Wednesday, 2 October 2013

मोहनदास करमचंद गॉंधी

मोहनदास   करमचंद  गॉंधी   यही   था  उनका  पूरा   नाम
र  घडी  सोचते  मातृभूमि  पर  कब  होगा  पूरा  यह काम।

  तलवार  न  बरछी  से  ही  बिन  रक्तपात के  हों आज़ाद
दास   नहीं   हम   अँग्रेज़ों   के  सत्याग्रह   से  होंगे  आबाद ।

मरथ को फिर साथ मिला आज़ाद भगत थे तिलक बोस
र्मयोग था  लक्ष्य  देह का यात्रा लंबी  थी अनगिन - कोस ।

त रहे निरंतर राष्ट्र - यज्ञ में स्वजनों का था सुन्दर - साथ 
न का मन से जो नाता था जनमन को फिर किया सनाथ ।

चंबा   से   फिर  रामेश्वर  तक   सत्याग्रह  अभियान  चला
धीचि सदृश उत्सर्ग हो गए यह थी उनकी जीने की कला ।

गॉंधी  का  वह  चरखा  अब  भी  देशी  का  पाठ  पढाता  है
धीर - वीर बन कर उभरो तुम वह  हर पल हमें सिखाता है ।

शकुन्तला शर्मा , भिलाई [ छ. ग. ]

10 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर रचना।

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (03-10-2013) को "ब्लॉग प्रसारण : अंक 135" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

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  3. सुंदर भावों के साथ सार्थक विचारों की काव्‍य प्रस्‍तुति।

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  4. आज और सर्वसमय के लिए एक सर्वकालिक रचना

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  5. सुन्दर रचना।

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  6. बहुत अच्छी रचना है बधाई

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