Friday, 12 September 2014

भाषा - बोध

उस दिन मुझे बहुत आश्चर्य हुआ
जब मैंने अपनी राष्ट्रभाषा को
दिन - दहाडे अपने घर पर देखा ।
उनके मुख - मण्डल पर गंभीरता तो थी
साथ ही उसमें उपालम्भ - मिश्रित वेदना भी थी ।

उन्होंने सहज भाव से मुझसे पूछा -
" हिन्दी - भाषा पढाती हो ?
बताओ, कितने छात्रों को तुमने भाषा का ज्ञान दिया है ?"
मैं मूर्छित सी हो गई ।
मेरे बारहवीं के छात्र -
" भूख लग रहा है
नींद आ रहा है
पानी गिर रहा है ।"
इस तरह की भाषा बोलते और लिखते हैं ।
जब मैं वीर - रस पढाती हूँ तो वे जँभाई भी लेते हैं
और करुण - रस पढते समय उनके चेहरे पर
डेढ - इंच मुस्कान भी होती है ।"

मैंने लज्जित हो कर कहा -
" मैं आपसे सच कहूँ -
और किसी भाषा का ज्ञान तो मुझे है ही  नहीं,
हिन्दी का भी तो समुचित - ज्ञान नहीं है
इसीलिए तो हम स्वयं, कवि को कवी, दृष्टि को दृष्टी
पिता को पीता और सिन्धु को सिन्धू कहते हैं ।
इसके अतिरिक्त
हम हिन्दी भाषा के सुदृढ, शक्तिशाली
और समृध्द होते हुए भी
अँग्रेज़ी और उर्दू की बैसाखी के बिना
एक पग चलने में भी, गर्व का अनुभव नहीं करते ।
दो सशक्त  पैरों के होते हुए भी
चौपाया बनने में ही गौरव का अनुभव करते हैं ।
हे माता ! अब तुम्हीं बताओ, ऐसी स्थिति में हम क्या करें ?"

उन्होंने मुझे प्रेरित करते हुए कहा-
" सर्वप्रथम तुम स्वयं भाषा को आत्मसात करो ।
फिर छात्रों को सही व सटीक उच्चारण सिखाओ ।
रसानुभूति से भाषा में रुचि बढेगी ।
पहले स्वयं रसामृत का पान करो
तत्पश्चात् छात्रों को रसास्वादन करवाओ ।
फिर देखो अपनी भाषा की गहराई और इसका विस्तार ।
गोधूलि एवम्  क्षितिज जैसे शब्दों के आशय को समझाने के लिए
जिज्ञासु को इनके दर्शन करवा दो ।

सम्बन्धित अधिकारियों एवम् साहित्यकारों तक
मेरे विचार पहुँचाओ और उनसे कहो कि-
हिन्दी भाषा के समस्त शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जाए
जिससे कि वे स्वयं अपने उच्चारण और लेखन की
त्रुटि को सुधार सकें ।
स्वर में स्पष्टता रखें एवम्
हिन्दी भाषा बोलते एवम् लिखते समय
किसी अन्य भाषा के प्रयोग से बचें ।

छात्रों को रसानुभूति करवाने की क्षमता स्वयं में विकसित करें,
अन्यथा आने वाले युग में भीषण भाषा - संकट उत्पन्न हो जाएगा ।"
कुछ रुक कर उन्होंने पुनः कहा -

"तुम एक काम और कर सकती हो
जनता जनार्दन तक अपनी बात पहुँचाने के लिए
तुम दृश्य - श्रव्य चल - चित्र निर्मित कर सकती हो ।
जिस प्रकार बेटी - बचाओ , नारी - उत्थान , एड्स और
नेत्र - दान हेतु जन - जागरण की सीख दी जा रही है ,
ठीक वैसी ही सीख
भाषा - बोध हेतु भी दी जा सकती है ।
इसके अतिरिक्त -
तुम जन - जन को प्रेरित करो कि
वे भाषा की गरिमा एवम् महिमा को समझें ।

तुम यह काम करोगी न ? "
सम्मोहन और समर्पण भरा स्वर
मेरी वाणी से फूट पडा -
" हॉ - हॉ मैं अवश्य करूँगी ।"
और तभी मेरी ऑख खुल गई ।
 





9 comments:

  1. हिंदी को समर्पित अद्भुत रचना , आभार आपका !

    ReplyDelete
  2. सामयिक -समस्या समाधान सहित!

    ReplyDelete
  3. जब चेले पहले से ही चीनी बनाने पर आमादा हों...तो गुरु ज्ञान किसे दे...सुपात्र छाँटिए और...उन पर अपनी शक्ति लगाइये...हीरों को तराशना पड़ता है...कोयलों की फ़िक्र न कीजिये...

    ReplyDelete
  4. घूमते भटकते आपके वृत्त्तपत्र पर पहुँचा। मैं केवल यह कहना चाहूँगा कि कोई परोपकारी हिन्दी के लिये भी कोई 'लिङ्गानुशासनम्' किस्म का ग्रन्थ लिख डाले तो बहुत अच्छा होगा । अन्य भाषा बोलनेवालों को इससे बहुत लाभ होगा । हिन्दी में लिङ्ग दो हैं परन्तु मेरी मातृभाषा (तमिळ) में लिङ्ग तीन हैं। अब तीन का दो कैसे करें? किसी की जान तो लेनी पडेगी?

    ReplyDelete
    Replies
    1. संस्कृत में भी तीन लिंग होते हैं, जो भाषायें संस्कृत से अनुप्राणित हैं, उन भाषाओं में तीन लिंग हैं, दक्षिण - भारतीय भाषायें संस्कृत से अत्यन्त निकट हैं, यही कारण है कि तमिल में .......।

      Delete
  5. सचमुच शुद्ध हिंदी को बोलने का दावा करने वाले हम हिन्दी भाषा के सुदृढ, शक्तिशाली
    और समृध्द होते हुए भी
    अँग्रेज़ी और उर्दू की बैसाखी के बिना
    एक पग चलने में भी, गर्व का अनुभव नहीं करते, शुद्ध भाषा बोध देती हुई सुंदर रचना...

    ReplyDelete
  6. सचमुच सुंदर विचार!

    ReplyDelete
  7. सचमुच शुद्ध हिंदी को बोलने का दावा करने वाले हम ... "दावा" कभी नहिं देखा मैने तो आजतक। ज्यादाहतर हिन्दी फिल्मके नाम तो देखो, उसमें आते गीत-संगीत या बातचीत के ढंग देखो, सब इंग्लिश 'medium' होनेकि वजहसे सोच भी नहिं सकते हिन्दीमें। हरेक tv पर आनेवाले शो देखो, हर तिसरा शब्द अंग्रेजी। और कथावस्तु तो पुरी विदेशी - जैसे भारत से तो कोई नाता ही नहिं। और यह अज की बात नहिं है। १५ अगस्त १९४७ की रात पुरे देशकी बस्ती गांव गांव रेडियो पर कान लगाये आतुर थी अपने प्रथम प्रधानमंत्रीको सुनने - पर हराम है जो वोह कुछ भी समझ पाये होंगे - ९९% समझ भी न पाये वैसी इंग्रजीमें वोह कह रहे थे कि हम स्वतंत्र हूए। अब यहा पता नहिं वोह किसे सुना रहे थे, क्योंकि इंग्रजी बोलनेवालो ने तो स्वतंत्रता दी थी बहुत नुकसान पहुंचाने के बाद, और जिन्होने जिवन बक्षे उन्हे तो पता भी न चला कि क्या कहा गया। ये हुइ ना इंग्लिश 'medium' बात। वैसे इग्लिश STRONG हो तो भी कोइ फर्क नहिं पडता - आखिर तो सोच फिर भी पराइ ही रहेगी न। और वोह ही तो आजतक दिखाइ दे रहा है। फिर भी आप तो बचपनमें हि शेर का मुंह खोलकर दंत गिनने कि हिम्मत दिखानेवाले भरत के मा के नामाभिधानी हो - जरूर ऐसी कविता टपकेगी ही आपकी कलम से! भगवान करे कोइ नया भरत आ जाये भारत को फिर से भारत बनाने!

    ReplyDelete
    Replies
    1. भाई ! मेरे ब्लॉग में आपका स्वागत है । आपने इतने सुन्दर - भाव से मेरी रचना को पढा , उसके लिए आपके प्रति आभार प्रकट करती हूँ । धन्यवाद ।

      Delete