Thursday, 18 April 2013

भारत स्‍वाभिमान



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शकुन्तला शर्मा , भिलाई [छ ग ]

Wednesday, 17 April 2013

हाइकू

एक

प्रेम - प्रहार,
मिलन - विरह  हो, 
दोनों  अंगार ।

दो

प्रीत  की  डोर ,
नाज़ुक  बहुत  है ,
नहीं   है  छोर ।

तीन

अपना कौन ,
पता  नहीं  चलता ,
भला  है  मौन ।

चार

सम -  अर्पण ,
सुनने   में  भला  है ,
यह  तर्पण ।

पाँच

कहाँ  है  प्रेम  ,
मृग - मरीचिका  है ,
नहीं  है नेम ।

छ:

प्रेम   की  प्यास ,
आस  है तब भी  है ,
मन  उदास ।

सात

मन है  वही ,
जो निरंकुश सा  है ,
मानता नहीं ।

आठ

मन  सारथी ,
कहाँ ले  जा रहा है ,
कैसा  है साथी ।

नव

मन   की  पीर ,
नयन   भर  आए , 
बरसे   नीर ।

दस

प्रेम  की  गली ,
बहुत  सँकरी  है ,  
तिलांजली ।

ग्यारह

मन - दर्पण ,
हर  पल  माँगे  है ,
सम - अर्पण ।

बारह

प्रेम  में मन , 
नहीं  पाता है  चैन , 
बावरा  मन ।

तेरह

सीधी सी बात,
नहीं पूछी जाती है,
साधू की जात ।

चौदह

प्रीत की रीत ,
सब कुछ अर्पित ,
मन के मीत ।

पन्द्रह

पते की बात 
प्रेम की बिसात में,
प्रेमी की मात ।

सोलह

प्रेम की पाती ,
भाव अतिरेक में,
पढ़ी  न जाती ।

सत्रह

प्रेम  में  मन  ,
निर्मल   दर्पण , 
कंपित   मन ।

अठारह

प्रेम का  रंग ,
उनका  पदचाप ,
जल - तरंग ।

उन्नीस 

प्रीत की कड़ी 
हँसी की फुलझड़ी,
लड़ी की लड़ी ।

बीस

मन  संसार , 
अपने  में  मगन ,
प्रेम   है  सार  ।

इक्कीस

प्रेम की माला,
साँस जपती है ,
यही  है  हाला ।

शकुन्तला शर्मा , भिलाई [छ ग ]

बताओ मैं कहाँ हूँ ? [ लघु - कथा ]

छत्तीसगढ़ की सुन्दरता अद्वितीय है , और उसमें हमारा बस्तर तो , छत्तीसगढ़ रूपी मुंदरी में जड़ा हुआ पन्ना है । मैं कुछ दिनों के लिए कोंडागांव गई थी । मेरे घर के सामने डोंगरी के पास , बच्चे खेलने आ जाते थे । मैं उन्हें टुकुर - टुकुर देखा करती थी , मुझे ऐसा लगता था , जैसे मैं भी उनमें से एक हूँ मनुष्य का देह तो बड़ा हो जाता है , पर उसका बचपन अपना मुँह बिचका - बिचका कर , उम्र भर अज़ीब सी शरारतें करता रहता है । वे बच्चे सबसे पहले ग्राम -- देवता की आराधना किया करते थे -

कला के नगरी कोंडागांव कतका सुघ्घर कोंडागांव मार्कन्डेय कोरा म बइठे सब ले सुघ्घर कोंडागांव दुनियाँ भर म   जस बगरे हे शिल्प - गाँव ए कोंडागांव खेती होथे संजीवनी के ओखदपुर ए कोंडागांव ।

रुख राई के बीच म बइठे ध्यान करत हे कोंडागांव दुनियाँ . भर ल बांहटत हावय कला नमूना कोंडागाँव निखरय कला गाँव के कीर्ति सदा रहय संतोष के छाँव प्रभु से हावय एही प्रार्थना बनय कल्परुख कोंडागांव ।

प्रार्थना करने के बाद वे बच्चे , सलफी के आम के और पीपल के रुख के पीछे छिप जाते थे और जोर से चिल्ला कर पूछते थे - ' बताओ मैं कहाँ हूँ ? ' देखते - देखते वे बच्चे मेरे अन्तर्मन के बच्चे से घुल - मिल गए । प्यास लगने पर मुझसे पानी माँगना और कई तरह के बहाने बनाकर , मेरे करीब आना और मेरे द्वारा घंटों उनका इंतज़ार करना , एक तरह से हमारी आदत में शुमार हो गया । जिस दिन उन्हें आने में देर हो जाती , मैं बिस्किट का पैकेट और लोटा - गिलास में पानी लेकर , उनके सामने बैठ जाती और फिर वे मुझे अपनी व्यस्तता बताते हुए कहते -'आंटी थोड़ा धीरज रखिये , हम लोग थोड़ी देर में आयेंगे । हमें अभी प्यास नहीं लगी है । ' उनका मना करना भी मुझे उतना ही अच्छा लगता , जितना उनका मुस्कुराते हुए दौड़कर आना । बिस्किट का पैकेट खोलने पर फूलो जोर से कहती - आंटी बस सबको एक - एक दे दीजिये , इससे ज्यादा हम लोगों से नहीं खाया जाएगा , है न लालू ? और फिर मज़ाल है कि कोई बच्चा , और बिस्किट ले ले । फूलो का फतवा सुनकर , मेरी आँखों में पानी आ जाता था , पर मैं उन बच्चों को एक से ज्यादा बिस्किट कभी नहीं खिला पाई । मैं तरसकर रह गई । मैं इतनी दीन हीन कभी नहीं हुई थी , जितना इन बच्चों ने मुझे बना दिया था ।

अचानक एक दिन वे बच्चे खेलने नही आये । मैं रुआँसी होकर उनकी खोज - खबर लेने पहुँची । मुझे पता चला कि फूलोदई और राजोदई को नक्सली, उठा कर ले गए हैं । फूलो तेरह बरस की और राजो ग्यारह बरस की थी ।

मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई । मैंने इन दोनों बच्चों के लिए साधना, अनुष्ठान, मंत्र - जप सब कुछ किया साथ साथ रोना - गाना भी चलता ही रहा । अचानक तीन महीने बाद , वे दोनोँ आईं पर वे अब घर से बाहर नहीं निकलतीं । मैं उनके घर गई । उनकी माँ से मिली तो पता चला कि वे दोनों बच्चियाँ , नक्सलियों की हवस की शिकार हो चुकी हैं । बुझी - बुझी सी उनकी आँखें और सूखा हुआ उनका चेहरा , वह सब कुछ बयान कर रहा था , जो बच्चियों ने अपने मुँह से नहीं कहा ।

दोनोँ बच्चियों से मिलकर जब मैं वापस लौट रही थी , तो उनकी माँ वेदवती , मुझे मिली । उसने जोर जोर से रोते हुए , मुझसे कहा - ' दीदी ! इससे तो अच्छा होता कि नक्सली इन्हें मार डालते । मैं किस - किस के सवालों का जवाब दूँ ? इनका बाप तो घर - बार छोड़ कर कहीं चला गया है , पर इन दोनों का मुँह देख कर मैं कहीं जा भी नहीं पा रही हूँ । ' मैंने समझाया कि - ' इन्हें पढाओ - लिखाओ । जब ये दोनों अपने पैरों पर खड़ी हो जायेंगी , तब तुम इन पर गर्व करोगी । हिम्मत रखो , मैं तुम्हारे साथ हूँ । '

दस - पन्द्रह दिन बाद , नक्सली फिर , इन्हीं बच्चियों को उठा कर ले गए और आज तक , उनकी कोई खबर नहीं है । उनकी माँ भी आज कल दिखाई नहीं देती । उनके घर का कपाट खुला हुआ है , पर घर में कोई नहीं है ।

मुझे रात - रात भर नींद नहीं आती । मैं फफक - फफक कर रोती हूँ और डोंगरी के बीच से , सलफी और पीपर - पेड़ के पीछे से मुझे फूलो और राजो की आवाज़ सुनाई देती है । वे मुझसे पूछतीं हैं -' आंटी ! बताओ मैं कहाँ हूँ '।

शकुन्तला शर्मा , भिलाई [छ ग ]

Saturday, 13 April 2013

हाइकू


एक


मोदी बनता
प्रधानमंत्री फिर
देश बढ़ता ।


दो


मोरार भाई
गॉंधी, शास्‍त्री भी है
नरेन्‍द्र भाई ।

तीन


नरेन्‍द्र भाई
ज्‍यों लौट आए
वल्‍लभ भाई ।


चार


मोदी के नैन
इतिहास लिखते
अनूठे बैन ।


पांच


मोदी सा शेर
दिल्‍ली में हो तो रिपु
हो जाऍं ढेर ।


छ:


नरेन्‍द्र मोदी
देश का भविष्‍य

आशायें बो दी ।


सात


मोदी का यश
उन्‍हें न भाए पर
है परवश ।


आठ


सुरक्षित है
देश मोदी के साथ
अभीप्सित है l 


शकुन्तला शर्मा
भिलाई [छ ग ]

Friday, 12 April 2013

मैं हूँ नारी

                 मैं हूँ  नारी  मैं मां हूँ  बेटी  हूँ प्रेम - शावक को मैं  ही सेती  हूँ
                 मेरी आँखों में  प्रेम पलता  है पीर  लेती हूँ सुख  मैं  देती  हूँ l
                  मैं हूँ नारी

                  प्रेयसी  बन मैं  थामती नर को हर पुरुष  बिन मेरे  अधूरा है
                  मैं  ही अर्धांगिनी हूँ प्रियतम की घर मुझसे ही  होता पूरा हैl
                   मैं हूँ नारी

                  मैं  ही परिवार की  प्रतिष्ठा हूँ घर - आँगन  को  मैं  सजाती  हूँ
                  मैं ही बचपन सँवारती  सबका गीत  शैशव के लिए गाती हूँ l
                  मैं हूँ नारी

                  मैं  सुनाती  हूँ  पंचतंत्र  कथा  मैं  ही आल्हा  उसे  सुनाती  हूँ
                  वेद - शास्त्रों  का ज्ञान  देती हूँ मैं  ही मानव उसे बनाती  हूँ l 
                   मैं हूँ नारी

                 धन  पराया   हूँ फिर  भी  मैं  ही  तो वल्लरी  वंश की  बढ़ाती हूँ
                 जन्म लेने दो मुझको मत मारो कल के वैभव की नई थाती हूँ l
                  मैं   हूँ नारी

                                               शकुन्तला शर्मा
                                                भिलाई [छ ग ]

Thursday, 11 April 2013

गज़ल

                                         
अपने सुख - दुःख के स्वामी तुम्हीं हो सखे अपनी मर्ज़ी से तुमने ये सुख - दुःख चखे
कर्म   का   फल  तो   मिलता  है  संसार  में   आजमा   लो   यही  बात  सच  है  सखे l

कोई  दूजा  तुम्हें  दुःख   नहीं  देता  है  अपनी  मर्ज़ी  से  दुःख  पाते   हो   तुम   सखे
बात  इतनी सी है तुम  भी  यह  जान  लो  सुख  है  सत्कर्म , दुष्कर्म  दुःख  है  सखे l

                   मैंने भोगा  है तू भी  'शकुन ' जान  ले
                   मुश्किलें हैं बहुत सच के पथ पर सखे l

                                                शकुन्तला शर्मा
                                                भिलाई [छ ग ]

नव संवत्सर फिर आया है

                               
                 चरैवेति से कर्म  करो तुम संदेश यही फिर लाया है
                 देशी खाओ देशी  पहनो इस दर्शन को दोहराया है l

                 देश का  हित  है सबसे  पहले यही बताने  आया  है
                 जागो जागो सब नर नारी आह्वान यही वह लाया है l 

                 पृथ्वी है परिवार  हमारा यही  गान उसने  गाया  है
                 हम सब आपस में प्रेम करें यह मंत्र बताने आया है l

                 शुभ  चिंतक है सखा हमारा देस राग इसने गाया है
                 हर मन में हो उत्साह हर्ष वह यही सिखाने आया है l

                 मेहनत का फल सबसे मीठाहै पुन:पुन:समझाया है
                 ईश्वर का वरदान है यह फिर हमें  जगाने  आया है l

                                                       शकुन्तला शर्मा
                                                        भिलाई [छ ग ]