[ऋषि-मन्यु तापस । देवता- मन्यु । छन्द- -त्रिष्टुप्-जगती ।]
9653
यस्ते मन्योSविधद्वज्र सायक सह ओजः पुष्यति विश्वमानुषक्।
साह्याम दासमार्यं त्वया युजा सहस्कृतेन सहसा सहस्वता॥1॥
हे मन्यु वज्र-सम तीक्ष्ण-तीर हो तुम समर्थ हो वैभवशाली ।
हम भी समर्थ बन जायें प्रभुवर करो अनुग्रह हे बलशाली॥1॥
9654
मन्युरिन्द्रो मन्युरेवास देवो मन्युर्होता वरुणो जातवेदा: ।
मन्युं विश ईळते मानुषीर्या:पाहि नो मन्यो तपसा सजोषा:॥2॥
तुम वरुण अग्नि और इन्द्र-देव हो तुम हम सबकी रक्षा करना।
परम-पूज्य तुम ही प्रणम्य हो तुम हम सबका दुख हरना ॥2॥
9655
अभीहि मन्यो तवसस्तवीयान्तपसा युजा वि जहि शत्रून् ।
अमित्रहा वृत्रहा दस्युहा च विश्वा वसून्या भरा त्वं नः॥3॥
प्रभु तेरा आवाहन करते हैं पूजन और अर्चन करते हैं ।
दुष्टों से तुम हमें बचाना अनुरोध यही तुमसे करते हैं॥3॥
9656
त्वं हि मन्यो अभिभूत्योजा: स्वयम्भूर्भामो अभिमातिषाहः।
विश्वचर्षणिः सहुरिः सहावानस्मास्वोजः पृतनासु धेहि॥4॥
हे सेनापति आगे बढ जाओ विजय-पताका तुम फहराओ ।
तुम अतुलित बल के स्वामी हो तुम मेरा भी ओज बढाओ॥4॥
9657
अभागः सन्नप परेतो अस्मि तव क्रत्वा तविषस्य प्रचेतः।
तं त्वा मन्यो अक्रतुर्जिहीळाहं स्वा तनूर्बलदेयाय मेहि॥5॥
तुम धीर-वीर और ज्ञानी हो मुझको अपने सँग में ले लो ।
चरैवेति है लक्ष्य तुम्हारा कर्म-योग की ओर ले चलो॥5॥
9658
अयं ते अस्म्युप मेह्यर्वाङ् प्रतीचीनः सहुरे विश्वधायः ।
मन्यो वज्रिन्नभि मामा ववृत्स्व हनाव दस्यूँरुत बोध्यापेः॥6॥
तुम अनुकूल मुझे लगते हो मुझको अपना मित्र बना लो ।
सान्निध्य तुम्हारा मुझको प्रिय है एक बार मुझको अपना लो॥6॥
9659
अभि प्रेहि दक्षिणतो भवा मेSधा वृत्राणि जङ्घनाव भूरि ।
जुहोमि ते धरुणं मध्वो अग्रमुभा उपांशु प्रथमा पिबाव॥7॥
हे मन्यु-देव हे परम-मित्र आओ हवि-भोग ग्रहण कर लो ।
हम प्रेम से तुम्हें बुलाते हैं तुम आकर सोम-पान कर लो॥7॥
9653
यस्ते मन्योSविधद्वज्र सायक सह ओजः पुष्यति विश्वमानुषक्।
साह्याम दासमार्यं त्वया युजा सहस्कृतेन सहसा सहस्वता॥1॥
हे मन्यु वज्र-सम तीक्ष्ण-तीर हो तुम समर्थ हो वैभवशाली ।
हम भी समर्थ बन जायें प्रभुवर करो अनुग्रह हे बलशाली॥1॥
9654
मन्युरिन्द्रो मन्युरेवास देवो मन्युर्होता वरुणो जातवेदा: ।
मन्युं विश ईळते मानुषीर्या:पाहि नो मन्यो तपसा सजोषा:॥2॥
तुम वरुण अग्नि और इन्द्र-देव हो तुम हम सबकी रक्षा करना।
परम-पूज्य तुम ही प्रणम्य हो तुम हम सबका दुख हरना ॥2॥
9655
अभीहि मन्यो तवसस्तवीयान्तपसा युजा वि जहि शत्रून् ।
अमित्रहा वृत्रहा दस्युहा च विश्वा वसून्या भरा त्वं नः॥3॥
प्रभु तेरा आवाहन करते हैं पूजन और अर्चन करते हैं ।
दुष्टों से तुम हमें बचाना अनुरोध यही तुमसे करते हैं॥3॥
9656
त्वं हि मन्यो अभिभूत्योजा: स्वयम्भूर्भामो अभिमातिषाहः।
विश्वचर्षणिः सहुरिः सहावानस्मास्वोजः पृतनासु धेहि॥4॥
हे सेनापति आगे बढ जाओ विजय-पताका तुम फहराओ ।
तुम अतुलित बल के स्वामी हो तुम मेरा भी ओज बढाओ॥4॥
9657
अभागः सन्नप परेतो अस्मि तव क्रत्वा तविषस्य प्रचेतः।
तं त्वा मन्यो अक्रतुर्जिहीळाहं स्वा तनूर्बलदेयाय मेहि॥5॥
तुम धीर-वीर और ज्ञानी हो मुझको अपने सँग में ले लो ।
चरैवेति है लक्ष्य तुम्हारा कर्म-योग की ओर ले चलो॥5॥
9658
अयं ते अस्म्युप मेह्यर्वाङ् प्रतीचीनः सहुरे विश्वधायः ।
मन्यो वज्रिन्नभि मामा ववृत्स्व हनाव दस्यूँरुत बोध्यापेः॥6॥
तुम अनुकूल मुझे लगते हो मुझको अपना मित्र बना लो ।
सान्निध्य तुम्हारा मुझको प्रिय है एक बार मुझको अपना लो॥6॥
9659
अभि प्रेहि दक्षिणतो भवा मेSधा वृत्राणि जङ्घनाव भूरि ।
जुहोमि ते धरुणं मध्वो अग्रमुभा उपांशु प्रथमा पिबाव॥7॥
हे मन्यु-देव हे परम-मित्र आओ हवि-भोग ग्रहण कर लो ।
हम प्रेम से तुम्हें बुलाते हैं तुम आकर सोम-पान कर लो॥7॥