Tuesday, 8 November 2016

कालिदास कवि कुल गौरव हैं

कालिदास कवि - कुल - गौरव हैं शब्द - चित्र के हैं आकाश
लोगों  ने उपहास - किया पर हुए  नहीं वह कभी - निराश ।

अभिज्ञानशाकुन्तल रच - कर दुनियां भर में नाम कमाया
मेघदूत छा - गया गगन में प्रणय - गीत जब तुमने गाया ।

सत्यमेव जयते की धुन पर तुमने रचा कुमार - सम्भवम्
दुष्ट - दमन अति आवश्यक है आदि सनातन यही नियम ।

मालविका भी अग्नि - मित्र - संग हंसी - ठिठोली करती है
प्रेम - रतन - धन दिया तुम्हीं ने आतुर - हो कर कहती है ।

विक्रम की उर्वशी क्षितिज पर सहज - सरल देती - सन्देश
अमर - रहे अनुराग  हमारा प्रेम - से पूरित- हो परि - वेश ।

ऋतु - संहार यही कहता  है  नित - नवीन  है यह - धरती
वनस्पतियॉ कितनी सुंंदर हैं कल कल कर कावेरी कहती ।

शिप्रा - तुम्हें - याद करती  है  बैठी - रहती  है  वह - मौन
पद - चापों की परख उसे है कभी - कभी कह उठती कौन ?

महाकाव्य - रघुवंश - तुम्हारा सब को राह - दिखाता है
यह मानव - जीवन अमूल्य है हम सब को समझाता है ।

जन्म भूमि की महिमा अद्भुत तुमने किया है गौरव गान
आज़ादी की खीर बँटी जब जाग- गया फिर हिन्दुस्तान ।

कालिदास तुम यहीं - कहीं हो सुनती  हूँ तेरा  पद - चाप
तुम मेरे मन में बसते हो अनुभव करती हूँ अपने - आप ।  
  

Sunday, 3 July 2016

वसंत पञ्चमी

                                                  [ कहानी ]

" तेरी मॉ बर्तन धोती है, तू भी वही काम कर. यहॉ स्कूल में क्या करने आई है ? पढ - लिख कर मास्टरनी बनेगी क्या ?" विद्या फूट-फूट कर रोने लगी.टीचर की डॉट की डर से वह ज़ोर-ज़ोर से नहीं रो रही थी, पर ऑख से ऑसू लगातार बह रहे थे और विद्या अपराधिनी की तरह सिर झुका कर खडी थी. थोडी देर में नाश्ते की छुट्टी हुई. सभी बच्चे अपना-अपना टिफिन खोल कर खाने लगे पर विद्या एक कोने में चुपचाप सिर झुका कर बैठी रही. शाम को जब छुट्टी हुई तो वह अपना बस्ता उठा कर घर की ओर जाने लगी तभी उसे रास्ते में उसी  की कक्षा में पढने वाली सहेली माया मिली. उसने विद्या से पूछा - ' तेरा घर कहॉ पर है ?' विद्या ने उसे बताया कि वह पास की बस्ती में ही रहती है. माया ने कहा- 'मैं भी तो वहीं रहती हूँ पर मैंने तुम्हें कभी नहीं देखा, तब विद्या ने उसे बताया कि वह अपनी नानी के साथ गॉव में रहती थी और अभी पढने के लिए मॉ के पास आ गई है. दोनों बच्चियों में दोस्ती हो गई और दोनों साथ-साथ रहने लगीं.

विद्या अभी तक समझ नहीं पाई थी कि टीचर ने उसे क्यों डॉटा था पर जब माया ने बताया कि टीचर ने तुम्हें इसलिए डाटा था कि तुम्हें न तो वर्णमाला लिखना आता और न ही तुम गिनती जानती हो.
' पर मुझे टीचर ने कभी सिखाया ही नहीं तो मुझे आएगा कैसे? मैं सीखने के लिए ही तो स्कूल जाती हूँ न ?'
'ऐसा नहीं होता विद्या ! हमें घर से सब कुछ सीख कर स्कूल जाना पडता है नहीं तो टीचर इसी तरह अपमानित करते हैं. वे केवल मुँह से बोलते हैं, हाथ पकड कर नहीं सिखाते.'
'पर मेरी मॉ तो कहती है कि टीचर भगवान की तरह होते हैं. वे सभी बच्चों को अपने बच्चे की तरह समझते हैं और सबको बराबर प्यार करते हैं.'
'अच्छा देख ! तेरा नाम विद्या है न ! तो तू ज़रूर पढेगी, चल आज वर्णमाला से मैं तेरा परिचय करवाती हूँ.'
बस फिर क्या था दोनों सहेलियॉ साथ-साथ पढने लगीं और विद्या ने थोडे ही दिनों में वर्णमाला और सौ तक गिनती सीख ली.टीचर का व्यवहार भी धीरे-धीरे बदलने लगा.रूखी बानी में मिठास आ गई.

आज वसंत-पञ्चमी है. आज विद्या के स्कूल में सरस्वती-पूजा हो रही है. बडे गुरुजी के साथ-साथ सभी बच्चों ने सरस्वती माता की वन्दना की फिर बडे गुरुजी के संग-संग सभी बच्चों ने गाया-
" जय सरस्वती की जय सरस्वती
तोर माथे धरवँ बेल की पत्ती ।
मॉ तुम पहनो गज - मुक्ताहार
हमको दे दो विद्या - भण्डार ॥"

विद्या गाती रही पर ऑखों से झर-झर ऑसू बहते रहे. बडे गुरुजी ने देख लिया, उन्होंने विद्या को अपने पास बुलाया और फिर उससे पूछा- " बेटा ! तुम क्यों रो रही हो ?"
विद्या ने बताया- " बडे गुरुजी ! मेरी दो छोटी बहनें हैं और मेरे पिताजी हम लोगों को छोड कर कहीं चले गए हैं । हमारे पास न ही रहने की जगह है न ही खाने-पीने के लिए कुछ है, मेरी मॉ दो घरों में बर्तन धोती है पर उससे गुज़ारा नहीं हो रहा है. आप मुझे कुछ काम दिलवा दीजिए,मैं पूरे स्कूल में झाडू-पोछा कर सकती हूँ" कहते -कहते वह फूट-फूट कर रोने लगी. गुरुजी की ऑखें भर आईं,उन्होंने विद्या के सिर पर हाथ रख कर कहा -
" आज से तुम मेरी बेटी हो ! तुम्हारी किताबें,स्कूल-ड्रेस तुम्हें मैं दूँगा और तुम्हारी मॉ को काम भी मिल जाएगा । तुम चिंता मत करो, तुम्हें काम करने की ज़रूरत नहीं है,अभी तुम्हें पढना है और पढ-लिख कर कुछ बनना है. "

बडे गुरुजी, विद्या और माया के साथ उसके घर गए. एक छोटे से सीलन भरे कमरे में उसकी दोनों बहनें,फ्टी हुई चादर पर खेल रही थीं और उसकी मॉ काम करने गई थी. बडे गुरुजी बाहर खडे रहे और जब उसकी मॉ काम से लौट कर आई तो उन्होंने कहा-" बच्चों को लेकर मेरे साथ चलिए, स्कूल में चौकीदार का कमरा खाली है, अपने बच्चों के साथ वहॉ रहिए. चपरासी का काम तुम्हें मिल जाएगा और तुम्हारा गुज़ारा हो जाएगा."

बच्चियॉ खुश हो गईं पर उनकी मॉ, लक्ष्मी के ऑसूँ नहीं थम रहे थे, उसने बडे गुरुजी के दोनों पैरों को पकड कर प्रणाम किया और बोली- " बडे गुरुजी ! आप मेरे लिए भगवान की तरह हैं, आपने मेरी बच्चियों को नई ज़िन्दगी दी है. लक्ष्मी अपनी छोटी बेटी रंभा को गोद में लेकर चल रही थी और विद्या और सरस्वती,बडे गुरुजी की ऊँगली पकड कर ऐसे शान से चल रही थीं जैसे उनको आसमान मिल गया हो.

विद्या आज खेल-खेल में सरस्वती -माता की मिट्टी की मूरत बनाई है और उसे अपने सीने से लगा कर अपने नए घर में ले जा रही है. रास्ते भर वह सरस्वती-माई से बात करती रही- ' हे सरस्वती माता ! तुम मुझे विद्या का भण्डार देना. वाणी का वरदान देना. मुझे अपने समान बनाना सरस्वती माई ! हमारी रक्षा करना. मुझे इतनी विद्या देना कि हम सिर उठा कर इस संसार में जी सकें.'

हम सब काम करते-करते थक जाते हैं और थक कर सो जाते हैं. एक-एक दिन करते -करते कई बरस गुज़र जाते हैं. कालचक्र कभी नहीं थमता, वह निरंतर चलता रहता है . बेटियॉ कब बडी हो जाती हैं पता ही नहीं चलता. लक्ष्मी बडी हो गई है. वह आई. पी. एस. अफसर बन चुकी है और उसकी नियुक्ति मुँबई - ठाणे में हो गई है. विद्या का घर हँस रहा है बहनें खिलखिला रही हैं और मॉ की ऑखें मुस्कुरा रही हैं. सरस्वती, मेडिकल कॉलेज़ में पढ रही है. रंभा आई. आई. टी. की तैय़ारी कर रही है.

अब विद्या को घर की याद आ रही है, वह अपनी खुशियों को अपनों से बॉटना चाहती है. उसे मॉ की बहनों की और बडे गुरुजी की याद आ रही है पर आज सडक - दुर्घटना में एक आदमी बुरी तरह घायल हो गया है,उसके दोनों पॉव टूट गए हैं, उससे मिलने जा रही है. वैसे तो इंस्पैक्टर उसका बयान लेकर आ गए हैं पर विद्या स्वयं उससे मिलना चाहती है. उसका नाम प्रभाकर है. विद्या उससे मिली और उसने उससे पूछा - ' कहॉ रहते हो ?'
' फुटपाथ पर .'
'कहॉ से आए हो ?'
'भवतरा से .'
अरे ! यह तो मेरा ही गॉव है.
' घर में और कौन - कौन हैं ?'
' मैं अपनी पत्नी और तीन बेटियों को छोड कर मुँबई आ गया था , पता नहीं वे कहॉ हैं और किस हाल में हैं .'
उसकी ऑखें भर आईं,वह रोने लगा,अपने आपको कोसने लगा. उसने कहा - 'मेरी बेटी आपके उम्र की होगी पर मैं बेटे की चाह में, अपनी बेटियों को छोड कर यहॉ भाग आया. क्या पता वे जिन्दा हैं भी या नहीं ?'
वह फूट-फूट कर रोने लगा.
अब विद्या पहचान चुकी थी कि वह उसका पिता है पर उसने बताया नही.उसके पैरों का ऑपरेशन करवाया.जयपुरी पैर लग गए और प्रभाकर जब चलने-फिरने लायक हो गया तो विद्या ने उससे पूछा-'क्या आप अपने गॉव जाना चाहेंगे? 'उसने रोते हुए कहा- ' हॉ , जाऊँगा .'

आज वसंत-पञ्चमी है . विद्या , प्रभाकर को लेकर मॉ के पास पहुँचने वाली है, मॉ ने विद्या के सम्मान में पूरे गॉव को बुलाया है, बडे गुरुजी नई धोती- कुर्ता पहन कर, सोफे पर बैठे हुए हैं, वे सभी आगंतुकों का स्वागत कर रहे हैं, विद्या की मॉ , लक्ष्मी आरती की थाल सजा कर , विद्या का इंतज़ार कर रही है, जैसे ही विद्या आई उसकी दोनों बहनें उससे लिपट गईं. लक्ष्मी ने विद्या की आरती उतारी और विद्या ने मॉ के चरण छुए, उसने बडे गुरुजी को प्रणाम किया और उनका आशीर्वाद लिया. प्रभाकर असहज होकर इधर-उधर देख रहा था,तभी विद्या ने अपनी मॉ से कहा- ' मॉ ! यहॉ आओ, देखो तो ये कौन हैं ?'
लक्ष्मी ने प्रभाकर को ध्यान से देखा- ' अरे ! वही ऑखें, वही चेहरा ! उसके होठों ने कहा- ' प्रभाकर !'
' मॉ ! तुम इन्हें जानती हो क्या ?'
" मैं तुम्हारा अपराधी हूँ लक्ष्मी !" कहकर प्रभाकर हाथ जोड कर बोला - " हो सके तो मुझे माफ कर देना ,मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ ." वह रोने लगा . नारी तो धरती है . लक्ष्मी ने उसका हाथ पकड कर उसे बिठाया, अपने बच्चों से मिलवाया और फिर पूरे गॉव वालों के साथ माता सरस्वती की पूजा की. माता सरस्वती ने विद्या की प्रार्थना सुन ली थी .  
  

Tuesday, 28 June 2016

सागर के सीप में मोती है मॉरीशस


अखिल भारतीय कवयित्री सम्मेलन के संस्थापक डॉ लॉरी आज़ाद ने जब हमें बताया कि हम 14वीं अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में मॉरीशस जा रहे हैं, तो मैं बहुत खुश हुई । कारण श्रीलंका,से लेकर भूटान, कनाडा, अमेरिका, रूस, सिंगापुर,नेपाल,मलेशिया,इंडोनेशिया,थाईलैण्ड और मॉरीशस से हिंदुस्तान की खुशबू आती है.इन देशों का अपनापन मुझे आकर्षित करता है.मेरा मन वहॉ बार-बार जाना चाहता है.लारी भाई ने हमारे आने-जाने और ठहरने की फटाफट तैयारी कर दी और हम निकल पडे अपने गंतव्य की ओर.
11जून 2016

छ्त्तीसगढ से हम पॉच बहनें जा रही हैं- चंद्रावती,संध्या,मधुलिका,सावित्री और शकुन्तला शर्मा.रायपुर एअरपोर्ट से आज शाम 6.55 को हमें दिल्ली पहुँचना है.हम सभी ठीक 5.00 बजे एअरपोर्ट पहुँच गए और 6.30 तक अपने विमान पर सवार हो गए.रास्ते भर हम कुछ न कुछ खाने की चीज़ें निकाल-निकाल कर खाते रहे और 8.55 पर दिल्ली पहुँच गए.डिनर के लिए हम घर से रोटी-सब्ज़ी रख लिए थे,उसे निकाल कर हम सभी इतमिनान से खाए और आराम से वहीं बैठे रहे क्योंकि हमें टर्मिनल 5 पर 1.00 बजे रात को एकत्र होना है.हम 12.00 बजे घरेलू हवाई अड्डे से निकले और बस में बैठकर,अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल -5 पर जाकर बैठ गए.थोडी ही देर में लारी भैया आए और उन्होंने हमें हमारी टिकट दी,एक-एक बैग और खाने-पीने की चीज़ें भी उन्होंने हमें ऑफर किया और फिर हमने चेक-इन किया. बोर्डिंग-पास लेने के बाद हमने एक जगह बैठकर मीटिंग की और फिर मॉरीशस एअर में बैठ गए.

12 जून 2016
सुबह 8.00 बजे हमारा विमान मॉरीशस की ओर चल पडा.हमारी सीट के आगे लेपटॉप जैसा एक सिस्टम था,जिसमें हर पल यह दिखा रहा था कि- हम कहॉ हैं और हमें जाना कहॉ है? रास्ते में समुद्र का दृश्य भी कम लुभावना नहीं था.सफर सात घंटे का था. उस लैपटॉप पर हम फिल्म भी देख सकते थे,गाना सुन सकते थे और गेम भी खेल सकते थे किंतु मुझे समुंदर में अपने लक्ष्य की ओर धीरे-धीरे खिसकते हुए बढने में ही मज़ा आ रहा था. मैं निरंतर उसी को देखती रही और आराम से सीट पीछे करके बैठी रही. मॉरीशस एअर ने हमें जलपान करवाया. उन्होंने कई बार कॉफी भी पिलाई.हम उनसे बार-बार पानी मॉगकर उन्हें परेशान करते रहे पर उन्होंने हर बार बहुत प्यार से न केवल पानी परोसा अपितु हर बार हमारा अभिनंदन भी किया.लारी भाई ने मेरी प्लेट के लिए जैन लिखवा दिया था,इसका बडा प्रभाव पडा.उन लोग सबसे पहले मेरी प्लेट ला कर दे रहे थे,उसके बाद शाकाहारियों को और बाद में किसी और को परोस रहे थे. मेरे पास ही संध्या बैठी थी.वह मेरी प्लेट को ध्यान से देखती थी और कहती थी-" शकुन दीदी,मुझे पनीर नहीं दिया",मैं चुपचाप मुस्कुरा देती थी. अचानक 3.00बजे दोपहर को हमसे कहा गया-" कृपया अपना सीट-बेल्ट बॉध लें,हम पोर्टलुईस पहुँच चुके हैं
.

थोडी ही देर में हम पोर्ट लुईस के सर शिवसागर रामगुलाम एअरपोर्ट पर पहुँच गए. वहॉ पर अ.भा.क.स.की टीम हमारे स्वागत में हमारे लिए गाडी लेकर आई है, उन्होंने मोतियों की माला पहना कर हमारा स्वागत किया फिर हम उनकी गाडी में बैठ गए. गाडी में एक गाइड भी है,जिसका नाम वरुणा है,वह एक-एक दृश्य को बारीक़ी से समझाती है,सबसे पहले हम " कासा फ्लोरिडा" हॉटेल गए,वहॉ हमने डिनर और विश्राम किया.

13 जून 2016
सुबह जलपान के तुरंत बाद हमारी गाडी आ गई, हम सब बैठ गए और हम मॉरीशस के वनस्पति-उद्यान की ओर भ्रमण के लिए निकल गए. वहॉ की मनोहारी छ्टा देख कर हम अभिभूत हो गए. हमने फोटोग्राफी भी की.हमारी गाइड वरुणा हमें वनस्पति विशेष के गुण-दोषों से रूबरू कराती रही.फिर नमस्ते रेस्टोरेण्ट में हमने लंच किया और प्रधानमंत्री आवास की ओर निकल गए क्योंकि प्रधानमंत्री जी से हमें मिलना था, प्रधानमंत्री जी ने हमसे बातचीत की और हम सबका अभिनंदन किया. हमने उन्हें अपनी किताबें भेंट की. वहॉ से निकल कर हम एक मॉल में घूमने चले गए और फिर उसी मॉल से नीचे उतर कर एक सुंदर जगह थी जिसका नाम लभ पॉइण्ट था वहॉ गए . वहॉ हमने फोटोग्राफी की. हमने वहॉ शॉपिंग भी की. हमें बहुत मज़ा आया. शाम को हमने अपने हॉटेल में डिनर किया और विश्राम किया.

14 जून 2016
आज हम जलपान के पश्चात शिप मॉडल फैक्ट्री देखने जा रहे हैं. यहॉ हर कारीगर बडी लगन से अपना काम कर रहा है. यह कारखाना बहुत आकर्षक है. अब हम यहॉ से निकल कर चमरेल जलप्रपात देखने जा रहे हैं.इस प्रपात में दो धारायें हैं.यहॉ हमने फोटोग्राफी कर ली है और अब हम गंगा तालाब की ओर बढ रहे हैं. आज से लगभग 150 वर्ष पूर्व अंग्रेज, हमारे भोले-भाले पूर्वजों को-" तुम पत्थर ढोना और हम तुम्हें सोना देंगे" कहकर बुला लेते थे और कभी जाने नहीं दिए. कलकत्ते के कुली-घाट से लोग यहॉ आते तो थे तो अपने साथ गंगा-जल लेकर आते थे और इसी तालाब पर चढा देते थे, इस तरह इसका नाम गंगा तालाब पड गया. यहॉ शिवरात्रि में बडा महोत्सव होता है. तालाब के बीचों-बीच शिवजी की बहुत बडी मूर्ति है.अभी रूबेन रेस्टोरेण्ट में भोजन करके अब हम सतरंगी भूमि की ओर बढ रहे हैं.

15 जून 2016
आज हम समुद्र तट पर हैं.यह बहुत आकर्षक है,मनोहारी है. हमने यहॉ तरह-तरह की बोटिंग की,फोटोग्राफी की . बहुत मज़ा आया. अरे लंच-टाइम हो गया.चलिए सीमांस रेस्टोरेण्ट में लंच करते हैं.अब यहॉ से हम शॉपिंग करते हुए अपने हॉटेल पहुँच गए हैं. अभी हम विश्राम करके " गोपीओ" महेन उच्चाना जी के कार्यक्रम में जा रहे हैं. वहॉ हमें भारतीय दूतावास के विनोद मिश्र जी मिले, उन्होंने हमसे बातचीत भी की.मैंने वहॉ काव्यपाठ किया,सभी ने ध्यान से सुना और सराहा भी, मुझे बहुत अच्छा लगा.वहॉ हमारी मुलाकात सरिता बुधु दीदी से हुई,वे वहॉ भोजपुरी की अध्यक्षा हैं.हमने वहॉ डिनर भी किया और फिर अपने हॉटेल में लौट आए.

16 जून 2016
आज हमारी ओर से एक कार्यक्रम हो रहा है जिसके मुख्य अतिथि हैं-मॉरीशस के उप-राष्ट्रपति परमा शिवम पिल्लई व्यापुरी.साथ में महेन उच्चाना, देविका भाभी, सरिता दीदी और विनोद मिश्र जी भी आए हैं.कुलगीत से हमारे कार्यक्रम का आरंभ हुआ.कुलगीत गाने का दायित्व मुझे मिला था. मेरे साथ करुणा,मधुलिका और मीना भी थी. इसके बाद अ.भा.क.स.के संस्थापक डा. लारी आज़ाद ने अतिथियों को अ.भा.क.स.के उद्देश्य का उल्लेख किया-1-नारी सशक्तीकरण 2- भाषाई सौहार्द्र- राष्ट्रीय - एकता 3- सम्पूर्ण विश्व में शांति का संदेश.मुख्य अतिथि ने मुझे " The Pride Of India "से सम्मानित किया.मॉरीशस में मुझे " मिस हैट्रिक " का सम्मान भी मिला. यह मेरे लिए अभूतपूर्व अनुभव  है.अब हम अतिथियों के साथ लंच करने जा रहे हैं,लंच के तुर्ंत बाद हमें एअरपोर्ट की ओर रवाना होना है. हमने पैकिंग की और अपना बैग लेकर बस में आकर बैठ गए हैं. अभी हम " अप्रवासी घाट " जा रहे हैं, यह जगह मुझे अंडमान के सेल्यूलर जेल जैसी लग रही है. ऑखों में ऑसू लेकर हम अपने वतन की ओर लौट रहे हैं.अलविदा मॉरीशस बहुत याद आओगे.
शकुन्तला शर्मा, भिलाई,छत्तीसगढ       

Sunday, 22 May 2016

गुरु दक्षिणा

                      [  कहानी ]
मैं और सुकवारा दोनों संगवारी, कोसला के प्राथमिक शाला में पहली से पॉचवीं तक साथ - साथ पढा करते थे
मेरी सहेली सुकवारा का घर गॉव के बाहर तालाब के किनारे बना हुआ था. उसके पिता चमडे का जूता बनाते थे और वही उनके परिवार की आमदनी का जरिया था. मुझे सुकवारा अच्छी लगती थी.वह कई खेलों में मुझे हरा कर ईनाम जीत लेती थी. जैसे घडा- दौड, कबड्डी, सुई-धागा दौड में उसका कोई सानी नहीं था. घडा-दौड में तो वह 'पामगढ' जाकर भी ईनाम लेकर आती थी. कबड्डी में मुझे हमेशा पकड लेती थी, मैं कभी भी उसे न पकड सकी. मदरसे में हम दोनों पास-पास ही बैठते थे पर हमारे गुरुजी को यह बात अच्छी नहीं लगती थी इसीलिए हम गुरुजी के सामने दूर-दूर रहते थे पर न जाने कैसे गुरुजी हमारी हर बात को बिना बताए जान जाते थे. उसके और मेरे घर का रास्ता भी ऐसा था कि मेरे घर के बाद उसका घर पडता था. मेरे नाना - नानी कभी भी मुझे सुकवारा के साथ खेलने - कूदने के लिए मना नहीं करते थे पर घर के नौकर- चाकर को इससे बडी तकलीफ होती थी. कारण तो वही जानें पर हम बिना किसी की परवाह किए साथ-साथ खेलते-कूदते,हँसी-खुशी जी रहे थे.

स्कूल में एक गुरुजी, सुकवारा को बहुत डॉटते थे और बुरा-भला कहते रहते थे. इमला में गलती होने पर कहते थे- ' पढाई तेरे बस की बात नहीं है सुकवारा ! तुम चुपचाप अपने घर में बैठो और गोबर सैंतो.' उसकी ऑखें छलछला जाती थीं और वह मेरी ओर देखती थी फिर मैं गुरुजी से पूछती थी-' गुरुजी ! सुकवारा क्यों नहीं पढ सकती ? जब मैं पढ सकती हूँ तो सुकवारा क्यों नहीं पढ सकती ?' गुरुजी मुझे गुर्रा कर देखते थे किसी गुरुजी ने मुझ पर कभी हाथ नहीं उठाया क्योंकि सभी गुरुजी मुझे 'भॉची' मानते थे.

हम पॉचवीं कक्षा में पहुँच गए थे. परीक्षा पास आ गई थी, बडे गुरुजी अपने घर के सामने बुला कर, पॉचवीं के सभी बच्चों को पढाते थे. किसी ने सुकवारा से कह दिया- ' सुकवारा ! तुम मत आना.' सुकवारा को बहुत खराब लगा, उसने मुझे बताया, मैं सुकवारा का हाथ पकड कर बडे-गुरुजी होरीलाल के पास गई और उन्हें पूरी बात बता दी. बडे गुरुजी ने मझसे कहा- ' अच्छा किया जो तुमने मुझे बता दिया.' उन्होंने सुकवारा के सिर पर हाथ रख कर कहा-' बेटी! तुम कभी किसी से मत डरना. मैं तुम्हारे साथ हूँ. तुम भी सब बच्चों के साथ मेरे घर पर पढने के लिए आना.'

उस दिन के बाद सुकवारा के भी पंख निकल आए. हम दोनों बहुत मस्ती करते साथ-साथ पढाई में भी ध्यान देने लगे. पॉचवीं में हम दोनों के अच्छे नम्बर आए.सुकवारा ने 11वीं पास की और वह शिक्षिका बन गई. साथ-साथ प्रायवेट परीक्षा देती रही- बी.ए.कर ली एम.ए. कर ली. बी. एड. कर ली.धीरे-धीरे प्रमोशन भी होता रहा. अभी वह हिन्दी की व्याख्याता है.

एक दिन एक बुज़ुर्ग उसके पास आए, उनकी ऑखों में ऑसूँ थे, सुकवारा ने उनसे पूछा-' आप रो क्यों रहे हैं ? ' तो उन्होंने बताया- ' मेरा बेटा किशोर दसवीं में दो साल से फेल हो रहा है. पढाई में ध्यान ही नहीं देता, आप ही बताइए मैं क्या करू ?' वह फूट-फूट कर रोने लगा.' सुकवारा ने कहा- ' किशोर तो मेरी ही क्लास में पढता है, मैं उसकी क्लास टीचर हूँ, रुकिए मैं उसे बुलवाती हूँ.' किशोर आया तो सुकवारा ने उसे समझाया- ' देखो किशोर ! तुम्हारे लिए तुम्हारे पापा कितने परेशान हैं, तुम मन लगा कर पढाई करो और 60% से ज्यादा नम्बर लाकर दिखाओ.' ' यस मैम' कह कर किशोर ने सुकवारा के पॉव छुए और क्लास में चला गया.

सुकवारा को लगा कि यह चेहरा कुछ परिचित लग रहा है और जब उसने किशोर के पिता का नाम देखा तो पता चला कि यह तो वही गुरुजी हैं जो हमेशा उसका अपमान किया करते थे. फिर क्या था सुकवारा ने उस किशोर का ऐसा ध्यान रखा जैसे कोई अपने सगे भाई का ध्यान रखता है.देखते ही देखते एक साल बीत गया और इस बार किशोर ने सुकवारा को निराश नहीं किया, वह केवल अपने स्कूल में ही नहीं अपितु पूरे पामगढ में अव्वल आया है ।                          


Monday, 11 January 2016

भूमिका

      बेटी बचाओ

" बेटी बचाओ "  नारा देश को संयमित - संतुलित करने का संदेश सम्प्रेषित करता है । अजन्मी - बेटी को दुनियॉ देखने के पूर्व मार डालना,जघन्य हत्या तो है ही, सामन्ती सोच की शोषण - वृत्ति और रूढिग्रस्त पारम्परिक प्रवृत्ति का पोषण भी है जो प्रकारांतर में पुरुषवादी समाज के अहं की तुष्टि का कुत्सित स्वरूप दिग्दर्शित करता है । जन्म लेते ही बेटे और बेटी में अंतर निर्दिष्ट करना और जीवन पर्यन्त इस भेद को बनाए - बढाए रखना निम्न - निकृष्ट व सीमित - संकुचित दृष्टि का प्रतिफलन है जो अद्य - पर्यन्त अक्षुण्ण है । शिक्षा - शास्त्री और मनोवैज्ञानिक इस विषय को वैचारिक वितान विनिर्मित कर विवेचित विश्लेषित करते हैं जबकि एक कवि संवेदना से संपृक्त कर इस तरह प्रस्तुत करता है कि वह सीधा मर्म को स्पर्श करता है । ' बेटी ' वह भी यदि विकलॉग हो तो भावना की छलॉग कविता में, आख्यानकता का आश्रय ढूँढती है और यदि लेखनी कवयित्री की हो तो 'सोने में सुहागा ' का मुहावरा मूर्त्त हो जाता है ।

एक महिला साहित्यकार के रूप में शकुन्तला शर्मा देश - विदेश में छत्तीसगढ का नाम रोशन कर रही हैं । इनकी रचनाओं में इक्कीसवीं सदी के नव्य स्पर्श  "विकलॉग - विमर्श  " का  वृत्त विनिर्मित करने का उद्यम उपस्थित है । छत्तीसगढी की विकलॉग -विमर्ष-विषयक लघु-कथाओं का संग्रह  "करगा" इनकी चर्चित कृति है और अब इसके बाद  "बेटी बचाओ " शीर्षक  से विकलॉग विमर्श के आख्यानक गीतों का संग्रह प्रस्तुत हो जाना महत्वपूर्ण घटना का सूत्रपात ही कहा जाएगा। कवयित्री की घुमक्कड-वृत्ति और अकादमिक, साहित्यिक,सामाजिक  संस्थाओं  के  आमंत्रण पर सहर्ष उपस्थित होने की प्रवृत्ति ने उन्हें अनुभव का जो व्यापक धरातल दिया उससे उनके विषय को भी असीम आकाश मिला । " जिन खोजा तिन पाइयॉ " के अनुरूप रुचि -प्रवृत्ति की नींव " जहॉ चाह वहॉ राह "  के भवन को आकार देती है तदनुरूप शकुन्तला शर्मा जो देखना चाह रही हैं, वह दृश्य उनके समक्ष प्रस्तुत हो जाता है । आसपास से लेकर प्रदेश और देश - विदेश - पर्यन्त   उन्हें जितने भी विकलॉग मिले उन्होंने उनके जीवन को जाँचकर और आदमियत को ऑक कर आख्यानक गीतों का जो ताना - बाना रचा, वह हिन्दी काव्य - जगत के लिए भी नयी भाव - भूमि प्रदान करती है । उन्होंने संग्रहीत इंक्यावन विकलॉगजन्य आख्यानक गीत लिखकर विकलॉगों का जो जीवन -दर्शन प्रस्तुत किया वह अनुपम - अद्भुत है । इन कथा - गीतों में कहीं भी विकलॉग - जन, दया या कृपा के पात्र नहीं हैं । वे सभी आत्मबल के पथ से, आत्मनिर्भरता का गन्तव्य ही प्राप्त नहीं करते अपितु उत्कट - जिजीविषा के जज़्बे को  अक्षुण्ण रखकर उत्कर्ष को स्पर्श कर लेने का माद्दा भी रखते हैं । वे सकलॉगों की तरह न शार्टकट का सहारा लेते हैं न और न ही बेईमानी और भ्रष्टाचार की सीढी से आगे बढने का तिकडम करते हैं । सत्कर्म से सद्गति को सिद्ध करने और प्रतिभा तथा मेधा के आश्रय से, गतिमान होने के लिए वे साधनामय कर्मठ को लक्ष्य बनाते हैं । अंग विशेष की अल्पता या शिथिलता के कारण, प्रकृति ने इन्हें जो अतिरिक्त शक्ति - क्षमता प्रदान की है,उसे सक्रिय करके वे जटिल - जीवन को विरल तथा प्रतिकूल स्थिति को अनुकूल बना लेने में सिद्ध - हस्त होते हैं । ऐसे चरित्रों को खोजकर, प्रसंगों तथा घटनाओं को उकेर कर, आख्यान के रूप में अधिष्ठित कर, संवेदना के सॉचे में ढालकर, काव्य के रूप में, अभिव्यक्त कर देना सरल कार्य नहीं है । यह शकुन्तला शर्मा जैसी सिद्ध कवयित्री से ही सम्भव है ।

विकलॉग को सहानुभूति नहीं,समानुभूति चाहिए जो कवयित्री के मन में भरी हुई है -

' सरगुजा में एक संगवारी है पर उसके नहीं हैं दोनों हाथ ।
वैसे तो हम दूर - दूर हैं पर मन से रहते हैं साथ - साथ ॥ '

निशक्त निर्विवाद रूप से अशक्त नहीं,सशक्त हैं जो अपनी प्रतिभा का लाभ समाज को समर्पित कर देते हैं -

' जिसको क़मज़ोर समझते थे वह धुरी पडी सब पर भारी ।
उससे साक्षात्कार हो गया यह भी है तकदीर हमारी ॥
वह दुनियॉ - भर में जानी जाती औषधि अन्वेषण करती है
नवजीवन जग को देती है सञ्जीवनी रग में भरती है ॥'

विकलॉगों की कर्मठता, ईमानदारी सच्चरित्रता, उदारता, कृतज्ञता आदि नानाविध दिव्य - गुणों को अनावृत्त करके कवयित्री ने उनके साथ जो संलग्नता और अंतरंगता दिखलाई है, यही विकलॉग - विमर्श का गन्तव्य - मन्तव्य है । उल्लेखनीय है कि सामान्य सी चोट या चुभन हमारा धीरज छीन लेती है परिणामतः हम उपचार और आराम करते हैं, जबकि एक अंग की अनुपस्थिति के बाद भी विकलॉग - जन अपने कार्य को कुशलता पूर्वक अर्थात् सहर्ष सम्पादित कर लेते हैं -
' छोटी सी चोट से हम चिल्लाते लेते नहीं धैर्य से काम
कुछ भी काम नहीं कर पाते करते हैं दिन भर आराम ।
पर बिना हाथ की होकर भी वह पैरों से करती है काम
जिजीविषा उसकी प्रणम्य है करती हूँ मैं उसे प्रणाम ॥'

विकलॉगों के मन में परोपकारिता व पर दुख कातरता है, वह सहज रूप से सकलॉगों में सम्भव नहीं है -
' वाणी - वैभव से वञ्चित बुधिया इतना सब कुछ करती है
आओ उससे जाकर पूछें वह मन में क्या गुनती रहती है ।
उसने लिख कर मुझे बताया यह जीवन है पर - उपकार
परोपकार में सच्चा सुख है यह ही है जीवन का आधार ॥'

विकलॉग पुष्पा सी. बी. आई. में अधिकारी है, जिसने डाकुओं से, रेल - यात्रियों को बचा कर स्फूर्ति - साहस और विवेक - युक्ति का जो करतब दिखाया, वह सन्तुलन - कुशलता व प्रबन्धन - पटुता सचमुच प्रणम्य है -'उस दिन पुष्पा ने मुझे बचाया मुझ पर है उसका एहसान
एक - हाथ वाली लडकी पर अब मुझको भी है अभिमान ।
त्वरित सोच से ही दिखलाया अद्भुत अनुपम आस अदम्य
पराक्रमी  है  मेरी  पुष्पा  वह  हस्ताक्षर  है  एक  प्रणम्य । '
विकलॉग किसी के आश्रय का मोहताज़ नहीं होना चाहता । वह अपना रास्ता बनाने और उस पर स्वतः प्रस्थित होने का पक्षपाती है -
' मदद किसी की लिए बिना ही देखो उसके उच्च - विचार
अपना काम स्वयं करती  है नहीं किसी पर  है वह भार ।'
एक ही भाव - भूमि पर रचित कविताओं में पुनरुक्ति का प्रश्रय सहज है लेकिन यह दोष के रूप में नहीं, अपितु विभिन्न - प्रसंगों में उसे पुष्ट करने की दृष्टि से प्रयुक्त है । इसी तरह लोक - कथाओं के  'लोक - अभिप्राय ' की तरह वर्णन - साम्य [ पुनरुक्ति - प्रयोग ]  काव्य को दुर्बल नहीं प्रत्युत सबल - समर्थ बनाने का संयोजन सिद्ध हुआ है -
' रात के पीछे  दिन आता  है दिन  के पीछे आती रात
एक एक दिन करते करते बीत गई कितनी बरसात ।'

भाषा पर कवयित्री का जबर्दस्त अधिकार है । सरल - सहज होते हुए भी इनकी भाषा सरल - सुबोध है । अरबी - फारसी और अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्दों के समाहार और यथावसर यत्किंचित् ऑचलिकता के व्यवहार से भाषा, भावों - विचारों को सम्प्रेषित कर पाने में सक्षम - समर्थ है । अलंकार भावोत्कर्ष में सहायक और छ्न्द, भावों के विधायक रूप में अलंकृत है । इस अभिनव कृति से यदि पाठकों को नयी दशा व दिशा की ओर मंथन करने का सुअवसर प्राप्त हुआ तो यह इस कृति के प्रकाशन की सार्थकता होगी । शुभ कामनाओं सहित -
सी- 62, अज्ञेय नगर ,                                                          डा. विनय कुमार पाठक
बिलासपुर छ्त्तीसगढ                                                     एम. ए., पी. एच. डी., डी. लिट् [ हिन्दी ] 
मो- 092298 79898                                                      पी. एच. डी., डी. लिट् [ भाषा विज्ञान ]
                                                                                         निदेशक प्रयास प्रकाशन

Wednesday, 2 December 2015

कंस

                    कहानी


नीलू बहुत अच्छी लडकी है । पास - पडोस के सभी लोग उसे बहुत पसन्द करते हैं. वह हमेशा खुश रहती है पर आज वह बहुत खुश है आज उसे उसकी पहली पगार मिली है. वह अपने लिए जेवर खरीदने जा रही है,अपनी शादी की तैयारी कर रही है. वह सोचती है-' मेरी मॉ बिचारी कितना करेगी ?' नीलू के पिता नहीं हैं,पिछले साल दिवंगत हो गए. एक बडा भाई है जो नौकरी करने जाता है और रोज नशे में लडखडाते हुए घर पहुँचता है, उसका नाम किसन है. उसकी शादी हो गई है पर उसकी बीबी अक्सर अपने मायके में ही रहती है. बात भी सही है, जो दिन-रात नशे में रहता हो,अपनी पत्नी को बहन को मारता-पीटता हो उसे कौन पसन्द करेगा ? पत्नी बेचारी भी तो किसी की बेटी है, उसे भी तो शौक लगता होगा कि उसका पति सभ्यता से रहे,कभी-कभी उसे भी घुमाने-फिराने लेकर जाए और सबसे बडी बात अपनी बीबी-बच्चे का ध्यान रखे.

आज नीलु अपने लिए करधन खरीद कर लाई है. अपनी पेटी में रख कर ताला लगा ही रही थी कि उसके भाई ने कहा-' नीलू! इधर आ- देख मैं मछली लाया हूँ,इसको तुरन्त मेरे लिए सब्जी बना दे.' नीलू उस दिन उपवास रखी थी, उसने कहा-' भैया ! आज मेरा उपवास है, मैं आज मछली की सब्ज़ी नहीं बना सकती. मैं तुलसी-चौंरा में दिया बारने जा रही हूँ.'

' देख नीलू ! तू ज्यादा नाटक मत कर, समझी न ! मुझे अभी तुरन्त मछली और भात खाना है, तू अभी इसी वक्त मुझे मछली की सब्ज़ी बना कर दे, वर्ना मैं तुलसी-चौंरा के सामने तुझे जला दूँगा,समझी ?' नीलू ने फिर कहा- 'समझने की कोशिश कर भैया ! आज मेरा उपवास है. तुम क्यों मुझे परेशान कर रहे हो ? आज मैं मछली को हाथ भी नहीं लगाऊँगी, भाभी से रोज-रोज इतना लडते हो,इसीलिए तो वह तुम्हारे साथ रहना पसन्द नहीं करती, मायके चली जाती है. तुम लोग तो अलग रहते हो न! तुम्हारा किचन तो अलग है फिर मुझे क्यों परेशान करते हो ? खुद बना कर खा लो, तुम्हें किसने मना किया है ?'

नीलू की बात सुन कर किसन गुस्से से पागल हो गया और अपनी सगी छोटी-बहन को दौडा-दौडा कर इतना मारा कि वह लहुलुहान हो गई और फिर उसको उठा कर अपने कमरे की ओर ले गया. घंटे भर बाद मोहल्ले में खबर फैल गई कि- नीलू ने आत्महत्या करने की कोशिश की और वह बुरी तरह झुलस गई है. उसके पडोसी  उसे अस्पताल में भर्ती करके आए हैं, तभी पुलिस इन्सपैक्टर भी नीलू का बयान लेने के लिए वहॉ पहुँच गए. डॉक्टर की टीम ने नीलू का उपचार किया पर उन्होंने इन्सपैक्टर से कहा-' इसके बचने की उम्मीद नहीं के बराबर है, आप चाहें तो लडकी का बयान ले सकते हैं.'

नीलू ने अपने बयान में कहा - ' मेरे घरवालों का कोई दोष नहीं है,मैं अपनी मर्जी से आत्महत्या कर रही हूँ.इस घटना की जिम्मेदार मैं खुद हूँ,'

इतना कहते ही नीलू ने दम तोड दिया. दूसरे दिन जब मैं नीलू के घर गई तो उसकी मॉ का रो-रो कर बुरा हाल था. उसने मुझे देखते ही ज़ोर से पकड लिया और बताया-' वोकर कंस भाई हर वोला, नाक-कान के फूटत ले, मोर आघू म मारिस हे बहिनी ! पटक-पटक के मारिस फेर वोला उठा के सुन्ना-कुरिया म ले गे अऊ माटी-तेल डार के  भूँज डारिस. ए दे देख न वोकर पेटी ल !' जैसे ही उस संदूक पर मेरी नज़र पडी,उसका चॉदी का करधन चमक रहा था और एक हरे रंग की नई कमीज़ रखी हुई थी क्योंकि उसके भाई का आज जन्म-दिन है.                                     

Tuesday, 20 October 2015

गंगा से वोल्गा तक

'ऑल इन्डिया पोएटेस कान्फ्रेंस' एक ऐसी संस्था है जो बहनों के सर्वांगीण विकास के लिए कटिबद्ध है. इस संस्था के माध्यम से हमारी प्रतिभा को अनन्त आकाश मिलता है और हमें प्रेरित प्रोत्साहित करने के लिए हमारी अध्यक्षा डॉ रोशन आरा हमेशा हमारे साथ होती हैं. विविध प्रदेशों से पहुँचने वाली विभिन्न बहनें, विविध नदियों की तरह ए. आई. पी. सी. के सागर में समा जाती हैं और स्वयं समुद्र बन जाती है, ए. आई. पी. सी. में रच-बस जाती है.

25 / 09 / 2015
2015 में हम रूस की यात्रा पर निकल रहे हैं. हमें इन्दिरा गॉधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा दिल्ली में 10 बजे रात तक पहुँचना है और 11. 30 को चेक इन करना है. इस बार छत्तीसगढ से हम चार बहनें रूस घूमने जा रही हैं- आशा लता नायडू, चन्द्रावती नागेश्वर, मधूलिका अग्रवाल और मैं पर आशा दीदी आज कल मुँबई में रहती हैं तो वे हमें दिल्ली एअरपोर्ट पर मिलेंगी. अब मैं चन्द्रा और मधु, गोंडवाना से ए सी 3 में बैठ कर दिल्ली जारहे हैं. हमारे सामने के बर्थ पर हमारे जगदलपुर के भदौरिया दम्पत्ति विराजमान हैं और उनसे हमारी दोस्ती भी हो गई है. हँसते-गाते, खाते-पीते कब भोपाल आ गया हमें पता ही नहीं चला. भोपाल में मेरी बेटी आस्था मुझसे मिलने आई है वस्तुतः मिलने के बहाने वह मेरे पसन्द की खाने-पीने की चीज़ें लेकर आई है. हम तीनों के लिए कॉफी लाई है, पर हम सभी ने कॉफी बॉट कर पी, मूँगफली खाई और हँसते-गाते हमने अपना सफर तय किया. निजामुद्दीन में हम उतर गए
.

26 / 09 / 2015
हम तीनों छत्तीसगढ सदन की ओर जा रहे हैं. यहॉ हमने दिन भर के लिए एक कमरा ले लिया है. हम आराम से नहाए धोए फिर मधु और चन्द्रा ने कैंटीन से खाना मँगवा लिया पर मैं घर से जो पराठा और करेले की सब्ज़ी ले गई थी उसी को खाई. दोपहर को हम शॉपिंग के लिए निकल गए, नागेश्वर को मफलर चाहिए था पर मफलर कहीं नहीं मिला. हम लोग घूम- घाम कर आ गए. थोडी देर आराम किए फिर उन दोनों ने डिनर मँगाया और मैंने वही घर का खाना खाया. काउन्टर में फोन करके हमने टैक्सी मँगाई और रात को आठ बजे एरोड्रम की ओर निकल गए, वहॉ हमें टर्मिनल-5 में एकत्र होना है. हम वहॉ पहुँचकर इतमिनान से बैठ गए. बहनें आती रहीं गप-शप चलता रहा और फिर आशा दीदी का फोन आया-'शकुन! तू कहॉ है ? मैं टर्मिनल 4 के पास खडी हूँ.' मैं आशा दीदी को लेने गई तो दंग रह गई. दीदी इतना सामान लेकर आई हैं, हे भगवान ! कैसे ढोएंगी ? अभी तो मैं ढो रही हूँ पर...मैंने दीदी से पूछा तो वे बोलीं- ' उठा लूँगी रे ! तू चिन्ता मत कर. आशा दीदी घर कुछ-कुछ बना कर लाई थीं उसे हम सब खाए और जब पूरी टीम इकट्ठी हो गई तो भैया ने कहा- ' चलो ! कतार बना लो, चेक इन करना है' आगे-आगे भैया-भाभी और पीछे-पीछे हम सभी कतार से चलते रहे, औपचारिकतायें पूरी करते रहे फिर अरब-अरेबिया के प्लेन पर बैठ गए.

27/ 09 / 2015
 हमारा प्लेन 4 .10 को सुबह उडा और हमें लगभग 4 - 5 घंटे में शारज़ाह पहुँचा दिया. शारज़ाह में हमने हाथ - मुँह धोकर चाय पी, ब्रेकफास्ट किया और फिर अरब अरेबिया से मास्को के लिए रवाना हो गए. जब हम मास्को पहुँचे तो शाम हो रही थी और मास्को के समय के अनुसार मेरी घडी में शाम के 5.30 बजे थे. मास्को में बोर्डिंग के समय बहुत वक़्त लग गया और इसी चक्कर में शाम को सर्कस देखने का हमारा अभियान फेल हो गया जबकि हमारी टिकट हो चुकी थी फिर भी हम वहॉ के नायाब सर्कस को नहीं देख पाए इसका अफसोस है पर यात्रा के दौरान तो इस तरह की घटनायें होती रहती हैं तो ' बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लेइ' की राह पर आगे बढते हैं.मास्को में हमारी गाइड श्वेता श्वेतलाना,हमारे लिए गाडी लेकर हमें रिसीव करने आई है. श्वेता गज़ब की सुन्दर है, मुस्कुराता हुआ चेहरा, अपने कार्य के प्रति उसका समर्पण, प्रणम्य है. हम मास्को सिटी की ओर बढ रहे हैं और हमारे भैया हमें बता रहे हैं कि-' देखो ! यह 'मास्कवा' नदी है, इसी के नाम पर इस शहर का नाम ' मास्को' पडा, उन्होंने हमें 'वोल्गा' नदी से रूबरू करवाया और बतलाया कि यह 'गंगा' जैसी महत्वपूर्ण नदी है और यह भी बताया कि क्रेमलिन जैसा सुन्दर राजमहल कहीं नहीं है. हमारे संस्थापक डॉ लारी आज़ाद इतिहास के प्राध्यापक हैं और अपनी विभिन्न गतिविधियों द्वारा सम्पूर्ण विश्व में जाने जाते हैं. वे हमें इतिहास की घटनाओं को बडी दिलचस्पी से लगातार बताते जाते हैं और मैं सभी घटनाओं को लिखना चाहती हूँ पर बीच-बीच में छूट जाता है, मुझे इतिहास और भूगोल की तनिक़ भी जानकारी नहीं है कि मैं घटनाओं को आपस में जोड सकूँ. काश ! मैं भैया के एक-एक शब्द को लिख पाती तो मेरा ब्लॉग कितना भव्य बन जाता.अब हम डिनर के लिए जा रहे हैं. रेस्टोरेंट का नाम है -'तन्दूरी नाइट'. यह एक भारतीय रेस्टोरेंट है. यहॉ हमने भोजन किया और फिर अपने हॉटेल ' मास्को अज़िमत ओलम्पिक' में जाकर आराम किया. यह एक चार सितारा हॉटेल है,बहुत सुन्दर और साफ-सुथरा है. हम बहुत थके हुए थे, ठंड बहुत थी. अधिकतम-16' c और न्यूनतम 3'c.आशा दीदी मेरे साथ हैं,हमें 11वें माले में रूम मिला है, बहुत ही साफ-सुथरा,आराम-दायक बिस्तर है. मन प्रसन्न हो गया, हमें अच्छी नींद आई
.

28 / 09 / 2015
हम सुबह उठे तो बारिश हो रही थी. जब हम नहा-धोकर जलपान के लिए पहुँचे तो हमने देखा कि सैकडों तरह की चीज़ें वहॉ विद्यमान हैं, मुझे समझ में ही नहीं आया कि मैं क्या खाऊँ ? मैं सूखे मेवे की ओर गई और अखरोट,बादाम,किसमिस और एक गोल-गोल कुछ था, जिसका स्वाद चिरौंजी जैसा था,उसे लेकर आई, दो केले और एक सेब खाई,मेरा पेट भर गया, खाने में मज़ा भी आया.अब हम घूमने जा रहे हैं जिधर नज़र जाती है वहॉ से उठती नहीं है. साफ-सुथरी सडकें हरे-भरे बागों ने हमारा ऑचल पकड लिया. अभी दोपहर के दो बजे हैं,अब हम लंच के लिए 'स्लोथनिक हॉटेल' में जा रहे हैं.यह एक भारतीय रेस्टोरेंट है, हमने यहॉ भोजन किया खाना अच्छा था पर रोटी मैदे की थी. लंच के बाद हम म्युज़ियम देखने के लिए फिर निकल गए और फिर शाम को हॉटेल 'खजुराहो' में हमारा ए. आई. पी. सी. का कार्यक्रम था. भारतीय दूतावास के संस्कृति-विभाग के डिप्टी-डायरेक्टर श्री सञ्जय जैन हमसे मिलने आए थे और वहॉ की लायब्रेरियन डा. मिताली सरकार भी वहॉ उपस्थित थी. यह एक बहुत ही गरिमामय कार्यक्रम था. भैया ने हम सभी का परिचय श्री सञ्जय जैन जी से करवाया और फिर बहनों ने अपनी-अपनी किताबों का विमोचन करवाया.श्री सञ्जय जैन जी हम सबको भारतीय दूतावास में आमंत्रित करना चाहते थे, किन्तु हमें आज शाम को मास्को के मैट्रो में घूमना था. हम सबने डिनर किया और फिर मैट्रो की ओर चल पडे
.
मास्को के मैट्रो तक जब हम पहुँचे तो हम भौचक्के रह गए. मैट्रो की दीवारें इस तरह सजी हुई थीं मानो दीवाली हो. भव्य-दीवारें, अद्भुत-कला-कृतियॉ. मैट्रो तक पहुँचने के लिए हमने आधा-किलोमीटर स्कलेटर का सफर तय किया. हे भगवान ! मेरे भारत को भी ऐसा ही वैभव देना. हर क्षेत्र में मेरा भारत विश्व के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचे,तुझसे यही प्रार्थना है.

29 / 09 / 2015
आज हमें मास्को से सेंट पीटर्सबर्ग पहुँचना है. हमने यह तय किया है कि हम ट्रेन से सेंट पीटर्सबर्ग जायेंगे. हमने जलपान किया और फिर अपनी गाडी में बैठ कर मास्को के रेल्वे-स्टेशन पर पहुँच गए. हम वहॉ अपनी गाडी में अपनी सीट पर बैठ गए.ट्रेन में जब मैं वाश-रूम गई तो मैंने देखा वाश-रूम के भीतर एक सुन्दर सी लडकी खडी है मैंने संकोच-वश तुरन्त दरवाजा बन्द कर दिया. थोडी देर बाद जब मैंने फिर दरवाज़ा खोला तो वही सुन्दरी फिर दिखी, इस बार मैंने उस पर दृष्टि डाली तो पता चला कि वह दर्पण है. मैं बाहर आकर जब अपनी सहेलियों को यह बात बताई तो उन्होंने मेरी अच्छी मरम्मत की,कहा-' तू और सुन्दर ? कभी दर्पण में अपनी शकल देखी है ? ' मैंने कहा- ' हॉ, आज देखी हूँ.' और हम सभी हँसती हुई लोट-पोट हो गईं.
गोधूलि-वेला में हम सेंट-पीटर्सबर्ग पहुँचे. वहॉ हमारी दूसरी गाइड एना हमारे लिए कोच लेकर आई थी. हम सब उसी के पीछे कतार-बद्ध होकर चलते गए और अपनी गाडी पर जाकर बैठ गए. एक भारतीय रेस्टोरेंट जिसका नाम 'नमस्ते जी' है हम डिनर के लिए गए फिर अपने हॉटेल ' पार्क इन ' पहुँचकर विश्राम किए. मैं और आशा दीदी साथ-साथ हैं. हमें दसवें माले में रूम मिला है और हमारे रूम का नम्बर है-10012. सेंट पीटर्सबर्ग में हमने 'नेवा' नदी देखी जो आगे जाकर मास्कवा और वोल्गा नदी से मिल गई है और फिर मेरे होठों में यह गीत थिरकने लगा -
' ओहो रे ताल मिले नदी के जल में नदी मिले सागर में
सागर मिले कौन से जल में कोई जाने न ओहो रे ताल मिले


30 / 09 / 2015
सुबह ब्रेकफास्ट के तुरन्त बाद हम साइड-सीन के लिए निकल गए. हल्की-हल्की बारिश हो रही थी. किसी ने
रेनकोट पहना तो किसी ने छाता खोला पर हम पूरे दिन घूमते रहे. राजमहल देखने के बाद हमने यह अनुभव किया कि भैया ठीक कहते हैं- ' क्रेमलिन से ज्यादा सुन्दर राजमहल कहीं नहीं है. इसका सौंन्दर्य अद्भुत है. लुई 16वीं की बीबी 'मैरी ऑनलोवोस्की' का दृष्टान्त है-कि जब भूख से बौखलाई हुई जनता जब अपनी रानी को अपना दुखडा सुना रही थी कि-' हमारे पास खाने के लिए रोटी नहीं है.' तो उनकी रानी ने उनसे कहा-' तुम लोग केक क्यों नहीं खाते ?' अन्ततः भूखी जनता ने अपनी रानी को सरे आम फॉसी पर लटका दिया और फिर 1917 में ' लेनिनग्राद' बन गया,जहॉ से पूरी दुनियॉ में मार्क्सवाद फैला. 1992 में मिखाइल गोर्वाचोव के काल में रूस 50 टुकडों में बँट गया फिर भी सेंट पीटर्सबर्ग, रूस की सॉस्कृतिक राजधानी के रूप में उभरा और उसका जलवा आज भी बरक़रार है
.

1/ 10/ 2015
आज हम सब अपने-अपने प्रदेश के पारम्परिक परिधान में सजे-धजे बैठे हैं क्योंकि आज 9-रेड में सॉस्कृतिक मँच पर भारतीय दूतावास से भारत के राजदूत महामहिम अरुण कुमार शर्मा अपनी पत्नी श्रीमती पूनम शर्मा के साथ हमारे कार्यक्रम में शिरक़त करने आ रहे हैं. भैया ने महामहिम के साथ मेरा परिचय करवाया. दीप प्रज्ज्वलन के साथ हमारा कार्यक्रम आरम्भ हुआ. ' कुलगीत' गाने का दायित्व मुझ पर था. कुलगीत गाने में, मैत्रेयी, मधूलिका, आशा दीदी एवम् असम की बहनों का मुझे पूरा सहयोग मिला. 'कुलगीत' के पश्चात हमने कवितायें सुनाई और उन्होंने हमें " Minerva Of The East " सम्मान से अलंकृत किया.उन्हें विदा करते समय मैंने आदरणीया पूनम शर्मा जी से अनुरोध किया कि वे ए.आई.पी.सी. की मेम्बर बन जायें तो उन्होंने हॉ कहा है अब देखते हैं कि कब वे मेम्बर बनती हैं, मैंने उन्हें अपनी किताब " चाणक्य-नीति" भेंट की है जिसे उन्होंने मुस्कुराते हुए स्वीकार किया. उनके व्यवहार में एक अपनापन है जिससे हम सभी प्रभावित हुए

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जैसे ही सॉस्कृतिक कार्यक्रम समाप्त हुआ हम सब भाग कर अपने रूम में गए और चेंज करके ' नमस्ते जी' में लंच करने के बाद नेवा नदी में बोटिंग करने चले गए, इसके लिए हमने 700 रुबेल खर्च किए. हमें बोटिंग में बहुत मज़ा आया, हमने वहॉ बीहू डॉस किया, फोटोग्राफी की और पूरे समय हम मस्ती करते रहे.अविस्मरणीय'''''''''' बोटिंग के बाद हम डिनर के लिए फिर ' नमस्ते जी ' हॉटेल में गए और लौटते समय मैं अचानक सबसे अलग हो गई और रास्ता भटक गई. मैं बहुत आगे निकल गई, जब कोई भी नहीं दिखा तो मैं लौट कर उसी रास्ते पर वापस आई और 'नमस्ते जी' रेस्टोरेंट की ओर दुबारा जा रही थी तब हमारे साथियों ने मुझे देख लिया और पूछा-' कहॉ जा रही हो ?' मेरी जान में जान आई पर भैया को मुझ पर बहुत विश्वास था, उन्होंने कहा- ' कोई और होता तो मैं डरता पर मुझे शकुन्तला दीदी पर पूरा विश्वास है वे टैक्सी लेकर हॉटेल पहुँच जायेंगी', मैंने भैया को देखा तो ऑखों में ऑसूँ आ गए पर मैं 'हॉटेल अज़िमत' को याद करके रखी थी और ' ' पार्क इन ' का नाम याद ही नहीं आ रहा था, अब जाऊँ तो कहॉ जाऊँ ? अक्सर छोटी-छोटी बातों पर मेरी ऑखें भर आती हैं फिर गाहे ब गाहे कोई मुझसे पूछता हैं - ' तुम्हारी ऑखों में कितने सागर भरे हुए हैं ?' मैं कहती हूँ ' यह तो मैं नहीं जानती पर इतना जानती हूँ कि मैं जब आप सबसे विदा लूँगी तो मेरे चेहरे पर मुस्कान होगी और मैं चाहूँगी कि आप सब मुझे हँस कर विदा करें ।

2 / 10 / 2015
आज ' पार्क इन ' हॉटेल को भी विदा करना है. यह बहुत ही सुन्दर तीन सितारा हॉटेल है. अभी 10 बजे हैं. हमने जलपान कर लिया और हॉटेल के अन्दर ही शॉपिंग करने में लग गए हैं. हमें 11.00 बजे यहॉ से निकलना है. हम रूस के रेल - मार्ग से पुनः मास्को जाने के लिए रेल्वे-स्टेशन की ओर चल पडे हैं और अपनी गाइड एना से भी विदा ले रहे हैं' जैसे ही ट्रेन आई हमने अपना टिकट अपने हाथ में लिया और मास्को के लिए रवाना हो गए' मास्को में हमें एलोविना फिर से मिल गई वह हमारे लिए कोच लेकर आई थी, राह के अन्तिम पडाव में बहनों ने अपने-अपने विचार प्रकट किए और फिर भैया ने बताया कि हम 2016 में बाली और जकार्ता जा रहे हैं. हम एरोड्रम पहुँच गए हैं और चेक इन कर रहे हैं. सभी औपचारिकतायें पूरी करके हम अरब अरेबिया में बैठ गए हैं
.
 3 / 10 / 2015

इस विमान ने रशियन समय के अनुसार 4. 45 को हमें शारजाह पहुँचाया है. यहॉ हम हाथ-मुँह धोकर चाय-पानी पीकर पुनः एअर-अरेबिया के विमान पर सवार हो गए हैं और शाम को भारतीय समयानुसार हम 5.30 बजे इन्दिरा गॉधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पहुँच गए हैं. हमने जल्दी-जल्दी अपना-अपना सामान लिया और सबसे विदा लेते हुए अपने गन्तव्य की तलाश में निकल पडे- " जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी." मैं अचानक  ' चन्दन कस तोर माटी हे' का यह गीत गुनगुनाने लगी-
' आम लीम बर पीपर पहिरे छत्तीसगढ के सब्बो गॉव ।
नरवा- नदिया तीर म बइठे छत्तीसगढ के सब्बो गॉव ॥'