Tuesday, 9 April 2013

मेरे सहचर

                             
जब - जब मैं चलते - चलते  लड़खड़ाई  मेरे  गीतों  ने मुझे  थाम लिया
जब - जब  मैं   निराश  हुई  मेरी   कविताओं   ने  मुझे   सहारा   दिया l

जब - जब   मैं  रोई   मेरी   कहानियों   ने  मुझे  गले  से  लगा   लिया
जब - जब   मैं   अकेली   हुई   मेरे  निबंधों  ने  मेरा   साथ   निभाया l

जब - जब मैं जीवन समर में हारी मेरी गजलों ने  मुझे  हौसला दिया
जब - जब  मैं  टूट  कर  बिखरी  मेरे  हाइकू  ने  मुझे  संभाल  लिया l

जब  मैं दीन - हीन हुई मेरे नाटकों ने मुझे आत्मविश्वास से भर दिया
मेरी  बेवकूफी  को   मेरे   सहचरों  ने  अपने  दामन  में  छिपा लिया l

जब - जब मुझे अहंकार ने  छुआ  मेरे सहचरों  ने  मुझे  उबार  लिया
मेरी कमियों को उजागर करके कसौटी पर कसने का उपक्रम किया l

                                           शकुन्तला शर्मा
                                            भिलाई [छ ग ]

Monday, 8 April 2013

आमचो बस्तर

बहुत दिनों बाद मै कांकेर जा रही थी । कांकेर की ब्यूटी एकदम अलग है । यह दूध नदी के तट पर , गड़िया पहाड़ की तलहटी में बसा हुआ है । वहाँ पर छोटे बड़े विभिन्न आकार प्रकार के बहुत ही खूबसूरत पत्थर , रास्तों के दोनों ओर , चुलबुले बच्चों की तरह दिखाई देते हैं । साथ चलने के लिए मचलते हैं । मेरी इनसे दोस्ती हो गई है । ये मुझसे बातें करते हैं । कहते हैं - 'शकुन ! तुम बहुत मतलबी हो । भिलाई पहुँचकर हमें भूल जाती हो ! हमें तुम्हारी बहुत याद आती है । तुम्हें याद है न ! जब तुम पिछली बार हमसे मिलने आई थी तो हम लोग कितनी मस्ती किए थे , है न ? तुमने हमें ' निराला ' की वह कविता सुनाई थी , जिसमे हमारा भी जिक्र हुआ है ।

वह कविता हमें याद है - 'वह तोड़ती पत्थर , देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर । '

पिछली बार तुमने हमसे कहा था कि पन्ना , पुखराज , माणिक और नीलम भी हमारे ही वंशज हैं , मेरे मस्तक पर हाथ रखकर तुमने बड़े प्यार से कहा था कि - ' हे शिलाखण्ड ! तुम पर मुझे गर्व है । तुम मुझे गोवर्धन की तरह लगते हो , क्योंकि तुम भी तो गो - वर्धन में सहयोग करते हो । तुम्हारे आस - पास गोचर होता है , जिससे गायों को भोजन मिलता है । गाय हमें गो - रस देती है । हमें स्वस्थ ,सुन्दर एवं समृद्ध बनाती है, तुम लोग बहुत अच्छे हो , मेरे दोस्त !'

सुनो न शकुन ! जैसे तुम लोग , बाघ , हाथी ,वन - भैसा आदि के लिए अभ्यारण्य बनाते हो वैसे ही हम पत्थरों के लिए क्यों नही बनाते ? हम भी तो तुम्हारी धरोहर हैं ,फिर तुम लोग हमें ,जंगलों में ऐसे ही अदियावन क्यों छोड़ देते हो ? हम अलग - अलग चेहरे से तुम्हारा शहर , जंगल , पर्वत ,पठार सब कुछ तो सजाते हैं और पशु- पक्षियों की तरह तुमसे , कुछ खाने को भी नही मांगते , फिर भी तुम लोग हमें प्यार क्यों नहीं करते ?

शकुन ! तुम लोग पाखण्ड क्यों करते हो ? एक ओर तो गाय की पूजा करते हो , गो - माता कहते हो , दूसरी ओर जब वह बूढ़ी हो जाती है , तो उसे , थोड़े से पैसों में बेच देते हो , ताकि तुम्हारी सरकार उसे कत्ल - खाने भेज कर , उसकी निर्मम हत्या कर सके l अपने दोहरे चरित्र से क्या तुम लोग तनिक भी शर्मिन्दा नही होते ? वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि आज - कल , जैविक खेती करने वाले लोग गो - मूत्र को 15 रू लिटर में खरीद रहे हैं और गोबर भी अच्छी कीमत में बिक रहा है । शकुन !भारत में गायों की निर्मम हत्या होगी , ऐसा हमने कभी सोचा भी नहीं था l तुम गो - रक्षा के लिए कुछ करती क्यों नहीं ? ' अचानक वह चुप हो गया ।

गोवर्धन जिन परिस्थितियों में अचानक जिस ढंग से चुप हुआ , उसने मुझे अंदर से हिला दिया वह जब गो - हत्या के बारे में बता रहा था , तो मुझे ऐसा लगा , जैसे वह सिसक रहा है और उसे साँस लेने में तकलीफ हो रही है । वह हांफते - हांफते बोल रहा था और अचानक रुक गया था , फिर उसके सहोदर कैलाश ने मुझसे कहा - ' शकुन ! तुम जल्दी आओ l पता नहीं गो - वर्धन को क्या हो गया है , हम सबकी जान खतरे में है शकुन! तुम आ जाओ । कुछ मत पूछो । यहाँ आकर हमारी दुर्गति तुम खुद ही देख लो । तुम खुद ही समझजाओगी । '

मैं तुरन्त अपनी गाड़ी से कांकेर के लिए रवाना हो गई l रास्ते भर मैं बेचैन रही कि मेरे दोस्तों के साथ कुछ गलत न हो गया हो l जब मैं वहाँ पहुँची तो गो - वर्धन के प्राण - पखेरू उड़ गए थे, वह जगह - जगह से क्रेक हो चुका था , मेरे सभी दोस्त भी मरनासन्न हो चुके थे l मैंने कैलाश से पूछा तो उसने मुझे गुस्से से देखा और कहा - ' हमे देखकर भी क्या तुम्हें समझ में नहीं आता कि हमें हुआ क्या है ? हमें ध्यान से देखो और खुद

हमारी पीड़ा को महसूस करो । '

जब मैंने उन्हें ध्यान से देखा , तो मुझे पता चला कि किसी ने उन सबके शरीर पर 'x' बना दिया है । उनकी बुझी - बुझी आँखें मुझे टकटकी लगाए देख रही थीं और मैं उनके सामने बेबस बनकर , फूट - फूट कर रो रही थी ।

शकुन्तला शर्मा
भिलाई [छ ग ]

Sunday, 7 April 2013

गज़ल

                                                           
               छत्तीसगढ़ही गरु गुरतुर है हिंदी जितनी ही प्यारी है
               हिंदी जैसी  ही  सुन्दर  है  हिंदी जितनी ही प्यारी है l

               सरल सरस समरस भी है इसका अपना आकर्षण है
               अपरा परा गुनगुनाती है हिंदी जितनी ही प्यारी है l

               वेद शास्त्र सब गा सकती है सबकी व्याख्या करती है
               ओजस्वी आभा मण्डल है हिदी जितनी ही प्यारी है l

               रूप है गुण है सम्मोहन है महतारी जैसी महिमा  है l
               प्राणी अनायास खिंचता है हिंदी जितनी ही प्यारी है l

               स्पर्श राम का यह पाई है यह तो  महानदी  जैसी  है
               शबरी गाथा यह गाती  है हिंदी जितनी ही प्यारी है l

               अति उदार संस्कृति वाली है भेद भाव से यह ऊपर है
              ' शकुन 'यह बानी बहुत मधुर है हिंदी जितनी प्यारी है l

                                                                   शकुन्तला शर्मा
                                                                   भिलाई [छ ग ]           

Saturday, 6 April 2013

मेरे सब कुछ

                                     
इतने दिनों के बाद तुम्हारा घर लौटना ,मन को उद्वेलित कर रहा है
तुम्हारा नित नूतन स्पर्श देह  में सिहरन भर रहा है .

असंख्य महाकाव्यों से भरी तुम्हारी ऑंखें ,मुझे भावशून्य बना देती हैं
मेरे होठों में दबे शब्द , तुम्हारे पास जाने से कतराते हैं .
दुबक कर छिप जाते हैं , रात में सरगोशी के लिए .

तुम सचमुच वात्स्यायन हो , तुम्हारी हर चेष्टा मोहक है
तुम्हारा चुप रहना भी उतना ही मुखर है जितना तुम्हारा बोलना .

तुम्हारी शरारतें , तुम्हारे निश्छल मन की बयानबाजी है
मैं तुम्हारी सरलता  पर मुग्ध  हूँ , तुम्हारे होंठों के स्पर्श से ,
जो शब्द थिरकते हुए लहराते हैं ,वे मुझे मन्त्र जैसे लगते हैं .

तुम्हारे व्यक्तित्व में सम्मोहन है , मैं जान चुकी हूँ कि
मैं चाहे जितनी तुम्हारी शिकायतें करूं पर
तुम्हारे बिना जी नही सकती .

तुम मेरी धडकन हो , मेरा चिन्तन मनन निदिध्यासन हो.
एक शब्द में कहूँ , तो तुम्हीं मेरे जीवन का फागुन हो ,
होली का रंग हो , सुखद तरंग हो ,
तुम्हीं अनँग हो , तुम्हीं अनंग हो .

                                                 शकुन्तला शर्मा
                                                 भिलाई [छ ग ]



Sunday, 31 March 2013

भारत स्वाभिमान बढ. जाये।

लक्ष्मीबाई  भगतसिंह  जैसा  बच्चा-बच्चा बन जाये।
न केवल साक्षर हो भारत वेद शास्त्र को पढे.पढ़ाये।
देशी खाए  देशी पहने  परम्पराओं को पढ.  पाये ।
प्यार करे भारत से चाहे घर दुनिया में कहीं बसाये।
भाषा अपनी भूषा अपनी अपनी राष्ट्रीरयता  निभाये ।
दुनियॉं में वह कहीं भी हो वंदे मातरम मन में गाये।
पंद्रह अगस्त को ध्वज वंदन कर अपना शीश नवाये।
हे प्रभु तुम ऐसा कुछ कर दो भारत स्वाभिमान बढ.जाये।

शकुन्तला शर्मा
288/7 मैत्रीकुंज भिलाई -490006
अचल-0788 2227477 चल-09302830030

Friday, 8 March 2013

भारत का उन्नयन करेंगें


भारत का  उन्नयन  करेंगें  पुन:  प्रतिष्ठा  पायेंगें
मन मंदिर को स्वच्छ रखेंगें स्वर्ग धरा पर लायेंगें

बड़ी किरकिरी हुई हमारी अब हमने भी सोंच लिया
कर्म   योग   का   पाठ   पढ़ेंगें   भागीरथी  बहायेंगें

उन्नत  खेती  होगी  तो  भरपूर अन्न फिर उपजेगा
भारत स्वाभिमान के पथ पर धर्म घ्वजा फहरायेंगें

शब्दों  की उल्टी  परिभाषा   नहीं करेगा अब कोई
चरैवेति के पथ पर चलकर राम राज्य को लायेंगें

लोकतंत्र के बेइमानों की पोल खोलकर रख दो तुम
सतच्चरित्र  मानुष  को  ही  सिंहासन  पर बैठायेंगें

नहीं कोई जीने देगा तू सोंच समझ कर बोल 'शकुन'
कौए  भीड़ में  आ  आ  करके कोयल को समझायेंगें.

                                                   शकुन्तला शर्मा
                                                   भिलाई.