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Monday, 23 December 2013

सूक्त - 83

[ऋषि-मन्यु तापस । देवता- मन्यु । छन्द- -त्रिष्टुप्-जगती ।]

9653
यस्ते मन्योSविधद्वज्र सायक सह ओजः पुष्यति विश्वमानुषक्।
साह्याम दासमार्यं त्वया युजा सहस्कृतेन सहसा सहस्वता॥1॥

हे  मन्यु  वज्र-सम तीक्ष्ण-तीर हो तुम  समर्थ  हो वैभवशाली ।
हम  भी  समर्थ बन जायें प्रभुवर करो अनुग्रह  हे बलशाली॥1॥

9654
मन्युरिन्द्रो   मन्युरेवास   देवो   मन्युर्होता  वरुणो  जातवेदा: ।
मन्युं विश ईळते मानुषीर्या:पाहि नो मन्यो तपसा सजोषा:॥2॥

तुम वरुण अग्नि और इन्द्र-देव हो तुम हम सबकी रक्षा करना।
परम-पूज्य  तुम  ही प्रणम्य हो तुम हम सबका दुख हरना ॥2॥

9655
अभीहि  मन्यो  तवसस्तवीयान्तपसा  युजा  वि  जहि  शत्रून् ।
अमित्रहा   वृत्रहा   दस्युहा  च  विश्वा  वसून्या  भरा त्वं नः॥3॥

प्रभु  तेरा  आवाहन  करते  हैं  पूजन  और  अर्चन  करते  हैं ।
दुष्टों  से  तुम  हमें  बचाना  अनुरोध  यही  तुमसे  करते  हैं॥3॥

9656
त्वं  हि  मन्यो अभिभूत्योजा: स्वयम्भूर्भामो  अभिमातिषाहः।
विश्वचर्षणिः  सहुरिः  सहावानस्मास्वोजः  पृतनासु   धेहि॥4॥

हे  सेनापति आगे  बढ  जाओ  विजय-पताका  तुम फहराओ ।
तुम अतुलित बल के स्वामी हो तुम मेरा भी ओज बढाओ॥4॥

9657
अभागः सन्नप  परेतो अस्मि  तव  क्रत्वा  तविषस्य  प्रचेतः।
तं  त्वा  मन्यो  अक्रतुर्जिहीळाहं  स्वा  तनूर्बलदेयाय मेहि॥5॥

तुम  धीर-वीर और  ज्ञानी  हो  मुझको  अपने  सँग  में ले लो ।
चरैवेति  है  लक्ष्य  तुम्हारा  कर्म-योग  की  ओर  ले  चलो॥5॥

9658
अयं    ते   अस्म्युप   मेह्यर्वाङ्   प्रतीचीनः  सहुरे  विश्वधायः ।
मन्यो वज्रिन्नभि मामा ववृत्स्व हनाव दस्यूँरुत बोध्यापेः॥6॥

तुम  अनुकूल  मुझे  लगते  हो  मुझको  अपना मित्र बना लो ।
सान्निध्य तुम्हारा मुझको प्रिय है एक बार मुझको अपना लो॥6॥

9659
अभि  प्रेहि  दक्षिणतो  भवा  मेSधा  वृत्राणि  जङ्घनाव  भूरि ।
जुहोमि  ते  धरुणं  मध्वो  अग्रमुभा  उपांशु  प्रथमा  पिबाव॥7॥

हे  मन्यु-देव  हे  परम-मित्र  आओ  हवि-भोग ग्रहण  कर  लो ।
हम  प्रेम  से  तुम्हें  बुलाते हैं तुम आकर सोम-पान कर लो॥7॥    
   

सूक्त - 84

[ऋषि- मन्यु तापस । देवता- मन्यु । छन्द- जगती-त्रिष्टुप् ।]

9660
त्वया मन्यो सरथमारुजन्तो हर्षणामासो धृषिता मरुत्वः।
तिग्मेषव आयुधा संशिशाना अभि प्र यन्तु नरो अग्निरूपा:॥1॥

शौर्य - पूर्ण  हैं  मन्यु - देवता  वे  सेना  को  प्रेरित  करते  हैं ।
शान्ति  हेतु  है  शस्त्र  ज़रूरी  वे  हमें  सुरक्षित  रखते  हैं॥1॥

9661
अग्निदेव मन्यो त्विषितः सहस्व सेनानीर्नः सहुरे हूत एधि।
हत्वाय शत्रून्वि भजस्व वेद ओजो मिमानो वि मृधो नुदस्व॥2॥

हे  रण - नायक  आवाहन  है  शौर्य  बढाता  साथ  तुम्हारा ।
दुष्ट - दमन  अति  आवश्यक  है  तभी सुरक्षित है जग सारा॥2॥

9662
सहस्व मन्यो अभिमातिमस्मे रुजन्मृणन्प्रमृणन्  प्रेहि शत्रून्।
उग्र  ते  पाजो  नन्वा  रुरुध्रे  वशी  वशं  नयस एकज त्वम् ॥3॥

हे  मन्यु - देव  हे  अद्वितीय तुम  धीरज  कभी  नहीं  खोते  हो ।
तुम  क्रोध -रहित होकर लडते हो इसीलिए विजयी होते हो ॥3॥

9663
एको  बहूनामसि  मन्यवीळितो  विशंविशं  युधये  सं शिशाधि ।
अकृत्तरुक्त्वया   युजा   द्युमन्तं   घोषं   विजयाय   कृण्महे ॥4॥

परम - पूज्य  हो  तुम  प्रणम्य हो अस्त्र-शस्त्र अपने सँग धर लो।
परम-मित्र हो तुम्हीं हमारे अपनी विजय सुनिश्चित  कर लो॥4॥

9664
विजेषकृदिन्द्रइवानवब्रवो3स्माकं    मन्यो    अधिपा    भवेह ।
प्रियं  ते  नाम  सहुरे  गृणीमसि विद्या तमुत्सं यत आबभूथ॥5॥

हे मन्यु-देव तुम इन्द्र सदृश हो तुम अधिपति हो मितभाषी हो।
हम  प्रेम  से  तुम्हें  बुलाते  हैं  तुम बलशाली अविनाशी हो ॥5॥

9665
आभूत्या  सहजा  वज्र  सायक  सहो  बबिभर्ष्यभिभूत  उत्तरम् ।
क्रत्वा  नो  मन्यो  सह  मेद्येधि महाधनस्य पुरुहूत संसृजि ॥6॥

अद्भुत - अनुपम  रूप  तुम्हारा  सरलता  की  तुम  मूरत  हो ।
वीरोचित - औदार्य - युक्त  हो  और  तुम बहुत खूबसूरत हो ॥6॥

9666
संसृष्टं  धनमुभयं  समाकृतमस्मभ्यं  दत्तां  वरुणश्च  मन्युः । 
भियं दधाना हृदयेषु शत्रवः पराजितासो अप नि लयन्ताम्॥7॥

वरणीय  मन्यु  सुख-वैभव  देना  निर्भय होकर जीवन जी लें ।
तेजस्विता  हमें  भी  दे  दो हम भी सुख का अमृत पी लें ।॥7॥     
 
  

Sunday, 22 December 2013

सूक्त - 85

[ऋषि- सूर्या-सावित्री । देवता- सोम । छन्द- अनुष्टुप् ।]

9667
सत्येनोत्तभिता    भूमिः    सूर्येणोत्तभिता    द्यौः ।
ऋतेनादि त्यास्तिष्ठन्ति दिवि सोमो अधि श्रितः॥1॥

परमेश्वर  के  नीति - नियम  से  ही  यह  धरती  टिकी  हुई  है ।
आकाश वहीं है अपनी जगह नियम से ही जगती चल रही है॥1॥

9668
सोमेनादित्या बलिनः सोमेन पृथिवी मही ।
अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहितः॥2॥

आदित्य-देव आलोक-वान हैं सोम अन्न-धन के दाता हैं ।
शस्य-श्यामला यह धरती है सोम-देव बल के दाता हैं॥2॥

9669
सोमं मन्यते पपिवान्यत्संपिंषन्त्योषधिम् ।
सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति कश्चन॥3॥

सोमलतादि वनस्पतियों की ओखद को जब पीसा जाता है ।
सोम उसी रस को कहते हैं अब यह दुर्लभ माना जाता है॥3॥

9670
आच्छद्विधानैर्गुपितो   बार्हतैः   सोम   रक्षितः ।
ग्राव्णामिच्छृण्वन्तिष्ठसि न ते अश्नाति पार्थिवः॥4॥

अग्नि-सोम  धरती  के रक्षक सोम  के रक्षक अग्नि-देव है ।
रक्षित  होने  के  कारण  ही सोम  हमें  उपलब्ध  नहीं  है॥4॥

9671
यत्त्वा  देव  प्रपिबन्ति  तत  आ  प्यायसे  पुनः ।
वायुः सोमस्य रक्षिता समानां मास आकृतिः॥5॥

सोम नाम की इस औषधि को रुचि से सभी ग्रहण करते हैं ।
सोम है रक्षित पवन-देव से वे प्रेम से रखवाली करते  हैं॥5॥

9672
रैभ्यासीदनुदेयी      नाराशंसी      न्योचनी ।
सूर्याया भद्रमिद्वासो गाथयैति परिष्कृतम्॥6॥

रवि - तनया  ऊषा के विवाह में  रैभी  ऋचा सखी थी उसकी ।
सेविका-ऋचा थी नाराशंसी मंत्रों से बनी थी साडी जिसकी॥6॥

9673
चित्तिरा उपबर्हणं चक्षुरा अ अभ्यञ्जनम् ।
द्यौर्भूमिः कोश आसीद्यदयात्सूर्या पतिम् ॥7॥

रवि-तनया जब ससुराल गई शुभ-चिन्तन परिधान पहनकर।
नयन  ही  ऊषा  का  काजल था वसुधा ही थी उसके जेवर॥7॥

9674
स्तोमा आसन्प्रतिधयः कुरीरं छन्द ओपशः ।
सूर्याया अश्विना वराग्निरासीत्पुरोगवः॥8॥

स्तवन  ही  रथ-चक्र-दण्ड  थे  कुरीर  छन्द  का अन्तः भाग ।
अश्विनीकुमार ऊषा के पति थे अग्नि-दूत थे अग्रिम-भाग॥8॥

9675
सोमो     वधूयुरर्भवदश्विनास्तामुभा     वरा ।
सूर्यां यत्पत्ये शंसन्तीं मनसा सविताददात्॥9॥

अश्विनीकुमार   ऊषा   दोनों   ही   एक-दूजे   पर  थे  अनुरक्त ।
ऊषा को सोम भी चाहते थे पर अश्विनीकुमार ही थे उपयुक्त॥9॥

9676
मनो अस्या अन आसीद् द्यौरासीदुत च्छादः ।
शुक्रावनङ्वाहावास्तां यदयात्सूर्या ग्रहम्॥10॥

ऊषा  ससुराल  गई  तब  उसका  मन  ही  रथ  का  वाहन था ।
सूर्य-सोम रथ के वाहक थे नभ रथ का सुन्दर वितान था॥10॥

9677
ऋक्सामाभ्यामभिहितौ गावौ ते सामनावितः ।
श्रोत्रं  ते  चक्रे आस्तां दिवि पन्थाश्चराचरः॥11॥

श्रवण ही मन-रथ के पहिए थे ऋक्-साम-गान प्राञ्जल पहरा था।
रथ का पावन - पथ अन्तरिक्ष जो स्वर्णिम और रुपहला था॥11॥

9678
शुची  ते  चक्रे  यात्या  व्यानो  अक्ष आहतः ।
अनो  मनस्मयं सूर्यारोहत्प्रयती पतिम्॥12॥

विदा - समय  रथ  के  दो  पहिए  दीख  रहे  थे  अति  उज्ज्वल ।
पवनदेव उस रथ की धुरी थे मन-रथ सुन्दर था दुग्ध-धवल॥12॥

9679
सूर्याया वहतुः प्रागात्सविता यमवासृजत् ।
अघासु  ह्न्यन्ते गावोSर्जुन्यो: पर्युह्यते॥13॥

पिता  सूर्य  ने  निज  पुत्री  को  धन-धान  से  किया मालामाल ।
मघा में गो-धन दान किया फाल्गुनी में फिर भेजा ससुराल॥13॥

9680
यदश्विना  पृच्छमानावयातं  त्रिचक्रेण  वहतुं  सूर्याया: ।
विश्वे देवा अनु तद्वामजानन्पुत्रःपितराववृणीत पूषा॥14॥

हे  अश्विनीकुमार  ऊषा  से  तुमने  विवाह -प्रस्ताव  किया  था ।
सब देवों का वरद-हस्त था सुत-पूषा ने स्वीकार किया था॥14॥

9681
यदयातं     शुभस्पती     वरेयं     सूर्यामुप ।
क्वैकं चक्रं वामासीत्क्व देष्ट्राय तस्थथुः॥15॥

हे  अश्विनीकुमार  जिस  समय  ऊषा - वरण  के  हेतु  गए  थे ।
उस समय तुम्हारा ध्यान कहॉ था प्रेम-गली में तुम खोए थे॥15॥

9682
द्वे  ते  चक्रे  सूर्ये  ब्रह्माण  ऋतुथा  विदुः ।
अथैकं चक्रं यद्गुहा तदध्दातय इद्विदुः॥16॥

हे  सूर्यदेव  ज्ञानी परिचित हैं कर्म-योग से रथ चलता है ।
ऋतु-अनुरूप वेग है उसका गोपनीय है पर कहता है॥16॥

9683
सूर्यायै   देवेभ्यो   मित्राय   वरुणाय   च ।
ये भूतस्य प्रचेतस इदं तेभ्योSकरं नमः॥17॥

सूर्य सभी के शुभ-चितक हैं सबका कल्याण वही करते हैं ।
सूर्य-देव सर्वदा स्तुत्य हैं हम सब उन्हें नमन करते हैं॥17॥

9684
पूर्वापरं चरतो माययैतो शिशू क्रीळन्तौ परि याति अध्वरम् ।
विश्वान्यन्यो भुवनाभिचष्ट ऋतूँरन्यो विदधज्जायते पुनः॥18॥

सूर्य- चन्द्र  आलोक - प्रदाता  हँसते  ही रहते हैं हरदम ।
कर्म-योग का पाठ-पढाते उन्हें नमन करते हैं  हम॥18॥

9685
नवोनवो   भवति   जायमानोSह्नां   केतुरुषसामेत्यगग्रम्।
भागं देवेभ्यो वि दधात्यायन्प्र चन्द्रमास्तिरते दीर्घमायुः॥19॥

चन्द्रदेव  प्रतिदिन  नवीन  हैं  हम  भी  प्रतिदिन  रहें नवीन ।
बिसराकर आगत-अतीत को वर्तमान में ही हो जायें लीन॥19॥

9686
सुकिंशुकं शल्मलीं विश्वरूपं हिरण्यवर्णं सुवृतं सुचक्रम् ।
आ रोह सूर्ये अमृतस्य लोकं स्योनं पत्ये वहतुं कृणुष्व॥20॥

शाल्मली-पलाश-तरु से निर्मित स्वर्णिम-रथ-पर होकर सवार।
रवि-तनया तुम पति-गृह जाओ जहॉ प्रेम-मय हो घर-द्वार॥20॥

9687
उदीर्ष्वातः  पतिवती  ह्ये3षा  विश्वावसु  नमसा  गीर्भिरीळे ।
अन्यामिच्छ पितृषदं व्यक्तां स ते भागो जनुषा तस्य विध्दि॥21॥

ऊषा का पाणिग्रहण हुआ और रवि - तनया ससुराल गई ।
सब लोग वहॉ से विदा हुए दायित्व निभाने और कई॥21॥

9688
उदीर्ष्वातो    विश्वावसो    नमसेळामहे    त्वा ।
अन्यामिच्छ प्रफर्व्यं1 सं जायां पत्या सृज॥22॥

हे  पण्डित  जी  आप  विदा  हों  हम  बारम्बार नमन करते हैं ।
विधि-विधान से ब्याह हुआ हम कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं॥22॥

9689
अनृक्षरा ऋजवः सन्तु पन्था येभिः सखायो यन्ति नो वरेयम्।
समर्यमा सं भगो नो निनीयात्सं जास्पत्यं सुयममस्तु देवा:॥23॥

मार्ग तुम्हारा सरल-सहज हो जीवन सुन्दर हो सुखकर हो ।
तुम दोनों सदा सुखी रहना मन में सब सुख सब रस हो॥23॥

9690
प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद्येन त्वाबध्नात्सविता सुशेवः।
ऋतस्य योनौ सुकृतस्य लोकेSरिष्टां त्वा सह पत्या दधामि॥24॥

वरुण-पाश से मुक्त रहो तुम पति-कुल का सदा बढाओ मान ।
अब अपना दायित्व निभाओ तुम हो सूरज की सन्तान॥24॥

9691 
प्रेतो मुञ्चामि नामुतः सुबध्दाममुतस्करम् ।
यथेयममिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रा सुभगासति॥25॥

पितृ-गृह से तुम्हें अलग करते हैं ससुराल ही है तेरा परिवार ।
धीर-वीर सन्तति पाओ पति का घर हो सुख का आगार॥25॥

9692
पूषा  त्वेतो  नयतु  हस्तगृह्याश्विना  त्वा  प्र  वहतां  रथेन ।
गृहान्गच्छ गृहपत्नी यथासो वशिनी त्वं विदथमा वदासि॥26॥

हे पूषा माता को सादर लाओ अश्विनीकुमार निज रथ में बिठाओ।
निज-भवन हेतु प्रस्थान करो पति होने का कर्तव्य निभाओ॥26॥ 

9693
इह प्रियं प्रजया ते समृध्यतामस्मिन् गृहे गार्हपत्याय जागृहि।
एना पत्या तन्वं1सं सृजस्वाधा जिव्री विदथमा व व्दाथः॥27॥

सुख-सन्तति ससुराल में पाओ अपनों के प्रति कर्तव्य निभाओ।
पति  के सँग अद्वैत रहो तुम सबके हित में समय बिताओ॥27॥

9694
नीललोहितं    भवति    कृत्यासक्तिर्व्यज्यते ।
एधन्ते अस्या ज्ञातयः पतिर्बन्धेषु बध्यते॥28॥

वधू  जब  रजस्वला  होती  है  आसक्ति  अचानक  बढती  है ।
परिवार  बडा  हो  जाता  है  भव-बन्धन  की कडी जुडती है॥28॥

9695
परा  देहि  शामुल्यं  ब्रह्मभ्यो  वि  भजा  वसु ।
कृत्यैषा पद्वती भूत्व्या जाया विशते पतिम्॥29॥

तन - मन  को  सदा  स्वच्छ  रखें  पर-हित  के हेतु विचार करें ।
निज - कुटुम्ब  का ध्यान रखें  पति-सँग परस्पर बात करें॥29॥

9696
अश्रीरा     तनूर्भवति     रुशती     पापयामुया ।
पतिर्यद्वध्वो3 वाससा स्वमङ्गमभिधित्सते॥॥30॥

पति-पत्नी दोनों स्वस्थ रहें नीरोग रहे दोनों का तन-मन ।
परस्पर--पूरक हैं ये दोनों सुख-दुख बॉटें कर लें चिन्तन॥30॥

9697
ये  वध्वश्चन्द्रं  वहतुं  यक्ष्मा  यन्ति  जनादनु ।
पुनस्तान्यज्ञिया देवा नयन्तु यत आगता:॥31॥

पत्नी  का  सदा  ध्यान  रखें  वह  स्वस्थ  रहे  और सुखी रहे ।
ससुराल में बहू प्रसन्न रहे वह दुख से ग्रस्त कभी न रहे॥31॥

9698
मा विदन्परिपन्थिनो य आसीदन्ति दम्पती ।
सुगेभिरर्दुर्गमतीतामप     द्रान्त्वरातयः॥32॥

रोग - रूप  रिपु- दल  से  सबको  बच-कर  दूर  ही  रहना  है ।
हवा-बदलने हेतु भ्रमण हो पर सदा स्वस्थ  ही  रहना है॥32॥

9699
सुमङ्गलीरियं   वधूरिमां   समेत   पश्यत ।
सौभाग्यमस्यै दत्त्वायाथास्तं वि परेतन॥33॥

नई  बहू  शुभ  की  सूचक  है  सबसे  पाती  है  आशीर्वाद ।
लक्ष्मी-समान वह खुद होती है करती है सुखकर सम्वाद॥33॥

9700
तृष्टमेतत्कटुकमेतदपाष्ठवद्विषवन्नैतदत्तवे ।
सूर्यां यो ब्रह्मा विद्यात्स इद्वाधूयमर्हति॥॥34॥

बहूरानी  सँग  जिस  घर  में  कोई  अत्याचार  कभी करता है ।
वह निंदनीय है और त्याज्य कटुवचन यदि कोई कहता है॥34॥

9701
आशसनं      विशसनमथो      अधिविकर्तनम् ।
सूर्याया:पश्य रूपाणि तानि ब्रह्मा तु शुन्धति॥35॥

मलिन-मुख दिखती है रवि-तनया किसने उसका अपमान किया।
परिधान भी उसका फटा हुआ है किसने ऐसा अपराध किया॥35॥

9702
गृभ्णानि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः ।
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवा:॥36॥

मैं  पति  हूँ  तुम  मेरी  पत्नी  आदर-अभिवादन  करता  हूँ ।
मुझे  छोडकर  कहीं  न  जाना  अनुरोध यही मैं करता हूँ॥36॥

9703
तां  पूषञ्छिवतमामेरयस्व  यस्यां  बीजं  मनुष्या3  वपन्ति ।
या न ऊरू उशती विश्रयाते यस्यामुशन्तः प्रहराम शेपम् ॥37॥

हे  प्रभु  तुम  शुभ-चिन्तन  देना  प्रजनन  का  पावन  प्रवाह हो ।
बीज गर्भ में धारण करने की अभिलाषा का शुभ-विचार हो॥37॥

9704
तुभ्यमग्रे   पर्यवहन्त्सूर्यां   वहतुना   सह ।
पुनः पतिभ्यो जायां दा अग्ने प्रजया सह॥38॥

हे अग्नि-देव आशीष  उसे  दें वह  माता  बन  कर्तव्य निभाये ।
सुख-सन्तति उसे प्रदान करें निज-कुटुम्ब सम्पूर्ण बनाये॥38॥

9705
पुनः     पत्नीमग्निरदादायुषा     सह     वर्चसा ।
दीर्घायुरस्या यः पतिर्जीवाति शरदः शतम्॥39॥

भगवान अग्नि ने पति-पत्नी को अनगिन-आशीर्वाद दिया है ।
चिर--जीवी हों सुख-स्वरूप हों हम पर यह उपकार किया है॥39॥

9706
सोमः  प्रथमो  विविदे  गन्धर्वो  विविद  उत्तरः ।
तृतीयो अनिष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजा:॥40॥

हे ऊषा सोम की पत्नी हो तुम अब अपने कुटुम्ब में मिल जाओ ।
तुम दोनों पति-पत्नी मिलकर अब अपना कर्तव्य निभाओ॥40॥

9707
सोमो  ददद्  गन्धर्वाय  गन्धर्वो दददग्नये ।
रयिं च पुत्रॉश्चादादग्निर्मह्यमथो इमाम्॥41॥

कन्या  शान्त - सोम  होती  है  धीरे - धीरे  विकसित  होती है ।
जब  वह  जवान  हो  जाती  है  तब  उसकी  शादी होती है॥41॥

9708
इहैव स्तं मा   वि   यौष्टं   विश्वमायुर्व्यश्नुतम्  ।
क्रीळन्तौ  पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानौ  स्वे   गृहे॥42॥

हे  वर- वधू  साथ  में  रहना  सबके  सुख  का  साधन  बनना ।
तुम  कर्तव्य - धर्म  का  पालन  जीवन-भर  करते  रहना॥42॥ 

9709
आ  नः प्रजां  जनयतु  प्रजापतिराजरसाय  समनक्त्वर्यमा ।
अदुर्मङ्गलीः पतिलोकमा विश शं भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥43॥

हे  प्रभु  हमें   सुसन्तति  देना  हम साथ रहें घर हो जँगल हो ।
सब-कुछ शुभ-शुभ हो जीवन में पूरे कुटुम्ब का मंगल हो॥43॥

9710
अघोरचक्षुरपतिघ्न्येदधि   शिवा   पशुभ्यः  सुमना:  सुवर्चा: ।
वीरसूरर्देवकामा  स्योना  शं  नो  भव  द्विपदे  शं चतुष्पदे॥44॥

हे  बहू  तुम  सदा  सुखी  रहना  तुम  सबको अपना-पन देना ।
सबके हित का चिन्तन कर ससुराल को तुम अपना लेना॥44॥

9711
इमां  त्वमिन्द्र  मीढ्वः  सुपुत्रां  सुभगां  कृणु ।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि॥45॥

परमेश्वर    यश  -  वैभव    देना    बँधा    रहे    पूरा    परिवार ।
प्राञ्जल-प्रेम-प्रवाह  यहॉ  हो  अन्न-धान का  हो  भण्डार॥45॥

9712
सम्राज्ञी   श्वशुरे   भव   सम्राज्ञी   श्वश्रवां   भव ।
ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु॥46॥

हे बहू तुम्हीं गृह-स्वामिनी हो सबका रखना समुचित ध्यान ।
सास-ननद-देवर सबको तुम मधुर-वचन का देना दान ॥46॥

9713
समञ्जन्तु  विश्वे  देवा: समापो  हृदयानि नौ ।
सं मातरिश्वा सं धाता समु देष्ट्री दधातु नौ॥47॥

तुम एक-दूसरे के पूरक हो पावन-पथ पर चलो परस्पर ।
भोजन-शयन और अर्चन भी साथ-साथ करना जीवन-भर॥47॥    

  
         
        

     

   
          


    

Wednesday, 18 December 2013

सूक्त - 87

[ऋषि- पायु भारद्वाज । देवता- रक्षोहा अग्नि । छन्द- त्रिष्टुप् - अनुष्टुप् ।]

9737
रक्षोहणं वाजिनमा जिघर्मि मित्रं प्रथिष्ठमुप यामि शर्म ।
शिशानो अग्निःक्रतुभि:समिध्दःस नो दिवा स रिषःपातु नक्तम्॥1॥

हम सज्जन से मित्रता निभाते और दुष्ट के लिए काल हैं ।
हे अग्निदेव तुम रक्षा करना हम पथ के पावन-प्रवाल हैं॥1॥

9738
अयोदंष्ट्रो अर्चिषा  यातुधानानुप  स्पृश जातवेदः समिध्दः ।
आ जिह्वया मूरदेवान्रभस्व क्रव्यादो व्रक्त्व्यपि धत्स्वासन्॥2॥

हे  प्रभु  हमें  नीरोग  बनाओ  तन-मन  की  हर  पीडा हर लो ।
आरोग्य प्रदान करो हमको आत्मीय समझ कर अपना लो॥2॥

9739
उभोभयाविन्नुप   धेहि   दंष्ट्रा   हिंस्त्रः   शिशानोSवरं   परं  च ।
उतान्तरिक्षे परि याहि राजञ्जम्भैः सं धेह्यभि यातुधानान्॥3॥

विध्वंस  और  रचना  दोनों  ही  बडी  कुशलता  से  करते  हो ।
अन्तरिक्ष  में  तुम्हीं  चमकते  तुम  रोगों से रक्षा करते हो॥3॥

9740
यज्ञैरिषूः  संनममानो  अग्ने  वाचा  शल्यॉं  अशनिभिर्दिहानः ।
ताभिर्विध्य हृदये यातुधानान् प्रतीचो बाहून्प्रति भङ्ध्येषाम्॥4॥

सतत  सुरक्षा  तुम  देते  हो रिपु - दल  का  तुम  बल  हरते  हो ।
उत्तम  स्वास्थ्य  तुम्हीं  देते  हो  प्रेरक बन-कर बल भरते हो॥4॥

9741
अग्ने  त्वचं  यातुधानस्य  भिन्धि हिंस्त्राशनिर्हरसा  हन्त्वेनम् ।
प्र पर्वाणि जातवेदः शृणीहि क्रव्यात्क्रविष्णुर्वि चिनोतु वृक्णम्॥5॥

मनुज-देह में जठर-अग्नि बन तन को सदा स्वस्थ रखते हो ।
तन-रोगाणु-मुक्त करते हो आरोग्य प्रदान तुम्हीं करते हो॥5॥

9742
यत्रेदानीं  पश्यसि  जातवेदस्तिष्ठन्तमग्न  उत  वा  चरन्तम् ।
यद्वान्तरिक्षे पथिभिः पतन्तं तमस्ता विध्य शर्वा शिशानः॥6॥

जो भी अशुभ तुम्हें दिखता हो उसको शीघ्र भस्म कर देना ।
हम सबकी तुम रक्षा करना तुम शुभ का पोषण कर लेना॥6॥

9743
उतालब्धं   स्पृणुहि   जातवेद   आलेभानादृष्टिभिर्यातुधानात् ।
अग्ने पूर्वो नि जहि शोशुचान आमादःक्ष्विङ्कास्तमदन्त्वेनीः॥7॥

दुनियॉं  के  इस  महाजाल  से  हे  प्रभु  तुम  ही  हमें बचाना ।
अपने कुछ गुण हमें भी देना सदा सत्य पथ पर ले जाना॥7॥

9744
इह प्र ब्रूहि यतम: सो अग्ने यो यातुधानो य इदं कृणोति ।
तमा रभस्व समिधा यविष्ठ नृचक्षसश्चक्षुषे रन्धयैनम्॥8॥

विघ्न-विनाशक तुम हो प्रभु-वर सत्कर्मों का पाठ-पढाना।
मेरा  सब  अवगुण हर लेना असुरों से तुम हमें बचाना॥8॥

9745
तीक्ष्णेनाग्ने चक्षुषा रक्ष यज्ञं प्राञ्चं वसुभ्यः प्र णय प्रचेतः।
हिंस्त्रं रक्षांस्यभि शोशुचानं मा त्वा दभन्यातुधाना नृचक्षः॥9॥

अन्न-धान हमको देना प्रभु सदा सुरक्षित तुम रखना ।
तुम असुरों के संहारक हो हम सबकी रक्षा करना ॥9॥

9746
नृचक्षा रक्षः परि पश्य विक्षु तस्य त्रीणि  प्रति  शृणीह्यग्रा।
तस्याग्ने पृष्टीर्हरसा शृणीहि त्रेधा मूलं यातुधानस्य वृश्च॥10॥

जगती  से  असुरत्व  मिटा  दो  सज्जन का प्रतिपाल करो ।
हे अग्नि-देव तुम समर्थ हो हवि-भोग मेरा स्वीकार करो॥10॥

9747
त्रिर्यातुधानं प्रसितिं त एत्वृतं यो अग्ने अनृतेन हन्ति ।
तमर्चिषा स्फूर्जयञ्जातवेद: समक्षमेनं गृणते नि वृङ्धि॥11॥

रोग - शोक  से  बचे  रहें  हम  ऐसी  युक्ति  हमें  बतलाओ ।
सत-पथ पर ही चलें निरंतर वही रीति हमको समझाओ॥11॥

9748
तदग्ने चक्षु: प्रति धेहि रेभे शफारुजं येन पश्यसि ययातुधानम् ।
अथर्ववज्ज्योतिषा   दैव्येन  सत्यं  धूर्वन्तमचितं  न्योष ॥12॥

असत  से  जहॉं  सत्य  कुम्हलाये  हे  प्रभु  तुम  ही रक्षा करना ।
शीघ्रातिशीघ्र तुम दंडित करना तुम सज्जन का दुख हरना॥12॥

9749
यदग्ने   अद्य   मिथुना   शपातो   यद्वाचस्तुष्टं   जनयन्त   रेभा: ।
मन्योर्मनसःशरव्या3 जायते या तया विध्य हृदये यातुधानान्॥13॥

प्रतिवाद परस्पर करें पुरुष जब तुम्हीं उन्हें सत्पथ बतलाना ।
नीति- नेम की बात सिखाना जीवन की शैली समझाना ॥13॥

9750
परा शृणीहि तपसा यातुधानान्पराग्ने रक्षो हरसा शृणीहि ।
परार्चिषा मूरदेवाञ्छृणीहि परासुतृपो अभि शोशुचानः॥14॥

अरजकता यदि राज करेगी जनता निरीह पिस जाएगी ।
सिंहासन पर जब सज्जन बैठे तब ही जनता मुस्काएगी॥14॥

9751
पराद्य  देवा  वृजिनं  शृणन्तु  प्रत्यगेनं  शपथा  यन्तु  तृष्टा: ।
वाचास्तेनं शरव ऋच्छन्तु मर्मन्विश्वस्यैतु प्रसितिं यातुधानः॥15॥

दुष्ट - दमन  करते  रहना  प्रभु  सज्जन  को  सुख देते रहना ।
भटके मानुष को राह दिखाना तुम ही उसकी पीडा हरना ॥15॥

9752
यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः ।
यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च॥16॥

अकारण जो हिंसा करते हैं जो गो-धन की हत्या करते हैं ।
इन लोगों को दण्डित करना जो गाय को भूखी रखते हैं॥16॥

9753
संवत्सरीणं पय उस्त्रियायासस्तस्य माशीद्यातुधानो नृचक्षः।
पीयूषमग्ने यतमस्तितृप्सात्तं प्रयञ्चमर्चिषा विध्य मर्मन्॥17॥

हिंसक  को  गो - धन  मत  देना उसको शुभ-चंतन दे देना ।
तुम उसको सत्पथ दिखलाना और उसे भी अपना लेना॥17॥

9754
विषं गवां यातुधाना: पिबन्त्वा वृश्च्यन्तामदितये दुरेवा ।
परैनान्देवः सविता ददातु परा भागमोषधीनां जयन्ताम्॥18॥

कर्तव्य-कर्म क्या हो कैसा हो हे प्रभु हमें तुम्हीं समझाना ।
दुर्जन को दण्डित करना फिर सत्य-धर्म उसको बतलाना॥18॥

9755
सनादग्ने मृणसि यातुधानान्न त्वा रक्षांसि पृतनासु जिग्युः।
अनु दह सहमूरान्क्रव्यादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्याया:॥19॥

हे  अग्नि - देवता  हे  बलशाली सदाचार तुम ही सिखलाना ।
भूल से भी कोई भूल न हो अब तुम ही सन्मार्ग दिखाना॥19॥

9756
त्वं  नो  अग्ने  अधरादुदक्तात्त्वं  पश्चादुत  रक्षा  पुरस्तात् ।
प्रति ते ते अ अजरासस्तपिष्ठा अघशंसं शोशुचतो दहन्तु॥20॥

दशों - दिशा  से  हम रक्षित हों भगवन वरद - हस्त रखना ।
प्रभु पावक-पावन प्रणम्य हो मुझ पर सतत कृपा करना॥20॥

9757
पश्चात्पुरस्तादधरादुदक्तात्कविः काव्येन परि पाहि राजन्।
सखे सखायमजरो जरिम्णेSग्ने मर्तॉं अमर्त्यस्त्वं नः॥21॥

सम्पूर्ण  विश्व  की  रक्षा  करना  पृथ्वी  ही है मेरा परिवार ।
दीर्घ-आयु  देना  तुम  प्रभुवर  धरती  है  मेरा घर-बार॥21॥

9758
परि त्वाग्ने पुरं वयं विप्रं सहस्य धीमहि ।
धृषद्वर्णं दिवेदिवे हन्तारं भङ्गुरावताम्॥22॥

हे अग्नि-देव गुण के निधान हो शुभ-शुभ कर्मों का दो दान।
मेरे अवगुन ले लो भगवन करते हैं आज यही आह्वान॥22॥

9759
विषेण  भङ्गुरावतः  प्रति  ष्म  रक्षसो  दह ।
अग्ने तिग्मेन शोचिषा तपुरग्राभिरृष्टिभिः॥23॥

विध्वंसक असुरों को हे भगवन तुम दण्डित करते रहना ।
सज्जन की तुम रक्षा करना सदा-सदा पोषण करना॥23॥

9760
प्रत्यग्ने  मिथुना  दह  यातुधाना  किमीदिना ।
सं त्वा शिशामि जागृह्यदब्धं विप्र मन्मभिः॥24॥

नर- नारी  दोनों  समान  हैं आपस  का  मत-भेद भगायें ।
वे एक-दूजे के पूरक हैं मिल-जुल कर कर्तव्य निभायें॥24॥

9761
प्रत्यग्ने  हरसा  हरः शृणीहि  विश्वतः प्रति ।
यातुधानस्य रक्षसो बलं वि रुज वीर्यम्॥25॥

पर - पीडा  में  जो  रत  रहते  उनको  है  सत्पथ  पर  लाना ।
जीवन परहित हेतु मिला है यही सत्य सबको समझाना॥25॥              
                 

Tuesday, 17 December 2013

सूक्त - 88

[ऋषि-मूर्धन्वान् आङ्गिरस । देवता- सूर्य-वैश्वानर अग्नि । छन्द- त्रिष्टुप् ।]

9762
हविष्पान्तमजरं   स्वर्विदि   दिविस्पृश्याहुतं   जुष्टमग्नौ ।
तस्य  भर्मणे भुवनाय देवा धर्मणे कं स्वधया पप्रथन्त॥1॥

सूर्यदेव   सुस्वादु   सोमरस   सेवनीय   स्वीकार   करो ।
हे अग्निदेव हम हवि देते हैं खलिहान-धान हर बार भरो॥1॥

9763
गीर्णं   भुवनं   तमसापगूळ्हमाविः  स्वरभवज्जाते  अग्नौ ।
तस्य देवा:पृथिवी द्यौरुतापोSरणयन्नोषधीःसख्ये अस्य॥2॥

पृथ्वी  तम  से  आच्छादित  थी फिर जग ने आकार लिया ।
अग्निदेव  ने  तब  इस  जग  को एक नया उपहार दिया॥2॥

9764
देवेभिर्न्विषितो  यज्ञियेभिरग्निं  स्तोषाण्यजरं  बृहन्तम् ।
यो भानुना पृथिवीं द्यामुतेमामाततान रोदसी अन्तरिक्षम्॥3॥

देव  सदैव  सृजन  करते  हैं  वे  जीव - जगत के पोषक हैं ।
यज्ञ - देवता  अविनाशी  हैं  तेज - पुञ्ज वे ही रक्षक हैं॥3॥

9765
यो होतासीत्प्रथमो देवजुष्टो यं समाञ्जन्नाज्येना वृणाना:।
स पतत्रीत्वरं स्था जगद्यच्छ्वात्रमग्निरकृणोज्जातवेदा:॥4॥

शुभ - विचार शुभ - शुभ भावों से यज्ञ - अर्चना जब होती है ।
परिणाम सभी सुखकर होते हैं अभीष्ट-सिध्दि तब होती है॥4॥

9766
यज्जातवेदो  भुवनस्य  मूर्धन्नतिष्ठो  अग्ने  सह  रोचनेन ।
तं त्वाहेम मतिभिर्गीर्भिरुक्थैःस यज्ञियो अभवो रोदसिप्रा:॥5॥

हे अग्निदेव हे अविनाशी तुम वरद-हस्त हम पर रखना ।
मन - वाणी की ओज बढाना बुध्दि प्रखर करते रहना॥5॥

9767
मूर्धा भुवो भवति नक्तमग्निस्ततः सूर्यो जायते प्रातरुद्यन् ।
मायामू तु यज्ञियानामेतामपो यत्तूर्णिश्चरति प्रजानन्॥6॥

अग्नि-देवता रात्रि-काल में मस्तक पर निवास करता है ।
प्रातः सूर्य--रूप में खिलता फिर नभ में स्थिर रहता है॥6॥

9768
दृशेन्यो यो महिना समिध्दोSरोचत दिवियोनिर्विबभावा ।
तस्मिन्नग्नौ सूक्तवाकेन देवा हविर्विश्व आजुहवुस्तनूपा:॥7॥

अग्नि - देवता  दर्शनीय  हैं  आलोक - वान  तेजस्वी  हैं ।
विद्वत् - जन हवि अर्पित करते वे अविनाशी ओजस्वी हैं॥7॥

9769
सूक्तवाकं प्रथममादिदग्निमादिध्दविरजनयन्त देवा: ।
स एषा यज्ञो अभवत्तनूपास्तं द्यौर्वेद तं पृथिवी तमापः॥8॥

वाक् - रूप  में  सूक्त  बने  हैं  इनकी  अद्भुत  महिमा  है।
उच्चारण से बल बढता है ज्ञान-गम्य इसकी गरिमा है॥8॥

9770
यं देवासोSजनयन्ताग्निं यस्मिन्नाजुहवुर्भुवनानि विश्वा।
सो अर्चिषा पृथिवीं द्यामुतेमामृजूयमानो अतपन्महित्वा॥9॥

हे अग्निदेव आलोक-प्रदाता जिससे जग में जीवन जगता है।
पावक - पावन से पृथ्वी पर प्राणी पग-पग पर पलता है ॥9॥

9771
स्तोमेन हि दिवि देवासो अग्निमजीजनञ्छक्तिभी रोदसिप्राम्।
तमू अकृण्वन् त्रेधा भुवे कं  स ओषधीः पचति विश्वरूपा ॥10॥

सर्व  व्याप्त  हैं  अग्नि - देवता  वनस्पतियॉं  देते  अनुकूल ।
औषधियॉं हैं भॉंति - भॉंति की सुखकर जीवन का है मूल॥10॥

9772
यदेदेनमदधुर्यज्ञियासो     दिवि     देवा:     सूर्यमादितेयम् ।
यदा चरिष्णू मिथुनावभूतामादित्प्रापश्यनन्भुवनानि विश्वा॥11॥

जीव-जगत की इस रचना में पावक का है पावन - धाम ।
इस जगती के पालक हैं वे हमको देते हैं धन-धान ॥11॥

9773
विश्वस्मा अग्निं भुवनाय देवा वैश्वानरं केतुमह्नामकृण्वन्।
आ यस्ततानोषसो विभातीरपो ऊर्णोति तमो अर्चिषा यन्॥12॥

अग्नि - देवता  तमस  मिटाते  ज्ञान - आलोक  बढाते  हैं ।
जग का कल्याण वही करते  हैं गन्तव्य वही दिखलाते हैं॥12॥

9774
वैश्वानरं कवयो यज्ञियासोSग्निं देवा अजनयन्नजुर्यम् ।
नक्षत्रं प्रत्नममिनच्चरिष्णु यक्षस्याध्यक्षं तविषं बृहन्तम्॥13॥

अग्नि - देव  अति  तेजस्वी  हैं  अति - अद्भुत है उनका रूप ।
नभ  में  नित  स्थिर  रहते  हैं  दर्शनीय  दिखते  अनूप॥13॥

9775
वैश्वानरं  विश्वहा  दीदिवासं  मन्त्रैरग्निं  कविमच्छा  वदामः ।
यो  महिम्ना  परिबभूवोर्वी  उतावस्तादुत  देवः परस्तात्॥14॥

हे  अग्निदेव तुम ही प्रणम्य हो जग को आलोकित करते हो ।
तुमसे ही चूल्हा जलता है भोजन में स्वाद तुम्हीं भरते हो॥14॥

9776
द्वे   स्त्रुती   अशृणवं   पितृणामहं   देवानामुत   मर्त्यानाम् ।
ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं च॥15॥

पितर   हमारे  देव  सदृश  हैं  वे  हैं   धरती   के   भगवान ।
श्रुतियों ने भी यही कहा है मातु - पिता  हैं  देव- समान॥15॥

9777
द्वे  समीची  बिभृतश्चरन्तं  शीर्षतो  जातं  मनसा  विमृष्टम् ।
स प्रत्यङ्विश्वा भुवनानि तस्थावप्रयुच्छन्तरणिर्भ्राजमानः॥16॥

अग्निदेव की गरिमा अद्भुत इस प्रसंग को सभी जानते ।
देदीप्यमान हैं अग्निदेवता उनकी महिमा सभी मानते॥16॥

9778
यत्रा  वदेते  अवरः  परश्च  यज्ञन्योः  कतरो  नौ  वि  वेद ।
आ शेकुरित्सधमादं सखायो नक्षन्त यज्ञं क इदं वि वोचत्॥17॥

पावक - पवन  परस्पर  पाते  हम  दोनों  हैं  एक  समान ।
हम दोनों का दायित्व बराबर यह है हम दोनों को भान॥17॥

9779
कत्यग्नयः  कति  सूर्यासः  कत्युषासः  कत्यु  स्विदापः ।
नोपस्पिजं वः पितरो वदामि पृच्छामि वः कवयो विद्मने कम्॥18॥

मेरी  विनम्र  जिज्ञासा  यह  है  पावक के हैं कितने प्रकार ।
प्रश्न नहीं है यह स्पर्धा का उत्सुकता का है यह विचार॥18॥

9780
यावन्मात्रमुषसो  न  प्रतीकं  सुपर्ण्यो 3वसते  मातरिश्वः ।
तावद्दधात्युप  यज्ञमायन्ब्राह्मणो होतुरवरो निषीदन् ॥19॥

स्थूल - रूप  में  अग्नि - देव  के  तीन  भेद  पाये  जाते हैं ।
जठरानल  बडवानल और  दावानल  ये  कहलाते  हैं ॥19॥  
        


       
      

Monday, 16 December 2013

सूक्त - 89

[ऋषि-रेणु वैश्वामित्र । देवता- इन्द्र-सोम । छन्द- त्रिष्टुप् ।]

9781
इन्द्रं स्तवा नृतमं यस्य मह्ना विबबाधे रोचना वि ज्मो अन्तान् ।
आ यः पप्रौ चर्षणीधृद्वरोभिः प्र सिन्धुभ्यो रिरिचानो महित्वा॥1॥

परमेश्वर की  महिमा  अद्भुत  वे  पृथ्वी - सीमा  से  परे  हैं ।
सूर्य-चन्द्र अभिभूत हैं जिनसे जो सागर से बहुत बडे हैं॥1॥

9782
स    सूर्यः     पर्युरू     वरांस्येन्द्रो     ववृत्याद्रथ्येव      चक्रा ।
अतिष्ठन्तमपस्यं1न सर्गं कृष्णा तमांसि त्विष्या जघान॥॥2॥

परमेश्वर  सबका  प्रेरक  है  सृष्टि - चक्र  उससे  चलता  है ।
ज्ञान - आलोक वही देता है अज्ञान - तमस वह ही हरता है॥2॥

9783
समानमस्मा अनपावृदर्च क्ष्मया दिवो असमं ब्रह्म नव्यम्।
वि यः पृष्ठेव जनिमान्यर्य इन्द्रश्चिकाय न सखायमीषे।॥3॥

अवनि - अम्बर  में जो अनुपम हो ऐसा रचो प्रेम का गान ।
पर-हित  का  जो  अभिलाषी  हो करे सुरक्षा का आह्वान॥3॥

9784
इन्द्राय  गिरो  अनिशितसर्गा  अपः  प्रेरयं  सगरस्य बुध्नात् ।
यो अक्षेणेव चक्रिया शचीभिर्विष्वक्तस्तम्भ पृथिवीमुत द्याम्॥4॥

वर्षा की वह जल - धारा भी है उस वरद - हस्त की महिमा ।
वह  ही सबकी रक्षा करता धरा- गगन की गाता गरिमा॥4॥

9785
आपान्तमन्युस्तृपलप्रभर्मा धुनिः शिमीवाञ्छरुमॉं ऋजीषी।
सोमो विश्वान्यतसा वनानि नार्वाग्रिन्दं प्रतिमानानि देभुः॥5॥

तेजस्वी  हैं  वे  परमेश्वर  कर्म - योग  का  पाठ - पढाते ।
संकल्प - पूर्ण वे ही करते हैं वे ही रिपु - दल से हमें बचाते॥5॥

9786
न यस्य द्यावापृथिवी न धन्व नान्तरिक्षं नाद्रयः सोमो अक्षा:।
यदस्य मन्युरधिनीयमानः शृणाति वीळु रुजति स्थिराणि॥6॥

स्थानापन्न नहीं है कोई उसका मूल्याञ्कन हो नहीं सकता ।
इसीलिए तो श्रुति-दर्शन सब उसको नेति-नेति है कहता ॥6॥

9787
जघान  वृत्रं  स्वधितिर्वनेव  रुरोज  पुरो  अरदन्न  सिन्धून् ।
बिभेद गिरिं नवमिन्न कुम्भमा गा इन्द्रो अकृणुत स्वयुग्भिः॥7॥

दुष्ट - दमन अति-आवश्यक है सज्जन का पालन करते हैं ।
परमेश्वर  सबके  रक्षक  हैं दुष्टों को दण्ड दिया करते  हैं ॥7॥

9788
त्वं  ह  त्यदृणया  इन्द्र  धीरोSसिर्न  पर्व  वृजिना  शृणासि ।
प्र ये मित्रस्य वरुणस्य धाम युजं न जना मिनन्ति मित्रम्॥8॥

परमेश्वर   प्राञ्जल   प्रकाश   हैं  सबको  रखते  दुख  से  दूर ।
सतत  सुरक्षा  सबको  देते  करते  हैं  प्रेम  सदा  भर - पूर ॥8॥

9789
प्र ये मित्रं प्रार्यमणं दुरेवा: प्र सङ्गिरः प्र वरुणं मिनन्ति ।
न्य1मित्रेषु वधमिन्द्र तुम्नं वृषन्वृषानमरुषं शिशीहि॥9॥

दुष्कर्मी जब पीडित करते सज्जन को व्याकुल करते हैं ।
सर्व-समर्थ वही परमेश्वर सज्जन का सब दुख हरते हैं ॥9॥

9790
इन्द्रो  दिव  इन्द्र ईशे पृथिव्या इन्द्रो अपामिन्द्र  इत्पर्वतानाम्।
इन्द्रो वृधामिन्द्र इन्मेधिराणामिन्द्रःक्षेमे योगे हव्य इन्द्रः॥10॥

सम्पूर्ण जगत का वह है स्वामी वह ज्ञानी-जन का पोषक है ।
अनुसंधान हेतु प्रेरित करता है वही क्रान्ति का उदघोषक है॥10॥

9791
प्राक्तुभ्य  इन्द्रः  प्र  वृधो  अहभ्यः  प्रान्तरिक्षात्प्र  समुद्रस्य धासेः।
प्र वातस्य प्रथसः प्र ज्मो अन्तात्प्र सिन्धुभ्यो रिरिचे प्र क्षितिभ्यः॥11॥

नदियॉं सागर उसकी महिमा पञ्चतत्व  है उसकी  देन ।
वह प्रभु तो कल्पनातीत है सुख से जीते हैं दिन रैन॥11॥

9792
प्र  शोशुचत्या  उषसो  न  केतुरसिन्वा  ते  वर्ततामिन्द्र  हेतिः।
अश्मेव विध्य दिव आ सृजानसस्तपिष्ठेन हेषसा द्रोघमित्रान्॥12॥

हे  प्रभु  रिपु  से  हमें  बचाना तुम ही सबकी रक्षा करना ।
भूल से भी कोई भूल हो जाए तो प्रभु हमें क्षमा करना॥12॥

9793
अन्वह      मासा      अन्विद्वनान्यन्वोषधीरनु     पर्वतासः ।
अन्विन्द्रं रोदसी वावशाने अन्वापो अजिहत जजायमानम्॥13॥

सूर्यदेव  सुख  के  स्वामी  हैं  वन - औषधि  देते  रहते  हैं ।
आलोक-पुञ्ज वे तमस मिटाते जल-वर्षा वे ही करते हैं॥13॥

9794
कर्हि स्वित्सा त इन्द्र चेत्यासदघस्य यद्भिनदो रक्ष एषत् ।
मित्रक्रुवो यच्छसने न गावः पृथिव्या आपृगमुया शयन्ते॥14॥

अस्त्र - शस्त्र का सञ्चय कर लो तभी सुरक्षित रह पाओगे ।
रहो अहिंसक पर बलशाली अन्यथा भीरु कहलाओगे॥14॥

9795
शत्रूयन्तो अभि ये नस्ततस्त्रे  महि व्राधन्त ओगणास इन्द्र।
अन्धेनामित्रास्तमसा सचन्तां सुज्योतिषो अक्तवस्तॉं अभि ष्युः॥15॥

सज्जन के प्रति विनय-शील और दुष्ट हेतु बन जाओ काल ।
रिपु-दल पर तुम अँकुश रखो दमके सदा शौर्य से भाल॥15॥

9796
पुरूणि हि त्वा सवना जनानां ब्रह्माणि मन्दन्गृणतामृषीणाम्।
इमामाघोषन्नवसा सहूतिं तिरो विश्वॉं अर्चतो याह्यर्वाङ् ॥16॥

संघ - शक्ति  में  अद्भुत  बल  है  रहे  सतत  हाथों  में  हाथ ।
हे  प्रभु सदा सुरक्षा देना हम सुख - दुख बॉंटें साथ-साथ ॥16॥

9797
एवा ते वयमिन्द्र भुञ्जतीनां विद्याम सुमतीनां नवानाम् ।
विद्याम व वस्तोरवसा गृणन्तो विश्वामित्रा उत त इन्द्र नूनम्॥17॥

करो अनुग्रह हम पर भगवन हम सत-पथ पर ही जायें ।
हम ऋषि-मुनियों के वंशज हैं वेद-ऋचा सस्वर गायें॥17॥

9798
शुनं   हुवेम   मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे   नृतमं   वाजसातौ ।
शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि सञ्जितं धनानाम्॥18॥

रण में भी मन-मति पावन हो हम विजय पताका फहरायें ।
सदा अन्न धन देते रहना निरन्तर निज दायित्व निभायें॥18॥         
                  

Saturday, 14 December 2013

सूक्त -91

[ऋषि- अरुण वैतहव्य । देवता- अग्नि । छन्द- जगती- त्रिष्टुप् ।]

9815
सं   जागृवद्भिर्जरमाण  इध्यते  दमे  दमूना   इषयन्निळस्पदे ।
विश्वस्य होता हविषो वरेण्यो विभुर्विभावा सुषखा सखीयते॥1॥

हे  अग्नि - देव  हे  परम - मित्र  तुम अन्न-धान से घर भरना ।
आलोकवान तुम हो तेजस्वी हवि - भोग ग्रहण करते रहना॥1॥

9816
स   दर्शतश्रीरतिथिर्गृहेगृहे     वनेवने    शिश्रिये    तक्ववीरिव ।
जनञ्जनं जन्यो नाति मन्यते विश आ क्षेति विश्यो3विशंविशम्॥॥2॥

तुम  ही  विद्वान  विभूतिवान  हो  सबसे  मिलता  है  सम्मान ।
घर हो वन हो या आश्रम हो सब जगह पूज्य हो एक समान॥2॥

9817
सुदक्षो  दक्षैः क्रतुनासि  सुक्रतुरग्ने  कविः काव्येनासि  विश्ववित्।
वसुर्वसूनां क्षयसि त्वमेक इद् द्यावा च यानि पृथिवी च पुष्यतः॥3॥

तुम नचिकेता नीति-निपुण हो कर्तव्य--कर्म कमनीय-काव्य हो।
समर्थ  सार  सर्वज्ञ  तुम्हीं  हो अक्षय - अक्षत - अद्वितीय हो ॥3॥

9818
प्रजानन्नग्ने  तव योनिमृत्वियमिळायास्पदे घृतवन्तमासदः ।
आ  ते  चिकित्र  उषसामिवेतयोSरेपसः  सूर्यस्येव  रश्मयः ॥4॥

उषा - काल की प्रभा - गुलाबी रवि - रश्मियॉं सदृश चञ्चल हो ।
औषधियों की समिधा से  ही देदीप्यमान आभा उज्ज्वल हो॥4॥

9819
तव  श्रियो  वर्ष्यस्येव  विद्युतश्चित्राश्चिकित्र  उषसां  न  केतवः ।
यदोषधीरभिसृष्टो वनानि  च  परि  स्वयं चिनुषे अन्नमास्ये॥5॥

जब  तुम  हविष्यान्न  लेते  हो  स्वयमेव  पवन होता है पावन ।
प्राण - वायु तुम  ही  देते  हो  रहे सुरक्षित सबका तन - मन ॥5॥

9820
तमोषधीर्दधिरे गर्भमृत्वियं तमापो अग्निं जनयन्त मातरः ।
तमित्समानं वनिनश्च वीरुधोSन्तर्वतीश्च सुवते च विश्वहा॥6॥

अग्निदेव  की  महिमा  भारी  सब  सुख  देते ऋतु - अनुसार ।
वे  ही सबके शुभ - चिन्तक हैं पग-पग पाया प्रेम - प्रभार ॥6॥

9821
वातोपधूत  इषितो  वशॉं  अनु  तृषु  यदन्ना  वेविषद्वितिष्ठसे ।
आ ते यतन्ते रथ्यो3यथा पृथक् शर्धांस्यग्ने अजराणि धक्षतः॥7॥

अग्नि - देव  अति  तेजस्वी  हैं  सूर्य - सदृश  है  उनका  रूप ।
जठरानल  से  मानव - तन  में अग्नि - देव का है स्वरूप ॥7॥

9822
मेघाकारं विदथस्य प्रसाधनमग्निं होतारं परिभूतमं मतिम् ।
तमिदर्भे हविष्या समानमित्तमिन्महे वृणते नान्यं त्वत्॥8॥

वे  ऋतम्भरा - प्रज्ञा  देते  हैं  रिपु - दल  को  करते  हैं  दूर ।
आओ हवि - भोग ग्रहण कर लो सुख देना सबको भरपूर॥8॥

9823
त्वामिदत्र   वृणते   त्वायवो   होतारमग्ने   विदथेषु   वेधसः ।
यद्देवयन्तो दधति प्रयॉंसि ते हविष्मन्तो मनवो वृक्तबर्हिषः॥9॥

हे अग्नि - देव  तुम  ही वरेण्य हो हम आवाहन तेरा करते हैं ।
आहुतियॉं   तुमको  देते  हैं  बारम्बार   नमन   करते   हैं ॥9॥

9824
तवाग्ने  होत्रं  तव  पोत्रमृत्वियं  तव  नेष्ट्रं  त्वमग्निदृतायतः ।
तव प्रशास्त्रं त्वमध्वरीयसि ब्रह्मा चासि गृहपतिश्च नो दमे॥10॥

यज्ञ - हवन  में  तुम  ही  भगवन सब दायित्व निभाते हो ।
विविध रूप में तुम ही प्रभु जी धर्म-कर्म सब सिखलाते हो॥10॥

9825
यस्तुभ्यमग्ने अमृताय मर्त्यः समिधा दाशदुत वा हविष्कृति।
तस्य होता भवसि यासि दूत्य1मुप ब्रूषे यजस्यध्वरीयसि॥11॥

सुधा-स्वरूप तुम्हीं हो भगवन तुम ही मातृ - सदृश सेते हो ।
यजमान रूप में हवि देते हो अग्नि - रूप में हवि लेते हो ॥11॥

9826
इमा अस्मै मतयो वाचो अस्मदॉं ऋचो गिरःसुष्टुतयःसमग्मत।
वसूयवो वसवे जातवेदसे वृध्दासु चिद्वर्धनो यासु चाकनत्॥12॥

अग्नि- देव  के  हेतु  ऋचा  का  समवेत - स्वरों में होता गान ।
अग्नि- देव धन - वैभव देते अग्नि - देव  देते  धन - धान ॥12॥

9827
इमां  प्रत्नाय  सुष्टुतिं  नवीयसीं  वोचेयमस्मा उशते शृणोतु नः ।
भूया अन्तरा हृद्यस्य निस्पृशे जायेव पत्य उशती सुवासा:॥13॥

विविध  विधा  में  भॉंति - भॉंति  से  वेद - मंत्र सब कोई गाओ ।
पावक-पावन पूजन स्वीकारो अग्निदेव मन में बस जाओ॥13॥

9828
यस्मिन्नश्वास ऋषभास उक्षणो वशा मेषा अवसृष्टास आहुता:।
कीलालपे सोमपृष्ठाय वेधसे हृदा मतिं जनये  चारुमग्नये॥14॥

हवि - भोग  ग्रहण  करने  वाले  हे  बुध्दि - श्रेष्ठ हे अग्नि - देव ।
सोमाहुति स्वीकार करो प्रभु मति पावन कर दो अग्निदेव॥14॥ 

9829
अहाव्यग्ने   हविरास्ये   ते   स्त्रुचीव   घृतं   चम्वीव   सोमः ।
वाजसनिं रयिमस्ये सुवीरं प्रशस्तं धेहि यशसं बृहन्तम्॥15॥

प्रज्वलित अग्नि ही तेरा मुख है हवि-भोग प्रेम से खा लेना ।
यश-वैभव प्रदान करना और अन्न - धान सबको देना ॥15॥ 
              

Friday, 13 December 2013

सूक्त - 92

[ऋषि- शार्यात मानव । देवता- विश्वेदेवा । छन्द- जगती ।]

9830
यज्ञस्य यो रथ्यं विश्पतिं विशां होतारमक्तोरतिथिं विभावसुम्।
शोचञ्छुष्कासु  हरिणीषु  जर्भुरद्वृषा केतुर्यजतो द्यामशायत॥1॥

हे  अग्नि - देव  पावक - पावन  तुम  सबकी  रक्षा  करते  हो ।
पुनीत-यज्ञ के ध्वज-स्वरूप गगन में शयन तुम्हीं करते हो॥1॥

9831
इममञ्जस्पामुभये अकृण्वत धर्माणमग्निं विदथस्य साधनम्।
अक्तुं  न  य  यह्वमुषसः  पुरोहितं  तनूनपातमरुषस्य निंसते॥2॥

तुम  सर्वोपरि  तुम  संरक्षक  तुम्हीं  धर्म - धारण  करते  हो ।
तुम  ही  पडिण्त  तुम्ही पुरोधा सूर्य - देव सम तुम लगते हो॥2॥

9832
बळस्य  नीथा  वि  पणेश्च  मन्महे  वया अस्य  प्रहुता आसुरत्तवे ।
यदा घोरासो अमृतत्वमाशतादिज्जनस्य दैव्यस्य कचर्किरन्॥3॥

हवि-भोग  ग्रहण  करना  प्रभु-वर  हम  यही  निवेदन  करते  हैं ।
जब  अग्नि  प्रज्वलित  होती  है  तब  आहुति अर्पित करते हैं ॥3॥

9833
ऋतस्य  हि  प्रसितिर्द्यौररुरु  व्यचो नमो मह्य1रमतिः पनीयसी ।
इन्द्रो  मित्रो  वरुणः सं चिकित्रिरेथो भगः सविता पूतदक्षतः॥4॥

यज्ञ - अग्नि  को  सभी  देवता  सादर  सदा  नमन  करते  हैं ।
उन्हें  प्रेम  से  सब  निहारते  परम  -प्रिय - पूज्य समझते हैं॥4॥

9834
प्र  रुद्रेण  ययिना  यन्ति सिन्धवस्तिरो महीमरमतिं दधन्विरे ।
येभिः परिज्मा प प्रियन्नुरु ज्रयो वि रोरुवज्जठरे विश्वमुक्षते॥5॥

वेग - वती  सरिता  बहती   है जन - जन  की  प्यास  बुझाती है ।
घन  नभ  में  निनाद करते हैं धरती की तपन मिट जाती है ॥5॥

9835
क्राणा रुद्रा मरुतो विश्वकृष्टयो दिवः श्येनासो असुरस्य नीळयः।
तेभिश्चष्टे  वरुणो  मित्रो   अर्यमेन्द्रो  देवेभिरर्वशेभिरर्वशः ॥॥6॥

पञ्चभूत  ये  सभी  शक्तियॉं  सबकी  रक्षा  में  जुट  जाती  हैं ।
संघ - शक्ति  में  अद्भुत  बल  है  पर - सेवा  में  सुख पाती हैं॥6॥

9836
इन्द्रे  भुजं  शशमानास  आशत  सूरो  दृशीके  वृषणश्च  पौंष्ये ।
प्र   ये  न्वस्यार्हणा  ततक्षिरे  युजं  वज्रं  नृषदनेषु  कारवः ॥7॥

इन्द्र  -  देव   देते   संरक्षण   दृष्टि  - शक्ति   सूरज   देते    हैं ।
ये सबको बल - वैभव  देते  स्नेह - सहित  अपना  लेते  हैं ॥7॥

9837
सूरश्चिदा  हरितो  अस्य  रीरमदिन्द्रादा  कश्चिद्भयते  तवीयसः ।
भीमस्य वृष्णो जठरादबभिश्वसो दिवेदिवे सहुरिःस्तन्नबाधितः॥8॥

सूर्य - देव  सबको  सुख  देते  जन - जन  को  प्रसन्न  करते  हैं ।
आलोक  और  ऊष्मा  देते  हैं  कर्म - योग  पथ  पर चलते हैं ॥8॥

9838
स्तोमं  वो  अद्य  रुद्राय  शिक्वसे  क्षयद्वीराय  नमसा  दिदिष्टन ।
येभिःशिवःस्ववॉं एवयावभिर्दिवःसिषक्ति स्वयशा निकामभिः॥9॥

यदि  मन  में  संकल्प  उठे  तो  मानव  सुख  से  जी  सकता है ।
परमेश्वर  मेरे  अपना  है  हर  मन  से   वही  जुडा  रहता   है ॥9॥

9839
ते हि प्रजाया अभरन्त वि श्रवो बृहस्पतिरर्वृषभः सोमजामयः।
यज्ञैरथर्वा  प्रथमो वि धारयद्देवा दक्षैर्भृगवः सं चिकित्रिरे ॥10॥

अन्न - धान  देकर  उस प्रभु ने हम  सब पर उपकार किया है ।
सदा अनुग्रह  करना प्रभु जी तुमने हमें कृतार्थ किया  है ॥10॥

9840
तेहि  द्यावापृथिवी  भूरिरेतसा  नराशंसश्चतुरङ्गो यमोSदिति: ।
देवस्त्वष्टा द्रविणोदा ऋभुक्षणः प्र रोदसी मरुतो विष्णुरर्हिरे॥11॥

यह  जीवन  भी  महायज्ञ  है  हे  प्रभु  आमंत्रित  करते  हैं ।
विधि - विधान से पूर्णाहुति हो यही प्रार्थना हम करते हैं॥11॥

9841
उत  स्य  न  उशिजामुर्विया  कविरहिः शृणोतु  बुध्न्यो3 हवीमनि।
सूर्यामासा विचरन्ता दिविक्षिता धिया शमीनहुषी अस्य बोधतम्॥12॥

हे  अग्नि - देव  पावक - पावन  यह  पूजा प्रभु स्वीकार करो ।
हे सूर्य-सोम सादर प्रणाम है जन-जन का तुम दुख हरो ॥12॥

9842
प्र   नः  पूषा   चरथं   विश्वदेव्योSपां   नपादवतु   वायुरिष्टये ।
आत्मानं वस्यो अभि वातमर्चत तदश्विना सुहवा यामनि श्रुतम्॥13॥

हे वरुण-देव प्रभु हे पूषा सुख-साधन का तुम रखना ध्यान ।
हे  पवन - देव  तुम रक्षा करना देते रहना अन्न - धान ॥13॥

9843
विशामासामभयानामधिक्षितं   गीर्भिरु   स्वयशसं   गृणीमसि ।
ग्नाभिर्विश्वाभिरदितिमनर्वणमक्तोर्युवानं नृमणा अधा पतिम्॥14॥

मेरे  मन  में  तुम्हीं  बसे  हो  यश- कीर्ति  तुम्हीं  दे  जाते  हो ।
हे सूर्य-सोम सादर प्रणम्य हो तुम सुख का पाठ पढाते हो ॥14॥

9844
रेभदत्र जनुषा पूर्वो अंङ्गिरा ग्रावाण ऊर्ध्वा अभि चक्षुरध्वरम् ।
येभिर्विहाया अभवद्विचक्षणः पाथः सुमेकं स्वधितिर्वनन्वति॥15॥

कर्तव्य-कर्म के इस पथ पर प्रभु साथ-साथ चलते रहना ।
पॉंव कहीं थक जायें तो प्रभु हाथ पकड कर ले चलना ॥15॥     
 
 

        

Thursday, 12 December 2013

सूक्त - 93

[ऋषि--तान्व पार्थ । देवता- विश्वेदेवा । छन्द-पंक्ति-अनुष्टुप्--सारिणी-बृहती।]

9845
महि द्यावापृथिवी भूतमूर्वी नारी यह्वी न रोदसी सदं नः।
तेभिर्नः    पातं    सह्यस    एभिर्नः    पातं    शूषणि॥1॥

यह धरती सबकी माता है प्रभु करना इसका विस्तार ।
यह  देती  है हमें  सुरक्षा यह ही तो है पालन - हार ॥1॥

9846
यज्ञेयज्ञे    स    मर्त्यो    देवान्त्सपर्यति।
यः सुम्नैर्दीर्घश्रुत्तम आविवासात्येनान् ॥2॥

पर - हित  में  जो  रत  रहते हैं जग-हित में करते हैं काम ।
प्रभु-उपासना जो करते हैं निशि-दिन लेते प्रभु का नाम॥2॥

9847
विश्वेषामिरज्यवो        देवानां          वार्महः ।
विश्वे हि विश्वमहसो विश्वे यज्ञेषु यज्ञिया:॥3॥

हे  परमेश्वर  यश - वैभव  दो  बन  जायें  प्रभु हम तेजस्वी ।
यज्ञ - धर्म  में लगे रहें  हम सबकी वाणी  हो  ओजस्वी ॥3॥

9848
ते घा राजानो अमृतस्य मन्द्रा अर्यमा मित्रो वरुणः परिज्मा।
कद्रुद्रो      नृणां      स्तुतो      मरुतः     पूषणो      भगः  ॥4॥

परमेश्वर  हमसे  कहते  हैं  सुख - मय  जीवन  जिया  करो ।
सुधा सदृश औषधियॉ लेकर प्रति-दिन इसको पिया करो॥4॥

9849
उत नो नक्तमपां वृषण्वसू सूर्यामासा सदनाय सधन्या ।
सचा            यत्साद्येषामहिर्बुध्नेषु            बुध्न्यः ॥5॥

जीवन में जो भी आवश्यक हो हे प्रभु हमको देते रहना ।
सतत सुरक्षा देना प्रभु जल- वायु सदा पावन रखना॥5॥

9850
उत नो देवावश्विना शुभस्पती धामभिर्मित्रावरुणा उरुष्यताम्।
महः     स     राय     ए     एषतेSति     धन्वेव      दुरिता ॥6॥

आदित्य - देव आलोक  हमें  दो तुम हम सबकी रक्षा करना ।
महाबली  हो   हे  परमेश्वर  जग  को  देना  तुम्हीं  सुरक्षा ॥6॥

9851
उत नो रुद्रा चिन्मृळतामश्विना विश्वे देवासो रथस्पतिर्भगः।
ऋभुर्वाज       ऋभुक्षण:       परिज्मा         विश्ववेदसः ॥7॥

हे  प्रभु  तुम धन-वैभव देना जीवन यह  उपवन  बन  जाए ।
करो अनुग्रह  हे परमात्मा तेरी पूजा में  मन  लग जाए ॥7॥

9852
ऋभुरृभुक्षा ऋभुर्विधतो मद आ ते हरी जूजुवानस्य वाजिना।
दुष्टरं     यस्य     साम     चिद्रिधग्यज्ञो     न     मानुषः ॥8॥

प्रभु का आनन्द भी अनन्त है अति समर्थ  है वह  परमेश्वर ।
जग की रचना कितनी सुन्दर मन की रचना अति सुन्दर॥8॥

9853
कृधी   नो   अह्नयो   देव   सवितः  स   च   स्तुषे   मघोनाम् ।
सहो न इन्द्रो वह्निभिर्न्येषां चर्षणीना चक्रं रश्मिं न योयुवे॥9॥

ऐसा  कर्म  करें  हम  भगवन  जिससे  न  हो  अपराध-बोध ।
जीवन  यह  बन  जाए  कसौटी स्वयं करें अपना ही शोध ॥9॥

9854
ऐषु   द्यावापृथिवी  धातं  महदस्मे   वीरेषु  विश्वचर्षणि  श्रवः।
पृक्षं       वाजस्य    सातये      पृक्षं      रायोत      तुवर्णे॥10॥

वरद- हस्त  रखना  संतति  पर यश - वैभव का देना वरदान।
संकट  से तुम उन्हें बचाना जीवन बन जाए गौरव-गान॥10॥

9855
एतं शंसमिन्द्रास्मयुष्ट्वं कूचित्सन्तं सहसावन्नभिष्टये सदा पाह्यभिष्टये।
मेदतां वेदता वसो ॥11॥

प्रभु  मेरा  अभिप्राय  समझना  सत्पथ  मुझको  दिखलाना ।
मनो-कामना पूरी करना कर्तव्य-धर्म मुझको समझाना॥11॥

9856
एतं मे स्तोमं तना न सूर्ये द्युतद्यामानं वावृधन्त नृणाम् ।
संववनं नाश्व्यं तष्टेवानपच्युतम् ॥12॥

सूर्य-किरण आलोक बॉंटती तुम देना गुण का भण्डार ।
सदा अर्चना करें तुम्हारी जीवन हो सुख का आगार॥12॥

9857
वावर्त   येषां   राया   युक्तैषां  हिरण्ययी ।
नेमधिता न पौंस्या वृथेव विष्टान्ता॥13॥

हे   परम - मित्र  हे  परमेश्वर  सद्बुध्दि  सदा  हमको  देना ।
हम बार-बार यदि भूल करें तो भी हमको अपना लेना॥13॥

9858
प्र  तद्दुःशीमे  पृथवाने  वेने   प्र  रामे  वोचमसुरे  मघवत्सु ।
ये   युक्त्वाय   पञ्च  शतास्मयु   पथा  विश्राव्येषाम् ॥14॥

भीतर - बाहर  के  दुश्मन  से  हे  प्रभु  तुम  ही  हमें  बचाना ।
धन से धान से घर भर देना जन-हित में तुम हमें लगाना॥14॥

9859
अधीन्न्वत्र सप्ततिं च सप्त च ।
सद्यो दिदिष्ट तान्वःसद्यो दिदिष्ट पार्थ्यःसद्यो दिदिष्ट मायवः॥15॥

वेद - ऋचायें   सिखलाती   हैं  त्याग -  सँग   उपभोग   करो ।
तुम जो चाहोगे वही मिलेगा तुम बस केवल संकल्प  करो॥15॥                        

Wednesday, 11 December 2013

सूक्त - 94

[ऋषि- अर्बुद काद्रवेय - सर्प । देवता- पाषाण । छन्द- जगती-त्रिष्टुप् ।]

9860
प्रैते  वदन्तु  प्र  वयं  वदाम  ग्रावभ्यो  वाचं  वदता  वदद्भ्यः।
यदद्रयःपर्वता:साकमाशवःश्लोकं घोषं भरथेन्द्राय सोमिनः॥1॥

पाषाण की हम पूजा करते हैं कण-कण में क्योंकि कान्हा है ।
पत्थर  भी  बातें  करते  हैं  हम  सब  ने  ही  यह माना है ॥1॥

9861
एते वदन्ति शतवत्सहस्त्रवदभि क्रन्दन्ति हरितेभिरासभिः।
विष्ट्वी ग्रावाणःसुकृतःसुकृत्यया होतुश्चित्पूर्वे हविरद्यमाशत॥2॥

पाषाण  हजारों  मुख  वाला  है  वह  ही  हवि-भोग बनाता है ।
हविष्यान्न  को  सबसे  पहले  पत्थर - पर कूटा जाता है ॥2॥

9862
एते वदन्त्यविदन्नना मधु  न्यूङ्खयन्ते अधि पक्व आमिषि।
वृक्षस्य शाखामरुणस्य बप्सतस्ते सूर्भवा वृषभा:प्रेमराविषुः॥3॥

वृषभ  सदृश  ही  स्वर  है  इसका  अपना  भाव प्रकट करता है ।
सोम इसके सहयोग से बनता वह सुख - सम्प्रेषित करता है॥3॥

9863
बृहद्वदन्ति  मदिरेण  मन्दिनेन्द्रं  क्रोशन्तोSविदन्नना  मधु ।
संरभ्या धीरा:स्वसृभिरनर्तिषुराघोषयन्तःपृथिवीमुपब्दिभिः॥4॥

पहले  सोम  यही  चखता  है  फिर  देवताओं  को मिलता है ।
इसकी  शब्द - गर्जना  अद्भुत  यह  झूमता - थिरकता  है॥4॥

9864
सुपर्णा  वाचमक्रतोप  द्यव्याखरे  कृष्णा  इषिरा  अनर्तिषु: ।
न्य1ङ्नि यन्त्युपरस्य निष्कृतं पुरु रेतो दधिरे सूर्यश्वितः॥5॥

यह पंछी सम कलरव करता गोचर में कृष्ण-हरिण लगता है।
विविध - राग- रागिनी गाता गति पाकर  नर्तन करता है ॥5॥

9865
उग्राइव प्रवहन्तः समायमुः साकं युक्ता वृषणो बिभ्रतो धुरः ।
यच्छ्वसन्तो जग्रसाना अराविषुः शृण्व एषां प्रोथथो अर्वतामिव॥6॥

रथ  को  घोडे  धारण  करते  पाषाण  यज्ञ  धारण  करता  है ।
सोम-ग्रहण जब यह करता है अश्व-सदृश वह स्वर लगता है॥6॥

9866
दशावनिभ्यो  दशकक्ष्येभ्यो  दशयोक्त्रेभ्यो  दशयोजनेभ्यः ।
दशाभीशुभ्यो अर्चताजरेभ्यो दश धुरो दश युक्ता वहद्भ्यः॥7॥

आओ  पाषाण की महिमा गायें मंदिर की परिक्रमा कर आयें ।
मन - मंदिर  में  उसे  बिठायें  आओ पूजा के पुष्प  चढायें ॥7॥

9867
ते  अद्रयो  दशयन्त्रास  आशवस्तेषामाधानं  पर्येति  हर्यतम्।
त ऊ सुतस्य सोम्यस्यान्धर्सोSशोःपीयूषं प्रथमस्य भेजिरे॥8॥

ये  अँगुलियों  का  कहा मानते जल्दी से सभी काम निपटाते ।
आलस्य  कभी  नहीं  करते हैं सभी कार्य में झट जुट जाते ॥8॥

9868
ते  सोमादो  हरी इन्द्रस्य निंसतेंSशुं दुहन्तो अध्यासते गवि ।
तेभिर्दुग्धं पपिवान्त्सोम्यं मध्विन्द्रो वर्धते प्रथते वृषायते॥9॥

पाषाण  बडा  ही  बलशाली  है  यह भी सोम - पान  करता है ।
पाषाण-देव की बात निराली मानव इनकी पूजा करता  है॥9॥

9869
वृषा  वो  अंशुर्न  किला रिषाथनेळावन्तः सदमित्स्थनाशिता:।
रैवत्येव महसा चारवःस्थन यस्य ग्रावाणो अजुषध्वमध्वरम्॥10॥

पाषाण  निराश  नहीं  होता  है  वह  हम  सबका  ही प्रेरक है ।
ईश्वर बन-कर  राह  दिखाता वह  ही सच्चा उपदेशक  है॥10॥

9870
तृदिला  अतृदिलासो  अद्रयोSश्रमणा   अशृथिता   अमृत्यवः।
अनातुरा अजरा:स्थामविष्णव:सुपीवसो अतृषिता अतृष्णजः॥11॥

तृष्णा  तुम्हें  छू  नहीं  सकती  हे पत्थर तुम अच्छे लगते हो ।
स्पृहा कभी पास आ नहीं सकती आशा के ऑंचल में रहते  हो॥11॥

9871
ध्रुवा एव वः पितरो युगेयुगे क्षेमकामासः सदसो न युञ्जते ।
अ अजुर्यासो हरिषाचो हरिद्रव आ द्यां रवेण पृथिवीमशुश्रवुः॥12॥

बहुधा पाषाण अचल रहता है पलायन कभी नहीं करता है ।
अपना कोई स्वार्थ नहीं है पर-हित का सदा ध्यान रखता है॥12॥   

9872
तदिद्वदन्त्यद्रयो विमोचने यामन्नञ्जस्पाइव घेदुपब्दिभिः।
वपन्तो बीजमिव धान्याकृतःपृञ्वन्ति सोमं न मिनन्ति बप्सतः॥13॥

मन्दिर में मूरत बन-कर भी वह कभी नहीं करता अभिमान।
आता  है औरों  के  काम  पत्थर तो है गुण का निधान ॥13॥

9873
सुते  अध्वरे  अधि  वाचमक्रता  क्रीलयो  न  मातरं  तुदन्तः ।
वि षू मुञ्चा सुषुवुषो मनीषां वि वर्तन्तामद्रयश्चायमाना:॥14॥

कर्म - योग  में  जो  ध्वनि  होती  वह  ही है उसका देश-गान ।
प्रजातंत्र  के मन्दिर में भी दिखता है उसका स्वाभिमान ॥14॥