Wednesday, 13 November 2013

सूक्त- 123

[ऋषि- वेन भार्गव । देवता- आदित्य । छन्द- त्रिष्टुप ।]

10190
अयं    वेनश्चोदयत्पृश्निगर्भा     ज्योतिर्जरायू    रजसो   विमाने ।
इममपां   सङ्गमे   सूर्यस्य  शिशुं  न  विप्रा  मतिभी  रिहन्ति॥1॥

सूर्य  मेघ  निर्मित  वितान  से  रवि  रश्मि-युक्त  जल भरते हैं ।
वृष्टि  हेतु उपक्रम  करते  हैं  जन  शिशु-सम  अर्चन  करते  हैं ॥1॥

10191
समुद्रादूर्मिमुदियर्ति     वेनो    नभोजा:   पृष्ठं    हर्यतस्य    दर्शि ।
ऋतस्य  सानावधि  विष्टपि  भ्राट् समानं  योनिमध्यनूषत व्रा:॥2॥

सूर्य -   देव   जल   की  धारा  को   पृथ्वी    पर   प्रेषित   करते  हैं ।
आलोक - पुञ्ज उस सूर्यदेव का जन शिशु -सम अर्चन करते हैं॥2॥

10192
समानं    पूर्वीरभि  वावशानास्तिष्ठन्वत्सस्य   मातरः   सनीला: ।
ऋतस्य सानावधि चक्रमाणा रिहन्ति मध्वो अमृतस्य  वाणीः॥3॥

वत्स - भूत   विद्युत   की   माता   नीड   में  ही  स्थित  रहती  है ।
मेघ  की  मधुर  जल-वाणी  फिर  सूर्य-देव की स्तुति करती है ॥3॥

10193
जानन्तो  रूपमकृपन्त  विप्रा  मृगस्य  घोषं  महिषस्य  हि  ग्मन् ।
ऋतेन   यन्तो   अधि  सिन्धुमस्थुर्विद्गन्धर्वो  अमृतानि  नाम ॥4॥

ज्ञानी - जन  रवि  के  स्वरूप  का  दर्शन  कर उसे नमन करते हैं ।
सृष्टि - नियम आदित्य निभाते हम सुधा-सलिल प्राप्त करते हैं ॥4॥

10194
अप्सरा  जारमुपसिष्मियाणा   योषा   बिभर्ति   परमे    व्योमन् ।
चरत्प्रियस्य  योनिषु  प्रियः सन्त्सीदत्पक्षे  हिरण्यये  स वेनः॥5॥

अप्सरा  सदृश  बिजली  मुस्काती  रवि  के  संग  विचरती  है ।
वह  मन  ही  मन  पत्नी  सम  आदित्य  का  वरण  करती   है ॥5॥ 

10195
नाके   सुपर्णमुप   यत्पतन्तं   हृदा   वेनन्तो  अभ्यचक्षत  त्वा ।
हिरण्यपक्षं   वरुणस्य  दूतं  यमस्य  योनौ  शकुनं  भुरण्यम् ॥6॥ 

सूर्य - देव   नभ   में   स्थिर   हैं   पृथ्वी  परिक्रमा   करती   है ।
रवि  सबका  पालक-पोषक  है  यही  सोचती  यह  धरती  है ॥6॥ 

10196
ऊर्ध्वो गन्धर्वो अधि नाके अस्थात्प्रत्यङ् चित्रा बिभ्रदस्यायुधानि।
वसानो  अत्कं  सुरभिं  दृशे  कं  स्व1र्ण  नाम जनत प्रियाणि ॥7॥

आदित्य  अन्तरिक्ष  स्थित  हैं  विद्युत - छटा  से  वे  शोभित  हैं ।
रवि  जल  को  धारण  करता है वह ही तो आदित्य-अमित है ॥7॥

10197
द्रप्सः  समुद्रमभि  यज्जिगाति  पश्यन्गृध्रस्य  चक्षसा विधर्मन् ।
भानुः  शुक्रेण  शोचिषा  चकानस्तृतीये  चक्रे रजसि प्रियाणि ॥8॥

नभ  में  आदित्य  सुशोभित है वह  उदक-बिन्दुओं का धारक है ।
सूर्य  मेघ  के  ही  समीप है रवि सुधा - तुल्य जल - दायक है ॥8॥
  

सूक्त - 124

[ऋषि- अग्नि-वरुण-सोम । देवता- अग्नि । छन्द- त्रिष्टुप- जगती ।]

10198
इमं   नो  अग्न  उप  यज्ञमेहि   पञ्चयामं  त्रिवृतं सप्ततन्तुम् ।
असो  हव्यवाळुत  नः पुरोगा ज्योगेव  दीर्घं तम आशयिष्ठा:॥1॥

हे  अग्नि  तुम्हीं  हवि  के  वाहक  हो  करते  हैं  हम  आवाहन ।
मन  में   है  जो  घना  अँधेरा  देना  प्रकाश  पावक - पावन ॥1॥

10199
अदेवाद्देवः    प्रचता   गुहा   यन्प्रपश्यमानो    अमृतत्वमेमि ।
शिवं यत्सन्तमशिवो जहामि स्वात्सख्यादरणीं नाभिमेमि॥2॥

जब तक हवि वहन नहीं करते हो वस्तु-मात्र हो तुम अदेव हो ।
पर  जब  हविष्यान्न  लेते  हो  तुम  देवत्व  प्राप्त  करते हो ॥2॥

10200
पश्यन्नन्यस्या अतिथिं वयाया ऋतस्य धाम वि मिमे पुरुणि।
शंसामि   पित्रे   असुराय   शेवमयज्ञियाद्यज्ञियं   भागमेमि ॥3॥

मैं अग्नि हर ऋतु में यज्ञ हेतु उपयुक्त जगह निश्चित करता हूँ ।
सद्-गति के लिए ही पूर्वज के मैं स्तुति को सस्वर पढता हूँ॥3॥

10201
बह्वीः  समा अकरमन्तरस्मिन्निन्द्रं  वृणानः  पितरं  जहामि ।
अग्निः सोमो वरुणस्ते च्यवन्ते  पर्यावर्द्राष्ट्रं तदवाम्यायन् ॥4॥

अपना  अरण्य  तज  देता  हूँ  मैं  यज्ञ-भूमि  में  बस  जाता हूँ ।
जब सोम वायु थक जाते हैं  तब उन्हें सुरक्षित ले आता हूँ ॥4॥ 

10202
निर्माया  उ त्ये  असुरा  अभूवन्त्वं  च  मा  वरुण  कामयासे ।
ऋतेन   राजन्ननृतं   विविञ्चन्मम   राष्ट्रस्याधपत्यमेहि ॥5॥

असुर  भी  तज  देते  हैं  माया  यज्ञ- कुण्ड  में मुझे  देखकर ।
हे वरुण राज्य-सिंहासन पर तुम  बैठो  सत का व्रत लेकर ॥5॥

10203
इदं     स्वरिदमिदास     वाममयं    प्रकाश    उर्व1न्तरिक्षम्  ।
हनाव  वृत्रं  निरेहि  सोम  हविष्ट्वा  सन्तं  हविषा यजाम ॥6॥

हे सोम स्वर्ग सुन्दर है अतिशय अन्तरिक्ष भी ज्योति-पुञ्ज है।
हम  देव-रूप  में  तुम्हें देखते हवि ले लो आनन्द-कुञ्ज है ॥6॥

10204
कविः कवित्वा  दिवि  रूपमासजदप्रभूती  वरुणो  निरपः  सृजत् ।
क्षेमं कृण्वाना जनयो न सिन्धवस्ता अस्य वर्णं शुचयो भरिभ्रति॥7॥

यह सूर्यलोक तो दिव्य - लोक  है वरुण  मेघ  में जल  भरते हैं ।
जल से नदी प्रवाहित होती जिससे अनगिन प्राणी पलते हैं ॥7॥

10205
ता अस्य ज्येष्ठमिन्द्रियं सचन्ते ता ईमा क्षेति स्वधया मदन्ती:।
ता  ईं  विशो  न राजानं वृणाना वीभत्सुवो अप वृत्रादतिष्ठन् ॥8॥ 

जैसे   भयभीत   प्रजा   अपने   राजा   का   आश्रय   लेती   है ।
वैसे  हे  जल  की  धारा  भी  जल-देव  का आश्रय  ले लेती है ॥8॥

10206
वीभत्सूनां   सयुजं   हंसमाहुरपां  दिव्यानां   सख्ये   चरन्तम्  ।
अनुष्टुभमनु  चर्चूर्य  माणमिन्द्रं  नि चिक्युः कवयो  मनीषा ॥9॥

भयभीत  नीर  के मित्र - मित्र  हैं  सूर्य  सतत  स्तवन योग्य है ।
अनुष्टुप-जगती युक्त -यज्ञ को कवि-मन कहता है प्रणम्य है ॥9॥    
 

Tuesday, 12 November 2013

सूक्त - 125

[ऋषिका- वागाम्भृणी । देवी- वागाम्भृणी ।छन्द- त्रिष्टुप-जगती ।]

10207
अहं       रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत          विश्वदेवैः ।
अहं  मित्रावरुणोभा  बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा ॥1॥

मैं  वाणी  की  देवी  वाग्देवी  हूँ  विद्वत्-जन  संग विचरती हूँ ।
यह पञ्च-भूत ही मेरा घर है मैं साधिकार घर पर रहती हूँ॥1॥

10208
अहं   सोममाहनसं   बिभर्म्यहं   त्वष्टारमुत   पूषणं   भगम् ।
अहं दधामि द्रविणं हविष्मतेसुप्राव्ये3यजमानाय सुन्वते ॥2॥

मैं  यश- वैभव  की  धात्री  हूँ  तन-मन  सदा  तृप्त  करती  हूँ ।
कला-उपासक यश-धन पाता मन-गागर सबका भरती हूँ ॥2॥

10209
अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् ।
तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् ॥3॥

मैं  सम्पूर्ण  राष्ट्र  की  वाणी  हूँ शुभ के संग सतत रहती हूँ ।
जग में जो भी मंगल होता है उसका प्रसार मैं करती हूँ ॥3॥

10210
मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यःप्राणिति य ई शृणोत्युक्तम्।
अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रध्दिवं ते वदामि ॥4॥ 

मेरी  क्षमता  प्राण-शक्ति  है  उससे  ही  सब  सुख  पाते  हैं ।
जो  मेरी  महिमा  नहीं  जानते वे स्वतः नष्ट हो जाते हैं ॥4॥

10211
अहमेव  स्वयमिदं   वदामि   जुष्टं   देवेभिरुत   मानुषेभिः ।
यं कामये तंतमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्॥5॥

देव - मनुज  सेवन  करते  हैं  मैं   ही  तो  हूँ  वह   उपदेश ।
गुण-कर्म-स्वभाव बॉंटती हूँ मैं सज्जन का है यह परिवेश॥5॥

10212
अहं   रुद्राय   धनुरा   तनोमि   ब्रह्मद्विषे   शरवे  हन्तवा  उ ।
अहं  जनाय  समदं  कृणोम्यहं  द्यावापृथिवी  आ विवेश ॥6॥

दुर्जन के लिए काल मैं ही हूँ जन-हित के लिए लडा करती हूँ।
मैं धरती पर ही रहती  हूँ और नीति-न्याय संग रहती हूँ ॥6॥ 

10213
अहं  सुवे  पितरमस्य  मूर्धन्मम  योनिरप्स्व1न्तः  समुद्रे ।
ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि ॥7॥

सिंहासन पर नित रहे योग्य नर इसी में है जग का कल्याण।
सबको  यही  सिखाती  हूँ  मैं नीति-न्याय से पाओ मान ॥7॥

10214
अहमेव  वात   इव  प्र   वाम्यारभमाणा   भुवनानि   विश्वा ।
परो  दिवा  पर  एना  पृथिव्यैतावती  महिना  सं  बभूव ॥8॥ 

समीर- सदृश  विचरण करती  हूँ रखती हूँ मैं सबका ध्यान ।
स्वार्थ छोड परमार्थ पकड लो यही है सबसे सच्चा ज्ञान ॥8॥  
 

Monday, 11 November 2013

सूक्त - 126

[ऋषि- अंहोमुक् वामदेव । देवता- विश्वेदेवा । छन्द- बृहती- त्रिष्टुप ।]

10215
न     तमंहो     न     दुरितं     देवासो     अष्ट    मर्त्यम् ।
अजोषसो यमर्यमा मित्रो नयन्ति वरुणो अति द्विषः॥1॥ 

न्याय  मित्र  और  वरुण- देव  दुश्मन से हमें बचाते हैं ।
सत- पथ पर ही  वे ले जाते हैं सदाचार सिखलाते हैं ॥1॥

10216
तध्दि       वयं       वृणीमहे       वरुण       मित्रार्यमन् ।
येना  निरंहसो  यूयं  पाथ  नेथा  च मर्त्यमति द्विषः ॥2॥

हे  त्रिदेव  विनती  है  तुमसे  दुष्कर्मो  से  सदा  बचाना ।
सदा सुरक्षा देना हमको सत्कर्मों के पथ पर ले जाना॥2॥

10217
ते     नूनं     नोSयमूतये     वरुणो     मित्रो     अर्यमा ।
नयिष्ठा उ  नो  नेषणि  पर्षिष्ठा उ नः पर्षण्यति  द्विषः ॥3॥

हे प्रभु संकट से सदा बचाना सब के हित की बात बताना।
तेरी शरण में हम आए हैं पर-हित का ही पाठ पढाना॥3॥

10218
यूयं     विश्वं     परि     पाथ     वरुणो    मित्रो   अर्यमा ।
युष्माकं शर्मणि  प्रिये  स्याम सुप्रणीतयोSति  द्विषः ॥4॥

जग के तुम ही रखवाले हो हम  करते  हैं  तेरा आवाहन ।
तुम प्यार बहुत करते हो हमसे देते रहना सुख साधन॥4॥

10219
आदित्यासो    अति    स्त्रिधो    वरुणो    मित्रो   अर्यमा ।
उग्रं  मरुभ्दी रुद्रं  हुवेमेन्द्रमग्निं  स्वस्तयेSति द्विषः ॥5॥

हे रुद्र इन्द्र और अग्नि-देव कल्याण सदा सबका करना ।
हम  प्रेम  से  तुम्हें  बुलाते हैं तुम ऐसे ही आते रहना ॥5॥

10220
नेतार    ऊ     षु    णस्तिरो    वरुणो     मित्रो     अर्यमा ।
अति  विश्वानि  दुरिता  राजानश्चर्षणीनामति   द्विषः ॥6॥

हे  धीर- वीर गुण  के स्वामी हम तुमसे विनती करते हैं ।
सुखकर मार्ग दिखाना प्रभु मन के विकार से डरते हैं ॥6॥

10221
शुनमस्मभ्यमूतये        वरुणो        मित्रो        अर्यमा ।
शर्म यच्छन्तु सप्रथ आदित्यासो  यदीमहे अति द्विषः॥7॥ 

सतत  सुरक्षा  देना  प्रभु  जी  दे  देना  हमको  चारों बल ।
सुख सम्पदा सदा हो घर में कभी न करें किसी से छल॥7॥

10222
यथा ह त्यद्वसवो  गौर्यं चित्पदि षिताममुञ्चता यजत्रा: ।
एवो ष्व1स्मन्मुञ्चता व्यंहः प्र तार्यग्ने  प्रतरं न आयुः॥8॥ 

यदि  हमसे  कोई  भूल  हुई  हो हे प्रभु हमें क्षमा कर देना ।
लम्बी उम्र हमें देना तुम अपना समझकर अपना लेना॥8॥
    

Sunday, 10 November 2013

सूक्त - 127

[ऋषि- रात्रि- भारद्वाजी । देवता- रात्रि । छन्द- गायत्री ।]

10223
रात्री व्यख्यदायती पुरुत्रा देव्य1 क्षभिः । विश्वा अधि श्रियोSधित ॥1॥

धरा-गगन में तमस बिछाती निशा चुपचाप चली आती है ।
नक्षत्र - नेत्र से देखने वाली रात्रि - परी सबको भाती  है ॥1॥

10224
ओर्वप्रा अमर्त्या निवतो देव्यु1द्वतः। ज्योतिषा बाधते तमः॥2॥

अमर-रात्रि फिर अन्तरिक्ष को तम से आच्छादित करती है ।
ग्रह-नक्षत्र आदि माध्यम से तम को कष्ट दिया करती है ॥2॥

10225
निरु स्वसारमस्कृतोषसं देव्यायती । अपेदु हासते तमः ॥3॥

रात्रि  भोर  की  करे  प्रतीक्षा वह ऊषा को प्रतिष्ठित करती है ।
तमस  मेट कर  ऊषा- गुलाबी प्रकाश की पोथी रचती है ॥3॥

10226
सा नो अद्य यस्या वयं नि ते यामन्नविक्ष्महि।वृक्षे न वसतिं वयः॥4॥

रात  में  हम  सब  सो  जाते  हैं  पूरी  दुनियॉ  सो  जाती  है ।
रात्रि  थकान  मिटा  देती है वह सुख की नींद सुलाती है ॥4॥ 

10227
नि ग्रामासो अविक्षत नि पद्वन्तो नि पक्षिणः।नि श्येनासश्चिदर्थिनः॥5॥

सभी  जीव  विश्राम  हेतु  फिर  रात  की  गोद  में  ही जाते हैं ।
यह रात्रि सभी को सुखकर हो जहॉ सभी थकान मिटाते हैं ॥5॥

10228
यावया वृक्यं 1वृकं यवय स्तेनमूर्म्ये।अथा नः सुतरा भव ॥6॥

हे  देवी  हमें  सुरक्षा  देना  कल्याण  तुम्हीं  सबका  करना ।
हम सुख की नींद रात्रि में सोयें सबका ध्यान तुम्हीं रखना॥6॥

10229
उप मा पेपिशत्तमः कृष्णं व्यक्तमस्थित। उष ऋणेव यातव॥7॥

मनस्तमस  को  तुम्हीं  मिटाना  अँधकार  को  दूर  भगाना ।
ऊषा-सुन्दरी प्रतिदिन आना संग में नूतन प्रकाश ले आना॥7॥

10230
उप ते गा इवाकरं वृणीस्व दुहितर्दिव:।रात्रि स्तोमं न जिग्युषे॥8॥

सूरज  की  बेटी  रात- परी  को शुभ-भावों के संग-संग रखते  हैं ।
हे रात्रि तुम्हीं शुभदा-सुखदा हो तुम्हें सविनय नमन करते हैं॥8॥     

Saturday, 9 November 2013

सूक्त - 128

[ऋषि- विहव्य आङ्गिरस । देवता- विश्वेदेवा । छन्द- त्रिष्टुप-जगती ।]

10231
ममाग्मे  वर्चो   विहवेष्वस्तु   वयं  त्वेन्धानास्तन्वं  पुषेम ।
मह्यं   नमन्तां   प्रदिशश्चत्स्त्रस्त्वयाध्क्षेण   पृतना   जयेम ॥1॥

प्रभु   हम   तेजस्वी   बन  जायें  यज्ञ- धूम  से  पुष्टि  मिले ।
दशों - दिशाओं   में   यश   पायें  मन  से  भी  संतुष्टि  मिले ॥1॥

10232
मम  देवा  विहवे  सन्तु  सर्व  इन्द्रवन्तो  मरुतो  विष्णुरग्निः ।
ममान्तरिक्षमुरुलोकमस्तु मह्यं वातः पवतां कामे अस्मिन् ॥2॥

सूर्य - अग्नि - और पवन - देव से आश्रय  की  है  हमें  अपेक्षा ।
अन्तरिक्ष  में  यश  फैले और  प्राण - पवन  दें  हमें  सुरक्षा ॥2॥

10233
मयि  देवा  द्रविणमा  यजन्ता  मय्याशीरस्तु  मयि  देवहूतिः ।
दैव्या  होतारो  वनुषन्त  पूर्वेSरिष्टा:  स्याम  तन्वा सुवीरा: ॥3॥

हे  अग्नि - देव  धन - वैभव  दे  दो  करते  हैं  तेरा  आवाहन ।
तन- मन से परिपुष्ट रहें प्रभु सुख संतति- पायें मन-भावन ॥3॥

10234
मह्यं यजन्तु मम यानि हव्याकूतिः सत्या  मनसो  मे  अस्तु ।
एनो मा नि गां कतमच्चनाहं विश्वे देवासो अधि वोचता नः॥4॥

संकल्प  पूर्ण  करना  प्रभु  मन  का  दुष्कर्मों  से  हमें  बचाना ।
हविष्यान्न  देते  हैं  प्रभुवर  अविरल  आशीष हमें दे जाना ॥4॥

10235
देवीः  षळुर्वीरुरु  नः  कृणोत   विश्वे   देवास   इह   वीरयध्वम् ।
मा हास्महि प्रजया मा तनूभिर्मा रक्षाम द्विषते सोम राजन् ॥5॥

हे  षट् - देवी  धन - वैभव   दो   दुष्टों   से   तुम   हमें   बचाना ।
तन - मन से हम हों बलशाली संतति गुण-सम्पन्न बनाना॥5॥

10236
अग्ने मन्युं प्रतिनुदन्परेषामदब्धो गोपा: परि पाहि नस्त्वम् ।
प्रत्यञ्चो यन्तु निगुतः पुनस्ते3मैषां चित्तं प्रबुधां वि नेशत् ॥6॥

सदा  सुरक्षा   देना  प्रभुवर  सद् - बुध्दि  सभी  को   दे   देना ।
शुभ-शुभ चिन्तन हो हम सबका सुख सन्मति सबको देना ॥6॥

10237
धाता  धातृणां  भुवनस्य  यस्पतिर्देवं त्रातारमभिमातिषाहम् ।
इमं यज्ञमश्विनोभा बृहस्पतिर्देवा: पान्तु यजमानं न्यर्थात् ॥7॥

हे  इन्द्र- देव  है  यही  प्रार्थना  निर्विघ्न  यज्ञ - सम्पादन हो ।
प्रज्ञा- जागृत  हो  जाए  प्रभु  शुभ-शुभ ही  यह अनुष्ठान हो ॥7॥ 

10238
उरुव्यचा  नो  महिषः शर्म  यंसदस्मिन्हवे  पुरुहूतः  पुरुक्षुः ।
स  नः  प्रजायै  हर्यश्च  मृळयेन्द्र मा नो रीरिषो मा परा दा: ॥8॥

हे अग्नि- देव  हे  इन्द्र-देव  सबकी  सन्तति  सतत सुखी हो ।
तुम  वरद - हस्त  लेकर आना  कोई  भी  यहॉं  दुखी  न हो ॥8॥ 

10239
ये नः सपत्ना अप ते भवन्त्विन्द्राग्निभ्यामव बाधामहे तान् ।
वसवो रुद्रा आदित्या उपरिस्पृशं मोग्रं चेत्तारमधिराजमक्रन्॥9॥

भीतर - बाहर  के  दुश्मन  से  प्रभु  सदा  हमारी  रक्षा करना ।
शौर्य - धैर्य  दे  देना  प्रभु-वर  सद्-गुण  ही  हो  मेरा गहना ॥9॥
  

Friday, 8 November 2013

सूक्त - 129

[ऋषि- प्रजापति परमेष्ठी । देवता- भाववृत्त । छन्द- त्रिष्टुप ।]

10240
नासदासीन्नो  सदासीत्तदानीं  नासीद्रजो  नो व्योमा परो यत् ।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम् ॥1॥

प्रलय  काल  में  सृष्टि  नहीं  थी  न  ही  जग था  न अभाव था ।
भू- नभ के सिवा कुछ भी न था पञ्च-भूत का भी अभाव था॥1॥

10241
न   मृत्युरासीदमृतं  न   तर्हि  न  रात्र्या   अह्न  आसीत्प्रकेतः ।
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माध्दान्यत्र  परः किं चनास ॥2॥

न  अमरत्व  और  न  मृत्यु  दिवा - रात्रि  का  ज्ञान  नहीं  था ।
अपर  कोई  अस्तित्व  नहीं  था  एक-मात्र  परमेश्वर ही था ॥2॥

10242
तम   आसीत्तमसा   गूळहमग्रेSप्रकेतं  सलिलं  सर्वमा  इदम् ।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं    यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम् ॥3॥

अज्ञान  तमस  से भरा हुआ था दसों-दिशा अव्यक्त सदृश था ।
स्वधा  प्रकृति  से तब प्रभु प्रकटे विशेषण नेति-नेति ही था॥3॥

10243
कामस्तदग्रे   समवर्तताधि   मनसो   रेतः  प्रथमं   यदासीत्।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन्ह्रदि प्रतीष्या  कवयो मनीषा ॥4॥

जग -रचना का विचार आया मन में ही बीज का हुआ वपन ।
निज-प्रज्ञा से ज्ञानी- जन ने प्रकट-तत्व का किया निरुपण॥4॥

10244
तिरश्चीनो  विततो  रश्मिरेषामधः  स्विदासी3दुपरि  स्विदासी3त् ।
रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयति: परस्तात्॥5॥

प्रश्न - रश्मि  फिर  हुई  तरंगित  कर्मों  के  फल  सम्मुख  आए ।
बध्द- जीव  भी  लगे  दीखने  और मुक्त - जीव  भी  सामने आए॥5॥

10245
को  श्रध्दा वेद  क  इह  प्र  वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः।
अर्वाग्देवा   अस्य   विसर्जनेनाथा   को   वेद  यत  आबभूव ॥6॥

अनादि- सृष्टि है जब से प्रभु हैं अनादि -सृष्टि सचमुच अपार है ।
जग - रचना का झंझट छोडें आत्म - शुध्दि  ही यहॉ सार है ॥6॥

10246
इयं   विसृष्टिर्यत   आबभूव   यदि   वा   दधे   यदि   वा   न ।
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ॥7॥

सृष्टि  बनी  कैसे  वह  जाने  किसने  रचना  की  क्या  जानें ।
मन- हेतु अगोचर है रचना अनुमान वृथा यदि मन की मानें॥7॥