Saturday, 9 August 2014

संस्कृत - दिवस के पावन - पर्व पर - महाकवि कालिदास

" पुरा कवीनां गणना प्रसंगे कनिष्ठिकाधिष्ठित कालिदासः ।
अद्यापि  तत्तुल्यकवेरभावात् अनामिका सार्थवती बभूव ॥ "

प्राचीन - काल में कवियों की गणना के प्रसंग में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण कालिदास का नाम कनिष्ठिका पर आया , किन्तु आज तक उनके समकक्ष कवि के अभाव के कारण , अनामिका पर किसी का नाम न आ सका और इस प्रकार अनामिका का नाम सार्थक हुआ । कालिदास कवि - कुल - गुरु माने जाते हैं । उन्होंने अपने विषय में कभी कुछ नहीं कहा , किन्तु उनकी रचनायें ही उनका सम्यक् एवम् सटीक परिचय देती हैं । परम्परानुसार कालिदास उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में से एक थे ।

कालिदास ने सात ग्रन्थ लिखे हैं-

1- अभिज्ञानशाकुन्तलम् - कालिदास का यह नाटक देश - विदेश में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ । यह सात अंकों में विभाजित है । इसमें शकुन्तला एवम् दुष्यन्त की प्रणय - गाथा एवम्  "भरत" के जन्म की कथा का वर्णन है ।
ग्रन्थ के आरम्भ में कालिदास ने शिव - पार्वती की वन्दना की है -
" या   सृष्टिः स्त्रष्टुराद्या  वहति   विधिहुतं या  हविर्या   च होत्री
ये द्वे कालं विधत्तःश्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहुः  सर्वबीज   प्रकृतिरिति  यया   प्राणिनः   प्राणवन्तः
प्रत्यज्ञाभिः    प्रपन्नस्तनुभिरवतु    वस्ताभिरष्टाभिरीशः ॥"

जो स्त्रष्टा की प्रथम सृष्टि है , वह अग्नि और विधिपूर्वक हवन की हुई आहुति का वहन करती है , जो हवि है और जो होत्री है , जो दो सूर्य और चन्द्र का विधान करते हैं , जो शब्द - गुण से युक्त होकर आकाश और सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त किए हुए हैं , जिस पृथ्वी को सम्पूर्ण बीजों का मूल कहा जाता है और जिस वायु के कारण प्राणी , प्राण को धारण करते हैं , भगवान शिव प्रसन्न होकर अपने इन आठ रूपों के द्वारा हमारी रक्षा करें ।

" अभिज्ञानशाकुन्तलम् " की कथा आश्रम के आस - पास घूमती है । आश्रम में ही शकुन्तला एवम् दुष्यन्त का प्रथम - मिलन होता है । शकुन्तला के सौन्दर्य - वर्णन में , कालिदास की लेखनी खूब चली है । शकुन्तला के विषय में वे कहते हैं - " वह अनघ पवित्र रूप , अनसूँघा - सुमन नखाघात से अछूता किसलय , अनबिंधा - रत्न अनास्वादित नव - मधु और अखण्ड पुष्पों के फल के समान है । विधाता न जाने किसे , इस सौन्दर्य के उपभोग की पात्रता देगा ? "

2 - विक्रमोर्वशीयम् - यह नाटक पॉच अंकों का है , जिसमें पुरुरवस और उर्वशी के प्रणय एवम् विवाह का वर्णन है । नाटक के आरम्भ में कवि ने शिव - स्तुति की है -
" वेदान्तेषु   यमाहुरेकपुरुषं  व्याप्य   स्थितं   रोदसी
अस्मिन्नीश्वर  इत्यनन्यविषयः  शब्दो यथार्थाक्षरः।
अन्तर्यश्च          मुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मग्यते
स स्थाणुःस्थिरभक्तियोगसुलभो निःश्रेयसायास्तु वः॥

जिसे वेदान्त में परम - पुरुष कहा गया है , जो पृथ्वी और आकाश को व्याप्त करने के बाद भी शेष है , जो अकेला यथार्थाक्षर , ईश्वर नाम को धारण करता है , मोक्ष चाहने वाले , प्राणादि का संयम करके जिसे ज्ञानी अपने अन्तर्मन में ढूँढते हैं , वह स्थिर भक्ति - योग से सहज ही प्राप्त होने वाला स्थाणु हमारा कल्याण करे ।

विक्रमोर्वशीयम् में कालिदास ने कहा है - जिस प्रकार नदी का प्रवाह विषम शिलाओं से अवरुध्द होकर अधिक बलवान हो जाता है , उसी प्रकार प्रेम के मार्ग में , बाधाओं के आने से , प्रेम की तीव्रता सौ - गुना बढ जाती है । विक्रमोर्वशीयम्  में मानवी और अतिमानवी का मेल है । उर्वशी का चरित्र उदार है । पुरुरवस प्रेम में आनन्द - मग्न है । वह प्रेम की तुलना में राज - पाठ को तुच्छ समझता है । इस नाटक में , ईश्वर की उपलब्धि को , भक्ति के द्वारा सुलभ बताया गया है ।

3 - मालविकाग्निमित्रम् - इस नाटक में पॉच अंक हैं । यह मालविका एवम् अग्निमित्र की प्रणय - गाथा है । इसका प्रथम श्लोक इस प्रकार है-
" एकैश्वर्ये  स्थितोSपि  प्रणतबहुफले  यः  स्वयं  कृत्तिवासा:
कान्तासम्मिश्रदेहोSप्यविषयमनंसा यः पुरस्ताद्यतीनाम् ।
अष्टाभिर्यस्य  कृत्सनं  जगदपि  तनुभिर्बिभ्रतो  नाभिमानः
सन्मार्गालोकनाय  व्यपनयतु  स  वस्तामसीं वृत्तिमीशः॥"

इस श्लोक में ईश्वर से यह प्रार्थना की गई है कि- जो अपने भक्तों को प्रभूत फल देने वाले , परम - ऐश्वर्य में स्थित होकर भी जो गज- चर्म को वस्त्र के रूप में धारण करते हैं , जो पत्नी से मिश्रित तन वाला होकर भी , विषयों से परे मन वाला है , यतियों का अग्रणी है , जो अपने आठ शरीरों से जगत को शारण करने के पश्चात्  भी अहंकार- शून्य है वे शिव हमें  सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें और हमारी तामसी - वृत्ति को दूर करें । यह प्रार्थना गायत्री मन्त्र से एवम्  बृहदारण्यक् की इस प्रार्थना से मिलती - जुलती है-
" असतो मा सद् गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्मा अमृतं गमय ॥"
बृहदारण्यक् - 1 - 3 - 27

मालविकाग्निमित्र में रानी को धारिणी कहा गया है क्योंकि वह प्रत्येक स्थिति को धारण करती है । जब मालविका राजा का ध्यान , नृत्य - प्रसंग की ओर ले जाना चाहती है तो रानी राजा को समझाती है और दायित्व - निर्वाह हेतु प्रेरित करती है । वह आदर्श पत्नी है ।

4 - रघुवंश -  यह कालिदास का महाकाव्य है । इसमें 19 सर्ग हैं । रघुवंश में सूर्यवंशी राजाओं के पराक्रम का वर्णन है - रघुवंश के प्रथम - श्लोक में कवि कहते हैं -
" वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥"
वाणी और अर्थ के समान मिले हुए जगत के माता - पिता , शिव - पार्वती की , वाणी और अर्थ की प्राप्ति के लिए मैं कालिदास वन्दना करता हूँ ।

रघुवंश के राजा दिलीप का वर्णन करते हुए कालिदास कहते हैं कि - जिस प्रकार सूर्य , समुद्र से जल लेता है , कि उसे वर्षा- काल में अनन्त- गुना अधिक लौटा सके , उसी तरह राजा दिलीप , प्रजा से 'कर' लेते थे , ताकि वे कई गुना अधिक कर के प्रजा को लौटा सकें ।

अज के राज्य में प्रत्येक मनुष्य यह सोचता है कि वह राजा का मित्र है । हमारी संस्कृति में आज भी आदर्श राज्य को राम - राज्य कहने की प्रथा है । राजा , प्रजा का पिता - समान माना जाता है क्योंकि वह प्रजा की शिक्षा की व्यवस्था करता है , उसकी रक्षा करता है और उसका भरण - पोषण करता है । कालिदास , विवाह की परिणति सन्तान - उत्पत्ति को मानते हैं कि - दिलीप और सुदक्षिणा का प्रेम सन्तान - प्राप्ति के बाद और बढ गया । कालिदास ने अज और इन्दुमती के विषय में कहा है - यदि ब्रह्मा परस्पर स्पृहणीय इन दोनों का संयोग न होने देता तो इन्हें सुन्दर बनाने का उनका श्रम , व्यर्थ हो जाता । धर्म का ध्येय , पुनर्जन्म से मुक्ति पाना है , जिसकी कामना , दुष्यन्त ने शाकुन्तलम्  के अन्तिम श्लोक में की है -
" ममापि च क्षपयतु नीलकण्ठः पुनर्भवं परिगतशक्तिरात्मभूः ।"

5 - कुमारसम्भव - यह महाकाव्य है और इसमें शिव एवम् पार्वती के विवाह का वर्णन है तथा युध्द के देवता कुमार कार्त्तिकेय के जन्म की कथा है । कुमारसम्भव के प्रथम श्लोक में कवि कालिदास ने हिमालय - प्रदेश की संस्कृति को विश्व की संस्कृति का मानदण्ड बताते हुए कहा है -
" अस्युत्तरस्यॉ दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः ।
पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य  स्थितः पृथिव्यॉ  इव  मानदण्डः ॥"

" उत्तर - दिशि में देव - हिमालय प्रहरी बनकर तना खडा है ।
उत्ती- बूडती दक्खिन में सागर इस धरती का मान बडा है ॥ "

भारत की संस्कृति मूलतः आध्यात्मिक है । प्रायः मनुष्य इस भौतिक जगत के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर सकता है किन्तु मनुष्य जीवन का ध्येय उस निरपेक्ष - सत्ता की अनुभूति - मात्र है । हम अपनी आत्मा के माध्यम से उस अनन्त सर्व- शक्तिमान परमात्मा तक पहुँच सकते हैं । " आत्मानमात्मना वेत्सि ।" कुमारसम्भव , 2- 10 .
" स्वयं विधाता तपसः फलानां केनापि कामेन तपश्चचार । " कुमारसम्भव , 1- 57 .अर्थात्  विधाता का रूप तपोमय है , वे स्वयं तप करते हैं और दूसरों को तप का फल प्रदान करते हैं । कालिदास ने धर्म के सभी रूपों को ग्राह्य बताया है । मनुष्य अपनी रुचि के अनुसार किसी भी रूप की आराधना कर सकता है , क्योंकि सभी देवता उस परमात्मा के ही रूप हैं । कुमार कार्त्तिकेय का जन्म आवश्यक था क्योंकि तारक नाम के दैत्य से मानवता की रक्षा करनी थी , इसलिए गौरी - शंकर का विवाह आवश्यक था । " अनेन धर्मः सविशेषमाद्य मे त्रिवर्गसारः ।" कुमारसम्भव , 5- 38 . उमा ने शिव को पाने हेतु प्रयास किया किन्तु अपनी देहयष्टि के सौन्दर्य से नहीं । उन्होंने अपने हृदय को समर्पित किया । उनकी आस्था केवल धर्म पर स्थित रही । " अयप्रभृत्यवनतांगि तवास्मि दासः ।" भगवान शिव द्वारा यह कहने पर कि - " हे युवती ! आज से मैं तुम्हारा तप द्वारा , खरीदा हुआ दास हूँ । " पार्वती की तपोजन्य क्लान्ति मिट गई ।

6 - मेघदूत - यह 129 श्लोकों में रचित , एक गीति - काव्य है । इस काव्य में एक यक्ष्य , मेघ को सन्देश - वाहक बना कर , अपनी प्रेयसी के लिए सन्देश भेजता है । " मेघदूत " प्रेम - काव्य है और इससे प्रेरित होकर , अनेक रचनायें लिखी गई हैं , किन्तु मेघदूत का अपना अलग महत्त्व है । पावस , प्रकृति एवम्  प्रेम का , अनूठा चित्रण मेघदूत में उपलब्ध है । कालिदास , प्रेम के अमर - गायक हैं । यक्ष , अपनी प्रेयसी का वर्णन करते हुए मेघ से कहते हैं -

" तन्वी श्यामा शिखरिदशना पक्वबिम्बाधरोष्ठी
मध्ये क्षामा चकितहरिणीप्रेक्षणा निम्ननाभिः ।
श्रोणीभारादलसगमना स्तोकनम्रा स्तनाभ्याम्
या  तत्र  स्याद्युवतिविषये  सृष्टिराद्येव  धातुः ॥ "
विधाता की प्रथम स्त्री - सृष्टि के समान तन्वी , श्यामा , भुट्टे के समान दॉतों वाली , पके कुँदरू के समान लाल होंठ और अधर वाली , क्षीण कटि वाली , सहमी हुई हरिणी के समान नयन वाली , गहरी नाभि वाली , नितम्बों के भार से मन्द - मन्द चलने वाली , और स्तनों के भार से कुछ झुकी हुई , वह वहॉ होगी । "
सम्भवतः रामायण में वर्णित राम के विरह से , कालिदास को " मेघदूत " लिखने की प्रेरणा मिली होगी ।

7  - ऋतुसंहार - इसमें छ्हः सर्ग हैं ,  जिसमें 144 श्लोक हैं । ऋतुसंहार में ग्रीष्म , वर्षा , शरद , हेमन्त , शिशिर और हेमन्त का हृदयग्राही वर्णन हुआ है । ऋतुसंहार का अर्थ है - ऋतुओं का समूह ।

" नितान्तनीलोत्पलपत्रकान्तिभिः क्वचित् प्रभिन्नाञ्जनराशिसन्निभैः ।
क्वचित्  सगर्भप्रमदास्तनप्रभैः समाचितम् व्योम घनैः समन्ततः ॥ 2- 2

कालिदास की लेखनी में अद्भुत क्षमता है । वे प्रकृति - चित्रण करें या भाव - चित्रण , उनके वर्णन में एक चित्रकार की दृष्टि और एक नर्तक की भँगिमायें होती हैं । शब्दों को पढने मात्र से, दृश्य दिखाई देने लगते हैं । उनके शब्द - चित्र सुन्दर भी हैं और सजीव भी । भारत की महिमा - मण्डित संस्कृति को, कालिदास ने न केवल आत्मसात किया, अपितु उसे समृध्द और सार्वभौम बना दिया । कालिदास एक महान कवि हैं । वे भारतीय - संस्कृति के उन्नायक हैं ।      
 
                    

6 comments:

  1. ......और उपमा कालिदास्य-बहुत अच्छा आलेख ! महाकवि को नमन!

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  2. सहेजने लायक जानकारी।

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  3. namastE,

    I have started, along with my son, the practice of learning SRee KALidAsa's poems by heart and as years go by, I realize that in order to fully enjoy the greatest of poets' PRatibhA, we have to learn the SlOka-s by heart (of course with the meaning) and "carry them around" with us. They are like mantrA-s -- the potency is the most when they seep down from the vaikhari level to madhyamA and on down to the PaSyantee level!! SRee KALidAsAya nama:

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    1. वस्तुतः वाणी चार प्रकार की होती है , जैसा कि आपने कहा है - 1- परा 2- पश्यन्ती 3- मध्यमा और 4- वैखरी । संस्कृत के प्रति आपका अनुराग प्रणम्य है । मैं भी संस्कृत के प्रति समर्पित हूँ । मैं " ऋग्वेद " का छन्द में अनुवाद कर रही हूँ । " ऋग्वेद " में 10552 मंत्र हैं । मैं 5500 मंत्रों का अनुवाद कर चुकी हूँ , अभी इसी कार्य में लगी हुई हूँ । आप चाहें तो " ऋग्वेद " के मंत्रों से भी शुरुआत कर सकते हैं । मेरे इसी ब्लॉग पर आपको "ऋग्वेद " के मंत्रों के साथ अनुवाद मिल जाएगा । आप चाहें तो हमारी बात भी हो सकती है । मेरा मेल आई - डी है - mailtoshakun@gmail.com और मो.- 09302830030

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    2. शकुंतला शर्मा जी में आप से एक छोटी जानकारी चाहूंगा कुमारसंम्भवः के लिए
      कुछ लोग कहते है कि महाकवि कालिदास ये कुमार सम्भव लिखा था और उसकी व्याख्या विक्रमादित्य के राज्य में की थी पर उज्जैन के महाकाल के भक्त इस नाराज हो गए थे और उन्होंने एक श्राप दिया था उस श्राप के कारण कालीदास ने कुमार सम्भव को आगे नही बढ़या था
      कहते है की जिसने भी उसको आगे बढ़ाने की कोशिश की उनको उस श्राप प्रभावित हुए है
      क्या सत्य है या नही

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  4. यह कहानी पढकर बहुत अच्छा लगा । अपने बच्चे के लिए शिक्षा प्रद कहानी यहाँ पाए http://www.storiesformoralvalues.blogspot.in

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