Wednesday, 2 December 2015

कंस

                    कहानी


नीलू बहुत अच्छी लडकी है । पास - पडोस के सभी लोग उसे बहुत पसन्द करते हैं. वह हमेशा खुश रहती है पर आज वह बहुत खुश है आज उसे उसकी पहली पगार मिली है. वह अपने लिए जेवर खरीदने जा रही है,अपनी शादी की तैयारी कर रही है. वह सोचती है-' मेरी मॉ बिचारी कितना करेगी ?' नीलू के पिता नहीं हैं,पिछले साल दिवंगत हो गए. एक बडा भाई है जो नौकरी करने जाता है और रोज नशे में लडखडाते हुए घर पहुँचता है, उसका नाम किसन है. उसकी शादी हो गई है पर उसकी बीबी अक्सर अपने मायके में ही रहती है. बात भी सही है, जो दिन-रात नशे में रहता हो,अपनी पत्नी को बहन को मारता-पीटता हो उसे कौन पसन्द करेगा ? पत्नी बेचारी भी तो किसी की बेटी है, उसे भी तो शौक लगता होगा कि उसका पति सभ्यता से रहे,कभी-कभी उसे भी घुमाने-फिराने लेकर जाए और सबसे बडी बात अपनी बीबी-बच्चे का ध्यान रखे.

आज नीलु अपने लिए करधन खरीद कर लाई है. अपनी पेटी में रख कर ताला लगा ही रही थी कि उसके भाई ने कहा-' नीलू! इधर आ- देख मैं मछली लाया हूँ,इसको तुरन्त मेरे लिए सब्जी बना दे.' नीलू उस दिन उपवास रखी थी, उसने कहा-' भैया ! आज मेरा उपवास है, मैं आज मछली की सब्ज़ी नहीं बना सकती. मैं तुलसी-चौंरा में दिया बारने जा रही हूँ.'

' देख नीलू ! तू ज्यादा नाटक मत कर, समझी न ! मुझे अभी तुरन्त मछली और भात खाना है, तू अभी इसी वक्त मुझे मछली की सब्ज़ी बना कर दे, वर्ना मैं तुलसी-चौंरा के सामने तुझे जला दूँगा,समझी ?' नीलू ने फिर कहा- 'समझने की कोशिश कर भैया ! आज मेरा उपवास है. तुम क्यों मुझे परेशान कर रहे हो ? आज मैं मछली को हाथ भी नहीं लगाऊँगी, भाभी से रोज-रोज इतना लडते हो,इसीलिए तो वह तुम्हारे साथ रहना पसन्द नहीं करती, मायके चली जाती है. तुम लोग तो अलग रहते हो न! तुम्हारा किचन तो अलग है फिर मुझे क्यों परेशान करते हो ? खुद बना कर खा लो, तुम्हें किसने मना किया है ?'

नीलू की बात सुन कर किसन गुस्से से पागल हो गया और अपनी सगी छोटी-बहन को दौडा-दौडा कर इतना मारा कि वह लहुलुहान हो गई और फिर उसको उठा कर अपने कमरे की ओर ले गया. घंटे भर बाद मोहल्ले में खबर फैल गई कि- नीलू ने आत्महत्या करने की कोशिश की और वह बुरी तरह झुलस गई है. उसके पडोसी  उसे अस्पताल में भर्ती करके आए हैं, तभी पुलिस इन्सपैक्टर भी नीलू का बयान लेने के लिए वहॉ पहुँच गए. डॉक्टर की टीम ने नीलू का उपचार किया पर उन्होंने इन्सपैक्टर से कहा-' इसके बचने की उम्मीद नहीं के बराबर है, आप चाहें तो लडकी का बयान ले सकते हैं.'

नीलू ने अपने बयान में कहा - ' मेरे घरवालों का कोई दोष नहीं है,मैं अपनी मर्जी से आत्महत्या कर रही हूँ.इस घटना की जिम्मेदार मैं खुद हूँ,'

इतना कहते ही नीलू ने दम तोड दिया. दूसरे दिन जब मैं नीलू के घर गई तो उसकी मॉ का रो-रो कर बुरा हाल था. उसने मुझे देखते ही ज़ोर से पकड लिया और बताया-' वोकर कंस भाई हर वोला, नाक-कान के फूटत ले, मोर आघू म मारिस हे बहिनी ! पटक-पटक के मारिस फेर वोला उठा के सुन्ना-कुरिया म ले गे अऊ माटी-तेल डार के  भूँज डारिस. ए दे देख न वोकर पेटी ल !' जैसे ही उस संदूक पर मेरी नज़र पडी,उसका चॉदी का करधन चमक रहा था और एक हरे रंग की नई कमीज़ रखी हुई थी क्योंकि उसके भाई का आज जन्म-दिन है.                                     

Tuesday, 20 October 2015

गंगा से वोल्गा तक

'ऑल इन्डिया पोएटेस कान्फ्रेंस' एक ऐसी संस्था है जो बहनों के सर्वांगीण विकास के लिए कटिबद्ध है. इस संस्था के माध्यम से हमारी प्रतिभा को अनन्त आकाश मिलता है और हमें प्रेरित प्रोत्साहित करने के लिए हमारी अध्यक्षा डॉ रोशन आरा हमेशा हमारे साथ होती हैं. विविध प्रदेशों से पहुँचने वाली विभिन्न बहनें, विविध नदियों की तरह ए. आई. पी. सी. के सागर में समा जाती हैं और स्वयं समुद्र बन जाती है, ए. आई. पी. सी. में रच-बस जाती है.

25 / 09 / 2015
2015 में हम रूस की यात्रा पर निकल रहे हैं. हमें इन्दिरा गॉधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा दिल्ली में 10 बजे रात तक पहुँचना है और 11. 30 को चेक इन करना है. इस बार छत्तीसगढ से हम चार बहनें रूस घूमने जा रही हैं- आशा लता नायडू, चन्द्रावती नागेश्वर, मधूलिका अग्रवाल और मैं पर आशा दीदी आज कल मुँबई में रहती हैं तो वे हमें दिल्ली एअरपोर्ट पर मिलेंगी. अब मैं चन्द्रा और मधु, गोंडवाना से ए सी 3 में बैठ कर दिल्ली जारहे हैं. हमारे सामने के बर्थ पर हमारे जगदलपुर के भदौरिया दम्पत्ति विराजमान हैं और उनसे हमारी दोस्ती भी हो गई है. हँसते-गाते, खाते-पीते कब भोपाल आ गया हमें पता ही नहीं चला. भोपाल में मेरी बेटी आस्था मुझसे मिलने आई है वस्तुतः मिलने के बहाने वह मेरे पसन्द की खाने-पीने की चीज़ें लेकर आई है. हम तीनों के लिए कॉफी लाई है, पर हम सभी ने कॉफी बॉट कर पी, मूँगफली खाई और हँसते-गाते हमने अपना सफर तय किया. निजामुद्दीन में हम उतर गए
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26 / 09 / 2015
हम तीनों छत्तीसगढ सदन की ओर जा रहे हैं. यहॉ हमने दिन भर के लिए एक कमरा ले लिया है. हम आराम से नहाए धोए फिर मधु और चन्द्रा ने कैंटीन से खाना मँगवा लिया पर मैं घर से जो पराठा और करेले की सब्ज़ी ले गई थी उसी को खाई. दोपहर को हम शॉपिंग के लिए निकल गए, नागेश्वर को मफलर चाहिए था पर मफलर कहीं नहीं मिला. हम लोग घूम- घाम कर आ गए. थोडी देर आराम किए फिर उन दोनों ने डिनर मँगाया और मैंने वही घर का खाना खाया. काउन्टर में फोन करके हमने टैक्सी मँगाई और रात को आठ बजे एरोड्रम की ओर निकल गए, वहॉ हमें टर्मिनल-5 में एकत्र होना है. हम वहॉ पहुँचकर इतमिनान से बैठ गए. बहनें आती रहीं गप-शप चलता रहा और फिर आशा दीदी का फोन आया-'शकुन! तू कहॉ है ? मैं टर्मिनल 4 के पास खडी हूँ.' मैं आशा दीदी को लेने गई तो दंग रह गई. दीदी इतना सामान लेकर आई हैं, हे भगवान ! कैसे ढोएंगी ? अभी तो मैं ढो रही हूँ पर...मैंने दीदी से पूछा तो वे बोलीं- ' उठा लूँगी रे ! तू चिन्ता मत कर. आशा दीदी घर कुछ-कुछ बना कर लाई थीं उसे हम सब खाए और जब पूरी टीम इकट्ठी हो गई तो भैया ने कहा- ' चलो ! कतार बना लो, चेक इन करना है' आगे-आगे भैया-भाभी और पीछे-पीछे हम सभी कतार से चलते रहे, औपचारिकतायें पूरी करते रहे फिर अरब-अरेबिया के प्लेन पर बैठ गए.

27/ 09 / 2015
 हमारा प्लेन 4 .10 को सुबह उडा और हमें लगभग 4 - 5 घंटे में शारज़ाह पहुँचा दिया. शारज़ाह में हमने हाथ - मुँह धोकर चाय पी, ब्रेकफास्ट किया और फिर अरब अरेबिया से मास्को के लिए रवाना हो गए. जब हम मास्को पहुँचे तो शाम हो रही थी और मास्को के समय के अनुसार मेरी घडी में शाम के 5.30 बजे थे. मास्को में बोर्डिंग के समय बहुत वक़्त लग गया और इसी चक्कर में शाम को सर्कस देखने का हमारा अभियान फेल हो गया जबकि हमारी टिकट हो चुकी थी फिर भी हम वहॉ के नायाब सर्कस को नहीं देख पाए इसका अफसोस है पर यात्रा के दौरान तो इस तरह की घटनायें होती रहती हैं तो ' बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लेइ' की राह पर आगे बढते हैं.मास्को में हमारी गाइड श्वेता श्वेतलाना,हमारे लिए गाडी लेकर हमें रिसीव करने आई है. श्वेता गज़ब की सुन्दर है, मुस्कुराता हुआ चेहरा, अपने कार्य के प्रति उसका समर्पण, प्रणम्य है. हम मास्को सिटी की ओर बढ रहे हैं और हमारे भैया हमें बता रहे हैं कि-' देखो ! यह 'मास्कवा' नदी है, इसी के नाम पर इस शहर का नाम ' मास्को' पडा, उन्होंने हमें 'वोल्गा' नदी से रूबरू करवाया और बतलाया कि यह 'गंगा' जैसी महत्वपूर्ण नदी है और यह भी बताया कि क्रेमलिन जैसा सुन्दर राजमहल कहीं नहीं है. हमारे संस्थापक डॉ लारी आज़ाद इतिहास के प्राध्यापक हैं और अपनी विभिन्न गतिविधियों द्वारा सम्पूर्ण विश्व में जाने जाते हैं. वे हमें इतिहास की घटनाओं को बडी दिलचस्पी से लगातार बताते जाते हैं और मैं सभी घटनाओं को लिखना चाहती हूँ पर बीच-बीच में छूट जाता है, मुझे इतिहास और भूगोल की तनिक़ भी जानकारी नहीं है कि मैं घटनाओं को आपस में जोड सकूँ. काश ! मैं भैया के एक-एक शब्द को लिख पाती तो मेरा ब्लॉग कितना भव्य बन जाता.अब हम डिनर के लिए जा रहे हैं. रेस्टोरेंट का नाम है -'तन्दूरी नाइट'. यह एक भारतीय रेस्टोरेंट है. यहॉ हमने भोजन किया और फिर अपने हॉटेल ' मास्को अज़िमत ओलम्पिक' में जाकर आराम किया. यह एक चार सितारा हॉटेल है,बहुत सुन्दर और साफ-सुथरा है. हम बहुत थके हुए थे, ठंड बहुत थी. अधिकतम-16' c और न्यूनतम 3'c.आशा दीदी मेरे साथ हैं,हमें 11वें माले में रूम मिला है, बहुत ही साफ-सुथरा,आराम-दायक बिस्तर है. मन प्रसन्न हो गया, हमें अच्छी नींद आई
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28 / 09 / 2015
हम सुबह उठे तो बारिश हो रही थी. जब हम नहा-धोकर जलपान के लिए पहुँचे तो हमने देखा कि सैकडों तरह की चीज़ें वहॉ विद्यमान हैं, मुझे समझ में ही नहीं आया कि मैं क्या खाऊँ ? मैं सूखे मेवे की ओर गई और अखरोट,बादाम,किसमिस और एक गोल-गोल कुछ था, जिसका स्वाद चिरौंजी जैसा था,उसे लेकर आई, दो केले और एक सेब खाई,मेरा पेट भर गया, खाने में मज़ा भी आया.अब हम घूमने जा रहे हैं जिधर नज़र जाती है वहॉ से उठती नहीं है. साफ-सुथरी सडकें हरे-भरे बागों ने हमारा ऑचल पकड लिया. अभी दोपहर के दो बजे हैं,अब हम लंच के लिए 'स्लोथनिक हॉटेल' में जा रहे हैं.यह एक भारतीय रेस्टोरेंट है, हमने यहॉ भोजन किया खाना अच्छा था पर रोटी मैदे की थी. लंच के बाद हम म्युज़ियम देखने के लिए फिर निकल गए और फिर शाम को हॉटेल 'खजुराहो' में हमारा ए. आई. पी. सी. का कार्यक्रम था. भारतीय दूतावास के संस्कृति-विभाग के डिप्टी-डायरेक्टर श्री सञ्जय जैन हमसे मिलने आए थे और वहॉ की लायब्रेरियन डा. मिताली सरकार भी वहॉ उपस्थित थी. यह एक बहुत ही गरिमामय कार्यक्रम था. भैया ने हम सभी का परिचय श्री सञ्जय जैन जी से करवाया और फिर बहनों ने अपनी-अपनी किताबों का विमोचन करवाया.श्री सञ्जय जैन जी हम सबको भारतीय दूतावास में आमंत्रित करना चाहते थे, किन्तु हमें आज शाम को मास्को के मैट्रो में घूमना था. हम सबने डिनर किया और फिर मैट्रो की ओर चल पडे
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मास्को के मैट्रो तक जब हम पहुँचे तो हम भौचक्के रह गए. मैट्रो की दीवारें इस तरह सजी हुई थीं मानो दीवाली हो. भव्य-दीवारें, अद्भुत-कला-कृतियॉ. मैट्रो तक पहुँचने के लिए हमने आधा-किलोमीटर स्कलेटर का सफर तय किया. हे भगवान ! मेरे भारत को भी ऐसा ही वैभव देना. हर क्षेत्र में मेरा भारत विश्व के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचे,तुझसे यही प्रार्थना है.

29 / 09 / 2015
आज हमें मास्को से सेंट पीटर्सबर्ग पहुँचना है. हमने यह तय किया है कि हम ट्रेन से सेंट पीटर्सबर्ग जायेंगे. हमने जलपान किया और फिर अपनी गाडी में बैठ कर मास्को के रेल्वे-स्टेशन पर पहुँच गए. हम वहॉ अपनी गाडी में अपनी सीट पर बैठ गए.ट्रेन में जब मैं वाश-रूम गई तो मैंने देखा वाश-रूम के भीतर एक सुन्दर सी लडकी खडी है मैंने संकोच-वश तुरन्त दरवाजा बन्द कर दिया. थोडी देर बाद जब मैंने फिर दरवाज़ा खोला तो वही सुन्दरी फिर दिखी, इस बार मैंने उस पर दृष्टि डाली तो पता चला कि वह दर्पण है. मैं बाहर आकर जब अपनी सहेलियों को यह बात बताई तो उन्होंने मेरी अच्छी मरम्मत की,कहा-' तू और सुन्दर ? कभी दर्पण में अपनी शकल देखी है ? ' मैंने कहा- ' हॉ, आज देखी हूँ.' और हम सभी हँसती हुई लोट-पोट हो गईं.
गोधूलि-वेला में हम सेंट-पीटर्सबर्ग पहुँचे. वहॉ हमारी दूसरी गाइड एना हमारे लिए कोच लेकर आई थी. हम सब उसी के पीछे कतार-बद्ध होकर चलते गए और अपनी गाडी पर जाकर बैठ गए. एक भारतीय रेस्टोरेंट जिसका नाम 'नमस्ते जी' है हम डिनर के लिए गए फिर अपने हॉटेल ' पार्क इन ' पहुँचकर विश्राम किए. मैं और आशा दीदी साथ-साथ हैं. हमें दसवें माले में रूम मिला है और हमारे रूम का नम्बर है-10012. सेंट पीटर्सबर्ग में हमने 'नेवा' नदी देखी जो आगे जाकर मास्कवा और वोल्गा नदी से मिल गई है और फिर मेरे होठों में यह गीत थिरकने लगा -
' ओहो रे ताल मिले नदी के जल में नदी मिले सागर में
सागर मिले कौन से जल में कोई जाने न ओहो रे ताल मिले


30 / 09 / 2015
सुबह ब्रेकफास्ट के तुरन्त बाद हम साइड-सीन के लिए निकल गए. हल्की-हल्की बारिश हो रही थी. किसी ने
रेनकोट पहना तो किसी ने छाता खोला पर हम पूरे दिन घूमते रहे. राजमहल देखने के बाद हमने यह अनुभव किया कि भैया ठीक कहते हैं- ' क्रेमलिन से ज्यादा सुन्दर राजमहल कहीं नहीं है. इसका सौंन्दर्य अद्भुत है. लुई 16वीं की बीबी 'मैरी ऑनलोवोस्की' का दृष्टान्त है-कि जब भूख से बौखलाई हुई जनता जब अपनी रानी को अपना दुखडा सुना रही थी कि-' हमारे पास खाने के लिए रोटी नहीं है.' तो उनकी रानी ने उनसे कहा-' तुम लोग केक क्यों नहीं खाते ?' अन्ततः भूखी जनता ने अपनी रानी को सरे आम फॉसी पर लटका दिया और फिर 1917 में ' लेनिनग्राद' बन गया,जहॉ से पूरी दुनियॉ में मार्क्सवाद फैला. 1992 में मिखाइल गोर्वाचोव के काल में रूस 50 टुकडों में बँट गया फिर भी सेंट पीटर्सबर्ग, रूस की सॉस्कृतिक राजधानी के रूप में उभरा और उसका जलवा आज भी बरक़रार है
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1/ 10/ 2015
आज हम सब अपने-अपने प्रदेश के पारम्परिक परिधान में सजे-धजे बैठे हैं क्योंकि आज 9-रेड में सॉस्कृतिक मँच पर भारतीय दूतावास से भारत के राजदूत महामहिम अरुण कुमार शर्मा अपनी पत्नी श्रीमती पूनम शर्मा के साथ हमारे कार्यक्रम में शिरक़त करने आ रहे हैं. भैया ने महामहिम के साथ मेरा परिचय करवाया. दीप प्रज्ज्वलन के साथ हमारा कार्यक्रम आरम्भ हुआ. ' कुलगीत' गाने का दायित्व मुझ पर था. कुलगीत गाने में, मैत्रेयी, मधूलिका, आशा दीदी एवम् असम की बहनों का मुझे पूरा सहयोग मिला. 'कुलगीत' के पश्चात हमने कवितायें सुनाई और उन्होंने हमें " Minerva Of The East " सम्मान से अलंकृत किया.उन्हें विदा करते समय मैंने आदरणीया पूनम शर्मा जी से अनुरोध किया कि वे ए.आई.पी.सी. की मेम्बर बन जायें तो उन्होंने हॉ कहा है अब देखते हैं कि कब वे मेम्बर बनती हैं, मैंने उन्हें अपनी किताब " चाणक्य-नीति" भेंट की है जिसे उन्होंने मुस्कुराते हुए स्वीकार किया. उनके व्यवहार में एक अपनापन है जिससे हम सभी प्रभावित हुए

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जैसे ही सॉस्कृतिक कार्यक्रम समाप्त हुआ हम सब भाग कर अपने रूम में गए और चेंज करके ' नमस्ते जी' में लंच करने के बाद नेवा नदी में बोटिंग करने चले गए, इसके लिए हमने 700 रुबेल खर्च किए. हमें बोटिंग में बहुत मज़ा आया, हमने वहॉ बीहू डॉस किया, फोटोग्राफी की और पूरे समय हम मस्ती करते रहे.अविस्मरणीय'''''''''' बोटिंग के बाद हम डिनर के लिए फिर ' नमस्ते जी ' हॉटेल में गए और लौटते समय मैं अचानक सबसे अलग हो गई और रास्ता भटक गई. मैं बहुत आगे निकल गई, जब कोई भी नहीं दिखा तो मैं लौट कर उसी रास्ते पर वापस आई और 'नमस्ते जी' रेस्टोरेंट की ओर दुबारा जा रही थी तब हमारे साथियों ने मुझे देख लिया और पूछा-' कहॉ जा रही हो ?' मेरी जान में जान आई पर भैया को मुझ पर बहुत विश्वास था, उन्होंने कहा- ' कोई और होता तो मैं डरता पर मुझे शकुन्तला दीदी पर पूरा विश्वास है वे टैक्सी लेकर हॉटेल पहुँच जायेंगी', मैंने भैया को देखा तो ऑखों में ऑसूँ आ गए पर मैं 'हॉटेल अज़िमत' को याद करके रखी थी और ' ' पार्क इन ' का नाम याद ही नहीं आ रहा था, अब जाऊँ तो कहॉ जाऊँ ? अक्सर छोटी-छोटी बातों पर मेरी ऑखें भर आती हैं फिर गाहे ब गाहे कोई मुझसे पूछता हैं - ' तुम्हारी ऑखों में कितने सागर भरे हुए हैं ?' मैं कहती हूँ ' यह तो मैं नहीं जानती पर इतना जानती हूँ कि मैं जब आप सबसे विदा लूँगी तो मेरे चेहरे पर मुस्कान होगी और मैं चाहूँगी कि आप सब मुझे हँस कर विदा करें ।

2 / 10 / 2015
आज ' पार्क इन ' हॉटेल को भी विदा करना है. यह बहुत ही सुन्दर तीन सितारा हॉटेल है. अभी 10 बजे हैं. हमने जलपान कर लिया और हॉटेल के अन्दर ही शॉपिंग करने में लग गए हैं. हमें 11.00 बजे यहॉ से निकलना है. हम रूस के रेल - मार्ग से पुनः मास्को जाने के लिए रेल्वे-स्टेशन की ओर चल पडे हैं और अपनी गाइड एना से भी विदा ले रहे हैं' जैसे ही ट्रेन आई हमने अपना टिकट अपने हाथ में लिया और मास्को के लिए रवाना हो गए' मास्को में हमें एलोविना फिर से मिल गई वह हमारे लिए कोच लेकर आई थी, राह के अन्तिम पडाव में बहनों ने अपने-अपने विचार प्रकट किए और फिर भैया ने बताया कि हम 2016 में बाली और जकार्ता जा रहे हैं. हम एरोड्रम पहुँच गए हैं और चेक इन कर रहे हैं. सभी औपचारिकतायें पूरी करके हम अरब अरेबिया में बैठ गए हैं
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 3 / 10 / 2015

इस विमान ने रशियन समय के अनुसार 4. 45 को हमें शारजाह पहुँचाया है. यहॉ हम हाथ-मुँह धोकर चाय-पानी पीकर पुनः एअर-अरेबिया के विमान पर सवार हो गए हैं और शाम को भारतीय समयानुसार हम 5.30 बजे इन्दिरा गॉधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पहुँच गए हैं. हमने जल्दी-जल्दी अपना-अपना सामान लिया और सबसे विदा लेते हुए अपने गन्तव्य की तलाश में निकल पडे- " जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी." मैं अचानक  ' चन्दन कस तोर माटी हे' का यह गीत गुनगुनाने लगी-
' आम लीम बर पीपर पहिरे छत्तीसगढ के सब्बो गॉव ।
नरवा- नदिया तीर म बइठे छत्तीसगढ के सब्बो गॉव ॥'                                            
                                                                   

Tuesday, 6 October 2015

सेंट पीटर्सबर्ग में शकुन्तला का सम्मान

ए आई पी सी के तत्वावधान में अन्तर्राष्ट्रीत सम्मेलन 2015 में सेंट पीटर्सबर्ग में सम्पन्न हुआ जिसमें मुख्य - अतिथि के रूप में भारत के राजदूत महामहिम अरुण कुमार शर्मा ने  वरिष्ठ - साहित्यकार श्री मती शकुन्तला शर्मा को  " MINERVA OF THE  EAST " से अलंकृत किया । इससे पहले भी शकुन्तला जी श्रीलंका , बैंकाग और मलेशिया में ,भारतीय दूतावास की ओर से सम्मानित हो चुकी हैं । सम्मान के इस अवसर पर उन्हें तूलिका पाण्डेय अनुराग पाण्डेय , सीपी दुबे शैलेश दुबे , आस्था एलिया नीरज एलिया अनुग्रह, सञ्जीवनी, शाल्मली , तत्सम , पहल , मन , मधूलिका , चन्द्रावती , मीरा शर्मा एवम् उनके  मित्रों ने उन्हें बधाई दी है ।
  

Monday, 21 September 2015

बेटी बचाओ

                                 [ एकांकी ]

पात्र - परिचय
 1 - रामलाल - घर का मुखिया   उम्र - 50 वर्ष ।
2 - कमला - रामलाल की पत्नी । उम्र - 45 वर्ष ।
3 - पवन -  रामलाल का बेटा ।  उम्र - 25 वर्ष ।
4 - पूजा - पवन की पत्नी । उम्र  - 22 वर्ष ।
5 - शोभा - रामलाल की बेटी । उम्र - 21 वर्ष ।
6 - श्याम - पूजा का भाई । उम्र - 24 वर्ष ।

                            प्रथम - दृश्य

     [  गॉव का घर । गोबर से लीपा हुआ अंगना । अंगना में चौक । रामलाल अपनी पत्नी को कुछ समझा रहे हैं । च्रहरे पर परेशानी का भाव झलक रहा है । ]

रामलाल - कमला ! तुम बहू को समझा दो कि अब वह नौकरी नहीं करेगी । हमारे घर में बहू - बेटियॉ नौकरी नहीं करतीं । यह बात वह जितनी जल्दी समझ जाए, उतना ही अच्छा है ।
 कमला - बहू नौकरी कर रही है, इसमें हर्ज ही क्या है ? अब ज़माना बदल गया है । हमें भी ज़माने के साथ चलना पडेगा, वर्ना हम पीछे रह जायेंगे । जो अन्याय मेरे साथ हुआ , वह अपनी बहू के साथ मैं नहीं होने दूँगी । रामलाल - तुमसे तो कुछ कहना ही बेकार है । हर बात का मतलब उल्टा ही निकालोगी । तुम्हारे भेजे में तो गोबर भरा है ।
कमला - मैं भी तुम्हारे बारे में यही बात कह सकती हूँ । मेरी सज्जनता को मेरी क़मज़ोरी समझने की भूल मत करना ।
रामलाल - हे भगवान ! इस औरत को सद्बुद्धि दे ।
कमला - इसकी ज़्यादा ज़रूरत तुम्हें है ।
[ बहू का प्रवेश ]
पूजा - अम्मॉ ! मैं उनके लिए चाय बना रही हूँ । आप लोगों के लिए बना दूँ क्या ?
कमला - हॉ, बेटा ! बना ले । चाय का टाइम तो हो ही गया है ।
रामलाल - हमारी बहू कितनी समझदार है, देखो हमारा कितना ध्यान रखती है, पर पता नहीं शोभा से कैसा व्यवहार करेगी ? मुझे इस बात की बडी चिन्ता है ।
कमला - मैंने कितनी बार यह बात कही कि हमें सच्चाई बता देनी चाहिए पर तुमने हर बार मना कर दिया । अब मैं क्या करूँ ?
पूजा - लीजिए अम्मॉ ! गरमा - गरम चाय । साथ में आलू - बैगन की पकौडी भी है ।
कमला - बेटा ! चाय पॉच कप क्यों बनाई हो ? हम तो चार ही हैं न !
पूजा - अम्मॉ ! आप शोभा को कैसे भूल सकती हैं ? क्या वह घर पर नहीं है ?

[ रामलाल के हाथ से चाय छलक जाती है पर कमला के हाथ से, चाय का कप गिर जाता है । कप के टूटने की आवाज़ से सभी स्तब्ध हो जाते हैं, सास - ससुर को असहज देखकर, पूजा कहती है -'आप रहने दीजिए अम्मॉ मैं उठा देती हूँ ।'  वह कप के टुकडे उठा - कर भीतर चली जाती है ।]
                 [ पूजा का प्रवेश ]
पूजा - अम्मॉ ! लीजिए, आपकी चाय ।

[ पवन और पूजा पूरे घर को खोज डाले पर शोभा उन्हें कहीं नहीं मिली । थक - हार कर पवन ने अपनी मॉ से पूछा - ]
पवन - अम्मॉ ! शोभा कहॉ है ?
कमला - [ असहज होने का अभिनय करती हुई ] शोभा अपने कमरे में ही है ।
पवन - पर उसके कमरे में तो ताला लगा हुआ है अम्मॉ !
कमला -ये रही चाबी, जा खोल दे ।
[ पवन ने कमरे की चाबी, पूजा के हाथ में देते हुए कहा- " पूजा ! अम्मॉ - बाबूजी शोभा को लॉक करके रखे हैं " तिरस्कार से अपनी माता - पिता को देखते हुए ]
पवन - वह लँगडी है, इसमें उसकी क्या गलती है ? हद कर दिए आप लोग ! अपने ही बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार ? वैसे पूजा ! मैं भी इंजीनियर नहीं हूँ । मैं एम. ए. बी. एड. किया हूँ । शिक्षा - कर्मी वर्ग - एक में बच्चों को हिन्दी पढा रहा हूँ । कभी - कभी मुँह खोलना ज़रूरी होता है अम्मॉ ! इसलिए बोल रहा हूँ । यदि बाबूजी यही बात समझ जाते तो मुझे पूजा के सामने ज़लील होने से बच जाता ।
                     

                             द्वितीय - दृश्य 

[ पूजा ने जब कमरे का ताला खोला तो मारे बदबू के, उसे अपनी नाक में साडी का पल्ला रखना पडा और यह क्या ? शोभा तो यहॉ बेहोश पडी है । वह रोती - चिल्लाती अम्मॉ के कमरे की ओर भाग रही है । ] 

पूजा - अम्मॉ ! शोभा बेहोश पडी है और उसके मुँह से झाग निकल रहा है ।
[अफरा-तफरी में पवन, वैद्य जी को लेकर आया है । सभी के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें दिखाई दे रही है ।] 
वैद्य - चिन्ता की कोई बात नहीं है । थोडी देर में जाग जाएगी । चेहरे पर ठण्डे - पानी का छींटा डालिए । [ पूजा शोभा के चेहरे पर ठण्डा - पानी छिडकती है , शोभा ऑखें मिचमिचाती है ।] शोभा जाग गई है ,उसे नीबू - पानी पिला दीजिए और वह जो खाना चाहे उसे खिला दीजिए । अब मैं चलता हूँ ।
[ पवन, वैद्य जी का बैग पकड - कर उन्हें छोडने जाता है ।]

[ शोभा की यह हालत देख कर पूजा रो - रो कर बेहाल है । उसकी ऑखें सूज गई हैं । वह सपने में भी नहीं सोच सकती कि कोई माता - पिता अपने बच्चे के साथ, ऐसा व्यवहार कर सकता है । वह शोभा का ध्यान इस तरह रखने लगी, जैसे वह उसकी छोटी बहन हो । ननद और भाभी, बतिया रही हैं, आइए हम भी सुनते हैं ।]
शोभा - भाभी । मुझे अम्मॉ - बाबूजी, फटे हुए कपडे की तरह क्यों छिपाते फिरते हैं ? कभी - कभी मैं अपने आप से पूछती हूँ कि यदि मैं लडका होती, तो भी क्या मेरे माता - पिता, मुझे इसी तरह छिपा - कर रखते ? लडकी को कितना अपमानित होना पडता है, भाभी ! उसे उस गलती की सज़ा मिलती है जो उसने कभी की ही नहीं है । 
[ वह पूजा को पकड - कर रोने लगती है ।] 
शोभा - आपके सिवाय, मेरा कोई नहीं है भाभी !
पूजा - मत चिन्ता कर । मैं हूँ न ! 
शोभा - भाभी ! मैं आपसे कुछ मॉगना चाहती हूँ , आप मना तो नहीं करेंगी ? 
पूजा - तू मॉग कर तो देख ! 
शोभा - भाभी ! आपने तो खैरागढ से लोक - गीत में एम. ए. किया है न ? मुझे भी सिखाइये न प्लीज़ ! 
पूजा - तुम मन लगा - कर सीखोगी तो सिखाऊँगी । 
शोभा - मैं आपसे प्रॉमिज़ करती हूँ , आपको कभी निराश नहीं करूँगी ।

[ हम सब काम करते - करते थक जाते हैं और थक - कर सो जाते हैं पर काल - चक्र कभी नहीं रुकता, वह निरन्तर चलता रहता है । दिन के बाद रात आती है और रात के बाद दिवस आता है और इसी तरह न जाने कितनी बरसात निकल जाती है । पूजा अपनी ननद को लोक - गीत गाना सिखाने लगी और सचमुच पूजा ने भी, पूरे मन से गाना सीखा और अब वह स्टेज़ पर गाने लगी है । आइए हम भी सुनें- वह "भरथरी " गा रही है ।
शोभा - 
ए दे नोनी पिला के जनम ल धरे तोर धन भाग ए ओ मोर नोनी 
तैं ह बेटी अस मोर तैं ह बहिनी अस मोर संगवारी अस मोर 
महतारी अस महतारी अस मोर नोनी sssssssssssssssssssssss।

लइका ल कोख म वोही धरथे भले ही पर - धन ए मोर - नोनी 
सब ल मया दिही   भले पीरा सइही    भले रोही - गाही 
ओही डेहरी म  ओही डेहरी म मोर - नोनी  sssssssssssssssssss।

पारस पथरा ए   जस ल बढाथे    मइके के  ससुरे के  मोर नोनी
ओला झन  हींनव ग ओला झन मारव ग  थोरिक सुन लेवव ग
गोहरावत हे  गोहरावत हे मोर - नोनी sssssssssssssssssssssss।

पूजा - तुम बहुत अच्छे से गाई हो शोभा ! पर मैं चाहती हूँ कि तुम फील - करो, इससे तुन्हें मज़ा भी आएगा और गीत में तुम्हारी पकड और मजबूत होगी ।
शोभा - ठीक है भाभी मैं कोशिश करूँगी ।

             तृतीय - दृश्य 

[ श्याम पूजा का भाई है । वह भाई - दूज में अपनी बहन के घर आया है । पूजा, अपने भाई को तिलक, लगा कर, आरती उतार ही रही थी कि आसपास से  "कजरी "  गीत का स्वर सुनाई देता है ।]
                        कजरी 
रंगबे -  तिरंगा मोर लुगरा बरेठिन 
किनारी म हरियर लगाबे बरेठिन ।

झंडा- फहराए  बर  महूँ  हर जाहँवँ
उप्पर म  टेसू -  रंग  देबे  बरेठिन ।

सादा -  सच्चाई  बर  हावय  जरूरी
भुलाबे झन छोंड देबे सादा बरेठिन।

नील रंग म चर्खा कस चक्का बनाबे
नभ  ल अमरही - तिरंगा  बरेठिन ।

श्याम - पूजा ! यह किसकी आवाज़ है ? वह देश - प्रेम में कजरी गा रही है पर उसकी आवाज़ में दर्द क्यों है ? पूजा बताओ न ! वह कौन है ? क्या तुम उसे जानती हो ?
पूजा - है एक लडकी, तुम्हें क्या इंटरेस्ट है ? 
श्याम - पूजा ! मैं उसके गायन का मुरीद हो गया हूँ । उसके लिए कुछ भी कर सकता हूँ ।
पूजा - लूली , लँगडी, अंधी होगी, तब भी क्या तुम --------------------
श्याम - हॉ पूजा हॉ, वह जैसी भी हो, मैं उसे अपनाने के लिए तैयार हूँ ।
[ तभी गीत के आखरी दो पंक्तियों को गुनगुनाती हुई, पूजा का प्रवेश ]
रंगबे -  तिरंगा  मोर लुगरा बरेठिन 
किनारी म हरियर लगाबे बरेठिन ।
[ 'कजरी' गाते- गाते शोभा, अपने भाई - भाभी के कमरे में आती है और किसी अजनबी को देख - कर ठिठक जाती है । श्याम और शोभा के बीच कोई बात नहीं होती पर दोनों असहज हो जाते हैं । अरे ! ये दोनों एक - दूसरे से ऑखें क्यों चुरा रहे हैं ? लगता है कि ये दोनों एक - दूसरे के बहुत क़रीब आने वाले हैं । आज पूजा अपनी शिष्या शोभा को " बिहाव - गीत " गाना सिखा रही है क्योंकि देवउठनी एकादशी आने वाली है । कोसला गॉव के गुँडी में " बिहाव - गीत " का कार्यक्रम है । शोभा, बिहाव - गीत गा रही है और पूजा हारमोनियम बजा रही है, पवन ढोलक बजा रहा है और श्याम बॉसुरी बजा रहा है ।]
शोभा - 
सियाराम के होवत हे बिहाव गौरी - गनेश बेगि आवव 
शुभ - शुभ  होही  सब काज गौरी - गनेश बेगि आवव ।

बॉस - पूजा पहिली मँडवा म होही 
उपरोहित ल  झट के बलाव  गौरी - गनेश  बेगि आवव ।
सियाराम के होवत हे बिहाव गौरी - गनेश बेगि आवव ।
शुभ - शुभ  होही  सब  काज  गौरी - गनेश बेगि आवव ।

चूल - माटी खनबो परघा के लानबो 
थोरिक माटी  के  मान  बढाव गौरी - गनेश बेगि आवव ।
सियाराम के होवत हे  बिहाव गौरी - गनेश बेगि आवव ।
शुभ - शुभ  होही  सब  काज  गौरी - गनेश बेगि आवव ।

पाणि -  ग्रहण  के  बेरा  हर आ  गे
सु - आसीन  मंगल - गाव  गौरी -  गनेश  बेगि  आवव ।
सियाराम के होवत हे बिहाव गौरी - गनेश बेगि आवव ।
शुभ - शुभ  होही  सब  काज  गौरी - गनेश बेगि आवव ।

बर - कइना  दुनों  ल असीस  देवव
दायी - बेटा  आघू  ले  आव  गौरी - गनेश  बेगि आवव ।
सियाराम के होवत हे बिहाव गौरी - गनेश बेगि आवव ।
शुभ - शुभ  होही  सब  काज  गौरी - गनेश बेगि आवव ।

हरियर  हे  मडवा  हरियर हे मनवा
जिनगी  ल  हरियर  बनाव  गौरी - गनेश  बेगि  आवव ।
सियाराम के होवत हे बिहाव गौरी - गनेश बेगि आवव ।
शुभ - शुभ  होही  सब  काज  गौरी - गनेश बेगि आवव ।

[ बिहाव - गीत के सम्पन्न होते ही पवन कुछ कह रहे हैं आइए हम भी सुनते हैं । ]
पवन - आज आप सबको साक्षी मान कर मैं श्याम को अपना बहनोई बना रहा हूँ । [ उसने श्याम का तिलक किया और शगुन के रूप में 101 रुपया उसके हाथ में दिया । श्याम ने तुरन्त पवन के पॉव छुए ।] आज मेरी बहन शोभा ने तुलसी - विवाह में " बिहाव - गीत गाया और आज से ठीक तीन दिन बाद, पूर्णिमा के दिन गोधूलि - वेला में मेरी बहन शोभा की शादी है । आप सभी को निमंत्रण है, उसे आशीर्वाद देने ज़रूर आइये ।

शकुन्तला शर्मा , भिलाई मो - 093028 30030                            
         
                               

Sunday, 13 September 2015

टोनही

                              टोनही                  [ कहानी ]

' रोज सॉझ को दारु पीने के लिए मेरे पास आ जाता है पर अपनी एक लडकी को मेरे यहॉ काम पर लगा दे बोलता हूँ तो मना कर देता है । पढ -लिख कर क्या मास्टरनी बन जाएगी तेरी बेटी ?'
' मेरी घरवाली अपनी बेटियों को आने नहीं देती सेठ ! वरना मैं तो चारों को तुम्हारे यहॉ भेज देता.'
' औरत की इतनी हिम्मत कि वो मर्द की बात को काटे ? सीधी ऊँगली से घी नहीं निकलता बुधराम,उसे टेढी करना पढता है. समझा कि नहीं ? '
' समझ गया सेठ.'
 आज बुधराम जब घर आया तो वह राक्षस बन कर आया । आते ही वह ढेली के ऊपर बरस पडा. गंदी - गंदी गालियॉ देने लगा और ढेली को पीटने लगा. बेटियों ने जाकर छुडाया और चारों बेटियॉ,मॉ के पास ही बैठी रहीं.बारह बरस की निर्मला ने मॉ को बताया कि जब भी वह सम्पत सेठ की दुकान के सामने से गुज़रती है वह उसे आवाज़ देकर बुलाता है कहता है कि-'आ जा ! तुझे चॉकलेट दूँगा ,बिस्किट दूँगा ' पर मैं उधर देखती भी नहीं,  चुपचाप वहॉ से निकल जाती हूँ.' निर्मला की बात सुनकर उसकी बडी दीदी कविता ने उसे समझाया- ' इन जैसे लोगों से हमें बच कर रहना है निर्मला. हमें कभी भी इनकी बातों में नहीं आना है. मन लगा कर पढाई करना है और इस दल-दल से निकलना है. समझी रे मेरी प्यारी बहना ?' निर्मला ने मुस्कुरा कर कहा-' हॉ दीदी.'

ढेली का परिवार भवतरा गॉव में रहता है. उनका छोटा सा घर है. ढेली,चार-पॉच घरों में चौका-बरतन करती है तब कहीं जाकर उनके घर में चूल्हा जलता है और लडकियों की पढाई का खर्च पूरा होता है.उसका पति बुधराम दिन भर सम्पत सेठ का काम करता है और दारु पी कर आ जाता है. घर में कभी एक पैसा नहीं देता. कहता है- 'तू मुझे एक भी सन्तान नहीं दी तो मैं तुझे किसके लिए पैसा दूँ ?'
कविता अभी बारहवीं में पढती है. वह अपने स्कूल में झाडू-पोछा करती है और उसकी मैडम उसे 500 सौ रुपए देती है.कविता हर महीने 400 रुपए बैंक में जमा कर देती है.

ढेली अभी भी इतनी सुन्दर है कि उस पर से निगाहें हटती नहीं.वह बिना सिंगार के सुन्दर दिखती है.उसकी बेटियॉ भी अपनी मॉ जैसी हैं.ऐसा लगता है कि मॉ- बेटियॉ जानती ही नहीं कि वे कितनी सुन्दर हैं कारण उनके घर में दर्पण नहीं है.हर औरत के मन में यह भाव आ ही जाता है कि काश.....
अचानक आज सुबह से ही सरपंच ने ढेली को बुलवाया है. ढेली जब सरपंच के घर पहुँची तो उसकी पडोसन वहीं बैठी थी. ढेली भी उसी के पास जाकर बैठ गई.सरपंच ने कहा-' ढेली! तुम मेरी बात का बुरा मत मानना पर तुम्हारी पडोसन तुम्हारी शिकायत लेकर आई है कि तुमने उसके ऊपर जादू-टोना कर दिया है.'
ढेली की ऑखों में ऑसू आ गए, उसने आश्चर्य से भूरी को देखा तो भूरी चिल्लाने लगी-'सरपंच जी ! देखो इसकी ऑखें,यह ऐसे ही जादू-टोना करती है.'
'अब मैं आपसे क्या कहूँ सरपंच जी ? आप तो मुझे बचपन से जानते हैं' कहते - कहते ढेली ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी और रोते-रोते वह बेहोश हो गई.गॉव में छोटा सा अस्पताल था, सरपंच ने ढेली को वहीं भिजवा दिया. ढेली बीच-बीच में बडबडाती थी-' मेरी बेटियों को बचाओ' और फिर बेहोश हो जाती थी. दिन बीत गया, रात बीत गई, ढेली को होश नहीं आया.दुनियॉ सो रही थी पर उसकी जीभ जाग रही थी. आग की तरह आस-पास के गॉवों में यह खबर फैल गई कि ढेली टोनही है. सुबह जब ढेली को होश आया तो उसके सामने पामगढ के इंसपेक्टर खडे थे और ढेली से पूछ रहे थे-'क्या हुआ ढेली ?' ढेली ने कहा - 'मेरी चार बच्चियॉ हैं उनको बचा लीजिए साहब, उनकी जान खतरे में है.' इंसपेक्टर ने तुरन्त वायरलेस से पुलिस-फोर्स को एलर्ट कर दिया, ढेली की चारों बेटियॉ, बिलासपुर रेल्वे-स्टेशन में, मुँबई-हावरा ट्रेन के ए. सी.कोच में मिलीं, उनके साथ सम्पत-सेठ भी मिला जो चेहरा छुपा-कर बैठा हुआ था. पुलिस ने बुधराम को खोजने की कोशिश की- वह सम्पत - सेठ के घर के सामने बेहोश पडा हुआ था.                                                

Wednesday, 9 September 2015

तीन गज़ल

              छत्तीसगढ के लोग


सरल - सहज हैं संस्कारी हैं छत्तीसगढ के लोग
संकोची - भोले  अल्हड  हैं छत्तीसगढ  के  लोग ।

बाहर  से जो पहुना आता मान  बहुत  देते  हैं वे
सबको अपना कुटुम मानते छत्तीसगढ के लोग ।

भले  ही कोई करे उपेक्षा लडते नहीं किसी से वे
जान- बूझ कर चुप रहते हैं छत्तीसगढ  के लोग ।

नर  हो  चाहे  नारी  डट  कर  मेहनत  वे करते हैं
पुरुषार्थी  हैं  कर्म - वीर  हैं  छत्तीसगढ  के  लोग ।

मेहनत  करता  है किसान जो भरता सबका पेट
भुइयॉ  के  भगवान  हैं भैया  छत्तीसगढ के लोग ।

यहॉ  की  माटी  मम्हाती है देवदारु चन्दन जैसी
'शकुन' यहीं बस जा अच्छे हैं छत्तीसगढ के लोग ।

       तुम मानो या न मानो

        
 जिसकी लाठी भैंस उसी की तुम मानो या न मानो 
नारी  नहीं  बराबर  नर  के  तुम  मानो  या न मानो ।

उसे कभी विश्राम नहीं है तीज तिहार हो या इतवार 
हाथ - बँटाता  नहीं  है  कोई  तुम  मानो या न मानो ।

इंसाफ  नहीं  होता है दफ्तर में भी उसके साथ कभी
ज़्यादा  क़ाम  दिया  जाता है तुम मानो या न मानो ।

कोई  नहीं  समझता उसको कहने को सब अपने  हैं 
नारी  भी  नारी की दुश्मन है तुम मानो या न मानो ।

'शकुन' कोई तरक़ीब बता वह जीवन सुख से जी ले 
जीवन यह अनमोल बहुत है तुम मानो या न मानो ।

  कौम से कटा हुआ ये जी रहा है कौन 

 

 कौम  से  कटा  हुआ  ये  जी रहा है कौन 
ऑख  में ऑसू  लिए  ये  जी रहा है कौन ? 

आज  बहू - बेटियॉ  रोती  हैं  यहॉ  क्यों 
प्रश्न  उठ रहा है कि रुलाता है उन्हें कौन ? 

रोटी - बना  रही  थी  तो आग लग गई 
गगन  में  गूँजता  है  जला रहा है कौन ?

बेबस को मार के भला तुझे मिलेगा क्या 
अपने ही घर में आग लगा रहा है कौन ?

बेटी को बचा ले 'शकुन' रो  रही  है वह
दुनियॉ में आने से उसे  रोक़ रहा कौन ?



Thursday, 27 August 2015

हाइकू

   एक
इरा ने पाया
आई ए एस वन
सबको भाया ।

    दो
कुसुमकली
देख नहीं सकती
कुसुम - कली ।

  तीन
अँधी - भैरवी
सुन्दर गाती है
राग - भैरवी ।

   चार
सूरदास है
मन से देखने का
एहसास है ।

   पॉच
अँधा है पर
तोडता है पत्थर
सडक - पर ।

    छः
रानी है नाम
लंगडी है लेकिन
करती - काम ।

   सात
गूँगी है गंगा
बरतन धोती है
मन है चँगा ।

  आठ
काना - कुमार
झूम - झूम गाता है
मेघ - मल्हार ।

    नव
बहरा - राम
दिन भर करता
बढई - काम ।

    दस
अंधी है माला
अंधों को पढाती है
माला है शाला ।

  ग्यारह
लँगडा - मान
किसानी करता है
नेक - इंसान ।

  बारह
बहरा - राम
टोकनी बनाता है
कहॉ - आराम ?