Saturday, 7 December 2013

सूक्त - 98

[ऋषि- देवापि आर्ष्टिषेण । देवता- देवगण । छन्द- त्रिष्टुप् ।]

9928
बृहस्पते  प्रति  मे  देवतामिहि  मित्रो वा यद्वरुणो वासि पूषा ।
आदित्यैर्वा यद्वसुभिर्मरुत्वान्त्स पर्जन्यं शन्तनवे वृषाय॥1॥

वर्षा  का  जल  अति - आवश्यक है बरसात हेतु हो अनुष्ठान ।
सभी देव - गण  करें  मंत्रणा जल-वर्षा हेतु सभी दें ध्यान॥1॥

9929
आ  देवो  दूतो  अजिरश्चिकित्वान्त्वद्देवापे  अभि मामगच्छत्।
प्रतीचीनःप्रति मामा ववृत्स्व दधामि ते द्युमतिं वाचमासन्॥2॥

हे  देव  बृहस्पति  तुम  आ जाओ तुम ज्ञानी तुम ही वरेण्य हो ।
सब विचार तज-कर ही आना तुम श्रेयस तुम ही प्रणम्य हो॥2॥

9930
अस्मे धेहि द्युमतिं वाचमासन् बृहस्पते अनमीवामिषिराम् ।
यया वृष्टिं शन्तनवे वनाव दिवो द्रप्सो मधुमॉं आ विवेश॥3॥

वरदान हमें दो हे वाक्देवी जिससे प्राञ्जल- पय - प्रवाह हो ।
जल - वृष्टि  धरा- पर हो जाए जग झूमे जीने की राह हो ॥3॥

9931
आ  नो  द्रप्सा  मधुमन्तो  विशन्त्विन्द्र देह्यधिरथं सहस्त्रम् ।
नि  षीद  होत्रमृतुथा  यजस्व  देवान्देवापे  हविषा  सपर्य ॥4॥

मधुर - वृष्टि  उपलब्ध  हमें  हो  प्रचुर-अन्न और शाक  मिले ।
हम सब मिल कर यह सोचें जिससे कि हर्ष का कमल खिले॥4॥

9932
आर्ष्टिषेणो होत्रमृषिरर्निषीदन् देवापिर्देवसुमतिं  चिकित्वान् ।
स  उत्तरस्मादधरं  समुद्रमपो  दिव्या  असृजद्वर्ष्या  अभि ॥5॥

हे  परम-मित्र  हे  परमेश्वर  तुम  वरद - वरुण  को  ले  आओ ।
अन्तरिक्ष के अम्बुधि से पृथ्वी पयोधि की प्यास बुझाओ॥5॥

9933
अस्मिन्त्समुद्रे अध्युत्तरस्मिन्नापो देवेभिर्निवृता अ अतिष्ठन्।
ता अद्रवन्नार्ष्टिसषेणेन सृष्टा देवापिना प्रेषिता मृक्षिणीषु ॥6॥

पृथ्वी - पयोधि  पर  परमेश्वर  ने  फैलाया  है  अद्भुत-वितान ।
पर पृथ्वी पर पर्जन्य पधारे पृथ्वी ने किया पावन-पय-पान॥6॥

9934
यद्देवापिः  शन्तनवे  पुरोहिता  होत्राय  वृतः  कृपयन्नदीधेत् ।
देवश्रुतं  वृष्टिवनिं  रराणो   बृहस्पतिर्वाचमस्मा  अयच्छत् ॥7॥

गंभीर- भाव  से  देव - बृहस्पति  वृष्टि - हेतु  उपक्रम  करते  हैं ।
मेघों  को  वे  प्रेरित  करते  हैं  जल-वर्षक  मंत्रों को पढते हैं ॥7॥

9935
यं  त्वा  देवापिः  शुशुचानो  अग्न  आर्ष्टिषेणो  मनुष्य: समीधे ।
विश्वेभिर्देवैरनुमद्यमानः   प्र   पर्जन्यमीरया   वृष्टिमन्तम्  ॥8॥

हे  अग्नि - देव  हम  पावन - मन  से स्तवन तुम्हारा करते हैं ।
परम - पूजनीय  देवों  से  वर्षा  - निमित्त  आग्रह  करते  हैं ॥8॥

9936
त्वां   पूर्व   ऋषयो   गीर्भिरायन्त्वामध्वरेषु   पुरुहूत   विश्वे ।
सहस्त्राण्यधिरथान्यस्मे   आ   नो   यज्ञं  रोहिदश्वोप याहि ॥9॥

हे  अग्नि - देव  आवाहन  है  शीघ्रातिशीघ्र  प्रभु  आ  जाओ ।
जल - वर्षा  का  दान  हमें दो इस जगती का ताप मिटाओ ॥9॥

9937
एतान्यग्ने   नवतिर्नव   त्वे   आहुतान्यदधिरथा   सहस्त्रा ।
तेभिर्वर्धस्व  तन्व:  शूर पूर्वीर्दिवो नो वृष्टिमिषितो रिरीहि॥10॥

हे  पावक - पावन  आ  जाओ  करते  हैं  हम  सब  आवाहन । 
दिव्य-लोक से जल बरसाओ ग्रहण करो प्रभु हविष्यान्न ॥10॥

9938
एतान्यग्ने  नवति  सहस्त्रा सं प्र यच्छ वृष्ण इन्द्राय भागम् ।
विद्वान्पथ ऋतुशो देवयानानप्यौलानं दिवि  देवेषु  धेहि॥11॥

परमेश्वर  को  प्रणाम  करते  हैं  वेद - ऋचाओं  को  पढते  हैं ।
हवि-भोग  सभी को देते हैं जल-दान करो प्रभु  कहते  हैं॥11॥

9939
अग्ने  बाधस्य  वि  मृधो  वि  दुर्गहापामीवामप रक्षांसि सेध ।
अस्मात्समुद्राद् बृहतो दिवो नोSपां भूमानमुप नःसृजेह॥12॥

अग्नि  हमारे  परम-हितैषी  तन  को  सदा  स्वस्थ रखते हैं ।
अंतरिक्ष  से  इस  धरती  को जल का दान वही करते हैं ॥12॥                 

Friday, 6 December 2013

सूक्त - 99

[ऋषि-वम्र वैखानस । ।देवता-इन्द्र । छन्द- त्रिष्टुप् ।]

9940
कं  नश्चित्रमिषण्यसि  चिकित्वान्पृथुग्मानं वाश्रं वावृधध्यै।
कत्तस्य   दातु  शवसो  व्युष्टौ  तक्षद्वज्रं  वृत्रतुरमपिन्वत् ॥1॥

हे   परमेश्वर  हे  वैभव - शाली  मनो - कामना  पूरी  करना ।
मेघों  से  समुचित  जल  देना धान से सबका  घर भरना॥1॥

9941
स  हि  द्युता  विद्युता  वेति  साम  पृथुं योनिमसुरत्वा ससाद ।
स सनीळेभिःप्रसहानो अस्य भ्रातुर्न ऋते सप्तथस्य माया:॥2॥

मेघ-मरुत का सँग अनूठा इनसे धरती को जल मिलता है ।
अन्न-उपजता भॉंति-भॉंति का मनउपवन सबका खिलता है॥2॥

9942
स  वाजं  यातापदुष्पदा  यन्त्स्वर्षाता  परि  षदत्सनिष्यन् ।
अनर्वा यच्छतदुरस्य वेदो घ्नञ्छिश्नददेवॉं अभि वर्पसा भूत्॥3॥

सत्पथ  पर  चलता  हुआ मनुज ही ज्ञान - वान  बन  पाता  है ।
सबका हित करने वाले को सुख- मय जीवन मिल जाता है ॥3॥

9943
स  यह्वयो3Sवनीर्गोष्वर्वा  जुहोति  प्रधन्यासु  सस्त्रिः ।
अपादो यत्र युज्यासोSरथा द्रोण्यश्वास ईरते घृतं वा:॥4॥

वर्षा  का  जल  खेतों  पर  गिरता  अधिक  अन्न  उपजाता  है ।
विविध किस्म के अन्न सब्ज़ियॉं हर-जीव पेट-भर खाता है॥4॥

9944
स  रुद्रेभिरशस्तवार  ऋभ्वा  हित्वी  गयमारेअवद्य  आगात् ।
वम्रस्य मन्ये मिथुना विवव्री अन्नमभीत्यारोदयन्मुषायन्॥5॥

पवन - देव  की  महिमा  भारी  अवगुण  उडा - उडा  ले  जाते ।
सज्जन  को महिमा - मण्डित कर वे सबको नीरोग बनाते ॥5॥

9945
स   इद्दासं   तुवीरवं   पतिर्दन्षळक्षं   त्रिशीर्षाणं   दमन्यत् ।
अस्य त्रितो  न्वोजसा  वृधानो विपा वराहमयोअग्रया हन्॥6॥

पवन - देव  मेघों  से  मिल - कर  पृथ्वी  पर जल बरसाते हैं ।
अति  समर्थ  हैं  पवन - देवता  वे सबकी प्यास बुझाते हैं ॥6॥

9946
स  द्रुह्वणे  मनुष  ऊर्ध्वसान  आ  साविषदर्शसानाय  शरुम् ।
स  नृतमो  नहुषोSस्मत्सुजातः पुरोSभिनदर्हन्दस्युहत्ये॥7॥

दुष्ट - दमन अति आवश्यक है हे इन्द्र - देव तुम रक्षा करना ।
पूजनीय  हो  तुम्हीं  हमारे  तुम सभी अपेक्षा पूरी करना ॥7॥

9947
सो  अभ्रियो  न  यवस  उदन्यन्क्षयाय गातुं विदन्नो अस्मे ।
उप  यत्सीददिन्दुं  शरीरैः  श्येनोSयोपाष्टिर्हन्ति  दस्यून् ॥8॥

काले - बादल  जैसे  जल देकर धरती का आलिंगन करते हैं ।
वैसे ही राजा प्रजा-जनों को घर हेतु ज़मीन दिया करते हैं॥8॥

9948
स  व्राधतः शवसानेभिरस्य  कुत्साय  शुष्णं  कृपणे  परादात् ।
अयं कविमनयच्छस्यमानमत्कं यो अस्य सनितोत नृणाम्॥9॥

पावन  -पवन - प्रबल है अतिशय रिपु-दल को दूर फेंक देता है ।
अग्नि - देव को चँवर -डुलाता आत्मीय-मान अपना लेता है॥9॥

9949
अयं   दशस्यन्नर्येभिरस्य   दस्मो   देवेभिर्वरुणो   न   मायी ।
अयं    कनीन    ऋतुपा    अवेद्यमिमीताररुं    यश्चतुष्पात्॥10॥

प्राण- पवन  सबको  सुख  देता  वह  सबका  है  जीवन - दाता ।
आदित्य-पवन की महिमा भारी ये दोनों हैं भाग्य-विधाता॥10॥

9950
अस्य स्तोमेभिरौशिज ऋ ऋजिश्वा व्रज दरयद्वृवृषभेण पिप्रोः ।
सुत्वा यद्यजतो दीदयद्गीः द्गीः पुर इयानो अभि वर्पसा भूत्॥11॥

ज्ञान - वान  बनता  जब  मानव  बढ  जाता  है  उसका  मान ।
आत्म - शक्ति बढ जाती उसकी देह-मुक्ति का होता भान ॥11॥

9951
एवा  महो  असुर  वक्षथाय  वम्रकः   पड्भिरुप   सर्पदिन्द्रम् ।
स इयानःकरति स्वस्तिमस्मा इषमूर्जं सुक्षितिं विश्वमाभा:॥12॥

हे  परमेश्वर  हे  बलशाली  कैसे  हो  प्रभु - जी  आत्म - बोध ।
आत्म- ज्ञान यदि हो जाए तो सत्संग से कर सकते हैं शोध॥12॥            
   
       

 

सूक्त - 100

[ऋषि- दुवस्यु वान्दन । देवता- विश्वेदेवा । छन्द-  जगती-त्रिष्टुप् ।]

9952
इन्द्र दृह्य मघवन्त्वावदिद्भुज इह स्तुतः सुतपा बोधि नो वृधे ।
देवेभिर्न: सविता प्रावतु श्रुतमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥1॥

हे  परम - मित्र  हे  परमेश्वर  तुम  ही  हो जग के पालन-हार ।
मनो -  कामना  पूरी  करना  भोग - मोक्ष -  इच्छानुसार ॥1॥

9953
भराय  सु  भरत  भागमृत्वियं  प्र  वायवे शुचिपे  क्रन्ददिष्टये ।
गौरस्य यःपयसःपीतिमानश आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥2॥

पावन-पवन-देव-प्राञ्जल हैं  हम  प्राण - पवन  उनसे  पाते हैं ।
हम हवि - भोग उन्हें देते हैं वे ध्वनि सँग आते और जाते हैं॥2॥

9954
आ  नो  देवः सविता  साविषद्वय ऋजूयते यजमानाय  सुन्वते ।
यथा  देवान्प्रतिभूषेम  पाकवदा  सर्वतातिमदितिं वृणीमहे ॥3॥

आदित्य -  देव  आदर्श  हमारे  सबका  ध्यान  वही  रखते  हैं ।
प्रकृति  हमारी  माता - सम  है  हम  उनकी स्तुति करते हैं ॥3॥

9955
इन्द्रो अस्मे सुमना अस्तु विश्वहा राजा सोमःसुवितस्याध्येतु नः।
यथा - यथा  मित्रधितानि  संदधुरा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥4॥

हे   प्रभु   मन   प्रसन्न  रखना  हम  पर  वरद -  हस्त   रखना ।
जन - हित जीवन का ध्येय बने यही अनुग्रह हम पर करना ॥4॥

9956
इन्द्र   उक्थेन   शवसा   प्ररुर्दधे   बृहस्पते   प्रतरीतास्यायुषः ।
यज्ञो मनुः प्रमतिर्न:पिता हि कमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥5॥

हे  परमेश्वर  दीर्घायु  बना  दो  श्रेष्ठ -  कर्म  हम  करें  निरन्तर ।
मति - मन  दोनों अनुकूल  रहे  यह  जीवन हो जाए सुखकर॥5॥

9957
इन्द्रस्य  नु  सुकृतं  दैव्यं  सहोSग्निर्गृहे  जरिता मेधिरः कविः ।
यज्ञस्य भूद्विदथे चारुरन्तम आ स स्र्वतातिमदितिं वृणीमहे॥6॥

हे  अग्नि - देव  तुम  आ  जाओ  तुम  हो  मेरे अत्यन्त निकट ।
तुम  पूजनीय  तुम  ही  वरेण्य  हो  हरते  रहो  सतत संकट ॥6॥

9958
न  वो  गुहा  चकृम  भूरि  दुष्कृतं नाविष्ट्यं वसवो देवहेळनम् ।
माकिर्नो देवा अनृतस्य वर्पस आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥7॥

प्रच्छन्न - रूप - में  प्रभु - प्रकटे  हम  श्रध्दा  से  स्वीकार  करें ।
प्रकृति - पावनी - पूज्या  को  पर  सिर - माथे-पर सदा धरें ॥7॥

9959
अपामीवां  सविता  साविषत्र्यत्र्य1ग्वरीय  इदप  सेधन्त्वद्रयः ।
ग्रावा  यत्र  मधुषुदुच्यते  बृहदा  सर्वतातिमदितिं  वृणीमहे ॥8॥

पूजनीय   है   ज्ञानी   जग   में   ज्ञान - दान  वे   ही   करते  हैं ।
सूर्य - देवता  स्वस्थ  बनाते  जग  का  ताप  मेघ  हरते  हैं ॥8॥

9960
ऊर्ध्वो ग्रावा  वसवोSस्तु  सोतरि  विश्वा  द्वेषांसि सनुतर्युयोत ।
स नो देवः सविता पायुरीड्य आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥9॥

 हे यज्ञ- देव तुम शुभ - चिन्तक हो राग - द्वेष से हमें बचाओ ।
सूर्य - देव  सबके  रक्षक  हैं प्रकृति-पावनी पास आ जाओ ॥9॥

9961
ऊर्जं गावो यवसे पीवो अत्तन ऋतस्य या: सदने कोशे अङ्ध्वे।
तनूरेव  तन्वो अस्तु  भेषजमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥10॥

गो - मॉं  कब  से  भूखी  बैठी  है  चारा  उसे  मिले  भर - पूर ।
गो-रस सोम-सदृश बन जाए मनुज-प्रकृति से हो न दूर ॥10॥

9962
क्रतुपावा  जरिता  शश्वतामव इन्द्र इद्भद्रा प्रमतिः सुतावताम् ।
पूर्णमूधर्दिव्यं यस्य सिक्तय आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥11॥

नया - वस्त्र  एक  दिन  फट  जाता इस जग को खाता है काल ।
हे  सूर्य - देव  तुम  रक्षा  करना  प्रकृति-पूजनीया है ढाल ॥11॥

9963
चित्रस्ते भानुःक्रतुप्रा अभिष्टिःसन्ति स्पृहो जरणिप्रा अ अधृष्टा:।
रजिष्ठया  रज्या  पश्व   आ   गोस्तूतूर्षति   पर्यग्रं  दुवस्युः ॥12॥

हे   परम - पिता   हे  परमेश्वर   तेरा   प्रकाश   प्रभु - पावन  है ।
तुमसे  हम बहुत प्रभावित हैं तेरा सुमिरन मन - भावन है ॥12॥  
   

              
        

Wednesday, 4 December 2013

सूक्त - 101

 [ऋषि- बुध सौम्य । देवता-विश्वेदेवा । छन्द--त्रिष्टुप् - -गायत्री - बृहती ।]

9964
उद्बुध्यध्वं समनसः सखायः समग्निमिन्ध्वं बहवः सनीळा:।
दधिक्रामग्निमुषसं च देवीमिन्द्रावतोSवसे नि  ह्वये  वः ॥1॥

हे  मित्र  उठो  जागो  और सोचो एकाग्र - चित्त  होकर जानो ।
होकर  अनेक  भी  सँग चलो जीवन-रहस्य को  पहचानो॥1॥

9965
मन्द्रा कृणुध्वं धिय आ तनुध्वं नावमरित्रपरणीं कृणुध्वम् ।
इष्कृणुध्वमायुधारं कृणुध्वं प्राञ्चं यज्ञं ग्र णयता सखायः॥2॥

श्रेष्ठ - कर्म तुम करो निरंतर शुभ - शुभ चिंतन का मंत्र पढो ।
प्रगति- नाव  में  चप्पू लेकर ज्ञान - मार्ग  में  सतत बढो।॥2॥

9966
युनक्त  सीरा  वि  युगा  तनुध्वं  कृते  योनौ  वपतेह  बीजम् ।
गिरा च श्रुष्टिःसभरा असन्नो नेदीय इत्सृण्यःपक्वमेयात्॥3॥

खेत  जोत - कर  बीज  की  बोनी  करो अन्न फिर उपजेगा ।
कृषि - वैज्ञानिक  की  सलाह लो खेत अन्न फिर उगलेगा॥3॥

9967
सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वि तन्वते पृथक् ।
धीरा                देवेषु               सुम्नया    ॥4॥

श्रम - शील मनुज खेती करता है पेट सभी का वह भरता है ।
रुचि-अनुसार यहॉं हर मानव विविध कर्म में रत रहता है॥4॥

9968
निराहावान्कृणोतन      सं      वरत्रा      दधातन ।
सिञ्चामहा अवतमुद्रिणं वयं सुषेकमनुपक्षितम् ॥5॥

पशु- जल की भी करो व्यवस्था जल हो न कभी खेत से दूर ।
वर्षा के जल का सञ्चय कर लो खेत को पानी दो भरपूर॥5॥

9969
इष्कृताहावमवतं सुवरत्रं सुषेचनम् । उद्रिणं सिञ्चे अक्षितम्॥6॥

पीने के पानी का प्रबन्ध हो खेत में हो अपना नल-कूप ।
खेत - किनारे हो अपना घर आती रहे सुनहरी धूप ॥6॥

9970
प्रीणीताश्वान्हितं  जयाथ  स्वस्तिवाहं  रथमित्कृणुध्वम् ।
द्रोणाहावमवतमश्मचक्रमंसत्रकोशं  सिञ्चता नृपाणम्॥7॥

पशुओं  को भी बढिया चारा दो उनका हो सुन्दर  नामकरण।
गो-माता गो-रस दे देती है आनन्द भरा हो हर एक क्षण॥7॥

9971
व्रजं  कृणुध्वं स हि वो नृपाणो  वर्म सीव्यध्वं बहुला पृथूनि ।
पुरःकृणुध्वमायसीरधृष्टा मा वःसुस्त्रोच्चमसो दृंहता तम्॥8॥

भॉंति-भॉंति की गो-शाला हो जहॉं सुख-कर गायें पलती हों ।
"बछडों को मेरा दूध मिले" जो बिन बोले यह कहती हों ॥8॥

9972
आ वो धियःयज्ञियां वर्त ऊतये देवा देवीं यजतां यज्ञियामिह।
सा  नो  दुहीयद्यवसेव  गत्वी सहस्त्रधारा पयसा मही गौः ॥9॥

यज्ञ - रूप  हो  जीवन  अपना  हे  प्रभु  तुम  ऐसी मति दे दो ।
त्याग - सहित उपभोग करें तुम मुझको यह चिंतन  दे दो॥9॥

9973
आ तू  षिञ्च हरिमीं द्रोरुपस्थे वाशीभिस्तक्षताश्मन्मयीभिः।
परि  ष्वजध्वं  दश  कक्ष्याभिरुभे धुरौ प्रति वह्निं युनक्त ॥10॥

सबका कर्तव्य विभाजित है हम सब अपना दायित्व निभायें।
सबके  सुख - दुख का चिंतन हो एक-दूजे के काम आयें॥10॥

9974
उभे   धुरौ   वह्निरापिब्दमानोSन्तर्योनेव   चरति    द्विजानिः ।
वनस्पतिं वन आस्थापयध्वं नि षू दधिध्वमखनन्त उत्सम्॥11॥

सत्कर्म   ही   मेरा   ईश्वर   है   यह  सबसे  बडा  देवता  है ।
हम इसकी महिमा को समझें यह सबसे बडी सरलता है ॥11॥

9975
कपृन्नरः   कपृथमुद्दधातन   चोदयत   खुदत   वाजसातये ।
निष्टिग्रयःयःपुत्रमा च्यावयोतय इन्द्रं सबाध इह सोमपीतये॥12॥

हे  कर्म-शील  हे मनुज-देव  तुम  सूर्य-देव  की  करो प्रार्थना ।
सुख-शान्ति वही देंगे तुमको यह वेद-ऋचा का है कहना॥12॥        
          

Tuesday, 3 December 2013

सूक्त - 102

[ऋषि- मुद्गल भार्म्यश्व । देवता- इन्द्र । छन्द- -त्रिष्टुप्--बृहती ।]

9976
प्र     ते     रथं     मिथूकृतमिन्द्रोSवतु     धृष्णुया ।
अस्मिन्नाजौ पुरुहूत श्रवाय्ये धनभक्षेषु नोSव।॥1॥

जब  भी  हम  आश्रय  विहीन हों हे प्रभु तुम ही रक्षा करना ।
हम  प्रेम  से  तुम्हें बुलाते हैं हम पर वरद - हस्त रखना॥1॥

9977
उत्स्म वातो वहति वासो अस्या अधिरथं यदजयत्सहस्त्रम् ।
रथीरभून्मुद्गलानी   गविष्टौ   भरे   कृतं  व्यचेदिन्द्रसेना ॥2॥

ऋषि - पत्नी  ने  शौर्य  दिखाया गो -रक्षा हेतु किया उपक्रम ।
पवन-देव भी प्रेरक बन गए गो-माता की पूजा करते हम॥2॥

9978
अन्तर्यच्छ      जिघांसतो        वज्रमिन्द्राभिदासतः ।
दासस्य वा मघवन्नार्यस्य वा सनुतर्यवया वधम् ॥3॥

दुष्ट-दलन अति आवश्यक है सज्जन की रक्षा बहुत जरूरी ।
यदि हम ऐसा न कर पाए तो होगी यह अपनी कमजोरी॥3॥

9979
उद्नो ह्रदमपपिबज्जज्जर्ह्रषाण: कूटं स्म तृंहदभिमातिमेति ।
प्र मुष्कभारः श्रव इच्छमानोSजिरं बाहू अभरत्सिषासन्॥4॥

शौर्य - शस्त्र  इस  नंदी  में  भी  भरा  है  साहस  अपरम्पार ।
मिट्टी को सींगों में धर-कर रिपु - दल-पर करता है वार॥4॥

9980
न्यक्रन्दयन्नुपयन्त   एनममेहयन्वृषभं    मध्य   आजेः ।
तेन  सूभर्वं  शतवत्सहतत्रं  गवां  मुद्गलः  प्रधने जिगाय॥5॥

अद्भुत निनाद था उस नंदी का वह ऋषि समीप ही खडा रहा।
जो  गो - मातायें  बंधक  थीं  उनकी  रक्षा  में लगा रहा ॥5॥

9981
ककर्दवे    वृषभो    युक्त    आसीदवावचीत्सारथिरस्य    केशी ।
दुधेर्युक्तस्य द्रवतःसहानस ऋच्छन्ति ष्मा निष्पदो मुद्गलानीम्॥6॥

नंदी रथ में  जुता हुआ था ऋषि-पत्नी के हाथों में लगाम ।
अब वह रथ दौडने लगा था पीछे सेना का ताम-झाम ॥6॥

9982
उत  प्रधिमुदहन्नस्य  विद्वानुपायुनग्वंसगमत्र  शिक्षन् ।
इन्द्र  उदावत्पतिमघ्न्यानामरंहत  पद्याभिः ककुद्मान्॥7॥

ऋषि ने किया नियंत्रित रथ को नंदी को प्रेम से सहलाया ।
देवों ने उसे सुरक्षा दी थी फिर रथ का परचम लहराया॥7॥

9983
शुनमष्ट्राव्यचरत्कपर्दी     वरत्रायां            दार्वानह्यमानः ।
नृम्णानि कृण्वन्बहवे जनाय गा:पस्पशानस्तविषीरधत्त॥8॥

आकर्षण-केन्द्र बन गया नंदी वस्त्राभूषण से सजा हुआ था ।
अनगिन लोगों को धन-वैभव नंदी स्वयं प्रदान किया था॥8॥

9984
इमं तं पश्य वृषभस्य युञ्जं काष्ठाया मध्ये द्रुघणं शयानम्।
येन  जिगाय  शतवत्सहत्रं  गवां  मुद्गलः   पृतनाज्येषु ॥9॥

युध्द-भूमि में गिरा हुआ यह दारु-निर्मित शस्त्र यहॉं है ।
इसी शस्त्र के द्वारा विजयी कई विजय-इतिहास यहॉं है॥9॥

9985
आरे अघा को न्वि1त्था ददर्श यं युञ्जन्ति तम्वा स्थापयन्ति।
नास्मै तृणं नोदकमा भरन्त्युत्तरो धुरो वहति प्रदेदिशत् ॥10॥

यह नंदी अजब अलौकिक था  घास  कभी  नहीं  खाता  था ।
रथ-भार वहन वह करता था स्वामी को विजय दिलाता था॥10॥

9986
परिवृक्तेव पतिविद्यमानट् पीप्याना कूचक्रेणेव सिञ्चनन् ।
एषैष्याक चिद्रथ्या जयेम सुमङ्गलं सिनवदस्तु सातम्॥11॥

ऋषि-पत्नी ने शक्ति-प्रदर्शन द्वारा पति-धन ग्रहण किया ।
हे ईश्वर हम भी विजयी हों तुमने ही सब कुछ हमें दिया॥11॥

9987
त्वं        विश्वस्य        जगतश्चक्षुरिन्द्रासि        चक्षुसः ।
वृषा यदांजि वृषणा सिषाससि चोदयन्वध्रिणा युजा॥12॥

सम्पूर्ण जगत के नैन तुम्हीं हो मेरे नैनों  की ज्योति तुम्हीं हो।
प्रभु मनो-कामना पूरी करना सभी-शक्ति के श्रोत तुम्हीं हो॥12॥    

    
           

Monday, 2 December 2013

सूक्त - 103

[ऋषि- अप्रतिरथ ऐन्द्र । देवता- इन्द्र-बृहस्पति-अप्पा देवी-मरुद्-गण। छन्द- त्रिष्टुप-अनुष्टुप ।

9988
आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीननाम् ।
सङ्क्रन्दनोSनिमिष एकवीरः शतं सेना अजयत्साकमिन्द्रः॥1॥

सज्जन  को  तुम्हीं  सुरक्षा   देते   दुष्टों   का   करते   हो  संहार ।
राग - द्वेष  से  परे  हो प्रभु - वर  जग  में  आते  हो  बारम्बार॥1॥

9989
सङ्क्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना युत्कारेण दुश्च्यवनेन धृष्णुना।
तदिन्द्रेण  जयत  तत्सहध्वं  युधो    नर   इषुहस्तेन  वृष्णा॥2॥

सत्कर्म  हेतु  तत्पर  रहते  हो  अविचल  होकर  भी  लडते  हो ।
नीति-निपुण हो फिर भी प्रभु असुरों से युध्द तुम्हीं करते हो॥2॥

9990
स  इषुहस्तैः स  निषङ्गिभिर्वशी  संस्त्रष्टा  स  युध इन्द्रो गणेन ।
संसृष्टजित्सोमपा   बाहुशर्ध्यु1  ग्रधन्वा   प्रतिहिताभिरस्ता ॥3॥

हे  इन्द्र - देव   तुम  युध्द-वीर  हो रिपु-दमन सदा करते रहना ।
कुशल  धनुर्धारी  भी  तुम  हो  मन - भर  सोम-पान  करना ॥3॥

9991
बृहस्पते     परि     दीया    रथेन     रक्षोहामित्रॉं     अपबाधमानः ।
प्रभञ्जन्त्सेना:प्रमृणो युधा जयन्नस्माकमेध्यविता रथानाम्॥4॥

असुर - निवारण  तुम  करते  हो  तुम   हो  सबके  पालन -  हार ।
सबकी   रक्षा   तुम   करते   हो   विजयी   होते  हो  बारम्बार ॥4॥

9992
बलविज्ञाय   स्थविरः   प्रवीरः   सहस्वान्वाजी   सहवान   उग्रः ।
अभिवीरो अभिसत्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा  तिष्ठ  गोवित्॥5॥

चारों -  बल   है   पास   तुम्हारे   हे    महावीर    हे     बलशाली ।
रहो प्रतिष्ठित विजयी- रथ पर अद्भुत है यह विजय - प्रणाली ॥5॥

9993
गोत्रभिदं   गोविदं   वज्रबाहुं   जयन्तमज्म   प्रमृणन्तमोजसा ।
इमं  सजाता  अनु  वीरयध्वमिन्द्रं सखायो अनु सं रभध्वम् ॥6॥

हे  इन्द्र - देव  हे  गो - पालक  हमको  पावन - पथ  दिखलाओ ।
तुम   ही  एक  सहारा  हो  प्रभु  जीवन  का  उद्देश्य  बताओ ॥6॥

9994
अभि  गोत्राणि  सहसा  गाहमानोSदयो  वीरः  शतमन्युरिन्द्रः ।
दुश्च्यवनःपृतनासषाळययुध्यो3Sस्माकं सेना अवतु प्र युत्सु॥7॥

हे  अविचल  हे  अद्वितीय   प्रभु   तुम   सबकी   रक्षा   करना ।
दुष्ट-दमन अति आवश्यक है सज्जन का सदा  ध्यान रखना॥7॥

9995
इन्द्र   आसां   नेता   बृहस्पतिर्दक्षिणा  यज्ञः  पुर   एतु  सोमः ।
देवसेनानामभिभञ्जतीनां  जयन्तीनां   मरुतो  यन्त्वग्रम् ॥8॥

देव - बृहस्पति   सबसे   आगे   हर  जगह  उपस्थित  रहते  हैं ।
मति  की  महिमा सभी मानते मति-अनुसार कर्म-करते हैं ॥8॥

9996
इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य  राज्ञ  आदित्यानां मरुतां शर्ध उग्रम् ।
महामनसां  भुवनच्यवानां  घोषो  देवानां जयतामुदस्थात् ॥9॥

आदित्य - अम्बु  और अनिल - देव ये तीनों सँग-सँग रहते हैं  ।
अति  विशाल  है  मन  इनका जय - घोष के साथ ठहरते हैं ॥9॥

9997
उध्दर्षय   मघवन्नायुधान्युत्सत्वनां   मामकानां    मनांसि ।
उद्वृवृत्रहन्वाजिनां वाजिनान्युद्रथानां जयतां यन्तु  घोषा:॥10॥

कर्म - योग  का  पथ  दिखलाओ  प्रभु प्रेरक-पन्थ प्रदान करो ।
इस  जीवन  में  आनन्द समाए सबकी विपदा तुम्हीं हरो॥10॥

9998
अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ता जयन्तु।
अस्माकं वीरा उत्तरे बभवन्त्वस्मॉं उ देवा अवता हवेषु ॥11॥

सदा  सुरक्षा  देना  प्रभु - वर  इस  रण  में विजय हमारी हो ।
सबका प्रभु कल्याण सदा हो असत पर सत ही भारी हो ॥11॥

9999
अमीषं     चित्तं     प्रतिलोभयन्ती    गृहाणाङ्गान्यप्वे    परेहि ।
अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैरन्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम्॥12॥

असुर - वृत्ति   से   दूर   रहें   हम  हे  प्रभु  तुम   ही  हमें  बचाना ।
मन से तमस मिटाना प्रभुवर और फिर प्रकाश तक ले जाना॥12॥

10000
प्रेता  जयता  नर  इन्द्रो  वः  शर्म  यच्छतु ।
उग्रा वः सन्तु बाहवोSनाधृष्या यथासथ॥13॥

आनंदित हो हम सबका मन सबको सुख-शान्ति प्रदान करो ।
हे  प्रभु हमें समर्थ बनाओ यश - वैभव का भण्डार  भरो ॥13॥     


    

    

Sunday, 1 December 2013

सूक्त - 104

[ऋषि- अष्टक वैश्वामित्र । देवता-इन्द्र । छन्द- त्रिष्टुप् ।]

10001
असावि सोमः पुरुहूत तुभ्यं हरिभ्यां यज्ञमुप याहि तूयम्।
तुभ्यं गिरो विप्रवीरा इयाना दधन्विर इन्द्र पिबा सुतस्य॥1॥

हे  सूर्य - देव  स्तुति  करते  हैं  हम  करते  हैं तेरा आवाहन ।
प्रभु हम सभी प्रतीक्षा-रत हैं सोम - पान कर लो  भगवन॥1॥

10002
अप्सु  धूतस्य  हरिवः पिबेह  नृभिः सुतस्य  जठरं  पृणस्व।
मिमिक्षुर्यमद्रय इन्द्र  तुभ्यं तेभिर्वर्धस्व  मदमुक्थवाहः ॥2॥

प्रभु  तुम  सोम - पान  कर  लो  हम  यही  निवेदन करते हैं ।
धन - धान  सदा  देते  रहना हम ध्यान तेरा  ही धरते हैं ॥2॥

10003
प्रोग्रां पीतिं वृष्ण इयर्मि स सत्यां प्रयै सुतस्य हर्यश्व तुभ्यम्।
इन्द्र धेनाभिरिह मादयस्व धीभिर्विश्वाभिःशच्या गृणानः॥3॥

तुम  ही  सुख  देते  हो  भगवन  हम  जानते  हैं तुम आओगे ।
तुम्हें सोम अर्पित करते  हैं  तुम  ज्ञान की बात बताओगे॥3॥

10004
ऊती  शचीवस्तव  वीर्येण   वयो  दधाना   उशिज   ऋतज्ञा: ।
प्रजावदिन्द्र  मनुषो   दुरोणे   तस्थुर्गृणन्तः  सधमाद्यासः ॥4॥

अन्न - धान   हमको   देना   प्रभु   समझदार  सन्तति  देना ।
आनन्द-मग्न हो जीव यहॉं पर अपना आत्मीय बना लेना॥4॥

10005
प्रणीतिभिष्टे   हर्यश्च   सुष्टोः  ससुषुम्नस्य  पुरुरुचो  जनासः ।
मंहिष्ठामूतिं वितिरे दधाना: स्तोतार इन्द्र तव सूनृताभिः ॥5॥

अद्भुत  छवि  है  बल  अपार  है  तुम यश-वैभव के स्वामी हो ।
धन-वैभव हमको देना प्रभु शुभ -चिन्तन के अनुगामी हो॥5॥

10006
उप  ब्रह्माणि  हरिवो  हरिभ्यां  सोमस्य  याहि पीतये सुतस्य ।
इन्द्र त्वा यज्ञःक्षममाणमानड् दाश्वॉं अस्यध्वरस्य प्रकेतः॥6॥

तुम तेज-पुञ्ज हो क्षमाशील हो तुम हो सब विषयों के ज्ञाता ।
सोम तुम्हें अच्छा लगता है तुम हो अक्षय- फल के दाता ॥6॥

10007
सहस्त्रवाजमभिमातिषाहं     सुतेरणं    मघवानं     सुवृक्तिम् ।
उप भूषन्ति गिरो अप्रतीतमिन्द्रं नमस्या जरितुः पनन्त॥7॥

तुम असीम-बल के अधिपति हो हमको भी  दे  दो  चारों बल ।
अन्याय-संग तुम ही लडते हो हमें भी देना शुभ-शुभ फल॥7॥

10008
सप्तापो देवीः सुरणा अमृक्ता याभिः सिन्धुमतर इन्द्र  पूर्भित् ।
नवतिं स्त्रोत्या नव च स्त्रवन्तीर्देवेभ्यो गातुं मनुषे च विन्दः॥8॥

हविष्यान्न   तुम   ही   देते   हो  दुष्ट - दलन  तुम   करते  हो ।
गन्तव्य हमारा हमें प्राप्त हो इसका ध्यान तुम्हीं रखते हो ॥8॥

10009
अपो      महीरभिशस्तेरमुञ्चोSजागरास्वधि     देव     एकः ।
इन्द्र यास्त्वं  वृत्रतूर्ये चकर्थ ताभिर्विश्वायुस्तन्वं  पुपुष्या:॥9॥

मेघ  हमें  जल  दे  देता  है  इस  जगती  के  तुम  पालक हो ।
तुम सबके जीवन-दाता हो तुम जागरूक अभिभावक हो ॥9॥

10010
वीरेण्यः   क्रतुरिन्द्रः   सुशस्तिरुतापि   धेना   पुरुहूतमीट्टे ।
आदर्यद्वृत्रमकृणोदु  लोकं  ससाहे शक्रः पृतना  अभिष्टिः॥10॥

कर्म-योग  का  पाठ -पढाता   रवि करता नहीं कभी आराम ।
वेद-ऋचा महिमा गाती है अनगिन हैं  रवि  के आयाम ॥10॥

10011
शुनं   हुवेम   मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे   नृतमं    वाजसातौ ।
शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि सञ्जितं धनानाम्॥11॥

आदित्य-देव का ध्यान धरें हम सूर्य-देव का आवाहन है ।
आलोक-वान है वह परमात्मा वह अनुष्ठान का साधन है॥11॥