Sunday, 14 June 2015

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर

             पर्यावरण बचाओ


मन -  में  जिजीविषा  हो  पर्यावरण -   बचाओ
जल - वायु स्वच्छ रखो अपना गगन - बचाओ ।

सद्भाव  से  जियो - तुम  यह  है  कवच -  हमारा
वाणी -  मधुर  हो सब  की  पर्यावरण - बचाओ ।

नित यज्ञ करो घर में परि - आवरण का रक्षक
इस  यज्ञ -  होम  से  तुम ओज़ोन  को  बचाओ ।

सत - राह  पर  है चलना सब सीख लें तो बेहतर
गंदी -  गली  से  अपने- अस्तित्व  को  बचाओ ।

तरु  हैं  हमारे  रक्षक  रोपो  'शकुन'  तुम उनको
इस -  वृक्ष  के  कवच  से अपना वतन बचाओ ।

         माटी की करो रक्षा

माटी  की  करो -  रक्षा  तुम  पेड  को  लगा -  कर 
फल - फूल  खूब -  पाओ  तुम  बेल को उगा- कर ।

वट -  नीम - बेल- पीपल अर्जुन को तुम लगाओ 
केला -  पपीता -  दरमी  खाओ  इन्हें  उगा - कर ।

कुँदरू -  करेला -  ककडी  तुम  क्यों  नहीं  उगाते 
खुद -  खाओ  पुण्य  पाओ औरों  भी खिला - कर ।

गमलों  में  फूल - सब्जी  अच्छे  से  तुम  उगाओ 
बाहर  की  सब्ज़ियों  से निज को रखो बचा - कर ।

लहसून -  प्याज़ -  अदरक  घर  में उगा  के देखो 
थोडे  से  श्रम  से  देखो  सुन्दर -  नतीजा पा कर ।

अँगने  में  जगह  है  'शकुन'  मेथी  वहॉ उगा लो 
तुम भी तो लाभ पाओ अपने को कुछ सिखाकर ।

        उद्योग न खा जाए धरती को

जन्म - भूमि की महिमा समझो माटी तो मॉ  है भाई 
चन्दन  - जैसी  खुशबू -  इसकी  माटी तो मॉ है भाई ।

जिस  माटी  में  खेल - कूद - कर बडे हुए हैं हम बच्चे 
कभी  प्रदूषित - करे  न  कोई  माटी  तो  मॉ  है  भाई ।

बडे - बडे हम वृक्ष - लगायें जिससे माटी बह न पाए 
आम - अनार - नीम  भी  बोयें  माटी  तो  मॉ है भाई ।

उद्योग न खा जाए खेती को इस पर भी देना है ध्यान 
अन्न - हमें   देती  वसुन्धरा - माटी  तो  मॉ  है भाई ।

नल -कूप निकट माटी हो तो आर्द्र रहेगा श्रोत 'शकुन'
जल - श्रोत  बढाएगी  माटी - माटी  तो  मॉ  है  भाई ।

             जल ही तो जीवन है

जल  को  रखो  बचा - कर  भाई  जल  ही  तो  जीवन है 
सम्भव  नहीं  है  जल बिन जीवन जल ही तो जीवन है ।

फल - सब्ज़ी जिसमें धोए हो उस जल से सींचो - पौधे
जल  का  अपव्यय  न  हो  पाए  जल  ही  तो जीवन है ।

चॉवल - दाल धुले - जल से  भी फल - फूलों  को  सींचो 
पौष्टिक - भोजन  है  यह उनका  जल  ही  तो जीवन है ।

पानी  का  ग्लास  बडा  न हो बेवज़ह - फेंकना पडता है
उपयोग  करो उपभोग  मत  करो जल ही तो जीवन है ।

फव्वारे  से  करो - नहाना  इससे - जल  बचता है भाई 
जल  है  इस  धरती  का अमृत  जल  ही  तो जीवन है ।

'शकुन' बचाओ जलश्रोतों को वाटर हारवेस्टिंग कर लो
जीवन -  जल  पर  ही  निर्भर  है जल ही तो जीवन है ।

         पञ्चभूतों को बचायें

कवि सम्मेलन में हम कवि गण जागरण के गीत गायें 
प्रकृति  के सहचर - बनें  सब  पञ्च - भूतों को बचायें ।

जन - जागरण करना हमारा धर्म है पहला समझ लो 
प्रतिदिन करें हम यज्ञ उससे पञ्च - भूतों को बचायें ।

वृक्ष  भी  सन्तान  हैं यह बात जन - जन को बतायें 
हर  घर ढँका हो पेड से हम पञ्च - भूतों  को  बचायें ।

सोच लो शुभ - कर्म  हो  सत् - कर्म  ही सौभाग्य  है 
सत् कर्म के सौजन्य से हम पञ्च - भूतों  को बचायें ।

'शकुन'  सुन  ले  धरती  असहाय  हो  - कर  रो  रही 
जागें स्वयं सबको जगा कर पञ्च-  भूतों को बचायें ।  

3 comments:

  1. पर्यावरण के विभिन्न आयामों का बहुत ही प्रभावी और सटीक शब्दांकन किया है...बहुत सुन्दर, समसामयिक और सारगर्भित रचनाएँ...

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  2. पर्यावरण दिवस पर सन्देश देती सुन्दर रचनायें...पर्यावरण के प्रति सचेत रहना न एक नैतिक जिम्मेदारी है...बल्कि आज के युग में हर व्यक्ति का सामाजिक दायित्व भी है...

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  3. जय मां हाटेशवरी....
    आप की रचना का लिंक होगा....
    दिनांक 05/06/2016 को...
    चर्चा मंच पर...
    आप भी चर्चा में सादर आमंत्रित हैं।

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