Monday, 20 January 2014

सूक्त - 55

[ऋषि- बृहदुक्थ वामदेव । देवता- इन्द्र । छन्द- त्रिष्टुप् ।]

9351
दूरे  तन्नाम  गुह्यं  पराचैर्यत्त्वा  भीते  अह्वयेतां  वयोधै ।
उदस्तभ्ना:पृथिवीं द्यामभीके भ्रातुःपुत्रान्मघवन्तित्विषाणः॥1॥

परमेश्वर  पावन  रहस्य  है  विरले  ही  उन्हें  जानते  हैं ।
वह प्रभु ही सबका आश्रय है ज्ञानी उनको पहचानते हैं॥1॥

9352
महत्तन्नाम  गुह्यं  पुरुस्पृग्येन  भूतं  जनयो  येन  भव्यम् ।
प्रत्नं जातं ज्योतिर्यदस्य प्रियं प्रिया: समविशन्त पञ्च॥2॥

हे  परमेश्वर  हे  परम - मित्र  तुझमें  अद्भुत  आकर्षण  है ।
गत-आगत के तुम्हीं सृजेता तुम्हें कोटिशः अभिवादन है॥2॥

9353
आ  रोदसी  अपृणादोत  मध्यं  पञ्च  देवॉ  ऋतुशः सप्तसप्त ।
चतुस्त्रिंशता  पुरुधा  वि चष्टे सरूपेण  ज्योतिषा विव्रतेन ॥3॥

परमेश्वर  ने  ही  पञ्च भूत  उनचास  पवन  को  रूप  दिया ।
चौतीस देव सम तेजस्वी प्रभु ने विभिन्न अवतार लिया ॥3॥

9354
यदुष  औच्छः प्रथमा  विभानामजनयो  येन  पुष्टस्य पुष्टम् ।
यते जामित्वमवरं परस्या महन्महत्या असुरत्वमेकम् ॥4॥

सूरज  के  आने  के  पहले  मुस्काती  हुई  ऊषा  आती  है ।
ऊर्ध्व - लोक - वसिनी ऊषा ही जग को भैरवी सुनाती है ॥4॥

9355
विधुं  दद्राणं  समने  बहूनां  युवानं  सन्तं  पलितो  जगार ।
देवस्य  पश्य  काव्यं  महित्वाद्या ममार स ह्यः समान ॥5॥

कर्म - योग  में  निपुण मनुज भी एक दिन बूढा हो जाता है ।
जो कल जिंदा था आज मरा कल फिर नव-जीवन पाता है॥5॥

9356
शाक्मना  शाको  अरुणः सुपर्ण आ यो महः शूरः सदाननीळः ।
यच्चिकेत सत्यमित्तन्न मोघं वसु स्पार्हमुत जेतोत दाता ॥6॥
 
वह  परमेश्वर  महाबली  है  तेजस्वी  है  सर्व - व्याप्त  है ।
सत्य - रूप  है  वह  परमात्मा ज्ञानी को वह सहज प्राप्त है ॥6॥

9357
ऐभिर्ददे  वृष्ण्या  पौंस्यानि  येभिरौक्षद्वृत्रहत्याय  व्रजी ।
ये कर्मणः क्रियमाणस्य मह्न ऋतेकर्ममुदजायन्त देवा:॥7॥
   
परमेश्वर  की  महिमा  अद्भुत  पृथ्वी  पर  होती  बरसात ।
बादल  नभ से जल बरसाते पल में खिलता है पात-पात॥7॥

9358
युजा कर्माणि जनयन्विश्वौजा अशस्तिहा विश्वमनास्तुराषाट्।
पीत्वी सोमस्य दिव आ वृधानः शूरो निर्युधाधमद्दसस्यून्॥8॥

हे  परमेश्वर  तुम ही प्रणम्य हो सत्पथ पर तुम ही ले चलना ।
पावन  प्रज्ञा  पायें  प्रभु-वर  जगती  की  तुम  रक्षा करना ॥8॥    

Sunday, 19 January 2014

सूक्त - 56

[ऋषि- बृहदुक्थ वामदेव । देवता- विश्वेदेवा । छन्द- त्रिष्टुप्- जगती ।]

9359
इदं  त  एकं  पर  ऊ  त  एकं  तृतीयेन  ज्योतिषा  सं  विशस्व ।
संवेशने   तन्व1  श्चारुरेधि   प्रियो   देवानां  परमे   जनित्रे ॥1॥

हे मनुज जगत है एक ज्योति और जीवात्मा भी एक ज्योति है।
परमेश्वर ही सबका पालक है वह प्रभु ही तो दिव्य-शक्ति है ॥1॥

9360
तनूष्टे  वाजितन्वं1  नयन्ती  वाममस्मभ्यं  धातु शर्म तुभ्यम् ।
अह्रुतो महो धरुणाय देवान्दिवीव ज्योतिः स्वमा मिमीया: ॥2॥

तन   तेरा  निर्जीव  हो   गया   अब   तुम्हें  दूसरा   देह   मिले ।
इस घटना से हम भी कुछ सीखें परम-प्राप्ति का फूल खिले ॥2॥

9361
वाज्यसि  वाजिनेना  सुवेनीः सुवितः स्तोमं सुवितो दिवं गा: ।
सुवितो धर्म प्रथमानु सत्या सुवितो देवान्सुवितोSनु पत्म॥3॥

हे  आत्मा  तुम  महाबली  हो  सत्पथ  पर  ही  तुम  चलना ।
दिव्य-गुणों  को  धारण  करना  स्वर्ग-लोक में तुम रहना ॥3॥

9362
महिम्न   एषां   पितरश्चनेशिरे   देवा   देवेष्वदधुरपि   क्रतुम् ।
समविव्यचुरुत  यान्यत्विषुरैषां  तनूषु  नि  विविशुः पुनः ॥4॥

पितर     हमारे     पूजनीय    हैं    वे    अद्भुत    बलशाली    हैं ।
देव - स्वरूप  कर्म  हैं  उनके  वे  अतिशय  प्रभावशाली  हैं ॥4॥

9363
सहोभिर्विश्वं  परि  चक्रमू  रजः पूर्वा धामान्यमिता मिमाना: ।
तनूषु विश्वा भुवना नि येमिरे प्रासारयन्त पुरुध प्रजा अनु॥5॥

अतुलित  बल  धारे  पितर  हमारे  अन्य लोक में भी जाते हैं ।
जन कल्याण हेतु अर्पित हैं आत्मीय समझ वे अपनाते हैं॥5॥

9364
द्विधा  सूनवोSसुरं  स्वर्विदमास्थापयन्त  तृतीयेन  कर्मणा ।
स्वां प्रजां पितरः पित्र्यं सह आवरेष्वदधुस्तन्तुमाततम् ॥6॥

पितरों  ने  परम्परा गढ - कर सन्तानों को सद्भाव दिया है ।
संस्कारों  के  बीज रोप-कर हम पर यह उपकार किया है ॥6॥

9365
नावा न क्षोदः प्रदिशः पृथिव्या: स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्वा।
स्वां    प्रजां     बृहदुक्थो     महित्वावरेष्वदधादा     परेषु ॥7॥

नौका में बैठा हुआ व्यक्ति तो जब चाहे जल में जा सकता है ।
वैसे  ही  ईश्वर  का  बेटा  जो  चाहे  वह  सब पा सकता है ॥7॥      
 

Saturday, 18 January 2014

सूक्त - 57

[ऋषि- गौपायन । देवता- विश्वेदेवा । छन्द- गायत्री ।]

9366
मा प्र गां पथो अयं मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः ।
मान्तः स्थुर्नो अरायतः ॥1॥

प्रभु  पावन - पथ  पर पहुँचाना पाप - पुण्य  का  पाठ - पढाना ।
संकल्प करें हम सत्कर्मों का दान की महिमा को समझाना॥1॥

9367
यो यज्ञस्य प्रसाधनस्तन्तुर्देवेष्वाततः ।
तमाहुतं नशीमहि ॥2॥

हे अग्निदेव तुम आ जाओ हवि - भोग  तुम्हीं  सबको  देते  हो ।
तुम  सबकी  रक्षा  करते  हो  तुम  सबका  दुख  हर लेते हो ॥2॥

9368
मनो न्वा हुवामहे नाराशंसेन सोमेन ।
पितृणां च मन्मभिः ॥3॥

पितर  हमारे  पूजनीय  हैं  उनके  शुभ - विचार  को  ध र- कर ।
मन-देव का आवाहन करते हैं जगहित का आधार ग्रहण-कर॥3॥

9369
आ त एतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय जीवसे ।
ज्योक् च सूर्यं दृशे ॥4॥

पुनीत  कर्म  में  हम  प्रवीण  हों  सौ - बरस  सूर्य  को  देवें  जल ।
मन मेरा तन के सँग रहे तब ही मिल सकता है शुभ - फल॥॥4॥

9370
पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यो जनः ।
जीवं व्रातं सचेमहि ॥5॥

पितर  पूज्य  हैं  परम - मित्र  हैं  पथ - पाथेय  वहीं  मिलता  है ।
तब सुख-मय जीवन जीते हैं तन-मन युग्म तभी खिलता है॥5॥

9371
वयं सोम व्रते तव मनस्तनूषु बिभ्रतः ।
प्रजावन्तः सचेमहि ॥6॥

हे  सोमदेव  तुम  करो  अनुग्रह  कर्म-योग  तुम  ही सिखलाना ।
तन  सँग मन को जोड लिए हैं पर-हित का वैभव दिखलाना॥6॥    

Friday, 17 January 2014

सूक्त - 58

[ऋषि- गौपायन । देवता- मन आवर्तन । छन्द- अनुष्टुप् ।]

9372
यत्ते यमं वैवस्वतं मनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे॥1॥

वैद बीमार से यह कहता है ठीक हो तुम कुछ नही हुआ  है ।
यम से वापस ला सकता हूँ तुम्हें निराशा ने छू लिया है॥1॥

9373
यत्ते दिवं यत्पृथिवीं मनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे॥2॥

इसी धरा पर ही खुश रहो तुम कहीं और नहीं जा सकते हो ।
तुम्हें स्वस्थ तन-मन देता हूँ मुझे बताओ क्या कहते हो॥2॥

9374
यत्ते भूमिं चतुर्भृष्टिं मनो जगाम दूरकम्।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे॥॥3॥

तुम आशा का दामन पकडो खुश होकर जीवन जीना है ।
रोग तुम्हारा हरिण हो गया सुख का अब अमृत पीना है॥3॥

9375
यत्ते चतस्त्रः प्रदिशो मनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ॥4॥

उल्टा-पुल्टा मत सोचो तुम तुम बिल्कुल बीमार नहीं हो ।
पुनर्नवा औषधि देता हूँ अब तो तुम एकदम सही हो ॥4॥

9376
यत्ते समुद्रमर्णवं मनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे॥5॥

दुःचिन्ता से बाहर निकलो मन को समझाकर वापस लाओ।
जीवन में लालित्य चाहिए आओ सुख-सागर में नहाओ॥5॥

9377
यत्ते मरीचिः प्रवतो मनो जगाम दूरकम्।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ॥6॥

मानव-तन का मोल समझना खुद पर सदा भरोसा करना ।
बहुत दिनों तक यहॉ है रहना गिर कर भी है हमें संभलना॥6॥

9378
यत्ते अपो यदोषदधीर्मनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तमामसीह क्षयाय जीवसे ॥7॥

आओ आशा का ऑचल पकडें मानव-जीवन का रस पी लें ।
कर्म-भूमि यह तुम्हें बुलाती आओ सुख से जीवन जी लें॥7॥

9379
यत्ते सूर्यं यदुषसं मनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे॥8॥

अपनी महिमा को पहचानो अपने मन का अवसाद मिटाओ ।
यह जीवन कितना सुन्दर है जियो और जीना सिखलाओ॥8॥

9380
यत्ते पर्वतान्बृहतो मनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे॥9॥

माथे पर चिन्ता की सलवट यह मानव की पहचान नहीं है ।
तुम्हें बहुत दिन तक जीना है हँस कर देखो खुशी यहीं है॥9॥

9381
यत्ते विश्वमिदं जगन्मनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे॥10॥

मन  को  निराश  मत  होने  दो  कितना सुन्दर है यह जीवन ।
विविध-विधा के फूल खिलेंगे श्रम से सींचो अपना उपवन॥10॥

9382
यत्ते परा: परावतो मनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे॥11॥

मन  को  कहीं  भटकने  न  दो  जहॉ भी हो वापस आ जाओ ।
सौ बरस जियोगे धरती पर मन में यह विश्वास जगाओ॥11॥

9383
यत्ते भूतं च भव्यं च मनो जगाम दूरकम् ।
 तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे॥12॥

गत-आगत में मत भरमाओ वर्तमान की महिमा जानो ।
कल को किसने देखा है आज जिन्दगी को पहचानो॥12॥
   

Thursday, 16 January 2014

सूक्त - 59

[ऋषि- गौपायन । देवता- द्यावा-पृथिवी । छन्द- त्रिष्टुप-पंक्ति ।]

9384
प्र  तार्यायुः  प्रतरं  नवीयः  स्थातारेव  क्रतुमता  रथस्य ।
अश्व च्यवान उत्तवीत्यर्थं परातरं सु निरृतिर्जिहीताम्॥1॥

सही  सारथी  यदि मिल  जाए यात्रा हो जाती है सुखकर ।
मानव  दीर्घ आयु  पाता  है मृत्यु दूर जाती है द्रुततर॥1॥

9385
सामन्नु  राये  निधिमन्न्वन्नं  करामहे  सु  पुरुध  श्रवांसि ।
ता नो विश्वानि जरिता ममत्तु परातरं सु निरृतिर्जिहीताम्॥2॥

हम उत्तम धन की प्राप्ति-हेतु उपक्रम दिन-रात किया करते हैं।
साम - गान के सँग-सँग सबको हवि-भाग दिया करते हैं ॥2॥

9386
अभी   ष्व1र्यः  पौंस्यैर्भवेम   द्यौर्न   भूमिं   गिरयो   नाज्रान् ।
ता नो विश्वानि जरिता चिकेत परातरं सु निरृतिर्जिहीताम्॥3॥

आदित्य - देव - आलोक - प्रदाता  हवा  निरन्तर  बहती  है ।
हम  आत्मा  का परिचय पा लें जिससे मृत्यु दूर रहती  है ॥3॥

9387
मो षु णः सोम मृत्यवे परा दा: पश्येम नु सूर्यमुच्चरन्तम् ।
द्युभिर्हितो जरिमा सू नो अस्तु परातरं सु निरृतिर्जिहीताम्॥4॥

प्रभु  हम  प्रतिदिन  सूरज  देखें  बुढापा  भी सुखकर हो जाए ।
जीवन  में  लालित्य  सदा  हो  मृत्यु  देर  से  ही अपनाए ॥4॥

9388
असुनीते  मनो  अस्मासु धारय जीवातवे सु प्र तिरा न आयुः ।
रारन्धि  नः सूर्यस्य  सन्दृशि  घृतेन  त्वं  तन्वं वर्धयस्य ॥5॥

दीर्घ  आयु  हमको  देना  प्रभु  ध्यान  सदा  तुम  मेरा  रखना ।
मुझे  सुरक्षा  देना  भगवन  तन - मन  परिपोषित करना ॥5॥

9389
असुनीते  पुनरस्मासु  चक्षुः  पुनः  प्राणमिह  नो धेहि भोगम् ।
ज्योक्  पश्येम  सूर्यमुच्चरन्तमनुमते  मृळया  नःस्वस्ति॥6॥

पुनः  प्राण  ऊर्जा  दो  प्रभुवर  नेत्र - ज्योति  मेरी  बढ  जाए ।
सदा सुरक्षित रहे मनुज यदि वह आत्मा का परिचय पाए॥6॥

9390
पुनर्नो   असुं   पृथिवी   ददातु   पुनर्द्यौर्देवी   पुनरन्तरिक्षम् ।
पुनर्नः  सोमस्तन्वं  ददातु  पुनः  पूषा पथ्यां3 या स्वस्तिः॥7॥

पुनर्नवा  प्रभु  हमें  बना  दो  तन  मन  आत्म  ब्रह्म बल देना ।
हे  सोम  समर्थ बना दो तुम आत्मीय समझ अपना लेना॥7॥

9391
शं रोदसी सुबन्धवे यह्वी ऋतस्य मातरा ।
भरतामप यद्रपो द्यौः पृथिवि क्षमा रपो मो षु ते किं चनाममत्॥॥8॥

परमेश्वर  सबका  अपना  है  वह  ही  तो  है  पिता  हमारा ।
दोष-शोक वह हर लेता है प्रभु ही पालक पोषक प्यारा ॥8॥

9392
अव द्वके अव त्रिका दिवश्चरन्ति भेषजा।क्षमा चरिष्ण्वेककं भरतामप
यद्रपो  द्यौः  पृथिवि  क्षमा  रपो  मो  षु  ते  किं  चनाममत् ॥9॥

क्षमा  स्वरूप  धरा  जननी  है  दोषों  को  सदा  क्षमा करती है ।
भूल से यदि कोई भूल हो जाए अपनाती है अपनी लगती है॥9॥

9393
समिन्द्रेरय गामनड्वाहं य आवहदुशीनराण्या अनः। भरतामप
यद्रपो  द्यौः  पृथिवि  क्षमा  रपो  मो  षु  ते किं चनाममत् ॥10॥

सूर्य - रश्मियॉ  औषधियॉ  हैं  सञ्जीवनी  बनकर  आती  हैं ।
प्रतिदिन हमको नव-जीवन देकर अद्भुत ऊर्जा से नहलाती हैं॥10॥
        
  




 

Wednesday, 15 January 2014

सूक्त - 60

[ऋषि- गौपायन । देवता- जीव । छन्द- अनुष्टुप् - गायत्री - पंक्ति ।]

9394
आ जनं त्वेषसन्दृशं माहीनानामुपस्तुतम् ।
अगन्म बिभ्रतो नमः॥1॥

 यह  इन्द्रिय  ही  मानव  तन  में  विनम्र-भाव  से  रहती  है ।
उसके माध्यम से यह काया जीवन भर सुख से चलती है॥1॥

9395
असमातिं नितोशनं त्वेषं निययिनं रथम् ।
भजेरथस्य सत्पतिम् ॥2॥

इन्द्रियॉ  मनोरथ  पूरा  करती  अपने  में  डूबी  रहती  हैं ।
पर आत्मा है पृथक सर्वदा ये उस तक नहीं पहुँचती हैं॥2॥

9396
यो हनानॉमहिषॉ इवातितस्थौ पवीरवान्।
उतापवीरवान्युधा ॥3॥

सदा  हारता  आया  मन  से  हे  प्रभु  तुम्हीं  दिलाओ  जीत ।
करो अनुग्रह मुझ पर भगवन आत्मिक-बल का गाऊँ गीत॥3॥

9397
यस्येक्ष्वाकुरुप व्रते रेवान्मराय्येधते ।
दिवीव पञ्च कृष्टयः ॥4॥

प्रभु मैं भी आत्मा को जानूँ कर्म-योग मुझको सिखलाओ ।
आत्मा ही तो परमात्मा है इस रहस्य को तुम समझाओ॥4॥

9398
इन्द्र क्षत्रासमातिषु रथप्रोष्ठेषु धारय ।
दिवीव सूर्यं दृशे ॥5॥

तन  से  जुडी  इन्द्रियॉ  एवम्  मति  से  दूर  जो  रहती  है ।
उस दिव्य-शक्ति से मिलवाओ दुनियॉ जिसे आत्मा कहती है॥5॥

9399
अगस्त्यस्य नद्भ्यः सप्ती युनक्षि रोहिता ।
पणीन्न्यक्रमीरभि विश्वान्राजन्नराधसः॥6॥

इन्द्रिय पर अँकुश रख पाए ऐसी मति मुझको दो प्रभुवर ।
कीचड में भी कमल बन सकूँ ऐसी जुगत बताओ नटवर॥6॥

9400
अयं  मातायं  पितायं  जीवातुरागमत् ।
इदं तव प्रसर्पणं सुबन्धवेहि निरिहि॥7॥

प्राण ही मातु - पिता  है  मेरा  सर्वस्व  इसी  को  में  मानूँ ।
मैं तुमसे कभी मिला ही नहीं आत्मा तुमको कैसे जानूँ॥7॥

9401
यथा युगं वरत्रया नह्यन्ति धरुणाय कम् ।
एवा दाधारं ते मनो जीवातवे न मृत्यवेSथो अरिष्टतातये॥8॥

यदि प्राण की रक्षा करनी हो तो आत्मा से इसको मिलवा दो।
इससे  प्राण  की उम्र बढेगी आत्मा से परिचय करवा दो ॥8॥

9402
यथेयं पृथिवी मही दाधारेमान्वनस्पतीन् ।
एवा दाधारं ते मनो जीवातये न मृत्यवेSथो अरिष्टतातये॥9॥

तन  में  इन्द्रिय  मन आत्मा है विविध मार्ग में यह चलता है ।
मन से यदि आत्मा जुड जाए तो अद्वितीय पौरुष पलता है॥9॥

9403
यमादहं वैवस्वतात्सुबन्धोर्मन आभरम् ।
जीवातवे न मृत्यवेSथो अरिष्टतातये॥10॥

मृत्युलोक  में  सब  मरते  हैं  कोई  अमर  नहीं हो सकता ।
पर जीवन स्थिर हो जाए सब कुछ संभव हो सकता है॥10॥

9404
न्य1ग्वातोSव  वाति  न्यक्तपति  सूर्यः ।
नीचीनमघ्न्या दुहे न्यग्भवतु ते रपः॥11॥

यह जीव पवन सम फिरता है रवि-किरण रोग-कण ले जाए ।
गौ-माता का आशीष मिले तो मेरा रोग-शोक मिट जाए॥11॥

9405
अयं  मे  हस्तो  भगवानयं  मे  भगवत्तरः ।
अयं मे विश्वभेषजोSयं शिवाभिमर्शनः॥12॥

मेरे  ये  दोनों  हाथ  ब्रह्म  है  ईश्वर  से  भी  यह  उत्तम  है ।
इसी हाथ में हर औषधि है यह हितकर मंगल अनुपम है॥12॥   
       

Tuesday, 14 January 2014

सूक्त - 61

[ऋषि- नाभानेदिष्ठ मानव । देवता- विश्वेदेवा । छन्द- त्रिष्टुप् ।]

9406
इदमित्था   रौद्रं   गूर्तवचा   ब्रह्म   क्रत्वा   शच्यामन्तराजौ ।
क्राणा यदस्य पितरा मंहनेष्ठा:पर्षत्पक्थे अहन्ना सप्त होतृन्॥1॥

वेद - ऋचाओं  का  अभ्यासी  वेद - ज्ञान  का मर्म समझता ।
कर्म और वाणी में धर-कर मातु-पिता सम निज को गढता ॥1॥

9407
स  इद्दानाय  दभ्याय  वन्वञ्च्यवानः  सूदैरमिमीत  वेदिम् ।
तूर्ययाणो  गूर्तवचस्तमः  क्षोदो  न  रेत इतऊति सिञ्चत्॥2॥

वेद - पुरुष  ज्ञानी  होता  है  वह  करता  है  प्रतिदिन  दान ।
धरा  बन गई यज्ञ-वेदिका हवि भोग मिले सबको समान॥2॥

9408
मनो  न  येषु  हवनेषु  तिग्मं  विप्रः  शच्या  वनुथो  द्रवन्ता ।
आ  यः शर्याभिस्तुविनृम्णो अस्याश्रीणीतादिशं गभस्तौ॥3॥

मन  की  गति  से  देव  पधारे  सूर्य - सोम  पाते  हवि- भाग ।
हवि-भोग सभी को मिलता है और मिलता है राग-विराग॥3॥

9409
कृष्णा   यद्गोष्वरुणीषु   सीदद्दियो   नपाताश्विना   हुवे   वाम् ।
वीतं  मे  यज्ञमा  गतं  मे  अन्नं  ववन्वांसा नेषमस्मृतध्रू ॥4॥

ऊषा - काल  में   हम   करते   हैं   अपने   देवों  का  आवाहन ।
प्रभु  इच्छा  से  प्रेरित  होकर  अर्पित करते हैं हविष्यान्न ॥4॥

9410
प्रथिष्ट   यस्य   वीरकर्ममिष्णदनुष्ठितं   नु   नर्यो   अपौहत् ।
पुनस्तदा   वृहति   यत्कनाया   दुहितरा   अनुभृतमनर्वा ॥5॥

देवताओं  में  दिव्य - शक्ति  है  प्रभु  तुम  देना  दिव्य - ज्ञान ।
कहीं भटक न जाऊँ भगवन सखी मिल जाए ऊषा समान॥5॥

9411
मध्या यत्कर्त्वमभवदभीके कामं कृण्वाने पितरि युवत्याम् ।
मनानग्रेतो जहतुर्वियन्ता सानौ निषिक्तं सुकृतस्य योनौ॥6॥

आदित्य-देव आलोक - प्रदाता रवि-किरणों का लेकर वितान।
अरुणाभा आई आज अवनि पर कोयल करती मधुमय-गान॥6॥

9412
पिता यस्त्वां दुहितरमधिष्कन्क्ष्मया रेतःसञ्जग्मानो नि सिञ्चत्।
स्वाध्योSजनयन्ब्रह्म  देवा  वास्तोष्पतिं  व्रतपां  निरतक्षन् ॥7॥

सूरज  के  प्रकाश  को  अब  हम विविध - विधा में करते भोग ।
सौर-शक्ति अब अति जनप्रिय है इसके हैं अतिशय उपयोग॥7॥

9413
स   ईं  वृषा  न  फेनमस्यदाजौ  स्मदा   परैदप   दभ्रचेता: ।
सरत्पदा न दक्षिणा परावृङ् न ता नु मे पृशन्यो  जगृभ्रे ॥8॥

यह  जीवन  भी  यज्ञ - रूप है त्याग-सहित ही हो उपभोग ।
दान  बहुत  ही  आवश्यक  है  खतरनाक है केवल भोग ॥8॥

9414
मक्षू  न  वह्नि: प्रजाया  उपब्दिरग्निं  न  नग्न  उप सीददूधः।
सनितेध्मं  सनितोत  वाजं स धर्ता जज्ञे सहसा यवीयुत्॥9॥

जलती आग  डरा  देती  है  पर  जब  विधिवत उपयोग करें ।
तब जीवन-रक्षक बन जाता है अनियंत्रित-बल से सदा डरें॥9॥

9415
मक्षू कनाया: सख्यं नवग्वा ऋतं वदन्त ऋतयुक्तिमग्मन् ।
द्विबर्हसो य उप गोपमागुरदक्षिणासो अच्युता दुदुक्षन् ॥10॥

अग्निदेव की अद्भुत गति है भिन्न-भिन्न हैं उसके रूप ।
प्राण-वायु से छटा निखरती अग्नि-देव हैं जग के भूप ॥10॥

9416
मक्षू कनाया: सख्यं नवीयो राधो न रेत ऋतमित्तुरण्यन् ।
शुचि यत्ते रेक्ण आयजन्त सबर्दुघाया: पय उस्त्रियाया:॥11॥

अग्नि देव  देते  धन-दौलत अग्नि-देव  पावस  लाते  हैं ।
सलिल-सुधा वे  ही  देते  हैं झर-झर पानी  बरसाते  हैं ॥11॥

9417
पश्वा  यत्पश्चा  वियुता  बुधन्तेति  ब्रवीति  वक्तरी रराणः ।
वसोर्वसुत्वा  कारवोSनेहा  विश्वं विवेष्टि  द्रविणमुप क्षु॥12॥

पशुधन भी अति आवश्यक है बिन पशु-धन ऑगन सूना है।
जिस  घर में गौ रँभाती है उस घर का सुख भी दूना है ॥12॥

9418
तदिन्न्वस्य परिषद्वानो अग्मन्पुरु सदन्तो नार्षदं बिभित्सन्।
वि शुष्णस्य संग्रथितमनर्वा विदत्पुरुप्रजातस्य गुहा यत्॥13॥

मानुष-तन में प्राण बली है पर अति-विचित्र आत्मा की आख्या।
ब्रह्म-स्वरूपा है यह आत्मा अति अद्भुत है इसकी व्याख्या ॥13॥

9419
भर्गो  ह  नामोत  यस्य  देवा: स्व1र्ण  ये  त्रिषधस्थे  निषेदुः ।
अग्निर्ह नामोत जातवेदा: श्रुधी नो होतरृतस्य होताध्रुक् ॥14॥

अग्नि - देव  के  कई  नाम  हैं  जल  थल  नभ  है इसका गेह ।
पावक  अनल  जातवेदस  है हर रूप में देते सबको स्नेह ॥14॥

9420
उत  त्या  मे  रौद्रावर्चिमन्ता  नासत्याविन्द्र  गूर्तये  यजध्यै ।
मनुष्वद्वृक्तबहिर्षे  रराणा  मन्दू  हितप्रयसा  विक्षु  यज्यू ॥15॥

हे  अश्विनीकुमार  प्रभु  आओ  हम  प्रेम  से  तुम्हें  बुलाते  हैं ।
बडे  यशस्वी  हो  तुम  दोनों  तुमको  पाकर हम हर्षाते हैं॥15॥

9421
अयं  स्तुतो  राजा  वन्दि  वेधा  अपश्च  विप्रस्तरति  स्वसेतुः ।
स  कक्षीवन्तं  रेजयत्सो अग्निं नेमिं न चक्रमर्वतो  रघुद्रु॥16॥

यह  समीर  है  सबका  साधक  नभ - धरती के मध्य सेतु-सम।        
मेघों  को  उद्वेलित  करता है जल-वर्षा का करता उपक्रम ॥16॥

9422
स     द्विबन्धुर्वैतरणो     यष्टा    सबर्धुं    धेनुमस्वं    दुहध्यै ।
सं   यन्मित्रावरुणा   वृञ्ज  उक्थैर्ज्येष्ठेभिरर्यमणं  वरूथैः ॥17॥
 
अग्नि - देव  आकाश  अवनि  में  समान  भाव  से  ही रहते हैं ।
अपने मुख के माध्यम से सबको हवि-भाग दिया करते हैं॥17॥

9423
तद्बन्धुः  सूरिर्दिवि  ते  धियंधा  नाभानेदिष्ठो रपति प्र वेनन् ।
सा नो नाभिः परमास्य वा घाहं तत्पश्चा कतिथश्चिदास॥18॥

आदित्य - देव  अति  अद्भुत  हैं  यह  सौर-शक्ति हितकारी है ।
हम सब सौर-ऊर्जा अपनायें आज भी अन्वेषण जारी है ॥18॥

9424
इयं  मे  नाभिरिह  मे  सधस्थमिमे  मे  देवा अयमस्मि सर्वः ।
द्विजा  अह   प्रथमजा  ऋतस्येदं  दधेनुरदुहज्जायमाना ॥19॥

परमेश्वर  ही  पिता  हमारे  वह  ही  मेरा  चिर - परिचित  है ।
वाक्-वैभव भी दिया है उसने उसका प्यार अपरिमित  है॥19॥

9425
अधासु   मन्द्रो   अरतिर्विभावाव   स्यति   द्विवर्तनिर्वनेषाट् ।
ऊर्ध्वा  यच्छ्रेणिर्न  शिशूर्दन्मक्षू  स्थिरं शेवृधं सूत माता ॥20॥

अग्नि  देव  अति  आनंदित  हैं  कहीं  भी  जाकर  रह  लेते  हैं ।
पावक  पावन  पूजनीय  हैं  वे  हम  सबको  सुख देते हैं ॥॥20॥

9426
अधा  गाव  उपमातिं  कनाया अनु श्वान्तस्य कस्य चित्परेयुः ।
श्रुधि त्वं सुद्रविणो नस्त्वं याळाश्वघ्नस्य वावृधे सूनृताभिः॥21॥

मंत्रोच्चारण  से  बल  बढता  वाणी  ओजस्वी  हो  जाती  है ।
हे अग्नि-देव तुम ही प्रणम्य हो दुनियॉ तुमसे ऊर्जा पाती है॥21॥

9427
अध  त्वमिन्द्र  विध्दय1  स्मान्महो  राये  नृपते  वज्रबाहुः ।
रक्षा च नो मघोनः पाहि सूरीननेहसस्ते हरिवो अभिष्टौ ॥22॥

हे  परमेश्वर  हे  बलशाली  तुम  हमको  यश - वैभव  देना ।
सदा  हमारी  रक्षा  करना  तुम  सबकी  पीडा  हर लेना ॥22॥

9428
अध   यद्राजाना   गविष्टौ   सरत्सरण्युः   कारवे   जरण्युः ।
विप्रः  प्रेष्ठः  स  ह्येषां  बभूव  परा  च  वक्षदुत पर्षदेनान् ॥23॥

प्रभु  पावन  पथ  पर  पहुँचायें  निज दायित्व निभाना जानें ।
हम अपनी प्रतिभा पहचानें सम्पूर्ण जगत को अपना मानें॥23॥

9429
अधा  न्यस्व  जेन्यस्य  पुष्टौ  वृथा  रेभन्त  ईमहे  तदू  नु ।
सरण्युरस्य   सूनुरश्वो   विप्रश्चासि    श्रवसश्च   सातौ ॥24॥

हे  वरुण  देव  तुम  ही  वरेण्य  हो मनोकामना पूरी करना ।
तुम हो सुख-स्वरूप हे प्रभुवर हमें अन्न-धन देते रहना॥24॥

9430
युवोर्यदि  सख्यायास्मे  शर्धाय  स्तोमं  जुजुषे  नमस्वान् ।
विश्वत्र यस्मिन्ना गिरः समीचीः पूर्वीव गातुर्दाशत्सूनृतायै॥25॥

मित्र - वरुण  की  सुन्दर  जोडी  परस्पर  पूरक  लगते  हैं ।
परिचित पथ पावन हो जैसे वैसे ही सुखकर लगते हैं ॥25॥

9431
स   गृणानो   अद्भिर्देववानिति   सुबन्धुर्नमसा   सूक्तैः ।
वर्धदुक्थैर्वचोभिरा हि नूनं व्यध्वैति पयस उस्त्रियाया:॥26॥

पानी  प्राणी  की  प्यास  बुझाता  सबको  शीतल करता है ।
वैसे  ही  पृथ्वी  पर  पानी  पावन  पद  गाते  बहता है ॥26॥

9432
त  ऊ  षु  णो  महो  यजत्रा  भूत  देवास  ऊतये  सजोषा: ।
ये वाजॉ अनयता वियन्तो ये स्था निचेतारो अमूरा:॥27॥
 
संघ -शक्ति में अद्भुत बल है विद्वद्जन का हो निज वितान ।
सभी सुरक्षित रहें धरा पर उदित हो रहा नवा- बिहान॥27॥