क्या आपको ऐसा लगता है कि 2 अक्टूबर 2019 में " नमामि - गङ्गे " प्रोजेक्ट सहित हमारा भारत, साफ - सुथरा हो जाएगा ? मुझे तो ऐसा दिख रहा है - कि 2019 क्या 2029 तक भी, हमारी गङ्गा और हमारा भारत, साफ - सुथरा नहीं हो सकता । अब आप ही बताइए कि हर वर्ष, "अनन्त - चतुर्दशी" में , दोनों नवरात्रि में, विश्वकर्मा - पूजा में और हर मनुष्य की अन्त्येष्टि में और हर वर्ष आश्विन कृष्ण - पक्ष के श्राध्द में , हम विभिन्न - वस्तुओं को , विसर्जित करते रहेंगे तो क्या कभी गङ्गा एवम् अन्य पवित्र नदियॉ , स्वच्छ हो पायेंगी ? धर्म - संकट यह है कि इनमें से , किसी भी विसर्जन को यदि आप रोकने की चेष्टा करेंगे तो जनता बौखला जाएगी । इस जनता रूपी भस्मासुर को भला कौन समझाए , जो कुछ समझने के लिए तैयार ही नहीं है । हमारे ढकोसले इतने हैं जो हमें बर्बाद करने के लिए पर्याप्त हैं , हमें दुश्मनों की क्या ज़रूरत है ?
मैंने अपने घर में किसी तरह,अपने बच्चों को यह समझा दिया है कि दीवाली में पटाखे फोडने की कोई ज़रूरत नहीं है पर पूरे हिन्दुस्तान के बच्चों को,उनके माता - पिता को कौन समझाए कि पटाखे फोडना सही नहीं है , इससे वातावरण में ज़हर घुल रहा है, इतना ही नहीं यह हमारे "ओज़ोन - परत " को भी बहुत नुकसान पहुँचा रहा है । भला पटाखे न जलाने की सीख हिन्दुस्तान को कौन देगा ?
"नमामि - गङ्गे " मिशन तभी क़ामयाब हो पाएगा जब भारत मानसिक - पूजा करेगा । वैसे भी पूजा में किसी वस्तु की , उपकरण की कभी कोई ज़रूरत नहीं होती । क्या हमारे देश की जनता , अध्यात्म के इस स्तर को समझ सकेगी ?
मुझे बरसों पहले की एक घटना याद आ रही है । मेरी बेटी "तूलिका" तीन बरस की थी । मैंने उससे पूछा - कि "बुआ क्या कर रही हैं ? " बच्ची ने अज़ीब सा चेहरा बना कर मुझे समझाया कि - " बुआ, भगवान को गुडिया बना कर खेल रही हैं ।" उस समय मेरे पास मेरी ननदें और मेरे जेठ जी की बेटियॉ भी बैठी हुई थीं, वे सब हँसने लगीं, पर मुझे इस घटना ने , बच्ची की बातों ने हिला - कर रख दिया । मेरे मन में प्रश्न उठा कि आखिर पूजा करते समय हम करते क्या हैं ?
मृत्यु के पश्चात दाह - संस्कार ऐसा हो, जिसमें अस्थियॉ भी जल जायें, मात्र राख शेष रहे जो अपनी जाति के साथ, आसानी से मिल जाए और खेतों में खाद की तरह, इसका उपयोग हो जाए । रावण , कुम्भकरण और मेघनाद को जलाने के लिए, राष्ट्रीय - सम्पत्ति का अपव्यय क्यों करें ? क्यों न हम अपने भीतर में बैठे, राक्षसों का वध, धीरे - धीरे करते रहें, उसे अपना सिर उठाने का कभी अवसर ही न दें तो वह स्वयमेव मर जाएगा ।
"युग निर्माण योजना " में एक सद् - वाक्य है कि - " परम्परा की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे," तो क्या हम उन परम्पराओं को दर - किनार करने की स्थिति में हैं, जो देश को कूडा - दान बनाने पर तुली हुई हैं ?
कबीर ने यह सब पहले ही भॉप लिया होगा और इसीलिए वह अपने अन्तिम - समय में," बनारस" छोड - कर "मगहर" चला गया होगा ताकि उसकी देह से "गङ्गा " दूषित न हो जाए और संभवतः वह हम सब को सिखाना चाहता हो कि - " भाइयों ! गङ्गा को दूषित मत करो, बनारस में ही मरना या अन्त्येष्टि होना आवश्यक नहीं है , प्राण कहीं भी छूटे, सत् - गति तो कर्मानुसार ही मिलती है । " मगहर " में देह त्याग - कर, कबीर ने यह सिध्द कर दिया कि - " मन चंगा तो कठौती में गङ्गा ।"
मैंने अपने घर में किसी तरह,अपने बच्चों को यह समझा दिया है कि दीवाली में पटाखे फोडने की कोई ज़रूरत नहीं है पर पूरे हिन्दुस्तान के बच्चों को,उनके माता - पिता को कौन समझाए कि पटाखे फोडना सही नहीं है , इससे वातावरण में ज़हर घुल रहा है, इतना ही नहीं यह हमारे "ओज़ोन - परत " को भी बहुत नुकसान पहुँचा रहा है । भला पटाखे न जलाने की सीख हिन्दुस्तान को कौन देगा ?
"नमामि - गङ्गे " मिशन तभी क़ामयाब हो पाएगा जब भारत मानसिक - पूजा करेगा । वैसे भी पूजा में किसी वस्तु की , उपकरण की कभी कोई ज़रूरत नहीं होती । क्या हमारे देश की जनता , अध्यात्म के इस स्तर को समझ सकेगी ?
मुझे बरसों पहले की एक घटना याद आ रही है । मेरी बेटी "तूलिका" तीन बरस की थी । मैंने उससे पूछा - कि "बुआ क्या कर रही हैं ? " बच्ची ने अज़ीब सा चेहरा बना कर मुझे समझाया कि - " बुआ, भगवान को गुडिया बना कर खेल रही हैं ।" उस समय मेरे पास मेरी ननदें और मेरे जेठ जी की बेटियॉ भी बैठी हुई थीं, वे सब हँसने लगीं, पर मुझे इस घटना ने , बच्ची की बातों ने हिला - कर रख दिया । मेरे मन में प्रश्न उठा कि आखिर पूजा करते समय हम करते क्या हैं ?
मृत्यु के पश्चात दाह - संस्कार ऐसा हो, जिसमें अस्थियॉ भी जल जायें, मात्र राख शेष रहे जो अपनी जाति के साथ, आसानी से मिल जाए और खेतों में खाद की तरह, इसका उपयोग हो जाए । रावण , कुम्भकरण और मेघनाद को जलाने के लिए, राष्ट्रीय - सम्पत्ति का अपव्यय क्यों करें ? क्यों न हम अपने भीतर में बैठे, राक्षसों का वध, धीरे - धीरे करते रहें, उसे अपना सिर उठाने का कभी अवसर ही न दें तो वह स्वयमेव मर जाएगा ।
"युग निर्माण योजना " में एक सद् - वाक्य है कि - " परम्परा की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे," तो क्या हम उन परम्पराओं को दर - किनार करने की स्थिति में हैं, जो देश को कूडा - दान बनाने पर तुली हुई हैं ?
कबीर ने यह सब पहले ही भॉप लिया होगा और इसीलिए वह अपने अन्तिम - समय में," बनारस" छोड - कर "मगहर" चला गया होगा ताकि उसकी देह से "गङ्गा " दूषित न हो जाए और संभवतः वह हम सब को सिखाना चाहता हो कि - " भाइयों ! गङ्गा को दूषित मत करो, बनारस में ही मरना या अन्त्येष्टि होना आवश्यक नहीं है , प्राण कहीं भी छूटे, सत् - गति तो कर्मानुसार ही मिलती है । " मगहर " में देह त्याग - कर, कबीर ने यह सिध्द कर दिया कि - " मन चंगा तो कठौती में गङ्गा ।"