Monday, 13 January 2014

सूक्त - 62

[ऋषि- नाभानेदिष्ठ मानव । देवता- विश्वेदेवा । छन्द- जगती-अनुष्टुप्-प्रगाथ- गायत्री- त्रिष्टुप् ।]

9433
ये  यज्ञेन  दक्षिणया  समक्ता  इन्द्रस्य  सख्यममृतत्वमानश ।
तेभ्यो भद्रमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः॥1॥

हे  प्रभु  तुम  हो  सखा  हमारे  सुधा - सदृश  है  तेरा  साथ ।
कल्याण सभी का करना प्रभुवर करते रहना हमें सनाथ॥1॥

9434
य  उदाजन्पितरो  गोमयं  वस्वृतेनाभिन्दन्परिवत्सरे   वलम् ।
दीर्घायुत्वमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः॥2॥

अज्ञान - रूप इस अन्धकार को ज्ञान-आलोक से तुम्हीं मिटाना ।
दीर्घ - आयु  मुझको  देना  प्रभु  श्रध्दावानों के सँग मिलाना ॥2॥

9435
य   ऋतेन    सूर्यमारोहयन्    दिव्यप्रथयन्पृथ्वीं    मातरं    वि ।
सुप्रजास्त्वमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः॥3॥

आदित्य-देव आलोक-प्रदाता भू-पर रवि-किरण बिखरती है ।
हम ऋषियों की सन्तानें हैं अब दुनियॉ जिसे निरखती है॥3॥

9436
अयं  नाभा  वदति  वल्गु  वो  गृहे  देवपुत्रा ऋषयस्तच्छृणोतन ।
सुब्रह्मण्यमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः॥4॥

हे  प्रभु  वाणी  का  वैभव  देना  मधुर  वचन   ही   हम  बोलें ।
श्रेष्ट-मनुज हमको बनना है निज को निकष-तुला में तौलें॥4॥

9437
विरुपास        इदृषयस्त        इद्गम्भीरवेपसः ।
ते अङ्गिरसः सूनवस्ते अग्नेः परि जज्ञिरे॥5॥

अग्नि-देव के विविध-रूप हैं जल थल नभ सब जगह समाए ।
प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न रूप में प्रत्येक रूप में वे काम आए॥5॥

9438
ये    अग्नेः    परि    जज्ञिरे     विरुपासो     दिवस्परि ।
नवग्वो नु दशग्वो अङ्गिरस्तमः सचा देवेषु मंहते॥6॥

अग्नि - देवता  तेजस्वी  हैं दिव्य-शक्ति है उनके पास ।
अपरा - परा  सभी रूपों में रहते हैं वे ही आस-पास ॥6॥

9439
इन्द्रेण युजा निः सृजन्त वाघतो व्रजं गोमन्तमश्विनम् ।
सहस्त्रं   मे   ददतो   अष्टकर्ण्य1:   श्रयो   देवेष्वक्रत ॥7॥

परमेश्वर  यश - वैभव  देना  देते  रहना  तुम धन-धान ।
हम हवि-भाग तुम्हें देते हैं हमको गो-धन देना दान ॥7॥

9440
प्र नूनं जायतामयं मनुस्तोक्मेव रोहतु ।
यः सहस्त्रं शताश्वं सद्यो दानाय मंहते॥8॥

जो  धन दान किया करते हैं जीवन सुख मय हो जाता  है ।
क्लेश-कष्ट सब मिट जाता है जीना सार्थक हो जाता है॥8॥

9441
न  तमश्नोति  कश्चन  दिव इव सान्वारभम् ।
सावर्ण्यस्य दक्षिणा वि सिन्धुरिव पप्रथे॥9॥

कर्म - योग  का धर्म-ध्वजा है वह सूरज आलोक-प्रदाता ।
वह विश्राम नहीं करता है दुनियॉ भर में सुख बरसाता॥9॥

9442
उत दासा परिविषे स्मद्दिष्टी गोपरीणसा ।
यदुस्तुर्वश्च                        मामहे ॥10॥

घर में गो-रस भी आवश्यक है आओ पशु-धन का मान बढायें।
प्यार से इन पशुओं को पालें कभी तो हम सेवक बन जायें॥10॥

9443
सहस्त्रदा ग्रामणीर्मा रिषन्मनुः सूर्येणास्य यतमानैतु दक्षिणा ।
सावर्णेर्देवा: प्र तिरन्त्वायुर्यस्मिन्नश्रान्ता असनाम वाजम्॥11॥

आदित्य-देव को नमन करो आलस्य त्याग जीवन जी लेना ।
जीवन में कुछ रस घुल जाए अञ्जुरी भर अर्घ्य सूर्य को देना ॥11॥        
 
 

Sunday, 12 January 2014

सूक्त - 63

[ऋषि- गयप्लात । देवता- विश्वेदेवा । छन्द- जगती - त्रिष्टुप् ।]

9444
परावतो ये दिधिषन्त आप्यं मनुप्रीतासो जनिमा विवस्वतः ।
ययातेर्ये नहुष्यस्य बहिर्षि देवा आसते ते अधि ब्रुवन्तु नः॥1॥

देव - लोक  से  देव  पधारे  सख्य - भाव  सिखलाते  हैं ।
मनुज-मात्र को मित्र मानते पावन-पथ पर पहुँचाते हैं ॥1॥

9445
विश्वा  हि  वो  नमस्यानि  वन्द्या  नामानि  देवा उत यज्ञियानि वः।
ये स्थ जाता अदितेरद्भय्स्परि ये पृथिव्यास्ते म इह श्रुता हवम्॥2॥

सभी   देव   गण   पूज्य   हमारे   विविध - दिशा   से   आए   हैं ।
अभिवादन   है   देवगणों   का   जिनके   दर्शन   हम   पाए   हैं॥2॥

9446
येभ्यो   माता   मधुमत्पिन्वते   पयः   पीयूषं   द्यौरदितिरद्रिबर्हा: ।
उक्थशुष्मान् वृषभरान्त्स्वप्नसस्तॉ आदित्यॉ अनु मदा स्वस्तये॥3॥

अमृत - मय  यह  अवनि  हमारी  मेघ - युक्त - नभ  जल  देता  है ।
देवताओं  में  दिव्य - शक्ति  है  सुमिरन  ही  भय  हर  लेता  है ॥3॥

9447
नृचक्षसो  अनिमिषन्तो  अर्हणा  बृहद्देवासो  अमृतत्वमानशुः ।
ज्योतीरथा अहिमाया अनागसो दिवो  वर्ष्माणं वसते स्वस्तये॥4॥

सज्जन  सत्कर्म  सदा  करता  है  उपासना  करता  रहता  है ।
उसकी  महिमा  बढती  जाती  जन - कल्याण  वही  करता  है ॥4॥

9448
सम्राजो  ये  सुवृधो  यज्ञमाययुरपरिह्वृता  दधिरे  दिवि  क्षयम् ।
तॉ आ विवास नमसा सुवृक्तिभिर्महो आदित्यॉ अदितिं स्वस्तये॥॥5॥

न्यौता  देने  पर  देव - शक्तियॉ  हषित  होकर  आ  जाती  हैं ।
हम पर सदा अनुग्रह करती अनगिन आशीष लिए आती हैं ॥5॥

9449
को वः स्तोमं राधति यं जुजोषथ विश्वे देवासो मनुषो यति ष्ठन ।
को  वोSध्वरं  तुविजाता अरं करद्यो नः पर्षदत्यंहःस्वस्तये ॥6॥

पूजनीय  है  व्यक्ति  वही  जो  देश - धर्म  का  रखता  ध्यान ।
जिसको  इसका  भान  नहीं है वह जीकर भी मृतक-समान ॥6॥

9450
येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनुः समिध्दाग्निर्मनसा सप्त होत्रिभिः।
त आदित्या अभयं शर्म यच्छत सुगा नः कर्त सुपथा स्वस्तये॥7॥

परमेश्वर   ही   पूजनीय   है   वह   ही   देता   है   अभय - दान ।
हवि - भोग  उसे  अर्पित  करते  हैं  सौंप  रहे हैं उसे कमान ॥7॥

9451
य  ईशिरे  भुवनस्य  प्रचेतसो विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च मन्तवः ।
ते  नः  कृतादकृतादेनसस्पर्यद्या  देवासः  पिपृता  स्वस्तये ॥8॥

ज्ञानी  का  सान्निध्य  मिले  तो  मन  के  दोष  दूर  हो  जाते ।
वे  कल्याण  सदा  करते  हैं  अनिष्ट  आदि  से  वही बचाते ॥8॥

9452
भरेष्विन्द्रं   सुहवं   हवामहेंSहोमुचं   सुकृतं   दैन्यं   जनम्  ।
अग्निं मित्रं वरुणं सातये भगं द्यावापृथिवी मरुतः स्वस्तये॥9॥

सज्जनता  हम  सबको  प्रिय  है उनका सँग  भला  लगता  है ।
परमेश्वर  सबका  अपना  है  सबका  हित  वह ही करता है ॥9॥

9453
सुत्रामाणं  पृथिवीं  द्यामनेहसं  सुशर्माणमदितिं  सुप्रणीतिम् ।
दैवीं  नावं  स्वरित्रामनागसमस्त्रवन्तीमा  रुहेमा स्वस्तये॥10॥

सबकी  रक्षा  करना  प्रभुवर  जीवन  भर  रहे  तुम्हारा  साथ ।
प्रभु  पावन  पथ  पर  पहुँचाना कर देना तुम हमें सनाथ ॥10॥

9454
विश्वे यजत्रा अधि वोचतोतये त्रायध्वं नो दुरेवाया अभिह्रुतः।
सत्यया वो देवहूत्या हुवेम शृण्यतो देवा अवसे स्वस्तये ॥11॥

हे परमेश्वर ध्येय बताना कहीं राह में भटक न जाऊँ ।
प्रभु तुम मेरी भी रक्षा करना मैं भी भूले को डगर बताऊँ ॥11॥

9455
अपामीवामप  विश्वामनाहुतिमपारातिं  दुर्विदत्रामघायतः ।
आरे देवा द्वेषो अस्मद्युयोतनोरु णः शर्म यच्छता स्वस्तये॥12॥

जो  शूल - सदृश  दुख  देते  हैं  उनसे  सदा  दूर  ही  रखना ।
अत्याचारी  दुष्ट - जनों  से  तुम्हीं  बचाना  रक्षा  करना ॥12॥

9456
अरिष्टः स  मर्तो  विश्व  एधते  प्र  प्रजाभिर्जायते  धर्मणस्परि ।
यमादित्यासो नयथा सुनीतिभिरति विश्वानि दुरिता स्वस्तये॥13॥

प्रभु सत्पथ पर प्रेरित करना अशुभ-निवारण तुम ही करना ।
कर्म - योग तुम ही सिखलाना सत्य-राह पर ही ले चलना ॥13॥

9457
यं  देवासोSवथ  वाजसातौ  यं  शूरसाता  मरुतो  हिते  धने ।
प्रातर्यावाणं रथमिन्द्र सानसिमरिष्यन्तमा रुहेमा स्वस्तये॥14॥

धन भी जीवन में आवश्यक है पर वह नीति-न्याय से आए ।
ऊषा-काल की शुभ वेला हो सत्कर्मों का फल मिल जाए॥14॥

9458
स्वस्ति  नः  पथ्यासु  धन्वसु  स्वस्त्य1प्सु  वृजने स्वर्वति ।
स्वस्ति नः पुत्रकृथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरुतो दधातन॥15॥

राह  भले  ऊबड - खाबड  हो  या  फिर  हो  नीचे - ऊपर ।
भले ही कॉटे हो उस पथ पर पर वह ही हो जाए हितकर॥15॥

9459
स्वस्तिरिध्दि  प्रपथे  श्रेष्ठा  रेक्णस्वत्यभि  या  वाममेति ।
सा नो अमा सो अरणे नि पातु स्वावेशा भवतु देवगोपा ॥16॥

यह  वसुधा  सब  कुछ  देती  है  सबका  मँगल  ही करती है ।
सुख-वैभव  प्रदान  करती है वह ही तो आश्रय बनती है॥16॥

9460
एवा  प्लतेः  सूनुरवीवृधद्वो  विश्व आदित्या अदिते मनीषी ।
ईशानासो  नरो  अमर्त्येनास्तावि  जनो दिव्यो गयेन ॥17॥

हे  परमेश्वर  हे  परममित्र  तुम  सदा अनुग्रह  करते  रहना ।
हे प्रभु तुम यश-वैभव देना तुम हम सबकी पीडा हरना॥17॥       
       
       

 

Saturday, 11 January 2014

सूक्त - 64

[ऋषि- गय प्लात । देवता- विश्वेदेवा । छन्द- जगती- त्रिष्टुप् ।]

9461
कथा देवानां कतमस्य यामनि सुमन्तु नाम शृण्वतां मनामहे ।
को मृळाति कतमो नो मयस्करत्कतम ऊती अभ्या ववर्तति॥1॥

स्तुति करने की विविध विधा है किसका करना है अभिवादन ।
हमें सुरक्षित कौन करेगा किस विधि करना है अभिनन्दन॥1॥

9462
क्रतूयत्नि क्रतयो हृत्सु धीतयो वेनन्ति वेना: पतयन्त्या दिशः ।
न मर्डिता विद्यते अन्य एभ्यो देवेषु मे अधि कामा अयंसत॥2॥

मन  के  उत्तम  संकल्पों  को  ज्ञान - मार्ग  से  हम  ले  जायें ।
ज्ञानी  अपनी  अभिलाषा  को विविध-दिशा में जाकर पायें॥2॥

9463
नरा  वा  शंसं   पूषणमगोह्यमग्निं   देवेध्दमभ्यर्चसे   गिरा ।
सूर्यामासा चन्द्रमसा यमं दिवि त्रितं वातमुषसमक्तुमश्विना॥3॥

पावक - पावन  की  करो  प्रार्थना  पोषक  पूषा  का  पूजन  हो ।
सूर्य  सोम  यम  पवन  देव और  देव  गणों  का  अर्चन  हो॥3॥

9464
कथा  कविस्तुवीरवान्कया  गिरा  बृहस्पतिर्वावृधते  सुवृक्तिभिः।
अज एकपात्सुहवेभिरृक्वबभिरहिःशृणोतु बुध्न्यो3 हवीमनि॥4॥

हे  अग्नि देव आलोक-प्रदाता  तुम  पूजनीय हो तुम प्रणम्य हो ।
हम  तेरा  आवाहन  करते  हैं  हमें  भी  दो  जो बोधगम्य हो ॥4॥

9465
दक्षस्य  वादिते  जन्मनि  व्रते  राजाना  मित्रावरुणा  विवाससि।
अतूर्तपन्था: पुरुरथो  अर्यमा  सप्तहोता  विषुरूपेषु  जन्मसु ॥5॥

आदित्य - देव  आलोक  बॉटते  वे  कर्म - योग  सिखलाते  हैं ।
ऊषा  ताजगी  भर-कर  जाती  रात  में थक-कर सो जाते हैं ॥5॥

9466
ते नो अर्वन्तो हवनश्रुतो हवं विश्वे शृण्वन्तु वाजिनो मितद्रवः ।
सहस्त्रसा मेधसाताविव त्मना महो ये धनं समिथेषु जभ्रिरे॥6॥

धन  की  महिमा  दान  से  बढती  उत्तम-सुख  है  पर-उपकार ।
पर-हित  जैसा  पुण्य  नहीं  है  सोचो और कर लो स्वीकार ॥6॥

9467
प्र वो वायुं रथयुजं पुरन्धिं स्तोमैः कृणुध्वं सख्याय पूषणम् ।
ते हि देवस्य सवितुःसवीमनि क्रतुं सचन्ते सचितःसचेतसः॥7॥

हे  पावन - पूषा  परम - मित्र  हम  तेरा  आवाहन  करते  हैं ।
होकर प्रसन्न आ जाओ प्रभु हवि-भोग तुम्हें अर्पित करते हैं॥7॥

9468
त्रिः सप्त सस्त्रा नद्यो महीरपो वनस्पतीन्पर्वतॉ  अग्निमूतये ।
कृशानुमस्तृन्तिष्यं सधस्थ आ रुद्रं रुद्रेषु रुद्रियं हवामहे ॥8॥

यज्ञ  कर्म  के  हेतु  हम  सभी  देवों  को  यहॉ  बुलाते  हैं ।
सब  नदियों  को  सब सागर को न्यौता देने हम जाते हैं ॥8॥

9469
सरस्वती सरयुः सिन्धुरूर्मिभिर्महो महीरवसा यन्तु वक्षणी:।
देवीरापो मातरः सूदयिन्त्वो घृतवत्पयो  मधुमन्नो अर्चत॥9॥

बडी  लहर  वाली  नदियॉ  भी  इस  महायज्ञ  में  आती  हैं ।
मातृ - सदृश  हैं  ये  सरितायें  मधुर- भाव  देकर जाती  हैं ॥9॥

9470
उत  माता  बृहद्दिवा शृणोतु नस्त्वष्टा देवेभिर्जनिभिः पिता वचः ।
ऋभुक्षा वाजो रथस्पतिर्भगो रण्वःशंसःशशमानस्य पातु नः॥10॥

हे  प्रभु  रक्षा  करो  हमारी  अन्न - धान  तुम  देते  रहना ।
वाणी  का  वैभव  दे  देना  प्रभु  इस  जग  की  पीडा  हरना ॥10॥

9471
रण्वः संदृष्टौ  पितुमॉ  इव क्षयो भद्रा रुद्राणां मरुतामुपस्तुतिः ।
गोभिः ष्याम यशसो जनेष्वा सदा देवास इळया सचेमहि॥11॥

देवों  का  यह  दर्शन  शुभ  है  वे  सुख-साधन  हैं  अन्न - धान ।
उनका सान्निध्य हमें प्यारा है उनका सुमिरन ज्ञान-ध्यान॥11॥

9472
यॉ  मे  धियं  मरुत  इन्द्र  देवा  अददात  वरुण  मित्र  यूयम् ।
तां  पीपयत  पयसेव  धेनुं  कुविद्गिरो  अधि  रथे  वहाथ ॥12॥

मेरे  मन  मति  को  समझाओ  उसे प्रगति का मार्ग दिखाओ ।
सदुपदेश  मुझको  भी  दे  दो  मेरे  मन का ताप मिटाओ ॥12॥

9473
कुविदङ्ग  प्रति  यथा  चिदस्य नः सजात्यस्य मरुतो बुबोधथ।
नाभा यत्र प्रथमं संनसामहे तत्र जामित्वमदितिर्दधातु नः॥13॥

तुम  ही  मेरे  परममित्र  हो  तुमने  सुन्दर  सम्बन्ध  निभाया ।
सुदृढ रहे यह सख्य हमारा तुमने जीवन जीना सिखलाया॥13॥

9474
ते  हि  द्यावापृथिवी  मातरा  मही  देवी देवाञ्जन्मना यज्ञिये इतः
उभे बिभृत उभयं भरीमभिः पुरू रेतांसि पितृभिश्च सिञ्चतः॥14॥

पवन  देव  पावन  पृथ्वी  का  सुन्दर  साथ  सदा  से  ही  है ।
प्राणी को प्राण-वायु मिल जाता जल-धारा की कमी नहीं है ॥14॥

9475
वि  षा  होत्रा  विश्वमश्नोति  वार्यं  बृहस्पतिररमति: पनीयसी ।
ग्रावा यत्र मधुषुदुच्यते बृहदवीवशन्त मतिभिर्मनीषिणः॥15॥

वाणी  का  वैभव  विस्तृत  है  भाव - कपाट  खोल कर रखती ।
विविध मन्त्र से सब विभूति फिर वातायन की ओर निरखती॥15॥

9476
एवा  कविस्तुवीरवॉ  ऋतज्ञा  द्रविणस्युर्द्रविणसश्चकानः ।
उक्थेभिरत्र मतिभिश्च विप्रोSपीपयद्गयो दिव्यानि जन्म ॥16॥

विविध-भॉति  के  मनुज  यहॉ  हैं सबके अपने-अपने विचार ।
जो  जितना  तत्पर  होता  है उसके जीवन का वही सार ॥16॥

9477
एवा  प्लतेः सूनुरवीवृधद्वो  विश्व  आदित्या  अदिते  मनीषी ।
ईशानासो  नरो  अमर्त्येनास्तावि  जनो  दिव्यो  गयेन ॥17॥

परमेश्वर  तुम  पूजनीय  हो  तुम  ही  देते  हो  धन - धान ।
जिसमें जितना आत्मिक बल है वह पा लेता उतना ज्ञान॥17॥
  

 

Friday, 10 January 2014

सूक्त - 65

[ऋषि- वसुकर्ण वासुक्र । देवता- विश्वेदेवा । छन्द- जगती- त्रिष्टुप् ।]

9478
अग्निरिन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा वायुः पूषा सरस्वती सजोषसः ।
आदित्या विष्णुर्मरुतः स्वर्बृहत् सोमो रुद्रो अदितिर्ब्रह्मणस्पतिः॥1॥

अन्तरिक्ष आकाश अनिल और अनल - दामिनी नभ - स्थित हैं ।
औषधि - प्राण - वनस्पतियों  का परमात्मा पालक-पोषक है॥1॥

9479
इन्द्राग्नी  वृत्रहत्येषु सत्पती मिथो हिन्वाना तन्वा3 समोकसा ।
अन्तरिक्षं  मह्या  पप्रुरोजसा  सोमो  घृतश्रीर्महिमानमीरयन् ॥2॥

अग्नि  -  देव  सज्जन  के  रक्षक  दुष्टों  को  दण्डित  करते  हैं ।
सोम  से  उनका तेजस बढता वे नभ को आलोकित करते  हैं॥2॥

9480
तेषां  हि  मह्ना महतामनर्वणां स्तोमॉ इयर्म्यृतज्ञा ऋताविधाम् ।
ये  अप्सवमर्णवं चित्रराधसस्ते नो रासन्तां महये सुमित्र्या:॥3॥

वे  अति-विशिष्ट  हैं  परम-मित्र  हैं  जो  जल-दान  हमें करते हैं ।
जल से विविध अन्न मिलता है सुख से जीवन भर चलते हैं॥3॥

9481
स्वर्णरमन्तरिक्षाणि रोचना द्यावाभूमी पृथिवीं स्कम्भुरोजसा ।
पृक्षा इव महयन्तः सुरातयो देवा: स्तवन्ते मनुषाय सूरयः॥4॥

आदित्य - देव  आलोक  बॉटते  रवि-किरण छटा बिखराती है ।
इह-पर  दोनों  सार्थक  करते इनकी स्तुति दुनियॉ गाती है॥4॥
 
9482
मित्राय शिक्ष वरुणाय दाशुषे या सम्राजा मनसा न प्रयुच्छतः।
ययोर्धाम धर्मणा रोचते बृहद् ययोरुभे रोदसी नाधसी वृतौ॥5॥

आदित्य - वरुण  हैं  मित्र  हमारे  ये  कर्म-योग  सिखलाते हैं ।
धरती  को  समृध्द  बनाते  प्राञ्जल  -  पाठ  -  पढाते  हैं ॥5॥

9483
या   गौर्वर्तनिं   पर्येति   निष्कृतं   पयो  दुहाना  व्रतनीरवारतः ।
सा पब्रुवाणा वरुणाय दाशुषे देवेभ्यो दाशध्दविषा विवस्वते॥6॥

मन्त्र  मार्ग   की   नौकायें   हैं   साधक   पार   उतर   जाता   है ।
जो हविष्यान्न अर्पित करता है वह निज को निर्भय पाता है॥6॥

9484
दिवक्षसो अग्निजिह्वा ऋतावृध ऋतस्य योनिं विमृशन्त आसते।
द्यां स्कभित्व्य1प आ चक्रुरोजसा यज्ञं जनित्वी तन्वी3 नि मामृजु:॥7॥

हे  अग्नि - देवता  हे  तेजस्वी  जल  थल  नभ  में है वास तुम्हारा ।
तेरे  हवि - भोग  ग्रहण  करने  पर  हुआ सुवासित ये जग सारा॥7॥

9485
परिक्षिता  पितरा  पूर्वजावरी  ऋतस्य  योना  क्षयतः  समोकसा ।
द्यावापृथिवी  वरुणाय  सव्रते  घृतवत्पयो  महिषाय  पिन्वतः॥8॥

परमेश्वर   हैं   पिता   हमारे   वे   निज - दायित्व   निभाते   हैं ।
सर्व-व्याप्त  है  वह  परमात्मा  जब  भी  बुलाओ  आ  जाते हैं ॥8॥

9486
पर्जन्यावाता   वृषभा   पुरीषिणेन्द्रवायू   वरुणो   मित्रो   अर्यमा ।
देवॉ आदित्यॉ अदितिं हवामहे ये पार्थिवासो दिव्यासो अप्सु ये॥9॥

मेघ   देव   और   पवन   देव   ये   दोनों   ही   जल -  दायक   हैं ।
हम   प्रेम  से   इन्हें   बुलाते  हैं  ये  मँगल - फल - दायक  हैं ॥9॥

9487
त्वष्टारं  वायुमृभवो  य  ओहते  दैव्या  होतारा  उषसं  स्वस्तये ।
बृहस्पतिं  वृत्रखादं  सुमेधसमिन्द्रियं सोमं धनसा उ ईमहे ॥10॥

सूर्य  वायु  और  ऊषा  मनुज  को  नव - जीवन  देने  आते  हैं ।
सबका कल्याण सदा करते हैं हम उनसे यश-वैभव पाते हैं ॥10॥

9488
ब्रह्म  गामश्वं  जनयन्त  ओषधीर्वनस्पतीन्पृथिवीं  पर्वतॉ  अपः ।
सूर्यं दिवि रोहयन्तः सुदानव आर्या व्रता विसृजन्तो अधि क्षमि॥11॥

सदियों  से  यह  ऋचा  कह  रही  तुम दुनियॉ को यह समझाओ ।
यम  -  नियमों  के  संदेशों  को  पूरी  पृथ्वी  पर   पहुँचाओ ॥11॥

9489
भुज्युमंहसः पिपृथो निरश्विना श्यावं पुत्रं वध्रिमत्या अजिन्वतम्।
कमद्युवं  विमदायोहथुर्युवं  विष्णाप्वं1  विश्वकायाव सृजथः ॥12॥

जग  को  विपदा  से  वही  बचाते  सबको  देते  हैं  धन - धान ।
सुख - सन्तति  वे  ही  देते  हैं  परमेश्वर  हैं  कृपा - निधान ॥12॥

9490
पावीरवी  तन्युतुरेकपादजो  दिवो  धर्ता  सिन्धुरापः  समुद्रियः ।
विश्वे देवासःशृणवन्वचांसि मे सरस्वती सह धीभिःपुरन्ध्या॥13॥

हे  प्रभु  वाणी  का  वैभव  देना  दिव्य - शक्तियों  का  दो  दान ।
हे सरस्वती मेरे मन में विराजो हमको भी दे दो दिव्य-ज्ञान॥13॥

9491
विश्वे  देवा: सह  धीभिः पुरन्ध्या  मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञा: ।
रातिषाचो अभिषाचः स्वर्विदः स्व1र्गिरो ब्रह्म सूक्तं जुषेरत ॥14॥

ज्ञान - कर्म  के  अनगिन  ज्ञाता  हर  युग  में  धरती पर आए ।
सद्गुण से सुख-साधन पाए सत्कर्म सुफल सबको समझाए॥14॥

9492
देवान्वसिष्ठो  अमृतान्ववन्दे  ये  विश्वा  भुवनाभि  प्रतस्थु: ।
ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥15॥

गुरुवों  का  अभिवादन  करते हैं जिनसे सीखा है ज्ञान-ध्यान ।
हे  प्रभु  सदा  सुरक्षा  देना  शुभ  गुण  कर्मों  का  दो दान ॥15॥

 

Thursday, 9 January 2014

सूक्त - 66

[ऋषि- वसुकर्ण वासुक्र । देवता- विश्वेदेवा । छन्द- जगती- त्रिष्टुप् ।]

9493
देवान्हुवे बृहच्छ्रवसः स्वस्तये ज्योतिष्कृतो अध्वरस्य प्रचेतसः।
ये  वावृधुः प्रतरं  विश्ववेदस  इन्द्रज्येष्ठासो अमृता ऋतावृधः ॥1॥

प्रचुर अन्न-जल  ज्योति-सृजेता  हे  परम पिता  तुम  ही तो हो ।
जग - कल्याण  हेतु हे प्रभुवर जीवन-पथ के पाथेय तुम्हीं हो॥1॥

9494
इन्द्रप्रसूता  वरुणप्रशिष्टा  ये  सूर्यस्य  ज्योतिषो  भागमानशुः ।
मरुद्गणे  वृजने  मन्म  धीमहि माघोने यज्ञं जनयन्त सूरयः॥2॥

कर्म - योग  है  मानुष - जीवन  वरुण - देव  जीना  सिखलाते ।
पवन - देव  परहित समझाते आदित्य-देव आलोक-बिछाते॥2॥

9495
इन्द्रो वसुभिः परि पातु नो गयमादित्यैरर्नो अदितिः शर्म यच्छतु ।
रुद्रो रुद्रेभिर्देवो मृळयाति नस्त्वष्टा नो ग्नाभिः सुविताय जिन्वतु॥3॥

हे  रुद्र - देव  सुख - सन्तति  देना  हे  प्रभु  सदा  सुरक्षित  रखना ।
शुभ - चिन्तन  हो  लक्ष्य  हमारा  सत्पथ  पर  हमको  ले चलना॥3॥

9496
अदितिर्द्यावापृथिवी   ऋतं   महदिन्द्राविष्णू   मरुतः   स्वर्बृहत् ।
देवॉ आदित्यॉ अवसे हवामहे वसून् रुद्रान्त्सवितारं सुदंससम्॥4॥

अवनि  अनल  और  अनिल  यहॉ  पर  अपनी महिमा से ठहरे हैं ।
सूरज   और   गगन   पानी  भी  पर - उपकारी   रूप   धरे   हैं ॥4॥

9497
सरस्वान्धीभिर्वरुणो  धृतव्रतः  पूषा  विष्णुर्महिमा  वायुरश्विना ।
ब्रह्मकृतो  अमृता  विश्ववेदसः शर्म  नो  यंसन  त्रिवरुथमंहसः॥5॥

कर्म - योग  है  गति  का  सूचक  वरुण - देवता  जल-दायक  हैं ।
आदित्य-अनिल और अवनि सभी सुधा-सदृश फल-दायक हैं॥5॥

9498
वृषा यज्ञो वृषणः सन्तु यज्ञिया वृषणो देवा वृषणो हविष्कृतः।
वृषणा द्यावापृथिवी ऋतावरी वृषा पर्जन्यो वृषणो वृषस्तुभः॥6॥

हे  विश्व - देव  तुम  पूजनीय  हो  मनो - कामना  पूरी  करना ।
हम हविष्यान्न अर्पित करते हैं पथ का पाथेय तुम्हीं बनना॥6॥

9499
अग्नीषोमा  वृषणा  वाजसातये  पुरुप्रशस्ता  वृषणा  उप ब्रुवे ।
यावीजिरे वृषणो देवयज्यया ता नःशर्म त्रिवरूथं वि यंसतः॥7॥

हे  सोम  देव  तुम  अन्न  हमें  दो  अभिलाषायें  पूरी  करना ।
प्रभु  तुम  हमें  सुरक्षा  देना  सबके  मन  की  पीडा  हरना ॥7॥

9500
धृतव्रता: क्षत्रिया यज्ञनिष्कृतो बृहद्दिवा अध्वराणामभिश्रियः।
अग्निहोतार  ऋतसापो  अद्रुहोSपो  असृजन्ननु  वृत्रतूर्ये ॥8॥

हे  प्रभु  कर्म-धर्म  में  रुचि  हो  कर्मों का हो समुचित निर्वाह ।
प्रभु  जी  द्वेष-रहित  जीवन  हो  पर-सेवा  ही हो मेरी राह ॥8॥

9501
द्यावापृथिवी जनयन्नभि व्रताप ओषधीर्वनिनानि यज्ञिया ।
अन्तरिक्षं स्व1रा पप्रुरूतये वशं देवासस्तन्वी3 नि मामृजु॥9॥

हे विश्व-देव शुभ चिन्तन देना शुभ-कर्मों का देना अनुदान ।
सबके हित में मेरा हित हो देना सुन्दर समुचित-ज्ञान ॥9॥

9502
धर्तारो दिव ऋभवः सुहस्ता वातापर्जन्या महिषस्य तन्यतोः।
आप ओषधी: प्र तिरन्तु नो गिरो भगो रातिर्वाजिनो यन्तु मे हवम्॥10॥

पर्जन्य - देव  तुम  पूजनीय  हो  सदा  हमारी  रक्षा करना ।
हम हवि-भोग तुम्हें देते हैं तुम अन्न-धान देते रहना ॥10॥

9503
समुद्रः  सिन्धू  रजो  अन्तरिक्षमज  एकपात्तनयित्नुरर्णवः ।
अहिर्बुध्न्यः शृणवद्वचांसि मे विश्वे देवास उत सूरयो मम॥11॥

हे अन्तरिक्ष आदित्य अवनि हे मेघ-देव और मध्यम- बानी ।
हे विश्व-देव सागर-समेत सब तक पहुँचाओ मेरी ज़ुबानी॥11॥

9504
स्याम वो मनवो देववीतये प्राञ्चं नो यज्ञं प्र णयत साधुया ।
आदित्या रुद्रा वसवः सुदानव इमा ब्रह्म शस्यमानानि जिन्वत॥12॥

हम  सभी  सदा  सत्कर्म  करें हम सब हैं मनु की संतान ।
त्याग-सहित उपभोग करें हम हो परम्परा का परिज्ञान ॥12॥

9505
दैव्या होतारा प्रथमा पुरोहित ऋतस्य पन्थामन्वेमि साधुया ।
क्षेत्रस्य पतिं प्रतिवेशमीमहे विश्वान्देवॉ अमृतॉ अप्रयुच्छतः॥13॥

आदित्य अग्नि हैं श्रेष्ठ-पुरोहित देवों का करते हैं आवाहन ।
परमेश्वर से धन-धान मॉगते अर्पित करते हैं हविष्यान्न ॥13॥

9506
वसिष्ठासः  पितृवद्वाचमक्रत  देवॉ  इळाना  ऋषिवत् स्वस्तये ।
प्रीता  इव  ज्ञातयः काममेत्यास्मे  देवासोSव धूनुता वसु ॥14॥

ऋषि  ने  पूजन-अर्चन  करके  सबके  हित  की  बात  कही  है ।
हे प्रभु तुम ही परममित्र हो तुम वह करना जो बात सही है॥14॥

9507
देवान्वसिष्ठो  अमृतान्ववन्दे  ये  विश्वा  भुवनानि  प्रतस्थुः ।
ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिःसदा नः॥15॥

हे  अद्वितीय  हे  अविनाशी  जीवन  बन  जाए  देव - समान ।
सदा  सुरक्षा  देना  प्रभुवर  देते  रहना  धन  और  धान ॥15॥ 
            
  

Wednesday, 8 January 2014

सूक्त - 67

[ऋषि- अयास्य आङ्गिरस । देवता- बृहस्पति । छन्द- त्रिष्टुप् ।]

9508
इमां धियं सप्तशीर्ष्णीं पिता न ऋतप्रजातां बृहतीमविन्दत् ।
तुरीयं स्विज्जनयद्विश्वजन्योSयास्य उक्थमिन्द्राय शंसन्॥1॥

ऋषि  ने  मन्त्रों  की  रचना  की  जो सत्य-भूमि में उपजा है ।
जन-कल्याण निहित है इसमें इसीलिए ऋषि ने सिरजा है॥1॥

9509
ऋतं शंसन्त ऋजु दीध्याना दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीरा: ।
विप्रं पदमङ्गिरसो दधाना यज्ञस्य धाम प्रथमं मनन्त॥2॥

ज्ञान-कर्म और सत्य सिखाते पावन-पथ पर ही चलते हैं ।
ऋषि पर-हित में रत रहते हैं वे सत्कर्म सतत करते हैं॥2॥

9510
हंसैरिव सखिभिर्वावदद्भिरश्मन्मयानि नहना व्यस्यन्  ।
बृहस्पतिरभिकनिक्रदद्गा उत प्रास्तौदुच्च विद्वॉ अगायत्॥3॥

मधुर-वचन की अद्भुत-महिमा सज्जन की होती मीठी बोली।
समवेत-स्वरों में सब गाते हैं फिर करते हैं सभी ठिठोली॥3॥

9511
अवो द्वाभ्यां पर एकया गा गुहा तिष्ठन्तीरनृतस्य सेतौ ।
बृहस्पतिस्तमसि ज्योतिरिच्छन्नुदुस्त्रा आकर्वि हि तिस्त्र आवः॥4॥

परा-पश्यन्ती और मध्यमा दिव्य वाक्-दर्शन करवाओ ।
हे प्रभु तम से हमें उबारो उजियारे पथ-पर पहुँचाओ॥4॥

9512
विभिद्या पुरं शयथेमपाचीं निस्त्रीणि साकमुदधेरकृन्तत् ।
बृहस्पतिरुषसं सूर्यं गामर्कं विवेद स्तनयन्निव द्यौः ॥5॥

हे प्रभु भव-बन्धन तुम काटो ज्ञान-ज्योति तुम दिखलाओ।
जीवन  यह  सार्थक  हो जाए ऐसी कोई जुगत बताओ ॥5॥

9513
इन्द्रो  वलं  रक्षितारं  दुघानां  करेणेव  वि  चकर्ता  रवेण ।
स्वेदाञ्जिभिराशिरमिच्छमानोSरोदयत्पणिमा गा अमुष्णात्॥6॥

आदित्य - देव आलोक - प्रदाता पावस को प्रेरित करता है ।
बरसात सुहानी तब होती है मानव सुख अनुभव करता है ॥6॥

9514
स ईं सत्येभिः सखिभिः शुचद्भिर्गोधायसं वि धनसैरदर्दः ।
ब्रह्मणस्पतिर्वृषभिर्वराहैर्घर्मस्वेदेभिर्द्रविणं     व्यानट् ॥7॥

प्रकृति-नटी की क्षमता अद्भुत चुप-चुप चलता कार्य-कलाप ।
होती नहीं खबर पर वह तो कुछ-कुछ करती है चुपचाप ॥7॥

9515
ते सत्येन मनसा गोपतिं गा इयानास इषणयन्त धीभिः ।
बृहस्पतिर्मिथो अवद्यपेभिरुदुस्त्रिया असृजत स्वयुग्भिः॥8॥

आदित्य-देव का अभिवादन है करते हैं उनका गुण-गान।
जीवन के आलोक तुम्हीं हो करो अनुग्रह दयानिधान ॥8॥

9516
तं वर्धयन्तो मतिभिः शिवाभिः सिहमिव नानदतं सधस्थे ।
बृहस्पतिं वृषणं शूरसातौ भरेभरे अनु मदेम जिष्णुम् ॥9॥

सिह-सम मेघ गरजते नभ में फिर होती सुखकर बरसात ।
तुम सबका कल्याण करो प्रभु करें प्रणाम सभी दिन-रात॥9॥

9517
यदा   वाजमसनद्विश्वरुपमा   द्यामरुक्षदुत्तराणि   सद्म ।
बृहस्पतिं वृषणं वर्धयन्तो नाना सन्तो बिभ्रतो ज्योतिरासा॥10॥

आदित्य - देवता  जल  देते  हैं  जिससे  मिलता है धन-धान ।
हे प्रभु सब हों सुखी यहॉ पर सबको देना यश-वैभव-दान॥10॥

9518
सत्यामाशिसषं  कृणुता  वयोधै  कीरिं  चिद्धय्वथ स्वेभिरेवैः ।
पश्चा मृधो अप भवन्तु विश्वास्तद्रोदसी शृणुतं विश्वमिन्वे॥11॥

अन्न - शाक  भर-पूर  मिले  प्रभु  यही  प्रार्थना हम करते हैं ।
सभी  सुखी  हों  सभी  निरोगी  बारम्बार  यही कहते हैं ॥11॥

9519
इन्द्रो  मह्ना  महतो  अर्णवस्य  वि  मूर्धानमभिनदर्बुदस्य ।
अहन्नहिमरिणात्सप्त सिन्धून्देवैर्द्यावापृथिवी प्रावतं नः॥12॥

शस्य - श्यामला  पावन - वसुधा हम सब जीवों की जननी है ।
मेघदेव तुम जल बरसाना यह धरणी जीवन की तरणी है॥12॥          

     

Tuesday, 7 January 2014

सूक्त - 68

[ऋषि- अयास्य आङ्गिरस । देवता- बृहस्पति । छन्द- त्रिष्टुप् ।]

9520
उदप्रुतो  न  वयो  रक्षमाणा  वावदतो  अभ्रियस्येव  धोषा: ।
गिरिभ्रजो नोर्मयो मदन्तो बृहस्पतिमभ्य1र्का अनावन्॥1॥

कृषक फसल की रक्षा करने हेतु अलग सी ध्वनि करता है ।
वर्षा से पहले मेघ गरजता वैसे ही ज्ञानी स्तुति करता है॥1॥

9521
सं गोभिराङ्गिरसो नक्षमाणो भग इ इवेदर्यमणं निनाय ।
जने मित्रो न दम्पती अनक्ति बृहस्पते वाजयाशूँरिवाजौ॥2॥

सूर्यदेव आलोक-प्रदाता सन्ध्या-वेला चुप-चुप हो जाता ।
मित्र-समान ही पति-पत्नी को बडे-प्रेम से वही मिलाता॥2॥

9522
साध्वर्या  अतिथिनीरषिरा:  स्पार्हा:  सुवर्णा  अनवद्यरूपा: ।
बृहस्पतिःपर्वतेभ्यो वितूर्या निर्गा ऊपे यवमिव स्थिविभ्य:॥3॥

बृहस्पति  गो-सेवा  करते  हैं  गो-माता  से  बातें  करते  हैं ।
गऊ  को  कष्टों  से  वही बचाते गो-माता की पीडा हरते हैं॥3॥

9523
आप्रुषायन्मधुन ऋतस्य योनिमवक्षिपन्नर्क उल्कामिव द्यो: ।
बृहस्पतिरुध्दरन्नश्मनो गा भूम्या उद्नेव वि त्वचं बिभेद ॥4॥

पावस  से  पृथ्वी  सिञ्चित  होती  बादल हमको जल देता है ।
जिससे अन्न-फूल-फल मिलता इतने में प्राणी जी लेता है॥4॥

9524
अप ज्योतिषा तमो अन्तरिक्षादुद्नः शीपालमिव वात आजत् ।
बृहस्पतिरनुमृश्या  वलस्याभ्रमिव  वात आ चक्र आ गा: ॥5॥

पवन - देव  में  अनुपम  गति  है  जल  से शैवाल हटा देते हैं ।
वे  ही  नभ से जल बरसाते आत्मीय समझ अपना लेते हैं॥5॥

9525
यदा  वलस्य  पीयतो  जसुं  भेद्  बृहस्पतिरग्नितपोभिरर्कैः ।
दभ्दिर्न  जिह्वा परिविष्टमाददाविर्निधींरकृणोदुस्त्रियाणाम् ॥6॥

जैसे  भोजन  को  दॉत  चबाते  फिर  रसना  रस  को पाती है ।
वैसे  ही  देव  बृहस्पति  को  गौ  अकस्मात् मिल जाती है ॥6॥

9526
बृहस्पतिरमत  हि  त्यदासां  नाम  स्वरीणां  सदने गुहा यत् ।
आण्डेव भित्त्वा शकुनस्य गर्भमुदुस्त्रिया: पर्वतस्य त्मनाजत्॥7॥

दुष्टों   ने   गाय   चुराई   थी  जब  वह  जोर - जोर  से  रँभाई ।
गुरु  ने  जाना  फिर उसे छुडाया मुक्त हुई थी तब गौ-माई ॥7॥

9527
अश्नापिनध्दं मधु पर्यपश्यन्मत्स्यं न दीन उदनि क्षियन्तम् ।
निष्टज्जभार  चमसं  न वृक्षाद् बृहस्पतिर्विरवेणा विकृत्य॥8॥

गुफा  में  बँधक  थीं  सब  गायें उन  सबकी दयनीय-दशा थी ।
जल-बिन  मछली जैसी वे सब भूखी-प्यासी तडप रही थीं॥8॥

9528
सोषामविन्दत्स स्व1: सो अग्निं सो अर्केण वि बबाधे तमांसि।
बृहस्पतिर्गोवपुषो  वलस्य  निर्मज्जानं  न  पर्वणो  जभार ॥9॥

पवन  -  देवता   और   ऊषा   का   साथ   बहुत  ही  सुन्दर   है ।
आदित्य अनल और अनिल तीन वर्षा के माध्यम सुखकर हैं॥9॥

9529
हिमेव  पर्णा  मुषिता  वनानि  बृहस्पतिनाकृपयद्वलो  गा: ।
अनानुकृत्यमपुनश्चकार यात्सूर्यामासा मिथ उच्चरातः॥10॥

हिम से कमल-पत्र गल जाता बदली ने जग में  किया अँधेरा ।
बीती रात नया दिन आया रवि-किरणों ने आलोक बिखेरा॥10॥

9530
अभि श्यावं न कृशनेभिरश्वं नक्षत्रेभिः पितरो द्यामपिंशन् ।
रात्र्यां तमो अदधुर्ज्योतिरहन्बृहस्पतिर्भिनदद्रिं विदग्दा:॥11॥

निशा-काल  की  सुषमा  अद्भुत   नभ में  चॉद-चमकता  है ।
दिन-भर के श्रम से थका मनुज पुनर्नवा होकर उठता है ॥11॥

9531
इदमकर्म    नमो    अभ्रियाय    यः   पूर्वीरन्वानोनवीति ।
बृहस्पति: स हि गोभिः सो अश्वैः स वीरेभिःस नृभिर्नो वयो धात्॥12॥

मेघ - दामिनी  की  महिमा  का  यह  है  सुन्दर  गौरव-गान ।
हे गुरुवर तुम हमें भी दे दो यश का वैभव धन और धान ॥12॥