Wednesday, 13 August 2014

पुनः विश्व- गुरु बन जाएगा

घोर - अँधेरा  छँटा  देश  में  सूर्य - सदृश  कोई आया  है
बडी -  देर  के  बाद  सही  हमने  अपना  राजा  पाया  है ।

संन्यासी  सम  जीवन  उसका  देश - धर्म  है सबसे आगे
जन समूह को जिसने बॉधा नीति - नेम के कच्चे धागे ।

हर  घर  में  अब  जलेगा  चूल्हा  हर  गरीब का होगा घर
सब  मिल - जुल कर काम करें पर देश रहे सबसे ऊपर ।

अपना  देश  शक्तिशाली  हो  ऐसी  रीति - नीति बन जाए
दादा  देशों  को  तरसा  कर  भारत देस - राग अब गाए ।

अन्य  देश  में  जब  हम जायें अपने पैसे में दाम चुकायें
देश - प्रेम  की परिभाषा को भाव - कर्म में हम अपनायें ।

कर्म - योग  की  राह  चले  तो वह दिन जल्दी ही आएगा
जग कुटुम्ब सम कहने वाला पुनः विश्वगुरु बन जाएगा ।   

Saturday, 9 August 2014

संस्कृत - दिवस के पावन - पर्व पर - महाकवि कालिदास

" पुरा कवीनां गणना प्रसंगे कनिष्ठिकाधिष्ठित कालिदासः ।
अद्यापि  तत्तुल्यकवेरभावात् अनामिका सार्थवती बभूव ॥ "

प्राचीन - काल में कवियों की गणना के प्रसंग में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण कालिदास का नाम कनिष्ठिका पर आया , किन्तु आज तक उनके समकक्ष कवि के अभाव के कारण , अनामिका पर किसी का नाम न आ सका और इस प्रकार अनामिका का नाम सार्थक हुआ । कालिदास कवि - कुल - गुरु माने जाते हैं । उन्होंने अपने विषय में कभी कुछ नहीं कहा , किन्तु उनकी रचनायें ही उनका सम्यक् एवम् सटीक परिचय देती हैं । परम्परानुसार कालिदास उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में से एक थे ।

कालिदास ने सात ग्रन्थ लिखे हैं-

1- अभिज्ञानशाकुन्तलम् - कालिदास का यह नाटक देश - विदेश में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ । यह सात अंकों में विभाजित है । इसमें शकुन्तला एवम् दुष्यन्त की प्रणय - गाथा एवम्  "भरत" के जन्म की कथा का वर्णन है ।
ग्रन्थ के आरम्भ में कालिदास ने शिव - पार्वती की वन्दना की है -
" या   सृष्टिः स्त्रष्टुराद्या  वहति   विधिहुतं या  हविर्या   च होत्री
ये द्वे कालं विधत्तःश्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहुः  सर्वबीज   प्रकृतिरिति  यया   प्राणिनः   प्राणवन्तः
प्रत्यज्ञाभिः    प्रपन्नस्तनुभिरवतु    वस्ताभिरष्टाभिरीशः ॥"

जो स्त्रष्टा की प्रथम सृष्टि है , वह अग्नि और विधिपूर्वक हवन की हुई आहुति का वहन करती है , जो हवि है और जो होत्री है , जो दो सूर्य और चन्द्र का विधान करते हैं , जो शब्द - गुण से युक्त होकर आकाश और सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त किए हुए हैं , जिस पृथ्वी को सम्पूर्ण बीजों का मूल कहा जाता है और जिस वायु के कारण प्राणी , प्राण को धारण करते हैं , भगवान शिव प्रसन्न होकर अपने इन आठ रूपों के द्वारा हमारी रक्षा करें ।

" अभिज्ञानशाकुन्तलम् " की कथा आश्रम के आस - पास घूमती है । आश्रम में ही शकुन्तला एवम् दुष्यन्त का प्रथम - मिलन होता है । शकुन्तला के सौन्दर्य - वर्णन में , कालिदास की लेखनी खूब चली है । शकुन्तला के विषय में वे कहते हैं - " वह अनघ पवित्र रूप , अनसूँघा - सुमन नखाघात से अछूता किसलय , अनबिंधा - रत्न अनास्वादित नव - मधु और अखण्ड पुष्पों के फल के समान है । विधाता न जाने किसे , इस सौन्दर्य के उपभोग की पात्रता देगा ? "

2 - विक्रमोर्वशीयम् - यह नाटक पॉच अंकों का है , जिसमें पुरुरवस और उर्वशी के प्रणय एवम् विवाह का वर्णन है । नाटक के आरम्भ में कवि ने शिव - स्तुति की है -
" वेदान्तेषु   यमाहुरेकपुरुषं  व्याप्य   स्थितं   रोदसी
अस्मिन्नीश्वर  इत्यनन्यविषयः  शब्दो यथार्थाक्षरः।
अन्तर्यश्च          मुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मग्यते
स स्थाणुःस्थिरभक्तियोगसुलभो निःश्रेयसायास्तु वः॥

जिसे वेदान्त में परम - पुरुष कहा गया है , जो पृथ्वी और आकाश को व्याप्त करने के बाद भी शेष है , जो अकेला यथार्थाक्षर , ईश्वर नाम को धारण करता है , मोक्ष चाहने वाले , प्राणादि का संयम करके जिसे ज्ञानी अपने अन्तर्मन में ढूँढते हैं , वह स्थिर भक्ति - योग से सहज ही प्राप्त होने वाला स्थाणु हमारा कल्याण करे ।

विक्रमोर्वशीयम् में कालिदास ने कहा है - जिस प्रकार नदी का प्रवाह विषम शिलाओं से अवरुध्द होकर अधिक बलवान हो जाता है , उसी प्रकार प्रेम के मार्ग में , बाधाओं के आने से , प्रेम की तीव्रता सौ - गुना बढ जाती है । विक्रमोर्वशीयम्  में मानवी और अतिमानवी का मेल है । उर्वशी का चरित्र उदार है । पुरुरवस प्रेम में आनन्द - मग्न है । वह प्रेम की तुलना में राज - पाठ को तुच्छ समझता है । इस नाटक में , ईश्वर की उपलब्धि को , भक्ति के द्वारा सुलभ बताया गया है ।

3 - मालविकाग्निमित्रम् - इस नाटक में पॉच अंक हैं । यह मालविका एवम् अग्निमित्र की प्रणय - गाथा है । इसका प्रथम श्लोक इस प्रकार है-
" एकैश्वर्ये  स्थितोSपि  प्रणतबहुफले  यः  स्वयं  कृत्तिवासा:
कान्तासम्मिश्रदेहोSप्यविषयमनंसा यः पुरस्ताद्यतीनाम् ।
अष्टाभिर्यस्य  कृत्सनं  जगदपि  तनुभिर्बिभ्रतो  नाभिमानः
सन्मार्गालोकनाय  व्यपनयतु  स  वस्तामसीं वृत्तिमीशः॥"

इस श्लोक में ईश्वर से यह प्रार्थना की गई है कि- जो अपने भक्तों को प्रभूत फल देने वाले , परम - ऐश्वर्य में स्थित होकर भी जो गज- चर्म को वस्त्र के रूप में धारण करते हैं , जो पत्नी से मिश्रित तन वाला होकर भी , विषयों से परे मन वाला है , यतियों का अग्रणी है , जो अपने आठ शरीरों से जगत को शारण करने के पश्चात्  भी अहंकार- शून्य है वे शिव हमें  सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें और हमारी तामसी - वृत्ति को दूर करें । यह प्रार्थना गायत्री मन्त्र से एवम्  बृहदारण्यक् की इस प्रार्थना से मिलती - जुलती है-
" असतो मा सद् गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्मा अमृतं गमय ॥"
बृहदारण्यक् - 1 - 3 - 27

मालविकाग्निमित्र में रानी को धारिणी कहा गया है क्योंकि वह प्रत्येक स्थिति को धारण करती है । जब मालविका राजा का ध्यान , नृत्य - प्रसंग की ओर ले जाना चाहती है तो रानी राजा को समझाती है और दायित्व - निर्वाह हेतु प्रेरित करती है । वह आदर्श पत्नी है ।

4 - रघुवंश -  यह कालिदास का महाकाव्य है । इसमें 19 सर्ग हैं । रघुवंश में सूर्यवंशी राजाओं के पराक्रम का वर्णन है - रघुवंश के प्रथम - श्लोक में कवि कहते हैं -
" वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥"
वाणी और अर्थ के समान मिले हुए जगत के माता - पिता , शिव - पार्वती की , वाणी और अर्थ की प्राप्ति के लिए मैं कालिदास वन्दना करता हूँ ।

रघुवंश के राजा दिलीप का वर्णन करते हुए कालिदास कहते हैं कि - जिस प्रकार सूर्य , समुद्र से जल लेता है , कि उसे वर्षा- काल में अनन्त- गुना अधिक लौटा सके , उसी तरह राजा दिलीप , प्रजा से 'कर' लेते थे , ताकि वे कई गुना अधिक कर के प्रजा को लौटा सकें ।

अज के राज्य में प्रत्येक मनुष्य यह सोचता है कि वह राजा का मित्र है । हमारी संस्कृति में आज भी आदर्श राज्य को राम - राज्य कहने की प्रथा है । राजा , प्रजा का पिता - समान माना जाता है क्योंकि वह प्रजा की शिक्षा की व्यवस्था करता है , उसकी रक्षा करता है और उसका भरण - पोषण करता है । कालिदास , विवाह की परिणति सन्तान - उत्पत्ति को मानते हैं कि - दिलीप और सुदक्षिणा का प्रेम सन्तान - प्राप्ति के बाद और बढ गया । कालिदास ने अज और इन्दुमती के विषय में कहा है - यदि ब्रह्मा परस्पर स्पृहणीय इन दोनों का संयोग न होने देता तो इन्हें सुन्दर बनाने का उनका श्रम , व्यर्थ हो जाता । धर्म का ध्येय , पुनर्जन्म से मुक्ति पाना है , जिसकी कामना , दुष्यन्त ने शाकुन्तलम्  के अन्तिम श्लोक में की है -
" ममापि च क्षपयतु नीलकण्ठः पुनर्भवं परिगतशक्तिरात्मभूः ।"

5 - कुमारसम्भव - यह महाकाव्य है और इसमें शिव एवम् पार्वती के विवाह का वर्णन है तथा युध्द के देवता कुमार कार्त्तिकेय के जन्म की कथा है । कुमारसम्भव के प्रथम श्लोक में कवि कालिदास ने हिमालय - प्रदेश की संस्कृति को विश्व की संस्कृति का मानदण्ड बताते हुए कहा है -
" अस्युत्तरस्यॉ दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः ।
पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य  स्थितः पृथिव्यॉ  इव  मानदण्डः ॥"

" उत्तर - दिशि में देव - हिमालय प्रहरी बनकर तना खडा है ।
उत्ती- बूडती दक्खिन में सागर इस धरती का मान बडा है ॥ "

भारत की संस्कृति मूलतः आध्यात्मिक है । प्रायः मनुष्य इस भौतिक जगत के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर सकता है किन्तु मनुष्य जीवन का ध्येय उस निरपेक्ष - सत्ता की अनुभूति - मात्र है । हम अपनी आत्मा के माध्यम से उस अनन्त सर्व- शक्तिमान परमात्मा तक पहुँच सकते हैं । " आत्मानमात्मना वेत्सि ।" कुमारसम्भव , 2- 10 .
" स्वयं विधाता तपसः फलानां केनापि कामेन तपश्चचार । " कुमारसम्भव , 1- 57 .अर्थात्  विधाता का रूप तपोमय है , वे स्वयं तप करते हैं और दूसरों को तप का फल प्रदान करते हैं । कालिदास ने धर्म के सभी रूपों को ग्राह्य बताया है । मनुष्य अपनी रुचि के अनुसार किसी भी रूप की आराधना कर सकता है , क्योंकि सभी देवता उस परमात्मा के ही रूप हैं । कुमार कार्त्तिकेय का जन्म आवश्यक था क्योंकि तारक नाम के दैत्य से मानवता की रक्षा करनी थी , इसलिए गौरी - शंकर का विवाह आवश्यक था । " अनेन धर्मः सविशेषमाद्य मे त्रिवर्गसारः ।" कुमारसम्भव , 5- 38 . उमा ने शिव को पाने हेतु प्रयास किया किन्तु अपनी देहयष्टि के सौन्दर्य से नहीं । उन्होंने अपने हृदय को समर्पित किया । उनकी आस्था केवल धर्म पर स्थित रही । " अयप्रभृत्यवनतांगि तवास्मि दासः ।" भगवान शिव द्वारा यह कहने पर कि - " हे युवती ! आज से मैं तुम्हारा तप द्वारा , खरीदा हुआ दास हूँ । " पार्वती की तपोजन्य क्लान्ति मिट गई ।

6 - मेघदूत - यह 129 श्लोकों में रचित , एक गीति - काव्य है । इस काव्य में एक यक्ष्य , मेघ को सन्देश - वाहक बना कर , अपनी प्रेयसी के लिए सन्देश भेजता है । " मेघदूत " प्रेम - काव्य है और इससे प्रेरित होकर , अनेक रचनायें लिखी गई हैं , किन्तु मेघदूत का अपना अलग महत्त्व है । पावस , प्रकृति एवम्  प्रेम का , अनूठा चित्रण मेघदूत में उपलब्ध है । कालिदास , प्रेम के अमर - गायक हैं । यक्ष , अपनी प्रेयसी का वर्णन करते हुए मेघ से कहते हैं -

" तन्वी श्यामा शिखरिदशना पक्वबिम्बाधरोष्ठी
मध्ये क्षामा चकितहरिणीप्रेक्षणा निम्ननाभिः ।
श्रोणीभारादलसगमना स्तोकनम्रा स्तनाभ्याम्
या  तत्र  स्याद्युवतिविषये  सृष्टिराद्येव  धातुः ॥ "
विधाता की प्रथम स्त्री - सृष्टि के समान तन्वी , श्यामा , भुट्टे के समान दॉतों वाली , पके कुँदरू के समान लाल होंठ और अधर वाली , क्षीण कटि वाली , सहमी हुई हरिणी के समान नयन वाली , गहरी नाभि वाली , नितम्बों के भार से मन्द - मन्द चलने वाली , और स्तनों के भार से कुछ झुकी हुई , वह वहॉ होगी । "
सम्भवतः रामायण में वर्णित राम के विरह से , कालिदास को " मेघदूत " लिखने की प्रेरणा मिली होगी ।

7  - ऋतुसंहार - इसमें छ्हः सर्ग हैं ,  जिसमें 144 श्लोक हैं । ऋतुसंहार में ग्रीष्म , वर्षा , शरद , हेमन्त , शिशिर और हेमन्त का हृदयग्राही वर्णन हुआ है । ऋतुसंहार का अर्थ है - ऋतुओं का समूह ।

" नितान्तनीलोत्पलपत्रकान्तिभिः क्वचित् प्रभिन्नाञ्जनराशिसन्निभैः ।
क्वचित्  सगर्भप्रमदास्तनप्रभैः समाचितम् व्योम घनैः समन्ततः ॥ 2- 2

कालिदास की लेखनी में अद्भुत क्षमता है । वे प्रकृति - चित्रण करें या भाव - चित्रण , उनके वर्णन में एक चित्रकार की दृष्टि और एक नर्तक की भँगिमायें होती हैं । शब्दों को पढने मात्र से, दृश्य दिखाई देने लगते हैं । उनके शब्द - चित्र सुन्दर भी हैं और सजीव भी । भारत की महिमा - मण्डित संस्कृति को, कालिदास ने न केवल आत्मसात किया, अपितु उसे समृध्द और सार्वभौम बना दिया । कालिदास एक महान कवि हैं । वे भारतीय - संस्कृति के उन्नायक हैं ।      
 
                    

Saturday, 2 August 2014

तुलसीदास- साहित्य के पार सत्य का चितेरा

सदियॉ जहॉ रोमांचक अनुभवों का इतिहास लिखती हैं , इतिहास , घटनाओं का एक अन्तहींन सिलसिला । उठते हुए साम्राज्य और ध्वस्त खण्डहर की एक स्मृति यात्रा । संस्कृति , धर्म, कला, साहित्य और इन सब के बीच से उभर कर झॉकता हुआ मनुष्य का अद्भुत जीवन । जीवन , जहॉ अनुभवों की दीवारें उठती चली जाती हैं। काल जिसके अँधेरे आयामों में प्रिय से प्रिय वस्तुयें खोती चली जाती हैं । उपलब्धि और असफलता के बीच , व्यक्ति तो आखिर काल के अँधेरे गर्भ में समा ही जाता है । जीवन , अनुत्तरित सवालों का एक अन्तहींन सिलसिला बन कर बहता हुआ झरना । इस भयावह काल - यात्रा , अनुत्तरित सवालों , जटिल संघर्षों और मिटते मनुष्य के जीवन का सार क्या है ? प्रत्येक चिन्तनशील मानव ने , इन प्रश्नों के समाधान हेतु अपना जीवन खपाया और इस विकट संघर्ष और शोध से जो प्रज्ञा उनके भीतर उद्भासित हुई , उसकी अनुभूति , आज युग की लम्बाइयों में गगनचुम्बी मीनारें बन कर खडी हैं । उसी आनन्द के उद्भास का एक अप्रतिम चितेरा हुआ "तुलसी" सोलहवीं शताब्दी का एक अद्वितीय मानव ।

तुलसी का नाम , हिन्दी साहित्य में स्वर्णाक्षरों में अंकित है । हिन्दी साहित्य उसकी गरिमा से गौरवान्वित हुआ है । रामचरितमानस , विनयपत्रिका , कवितावली , गीतावली आदि तुलसी के विश्व - प्रसिध्द ग्रन्थ हैं । अब प्रश्न यह उठता है कि तुलसी के जीवन और उसके साहित्य से हमारा क्या लेना - देना ? वस्तुतः तुलसी एक व्यक्ति नहीं है , वह जीवन की विराट लम्बाइयों और अतल गहराइयों का एक अप्रतिम चितेरा है । एक व्यक्ति के रूप में वह आज भी उतनी ही नवीनता और जगमग - ज्योति के साथ जीवित है । तुलसी ने जीवन के मर्म को समझा और उसकी सार्थकता को खोज लिया । हम जिस खाने - पीने और इन्द्रिय - सुखों से युक्त, जीवन को जीते हैं , उसे उन्होंने पशु - जीवन कहा है ‌- " तिन्ह ते खर सूकर श्वान भले जडता बस ते न कहै कछु वै । जरि जाउ सो जीवन जानकिनाथ जिए जग में तुम्हरे बिनु व्है ।" तुलसी के आदर्श , उनके प्राणप्रिय , उनके लक्ष्य, राम थे, पर यह उनका संकेत था जीवन के चरम लक्ष्य की ओर । अपने राम के विषय में उन्होंने कहा - " प्राण प्राण के जीवन जी के ।"

जो प्राणों का भी प्राण हो, जीवन का भी जीवन हो, वही तो राम है । राम अर्थात् परम सत्य की खोज, यही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य रहा । तुलसी का जीवन आज भी हमारे भीतर अबाध गहराइयों में बह रहा है और इसीलिए जीवन की उस अनादि प्रवाह के अर्थ को समझने के लिए हम कटिबध्द हैं । हमारी आयु का प्रत्येक क्षण, हमारी सम्पूर्ण चेष्टा, क्रिया, भावना उसी अनादि जीवन - सत्य की प्यास में, जाने - अनजाने हुआ करती है  । जिसे हम सुख कहते हैं वह उसी अनादि जीवन - सत्य की छाया - मात्र है । छाया का अनुभव हमें होता है । सुख का अनुभव हम प्रतिक्षण करते हैं और इस छाया को पकड - कर उस मूल सत्य तक जाना चाहते हैं । इन प्रतिक्षण मरते और नष्ट होते विश्व के बीच किसी अमर - अनादि सत्ता को पाना चाहते हैं, जहॉ जरा - मरण का भय न हो । सत् चित् आनन्द का अबाध विस्तार हो । इस अबाध अस्तित्व का आनन्द ही "राम" है । तुलसी इसी आनन्द के साथ आजीवन मुग्ध रहे । उनका जीवन इस विराट अस्तित्व के अनुभव के आनन्द की व्याख्या है ।

तुलसी बाबा आज हमारे बीच दो आयामों पर जीवित हैं, एक अनुभूति के, दूसरे अभिव्यक्ति के । रामचरितमानस में, राम, लक्ष्मण, सीता आदि अनेक पात्रों के माध्यम से जीवन के मूलभूत जटिल प्रश्नों का जैसा सम्यक् एवम् सटीक, अनुभूत उत्तर तुलसी ने दिया है, वह साहित्य के संसार का स्वर्ण - कलश है - जगमगाता , उज्ज्वल , चिर- नवीन । काल का प्रवाह उसकी नवीनता को आज भी सँजो - कर रखा है । जब तक मनुष्य का जीवन रहेगा , तुलसी की यह अभिव्यक्ति मुखरित होती रहेगी ।                        
  

Monday, 28 July 2014

पावस प्रण

पावस अपने रुदन में भी तुम जग का कितना हित करती हो
 अपनी व्यथा नीर के द्वारा धरती को  सम्प्रेषित  करती  हो ।

कृषक तुम्हारी बाट जोहता आतुर - अँखियॉ  पथ  पर  होती
देर  हुई  यदि आने  में  तो  उसकी अँखियॉ  नींद  न  सोती ।

बचपन   तेरी   करे   प्रतीक्षा  आओ   पावस   करो   शीघ्रता
यदि  तुम  आए  नहीं  तो   मेरा  रह  जाएगा  गागर   रीता ।

कहॉ  चलाऊँगा   मैं  अपनी   छोटी   सी  क़ागज़   की   नाव
गलियों में छप्पक- छप करते किस विधि पार करूँगा गॉव ।

सावन   में   आयेंगे   साजन   यही   सोचती   हैं   ललनायें
घटा  न  छाई  मेघ  न  बरसे  गीत  मिलन  के  कैसे  गायें ?

मोर   देखते   राह  तुम्हारी   मेघ  -  थिरकते   मोर   नाचता
उसके  नर्तन  की  पोथी  को  व्याकुल -  प्रेमी  सदा  बॉचता ।

दादुर  टर्र - टर्र  की  बोली  में  क्या  कुछ मन को नहीं बताते
पावस तुमसे प्रेमी - जन जीते विरह - व्यथा भी वे सह जाते ।

निश्चित  ही  नीर  रुदन   है  तेरा   तेरी   पीडा   फूट   पडी   है
जो जग को अजस्त्र - वर देता  विपदा  उसकी  बहुत  बडी है ।

पावस पल -पल पर - सेवा पर कर दे अर्पित सब कुछ अपना
अपना आपा त्याग करे वह प्राणि - मात्र की सुख - संरचना ।

मनुज कदाचित् सीख ले किंचित् पावस चिंतन पावस गरिमा
रहे  शाश्वत  सुयश  उसी का इतिहास कहे उसकी ही महिमा ।

Friday, 25 July 2014

वरुण देव

विविध रूप में वरुण - देव तुम  वसुधा का हित करते हो
देकर निज अनुदान जगत को नभ - जल  देते रहते हो ।

सर सरिता सागर सब के सब करते  हैं वन्दना  तुम्हारी
निर्झरणी भी मीठी  धुन  में  करती  है मनुहार तुम्हारी ।

पावस - घन  दुन्दुभि बजाता करता है अभिषेक तुम्हारा
अवनि - श्रोत से निसृत होता अक्षय पावन रूप तुम्हारा ।

नर तन में अस्तित्व तुम्हारा व्यापक विविध विधा में है
सुख दुख प्रस्तुति में रूप तुम्हारा प्रकट नयन बानी में है ।

जहॉ अशेष  शब्द  होते  हैं  नयन - गिरा से तुम झरते हो
शेष भावनाओं को तुम ही छलक - छलक  भाषा  देते हो ।

नयन तुम्हारे माध्यम से जब कुछ  कहने  की चेष्टा करते
भाषा  - बन्धन  तोड  शाश्वत  भावों  से  सम्प्रेषित  होते ।

विविध निम्न कर्मों से जब नर अपना दामन मैला करता
ऑखों का जल प्रायश्चित से दाग  मनुज  के धोया करता ।

कहता है यह कौन नयन - जल निर्बलता का है परिचायक
यह अद्भुत उपहार प्रकृति का शुभ-भावों का है प्रतिपालक ।

शस्य - श्यामला भूमि तुम्हीं से तुमसे है सन्तुलन धरा का
तुमसे भावों की उज्ज्वलता तुम ही तो हो स्नेह - शलाका ।

आओ वरुण - देव आ जाओ  मेरे  नयनों  में  नीड  बना लो
अपनों ने तज दिया क्या करूँ तुम ही मुझको मीत बना लो ।


Monday, 14 July 2014

मलेशिया में भरथरी


बारहवॉ अन्तर्राष्ट्रीय ए.आई. पी. सी. सम्मेलन , 2014 , इस बार ,मलेशिया , क्वाला लम्पुर में आयोजित था । छत्तीसगढ से हम चार बहनें , संतोष ,सावित्री , नागेश्वर और शकुन्तला शर्मा , 27 जून को शाम 5 बजे , सुभाषचन्द्र बोस ,अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुँच गईं । हमसे पहले भी बहुत सी बहनें वहॉ पहुँच चुकी थीं । थोडी ही देर में , लारी भैया और मनु जी भी वहॉ आ गए । भैया ने हम सबको हमारा पासपोर्ट और टिकट दिया और एक ब्लैक कलर का सुन्दर सा बैग भी दिया । अब हम बोर्डिग - पास के लिए , लाइन में लग गए । इस औपचारिकता के दौरान भी हम मस्ती करते रहे और फिर एयर - एशिया के विमान ए.के. 62 में बैठ गए । थोडी देर में मुझे इतनी ठँड लगी कि मैं एयर - होस्टेस से कम्बल मॉगने लगी पर उसने कहा कि उसके पास ओढने के लिए कुछ भी नहीं है । मैंने अपनी सीट की ए. सी. बन्द कर ली , साइड में बैठी दोनों सहेलियों ने भी , ए. सी. बन्द कर ली क्योंकि ठँड तो सभी को लग रही थी । रात में ठीक बारह बजे होस्टेस ने वेज़- बिरयानी लाकर , परोस दिया , जिसे मैंने छुआ भी नहीं । साढे चार घन्टे का समय था पर उबाऊ था लेकिन मैं विंडो के पास बैठी थी , मैं आकाश को निहारती रही और एक ऐसा समय आया जब मैंने सूर्योदय को देखा । मेरा मन प्रसन्न हो गया ।

28 / 06 / 14
अभी - अभी सुबह - सुबह  8.50 पर हम क्वाला लम्पुर पहुँचे हैं । ए. आई. पी. सी. की ओर से हमें , रिसीव करने के लिए वाल्वो की तरह एक बडी गाडी आई है । वे लोग फूलों के हार से हमारा स्वागत कर रहे हैं । स्वागत के पश्चात हम गाडी में बैठकर " पुत्रजय " कैम्पस के रेस्टोरेण्ट में ब्रेक- फास्ट के लिए पहुँचे हैं । जलपान के बाद हम ऐतिहासिक - भूमि ,"मलक्का " जायेंगे । हमारे साथ ' सगया ' नाम का गाइड है जो हमें लगातार , मलेशिया के बारे में बता रहा है । " पुत्रजय " बहुत ही भव्य - भवन है , यहॉ बैठकर जलपान करना बहुत अच्छा लग रहा है । अब हम मलक्का की ओर जा रहे हैं । रास्ते इतने साफ - सुथरे और खूबसूरत हैं कि वहॉ से नज़र नहीं हट रही है । अचानक सगया ने हमसे कहा - " सलामादातान = सलाम देता हूँ ।" हम लोगों ने भी जवाब दिया - " वालेक़म सलाम ।" सगया ने हमें बताया कि मलेशिया , " मलय " शब्द से बना है । यद्यपि मलेशिया , मुस्लिम बहुल देश है पर यह भारत की तरह सेक्युलर है । यहॉ का मुख्य व्यवसाय " पाम - ऑयल " है जिसका 3/4 भाग  भारत में निर्यात होता है । सिंगापुर , मलेशिया से 1965 में अलग हुआ । अब हम " मलक्का " पहुँच चुके हैं । मलक्का 1511 में बना । यहॉ का "सेन्ट जेवियर्स चर्च " दर्शनीय है । यहॉ का समुद्र - तट , सिंगापुर तक फैला हुआ है । मलक्का के भवन कुछ अनूठी शैली के दिखाई दे रहे हैं । यहॉ हमने गाडी से उतर कर शॉपिंग भी की । आज हम यहीं " मलक्का " में रुक रहे हैं , होटल का नाम है - " सेन्ट्रल होटल , मलक्का ।"

29 / 06 / 14
आज हम " मलक्का " से क्वाला लम्पुर जा रहे हैं । सगया ने हमें बताया कि यहॉ के राजा , भारतीय सँस्कृति से बहुत प्रभावित थे । उनकी दिनचर्या , भारतीयों की दिनचर्या जैसी ही थी - विवाह की रस्म शुरू होने से लेकर , शादी की साल- गिरह मनाते तक हू-ब-हू भारतीय । हम पुनः " पुत्रजय " पहुँच चुके हैं । हमें अपना लँच यहीं करना है । " पुत्रजय " एक इलेक्ट्रॉनिक कॉलोनी है जो पॉच किलोमीटर में फैला हुआ है । यहॉ की इमारतें भव्य हैं और पेड - पौधे भी बहुत घने एवम् सुन्दर हैं । हमें मुस्कुरा - मुस्कुरा कर अपने पास बुलाते हैं । सब कुछ बहुत सुन्दर है - " सुन्दर है विहग सुमन सुन्दर । मानव तुम सबसे सुन्दरतम ॥" पन्त

30 / 06 / 14
आज भारतीय दूतावास के सँस्कृति निदेशक श्री वाय. लक्ष्मा राव के मुख्य आतिथ्य में , ए. आई. पी. सी. का सॉस्कृतिक कार्यक्रम होने जा रहा है । सभी बहनें अपने - अपने प्रदेशों के पारम्परिक - परिधान में सुसज्जित दिखाई दे रही हैं । हम चारों छत्तीसगढी बहनें भी अपने पारम्परिक - परिधान में सजी हुई हैं । ब्रेकफास्ट के लिए जब मैं जा रही थी तो भैया मुझे लिफ्ट में मिल गए और उन्होंने मुझसे कहा - " शकुन्तला दीदी ! आप इस ड्रेस में बहुत अच्छी लग रही हैं । " इसी कार्यक्रम में मैने स्वरचित छत्तीसगढी " भरथरी " की प्रस्तुति दी जिसकी सभी ने सराहना की । मैं भूमिका में भरथरी के मूल -भाव को बता चुकी थी , इसलिए सभी को यह लोक -गीत बहुत पसन्द आया । एक और खुशी की बात यह हुई कि हमारी छत्तीसगढ की चन्द्रावती नागेश्वर को " मिस मलेशिया" का खिताब मिला । आज का दिन हमारे लिए जश्न की तरह था हमने बहुत एन्जॉय किया ।

लँच के बाद हम कुमार कार्त्तिकेय का दर्शन करने जा रहे हैं । मलेशिया में इन्हें " मुरुगन " कहा जाता है । यहॉ विश्व की सबसे पुरातन गुफायें हैं । ऐसा लगता है कि कालिदास ने जहॉ " कुमारसम्भव " लिखा , जिस गुफा में शिव और पार्वती का मिलन हुआ मानो यह , वही कन्दरा है । ये गुफायें साढे चार लाख साल पुरानी है । गुफा में जाने के लिए 250 सीढियों की खडी चढाई थी । हममें से कुछ ही लोग ऊपर चढे पर ऊपर की भव्यता देखकर , थकान मिट गई और मन ऊर्जा से भर गया । गुफा के नीचे , सीढियों के पास कुमार कार्त्तिकेय की विशाल प्रतिमा बनी हुई है । यह स्वर्णिम प्रतिमा अत्यन्त भव्य है ।

1/ 07 / 14
आज हम वाटर - वर्ड जा रहे हैं । आज हमें दिन भर पानी में रहना है । हम सब ने स्वीमिंग कॉस्ट्यूम पहन रखा है । होटल पर्ल से हमने अपना ब्रेकफॉस्ट लिया और ठीक 9 . 00 ए. एम. को अपनी गाडी में सवार होकर , हमने वाटर - वर्ड की ओर प्रस्थान किया । जल - क्रीडा की ऐसी अद्भुत दुनियॉ मैंने पहले कभी नहीं देखी थी । हम सब की अपनी - अपनी जोडी बन गई थी । मेरी और अनिता[ शिलॉंग] की जोडी बन गई । हमने अपने पूरे समय का लुत्फ उठाया और एक - एक मिनट का उपयोग किया । हम हर तरह की जल - क्रीडा में गए चाहे वह कितना भी खतरनाक क्यों न हो । इसी बीच हमने सागर रेस्टोरेण्ट में लँच भी किया । यह एक भारतीय रेस्टोरेण्ट था । लडके हमें समझा कर बताते थे कि हम अपने कूपन का उपयोग किस - किस तरह से कर सकते हैं । मैंने वहॉ इडली - सॉभर और चटनी खाई और फिर हम दोनों ने दो बार कॉफी भी पी ली । भीगते - भीगते हम दोनों ने वहॉ एक थ्री - डी पिक्चर भी देखी जो बहुत भयानक थी । अनिता और मैंने वहॉ बहुत फोटोग्राफी भी की । हम पूरे समय नाचते - गाते रहे । बहुत मज़ा आया । आखिर में हम पीछे के रास्ते रोप - वे से बाहर निकल गए । वह रास्ता सँकरा सा था और " लक्ष्मण - झूला " जैसे हिल रहा था और उसकी लम्बाई ," लक्ष्मण - झूले " से लगभग दुगुनी थी ।

बाहर निकल कर हम सब ग्रुप में फोटो खिंचवाए और फिर डिनर करने के पश्चात् अपने होटल पर्ल इन्टरनेशनल क्वाला लम्पुर में , अपने - अपने कमरे में लौट आए । मेरे कमरे का नम्बर था - 1619 और मेरी पार्टनर थी सुशीला ढाका , जो राजस्थान की है ।

2 / 07 / 14
अभी सुबह के दस बजे हैं । हम K. L.टॉवर से पूरे मलेशिया को निहार रहे हैं । इस टॉवर की ऊँचाई 421 मीटर है अभी - अभी हम एक चॉकलेट - फैक्ट्री में आए हैं । विविध तरह के चॉकलेट से पूरी दुकान सजी है । मेरे पास जो भी रिंगिट [ मलेशियाई - मुद्रा ] बची है , मैंने सबका चॉकलेट खरीद लिया है । आज हमें भारतीय दूतावास में भी आमन्त्रित किया गया है । कुल - गीत गाने का दायित्व मुझ पर है । मैं अन्य बहनों का साथ लेकर इस दायित्व का निर्वाह करती हूँ । आज हमें भारतीय दूतावास से स्वल्पाहार के पश्चात् , हमें सीधा क्वाला लम्पुर के हवाई - अड्डे में पहुँचना है और एयर - एशिया के विमान ए. के. - 63 से अपने भारत पहुँचना है । सचमुच - " जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।"            

Saturday, 12 July 2014

तस्मै श्री गुरवे नमः

सुख  से  सना  था  शैशव मेरा चिन्ता से परिचय न था 
वरद-हस्त था बडे-बडों का सुख सपना अतिशय न था।

अँजोरा  भूरी  शैलकुमारी  प्यारी - प्यारी  सखियॉ  थीं 
लडते - मिलते - इठलाते हम फूलझडी की लडियॉ थीं ।

जाने कब यह यौवन आया तितर-बितर कर गया हमें
सखियॉ प्यारी गॉव में रह गईं गॉव छोडना पडा हमें ।

हमें पढाए जो बचपन में गुरु - जन  कितने अच्छे  थे
प्रियाप्रसाद थे  परसराम  थे  तिलकेश्वर भी सच्चे  थे ।

बडे गुरु जी होरी - लाल थे सच - मुच में वे थे गुरुतर
पूरे गॉव में सम्मानित थे थे प्रणम्य वे गुरु घर - घर ।

लालटेन  लेकर  हम  सब  जाते  थे  उनके  घर  पढने 
बडे  प्रेम  से  हमें  पढाते  वह तो आए  थे  हमें   गढने ।

अक्षर-अक्षर हमें पढाया गुरु है सचमुच भाग्य-विधाता
तमस हटा आलोक दिखाया गुरु ही तो है जीवन-दाता ।

छुआ - छुवौवल  रेस -  टीप भी गुरु सँग खेला करते थे
नया गडी और नया दाम के नेम  भी गुरु पर चलते थे ।

कहॉ  भूल  पायेंगे  हम उन खट्टी - मीठी  स्मृतियों  को
कुडिया पोखरी बँधवा अँधरी की खोई -खोई गलियों को ।

पावन - ठौर सिध्द बावा का अब  भी  बसा है इस मन में
गुडी में राम - कृष्ण लीला की मोहक स्मृति है जीवन में ।

ग्राम - देव "कोसला" नमन है तुझ में बसा है मेरा बचपन 
आत्मोन्नति का मार्ग दिखाया जीवन यह कृतज्ञताज्ञापन।