है ॥1॥

10173
य आत्मदा  बलदा  यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य  देवा: ।
यस्य छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥2॥

वह भौतिक - आध्यात्मिक बल देता उसके सभी उपासक हैं ।
दृष्टि अमित है जिस प्रभु की उस अद्वितीय के आराधक हैं ॥2॥

10174
यः  प्राणतो  निमिषतो  महित्वैक   इद्राजा   जगतो   बभूव ।
य  ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥3॥

जो मनुज और मृग  सबका  ही जग का एकमात्र  स्वामी  है ।
उस सुख - स्वरूप  परमेश्वर  की  उपासना ऊर्ध्व-गामी है ॥3॥

10175
यस्येमे   हिमवन्तो   महित्वा   यस्य  समुद्रं  रसया  सहाहुः ।
यस्येमा: प्रदिशो  यस्य  बाहू  कस्मै  देवाय हविषा विधेम ॥4॥

हिम-आलय और अन्य शिखर जिसकी महिमा-गरिमा गाते हैं।
दिशा बाहु  हैं  उसी  परम  के  उसका  हम  आरोह  पाते  हैं ॥4॥

10176
येन  द्यौरुग्रा  पृथिवी  च दृळहा येन स्वः स्तभितं  येन  नाकः ।
यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै  देवाय  हविषा विधेम ॥5॥

अवनि और अम्बर को जिसने  किया  कुशलता  से  स्थापित ।
आलोक हेतु आदित्य  दिया है अवदानों से  हैं  आप्लावित ॥5॥

10177
यं  क्रन्दसी  अवसा  तस्तभाने  अभ्यै  क्षेतां  मनसा  रेजमाने ।
यत्राधि सूर उदितो  विभाति  कस्मै  देवाय  हविषा  विधेम ॥6॥

परम  प्रकाशक  है  परमात्मा  जीवन - दायिनी  यह  धरती है ।
धरा - गगन आलोकित  होते  मानवता  सुख  से  पलती है ॥6॥

10178
आपो ह  यद्  बृहतीर्विश्वमायन्गर्भं  दधाना  जनयन्तीरग्निम् ।
ततो देवानां समवर्ततासुरेकः कस्मै  देवाय  हविषा विधेम ॥7॥

प्राण - भूत   वह  परमेश्वर  भी   इसी  जगत  में  विद्यमान  है ।
अहं  ब्रह्मास्मि सत्य है सचमुच वही पिता है यह  प्रमाण है ॥7॥

10179
यश्चिदापो   महिना   पर्यपश्यद्दक्षं   दधाना   जनयन्तीर्यज्ञम् ।
यो  देवेष्वधि  देव एक आसीत्कस्मै देवाय  हविषा  विधेम ॥8॥

शक्ति-पुञ्ज  है  वह   परमात्मा हम उसकी  उपासना करते  हैं ।
सुख-स्वरूप  वह  ही  प्रणम्य  है हम उनकी स्तुति करते हैं ॥8॥

101180
मा नो हिंसीज्जनिता यः पृथिव्या यो वा दिवं सत्यधर्मा जजान ।
यश्च्चापश्चन्द्रा   बृहतीर्जजान   कस्मै  देवाय  हविषा  विधेम ॥9॥

जो  धरा - गगन  का  रक्षक  है  जो  हम  सबका  दुख-हरता  है ।
उस  सुख-स्वरूप  परमेश्वर  की  यह जग उपासना करता है ॥9॥

10181
प्रजापते  न  त्वदेतान्यन्यो  विश्वा  जातानि  परि  ता  बभूव ।
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥10॥

हे  स्वामी  हे  सुख  स्वरूप  प्रभु  हम  तेरा  अर्चन  करते  हैं ।
दया-दृष्टि  हम  पर  रखना  प्रभु  यही  निवेदन कर सकते हैं ॥10॥  

Wednesday, 30 October 2013

सूक्त - 145

[ऋषि- इन्द्राणी । देवता- उपनिषत् । छन्द- अनुष्टुप-पङ्क्ति ।]

10347
इमां   खनाम्योषधिं   वीरुधं  बलवत्तमाम् ।
यया सपत्नीं बाधते यया संविन्दते पतिम्॥1॥

जीवन- दायिनी  ये औषधियॉ  तन-मन का पोषण करती हैं ।
अधिकतर लता-मयी औषधियॉ रूप-राशि वर्धित करती हैं॥1॥

10348
उत्तान - पर्णे   सुभगे   देवजूते  सहस्वति ।
सपत्नीं  मे  परा  धम पतिं मे केवलं कुरु ॥2॥

हे  उत्तान - पर्ण  औषधियॉ  रूपवती  तुम  मुझे  बना  दो ।
प्रसन्न रख  सकूँ अपने पति को ऐसा रूप और गुण दे दो ॥2॥

10349
उत्तराहमुत्तर                  उत्तरेदुत्तराभ्यः ।
अथा  सपत्नी  या ममाधरा साधराभ्यः ॥3॥

हे  सञ्जीवनी औषधि  देवी  तुम मुझे श्रेष्ठ-उत्कृष्ट बनाओ ।
मेरे भीतर के षड्-रिपु को शीघ्राति-शीघ्र तुम दूर भगाओ ॥3॥

10350
नह्यस्या नाम गृभ्णानि नो अस्मिन्रमते जने ।
परामेव    परावतं    सपत्नीं    गमयामसि ॥4॥

मैं  पति  की  प्यारी  बन  जाऊँ  पाऊँ  उनका पावन प्यार ।
जनम-जनम तक साथ रहें कभी भी कम न हो यह ज्वार॥4॥

10351
अहमस्मि सहमानाथ त्वमसि सासहिः ।
उभे  सहस्वती  भूत्वी  सपत्नीं मे सहावहै ॥5॥

हे  देवी  तुम  भी  साथ  निभाना  पति-परमेश्वर  हों न दूर ।
तुम  समर्थ हो  मुझे  भी  देना  पिया-प्रीत  पाऊँ भर-पूर ॥5॥

10352
उप     तेSधां      सहमानामभि       त्वाधां         सहीयसा ।
मामनु प्र ते मनो वत्सं गौरिव धावतु पथा वारिव धावतु ॥6॥

सौन्दर्य-स्वामिनी  मैं  बन  जाऊँ  ऐसा  सुन्दर  देना रूप । 
रूप  के  संग  मधुरता  देना  अक्षय  हो  सौन्दर्य- अनूप ॥6॥