Sunday, 31 March 2013

भारत स्वाभिमान बढ. जाये।

लक्ष्मीबाई  भगतसिंह  जैसा  बच्चा-बच्चा बन जाये।
न केवल साक्षर हो भारत वेद शास्त्र को पढे.पढ़ाये।
देशी खाए  देशी पहने  परम्पराओं को पढ.  पाये ।
प्यार करे भारत से चाहे घर दुनिया में कहीं बसाये।
भाषा अपनी भूषा अपनी अपनी राष्ट्रीरयता  निभाये ।
दुनियॉं में वह कहीं भी हो वंदे मातरम मन में गाये।
पंद्रह अगस्त को ध्वज वंदन कर अपना शीश नवाये।
हे प्रभु तुम ऐसा कुछ कर दो भारत स्वाभिमान बढ.जाये।

शकुन्तला शर्मा
288/7 मैत्रीकुंज भिलाई -490006
अचल-0788 2227477 चल-09302830030

Friday, 8 March 2013

भारत का उन्नयन करेंगें


भारत का  उन्नयन  करेंगें  पुन:  प्रतिष्ठा  पायेंगें
मन मंदिर को स्वच्छ रखेंगें स्वर्ग धरा पर लायेंगें

बड़ी किरकिरी हुई हमारी अब हमने भी सोंच लिया
कर्म   योग   का   पाठ   पढ़ेंगें   भागीरथी  बहायेंगें

उन्नत  खेती  होगी  तो  भरपूर अन्न फिर उपजेगा
भारत स्वाभिमान के पथ पर धर्म घ्वजा फहरायेंगें

शब्दों  की उल्टी  परिभाषा   नहीं करेगा अब कोई
चरैवेति के पथ पर चलकर राम राज्य को लायेंगें

लोकतंत्र के बेइमानों की पोल खोलकर रख दो तुम
सतच्चरित्र  मानुष  को  ही  सिंहासन  पर बैठायेंगें

नहीं कोई जीने देगा तू सोंच समझ कर बोल 'शकुन'
कौए  भीड़ में  आ  आ  करके कोयल को समझायेंगें.

                                                   शकुन्तला शर्मा
                                                   भिलाई.

Saturday, 1 December 2012

जिन्दगी किताब बन गई

मिल गई है प्रेम की  गली  जाग  उठी  कामना  कई
खिल रही है प्रीत की कली जिन्दगी किताब बन गई .

तेरी छुअन में अजब नशा हरिन हुआ होश अब मेरा
तेरी साँस में है वो चुभन मै तो   मालामाल  हो गई .
जिन्दगी किताब बन गई .....

सहम   गए  शब्द  कंठ में  अंग अंग   थिरकने   लगा
तुम न कह सके तो क्या हुआ दृष्टि महाकाव्य कह गई .
जिंदगी किताब बन गई .......

काँप रही क्यों  अनामिका आज  इसे हो  गया है  क्या
हो गई है फुलझरी सी क्यों उसकी चाल क्योँ बदल गई .
ज़िंदगी   किताब  बन  गई  जिंदगी  किताब  बन  गई . 
                    jindgi 

Wednesday, 25 January 2012

नेता जी सुभाष चंद्र

नेता जी सुभाष चंद्र को नहीं जानता जग में कौन
तउम्र भटकते रहे अकेले मातृभूमि के रक्षक मौन ।
जीत गए तुम अपनी बाजी राच्च्ट्र्‌ यज्ञ में आहुति दी
सुखदा आजादी मिली किंतु बाट जोहती रही सदी।
भान मुझे होता है अब भी तुम सबसे खून मांॅगते हो
द्राडानन सम सेनापति बनकर गारों का वध करते हो।
चंद्र समान तुम्हारा आनन देद्गा के हित में आया काम
द्रव सा मन था जनजन में प्रिय जनमन में अंकित है नाम।
बोए थे जो तुम बीज उसी की आज फसल उग आई है
सब देख रहे हैं राह तुम्हारी अब आने लगी रुलाई है ।

Thursday, 10 November 2011

ढाई आखर

तुम्‍हारे अनुग्रह से
आज ऑंसुओं में डूब कर
मैं अनुभव कर रही हूँ
प्रेम की उस पीर का
जिसे मैंने कभी हँस हँस कर पढ़ा था।
थाह लगाने की सोंचना नासमझी है
उस ढाई आखर की गहराई का
फिर भी मैं उसका
अ अनार का पढ़ने में लगी हूं।

तुम्‍हारे द्वारा प्रदत्‍त  यह अनुभव
मेरे लिये ब्रम्‍हानन्‍द है
क्‍योंकि मेरे ब्रम्‍ह तो तुम्‍ही हो
और सच कहूं तो
तुम्‍ही मेरे सर्वस्‍व हो।

तुम्‍हारे गहन नयन मेरी मृग-मरिचिका हैं
परिणाम से परिचित हूं
फिर भी यह अनन्‍त नित नूतन
अनमोल भाव परित्‍याज्‍य नहीं है
प्रबलतम प्‍यास है
पढ़ने का प्रयास है
ढाई आखर ........