Friday, 7 February 2014

सूक्त - 37

[ऋषि- अभितपा सौर्य । देवता- सूर्य । छन्द- जगती- त्रिष्टुप् ।]

9179
नमो  मित्रस्य  वरुणस्य  चक्षसे  महो  देवाय  तदृतं  सपर्यत ।
दूरदृशे   देवजाताय   केतवे   दिवस्पुत्राय   सूर्याय   शंसत ॥1॥

ओ  आदित्य  देव  आ  जाओ  मेरे  जीवन  का  तमस  मिटाओ ।
आलोक-पुत्र उस सूर्य-देव का आओ सब मिल-कर गुण गाओ॥1॥

9180
सा मा सत्योक्तिः परि पातु विश्वतो द्यावा च यत्र ततनन्नहानि च ।
विश्वमन्यन्नि विशते यदेजति विश्वहापो  विश्वाहोदेति  सूर्यः ॥2॥

हे  वेद-ऋचा  तुम  ही  वरेण्य  हो  तुम  हम  सबकी  रक्षा करना ।
आदित्य-देव पाथेय तुम्हीं हो पावन-पथ  पर  तुम ले चलना ॥2॥

9181
न  ते  अदेवः प्रदिवो  नि  वासते  यदेतशेभिः  पतरै  रथर्यसि ।
प्राचीनमन्यदनु वर्तते रज उदन्येन ज्योतिषा यासि सूर्य ॥3॥

अन्तरिक्ष  में  रहकर  भी  तुम  कर्म-योग  का  पाठ - पढाते ।
नहीं कभी आराम किए तुम जीवन-शैली सबको समझाते॥3॥

9182
येन सूर्य ज्योतिषा बाधसे तमो जगच्च विश्वमुदियर्षि भानुना।
तेनास्मद्विश्वामनिरामनाहुतिमपामीवामप दुष्ष्वप्न्यं सुव॥4॥

अंधकार  से  तुम्हीं  बचाते  आराम - अवसर  देकर  जाते हो ।
तुम्हें अर्घ्य अर्पित करते हैं  हमको बहुत अधिक भाते  हो॥4॥ 

9183
विश्वस्य हि प्रेषितो  रक्षसि व्रतमहेळयन्नुच्चरसि स्वधा अनु ।
यदज्ञ त्वा  सूर्योपब्रवामहै  तं नो देवा अनु मंसीरत क्रतुम् ॥5॥

सबको  तुम्हीं  प्रेरणा  देते  लो  यज्ञ- भाग  तुम  ग्रहण  करो ।
हम  सब  तेरी  महिमा  गाते  हैं तुम हम सबका दुख हरो ॥5॥

9184
तं  नो  द्यावापृथिवी  तन्न आप इन्द्रः शृण्वन्तु मरुतो हवं वचः।
मा शूने भूम सूर्यस्य सन्दृशि भद्रं जीवन्तो जरणामशीमहि॥6॥

सब  देव - गणों  का  आवाहन  है  हे  प्रभु  दया - दृष्टि  रखना ।
दुख - कष्टों  से  हमें  बचाना  प्रेम-पंथ - पर पुनः  परखना ॥6॥

9185
विश्वाहा त्वा सुमनसः सुचक्षसः प्रजावन्तो अनमीवा अनागसः।
उद्यन्तं त्वा मित्रमहो दिवेदिवे ज्योग्जीवा: प्रति पश्येम सूर्य ॥7॥

हम  जीवन - रण  में  विजयी  हों  ऐसी  अद्भुत  प्रतिभा  पायें ।
दीर्घ - आयु  हमको  देना  प्रभु सूर्य-देव  का  हम  गुण गायें ॥7॥

9186
महि  ज्योतिर्बिभ्रतं त्वा विचक्षण भास्वन्तं चक्षुषेचक्षुषे मयः ।
आरोहन्तं बृहतः पाजसस्परि वयं जीवा: प्रति पश्येम सूर्य ॥8॥

तेजस्वी  हमें  बनाना  प्रभुवर हम  सत्पथ-प्रकाश  बन जायें ।
सूर्य-देवता  हम  भी प्रतिदिन रवि-दर्शन का पुण्य कमायें ॥8॥

9187
यस्य ते विश्वा भुवनानि केतुना प्र चेरते नि च विशन्ते अक्तुभिः ।
अनागास्त्वेन  हरिकेश  सूर्याह्नाह्ना नो वस्यसावस्यसोदिहि ॥9॥

आदित्य - देव  आदर्श  हमारे  कर्म - योग  के  वे  विग्रह  हैं ।
वह  पूजनीय  वह  ही  प्रणम्य  हैं  वे  अपरंपार  अनुग्रह  हैं ॥9॥

9188
शं  नो  भव  चक्षसा  शं  नो अह्ना शं  भानुना शं हिमा शं घृणेन ।
यथा  समध्वञ्छमसद्दुरोणे  तत्सूर्य  द्रविणं  धेहि  चित्रम्॥10॥

सूर्य  -  देव  की  महिमा  अद्भुत  अनगिन  हैं  उनके  वर-दान ।
वे हैं अभिभावक हम सबके सुख-साधक अत्यन्त महान॥10॥

9189
अस्माकं देवा उभयाय जन्मने शर्म यच्छत द्विपदे- चतुष्पदे ।
अदत्पिबदूर्जयमानमाशितं  तदस्मे शं योररपो दधातन॥11॥

जगती में जो सुख-साधन है उस पर है  हम सबका अधिकार।
सबका  हो  कल्याण यहॉ पर यह ही  है जीवन का सार ॥11॥

9190
यद्वो  देवाश्चकृम  जिह्वया  गुरु  मनसो  वा  प्रयुती  देवहेळनम् ।
अरावा यो नो अभि दुच्छुनायते तस्मिन्तदेनो वसवो नि धेतन॥12॥

हे  प्रभु  मन  से  वचन-कर्म  से  मुझसे  कोई त्रुटि न हो जाये ।
मुझे क्षमा कर देना प्रभुवर मन मेरा नित तेरा गुण गाये ॥12॥       

  

Thursday, 6 February 2014

सूक्त - 38

[ऋषि- इन्द्र मुष्कवान् । देवता- इन्द्र । छन्द- जगती ।]

9191
अस्मिन्न इन्द्र पृत्सुतौ यशस्वति शिमीवती क्रन्दसि प्राव सातये ।
यत्र  घोषाता  धृषितेषु  खादिषु  विष्वक्पतन्ति  दिद्यवो नृषाह्ये ॥1॥

आदित्य - देव  अति  तेजस्वी  हैं  शौर्य - धैर्य  से  हैं  भर- पूर ।
वे  हम  सबकी  रक्षा  करते  दुनियॉ   भर   में   हैं   मशहूर ॥1॥

9192
स  नः क्षुमन्तं सदने व्यूर्णुहि गोअर्णसं रयिमिन्द्र सश्रवाय्यम् ।
स्याम ते जयतः शक्र मेदिनो यथा वयमुश्मसि तद्वसो कृधि॥2॥

मेरा अभीष्ट  मिल  जाए  प्रभु - वर संकल्प - शक्ति मुझको देना ।
हे  प्रभु अन्न - धान  तुम देना आत्मीय समझ अपना लेना ॥2॥

9193
यो   नो   दास   आर्यो   वा   पुरुष्टुतादेव  इन्द्र  युधये  चिकेतति ।
अस्माभिष्टे सुषहा:सन्तु शत्रवस्त्वया वयं तान्वनुयाम सङ्गमे॥3॥ 

हे  पावन - प्रभु  तुम  प्रणम्य  हो  हम सब गौरव - पथ पर जायें ।
हमको  हरदम  जीत  मिले  प्रभु हम यश- धन सब कुछ पायें॥3॥

9194
यो  दभ्रेभिर्हव्यो  यश्च  भूरिभिर्यो  अभीके  वरिवोविन्नृषाह्ये ।
तं  विखादे  सस्निमद्य श्रुतं  नरमर्वाञ्चमिन्द्रमवसे करामहे॥4॥

तुम जन- प्रिय हो सूर्य - देवता तुम  ही  जगती  के  पालक  हो ।
सज्जन   की  रक्षा  करते  हो  असुरों  के  तुम  संहारक  हो ॥4॥ 

9195
स्ववृजं  हि  त्वामहमिन्द्र  शुश्रवानानुदं  वृषभ  रध्रचोदनम् ।
प्र मुञ्चस्व परि कुत्सादिहा गहि किमु त्वावानन्मुष्कयोर्बध्द आसते॥5॥

हे  पूजनीय  तुम  ही  वरेण्य  हो तुम ही तो प्रभु मेरे प्रेरक हो ।
प्रभु  पावन - पथ  पर  पहुँचाना  तुम ही तो मेरे रक्षक हो ॥5॥   

Wednesday, 5 February 2014

सूक्त - 39

[ऋषि- घोषा काक्षीवती । देवता- अश्विनीकुमार । छन्द- जगती - त्रिष्टुप् ।]

9196
यो वां परिज्मा सुवृदश्विना रथो दोषामुषासो हव्यो हविष्मता ।
शश्वत्तमासस्तमु  वामिदं  वयं  पितुर्न  नाम सुवहं हवामहे ॥1॥

जो  सत्कर्म  सदा  करता  है  वह  जन-प्रिय  हो  ही  जाता  है ।
जनता  मुरीद  हो जाती है जन-जन का प्यार वही पाता है॥1॥

9197
चोदयतं  सूनृता:  पिन्वतं  धिय  उत्पुरन्धीरीरयतं   तदुश्मसि ।
यशसं भागं कृणुतं नो अश्विना सोमं न चारुं मघवत्सु नस्कृतम्॥2॥

हम  सम्भाषण- शैली  सीखें  जो  कर  दे  मन-मति  की  व्याख्या ।
ज्ञान  प्राप्त  कर  बनें  यशस्वी  कह  दें  कर्म-योग  की  आख्या ॥2॥

9198
अमाजुरश्चिद्भवथो   युवं   भगोSनाशोश्चिदवितारापमस्य   चित् ।
अन्धस्य चिन्नासत्या कृशस्य चिद्युवामिदाहुर्भिषजा रुतस्य चित्॥3॥

वैद्य   रोग   से   हमें   बचाता   सबकी  पीडा   वह  हरता  है ।
सबका  दुख  वह  दूर भगाता  वह सबकी सेवा करता है ॥3॥

9199
युवं  च्यवानं  सनयं  यथा  रथं  पुनर्युवानं चरथाय चक्षथुः ।
निष्टौग्रयमूहथुरभ्दय्स्परि  विश्वेत्ता  वां सवनेषु प्रवाच्या॥4॥

तुम औषधियों  के  ज्ञाता  हो  रोगी  को  स्वस्थ  बनाते हो ।
नव-जीवन पाती जर्जर-काया जन-जन को अपनाते हो॥4॥

9200
पुराणा  वां  वीर्या3  प्र  ब्रवा  जनेSथो हासथुर्भिषजा मयोभुवा ।
ता वां नु नव्याववसे करामहेSयं नासत्या श्रदरिर्यथा दधत्॥5॥

साक्षी  हैं  सत्कर्म  तुम्हारे  तुम  अनुभवी  चिकित्सक  हो ।
हमें  सहारा  देना  भगवन  तुम सबके शुभ-चिन्तक हो ॥5॥

9201
इयं  वामह्वे  शृणुतं  मे  अश्विना  पुत्रायेव  पितरा  मह्यं  शिक्षतम्।
अनापिरज्ञा असजात्यामतिः पुरा तस्या अभिशस्तेरव स्पृतम्॥6॥

जग  में  मेरा  नहीं  है  कोई  तुम  ही  हो  मेरे  प्राण - अधार ।
ज्ञान - ध्यान मैं नहीं जानती जीवन - नैया  कर  दो पार ॥6॥

9202
युवं  रथेन  विमदाय शुन्ध्युवं न्यूहथुः पुरुमित्रस्य योषणाम् ।
यवं हवं वध्रिमत्या अगच्छतं युवं सुषुतिं चक्रथुः पुरन्धये॥7॥

वैद्य-राज  है  प्रभु का प्रतिनिधि नर हो या नारी सभी समान ।
प्रसव- वेदना  के  अवसर  पर  तू उसको देव-दूत ही मान॥7॥

9203
युवं   विप्रस्य   जरणामुपेयुषः   पुनः   कलेरकृणुतं   युवद्वयः।
युवं वन्दनमृश्यदादुदूपथुत्युवं सद्यो विश्पलामेतवे कृथः ॥8॥

कितनों का काया-कल्प किया है औषधि का अद्भुत अनुभव है।
कैसा भी क्यों न असाध्य रोग हो औषधि में बल अभिनव है॥8॥

9204
युवं  ह  रेभं  वृषणा  गुहा   हितमुदैरयतं   ममृवांसमश्विना ।
युवमृबीसमुत  तप्तमत्रय  ओमन्वन्तं चक्रथुः सप्तवध्रये॥॥9॥

अत्रि - रेभ  नामक  ऋषियों  को  तुमने ही असुरों से बचाया ।
वैद्य-राज तुम सुख-वर्षक हो मति-ज्वर पर भी काबू पाया॥9॥

9205
युवं  श्वेतं  पेदवेSश्विनाश्वं  नवभिर्वाजैर्नवती  च  वाजिनम् ।
चर्कृत्यं ददथुर्द्रावयत्सखं भगं न नृभ्यो हव्यं मयोभुवम्॥10॥

ओ औषधि अन्वेषक आओ मानव-तन  को  सबल बनाओ ।
यश- वैभव दे दो प्रभु हमको रोग-शोक से हमें बचाओ ॥10॥

9206
न तं राजानावदिते कुतश्चन नांहो अश्नोति दुरितं नकिर्भयम् ।
यमश्विना  सुहवा  रुद्रवर्तनी पुरोरथं कृणुथः पत्न्या सह ॥11॥

सँग  तेरा  सबको  सुख - कर  है  तेरी  महिमा  सब  गाते हैं ।
आधि-व्याधि से हमें बचाना तुझ में अपना-पन पाते हैं॥11॥

9207
आ  तेन  यातं  मनसो  जवीयसा  रथं  यं  वामृभवश्चक्रुरश्विना ।
यस्य योगे दुहिता जायते दिव उभे अहनी सुदिने विवस्वतः॥12॥

आदित्य - देव  आलोक - प्रदाता  अंधकार  से  वही  बचाता ।
विश्राम - हेतु अवसर देता है कर्म-योग का पाठ-पढाता ॥12॥

9208
ता  वर्तियातं  जयुषा  वि  पर्वतमपिन्वतं  शयवे  धेनुमश्विना ।
वृकस्य चिद्वर्तिकामन्तरास्यादद्युवं शचीभिर्ग्रसितामममुञ्चतम्॥13॥

तुमने  सबका  कल्याण  किया  है मेरा भी तुम रखना ध्यान ।
सदा  सुरक्षा  देना  प्रभुवर  सात्विक  हो मेरा खान-पान ॥13॥ 

9209
एतं   वा   स्तोममश्विनावकर्मातक्षाम   भृगवो   न   रथम्  ।
न्यमृक्षाम योषणां न मर्ये नित्यं न सूनुं तनयं  दधाना:॥14॥

पर-हित  है  प्रभु  ध्येय तुम्हारा मुझको भी यह देना ज्ञान ।
वरद-हस्त रखना प्रभु मुझ पर जीवन बन जाए वरदान॥14॥        
         

Tuesday, 4 February 2014

सूक्त - 40

[ऋषि- घोषा काक्षीवती । देवता- अश्विनीकुमार । छन्द- जगती ।]

9210
रथं यान्तं कुह को ह वां नरा प्रति  द्युमन्तं  सुविताय  भूषति ।
प्रातर्यावाणं विभ्वं विशेविशे वस्तोर्वस्तोर्वहमानं धिया शमि॥1॥

अध्यापक  का  अभि-नन्दन है वह ही जगती का शिक्षक है ।
वह ही सबका भाग्य-विधाता वह  परम्परा  का रक्षक  है॥1॥

9211
कुह स्विद्दोषा कुह वस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोषतुः ।
को वां शयुत्रा विधवेव देवरं मर्यं न योषा कृणुते सधस्थ आ॥2॥

जीवन  जीना  भी  एक कला है उचित समय पर सभी कर्म हो ।
सुन्दर-सटीक हम नियम बनायें ध्येय सदा कर्तव्य-धर्म हो॥2॥

9212
प्रातर्जरेथे जरणेव कापया वस्तोर्वस्तोर्यजता  गच्छथो  गृहम् ।
कस्य ध्वस्त्रा भवथःकस्य वा नरा राजपुत्रेव सवनाव गच्छथः॥3॥

हे  गुरु - वर  तुम  ही  वरेण्य  हो  बचपन  को  देते  हो  आकार ।
गीली-माटी से  विविध रूप  रच  कहलाते  हो  तुम्हीं  कुम्हार ॥3॥

9213
युवां  मृगेव  वारणा  मृगण्यवो  दोषा  वस्तोर्हविषा  नि  ह्वयामहे ।
युवं   होत्रामृतुथा   जुह्वते   नरेषं   जनाय   वहथः  शुभस्पती ॥4॥

आदित्य - देव  का आवाहन  है  हम  हवि - भाग  उन्हें  देते  हैं ।
रिमझिम  बरसात  वही  देते  हैं  अन्न - धान  वे  ही  देते  हैं ॥4॥

9214
युवां  ह  धोषा  पर्यश्विना  यती  राज्ञ  ऊचे दुहिता पृच्छे वां नरा ।
भूतं   मे   अह्न   उत  भूतमक्तवेSश्वावते   रथिने   शक्तमर्वते ॥5॥

हे  पावन  पूजनीय  परमेश्वर  मन  की  बात  तुम्हें  कहती  हूँ ।
प्रभु  मैं  राजकुमारी  घोषा  सख्य - भाव  से  मैं  भजती  हूँ ॥5॥

9215
युवं  कवी  ष्ठ:  पर्यश्विना  रथं  विशो न कुत्सो जरितुर्नशायथः ।
युवोर्ह  मक्षा  पर्यश्विना  मध्वासा  भरत निष्कृतं न योषणा॥6॥

हे  अश्विनीकुमार  प्रभु आ जाओ  हम  सभी  प्रतीक्षा  करते  हैं ।
तुम  मधुमय  मनमोहक हो हम बहुत प्यार तुमसे करते हैं॥6॥

9216
युवं  ह  भुज्युं  युवमश्विना  वशं  युवं शिञ्जारमुशनामुपारथुः ।
युवो  ररावा  परि सख्यमासते युवोरहमवसा सुम्नमा चके॥7॥

घोषा  आमंत्रित  करती  है  हे  अश्विनी  कुमार  तुम  आओ ।
तुम तो सबके शुभ-चिन्तक हो सुख-संतोष मुझे  दे जाओ॥7॥

9217
युवं  ह  कृशं  युवमश्विना  शयुं युवं विधन्तं विधवामुरुष्यथः ।
युवं  सनिभ्यः स्तनयन्तमश्विनाप व्रजमूर्णुथः सप्तास्यम्॥8॥

तुम्हीं  सुरक्षा  देते  प्रभु - वर  तुम  ही  हो  सबके  आधार ।
गो - माता  के  तुम  रक्षक  हो  सबका  करते  बेडा - पार ॥8॥

9218
जनिष्ट  योषा  पतयत्कनीनको  वि  चारुहन्वीरुधो दंसना अनु ।
आस्मै रीयन्ते निवनेव सिन्धवोSस्मा अह्ने भवति तत्पतित्वनम्॥9॥

हे  परमेश्वर  तुम  समर्थ  हो  तुम  अभीष्ट  सबको  देते  हो ।
मुझको सुख-सौभाग्य मिला है तुम सबका दुख हर लेते हो॥9॥

9219
जीवं रुदन्ति वि मयन्ते अध्वरे दीर्घामनु प्रसितिं दीधियुर्नरः।
वामं पितृभ्यो य इदं समेरिरे मयःपतिभ्यो जनयःपरिष्वजे॥10॥

पत्नी   को   जो   सुख   देते   हैं  सन्तति  की  रक्षा  करते  हैं ।
पत्नी  भी  सदा  समर्पित  रहती  ऐसे घर में प्रभु रहते हैं॥10॥

9220
न तस्य विद्म तदु षु प्र वोचत युवा ह यद्युवत्या: क्षेति योनिषु।
प्रियोस्त्रियस्य वृषभस्य रेतिनो गृहं गमेमाश्विना तदुश्मसि॥11॥

प्रभु मैं पति-सुख से वञ्चित हूँ परिणय-सुख की अभिलाषा है ।
प्रणय-रसिक मुझको मिल जाए नयन-गिरा की यह भाषा है॥11॥

9221
आ वामगन्त्सुमतिर्वाजिनीवसू न्यश्विना हृत्सु कामा अयंसत ।
अभूतं गोपा मिथुना शुभस्पती प्रिया अर्यम्णो दुर्यॉ अशीमहि॥12॥

तुम  ही  मेरे  शुभ-चिन्तक  हो  प्रभु मुझ पर दया-दृष्टि रखना ।
पति  का  संरक्षण  मिल  जाए  मनो-कामना  पूरी करना ॥12॥

9222
ता  मन्दसाना  मनुषो  दुरोण आ  धत्तं रयिं सहवीरं वचस्यवे ।
कृतं तीर्थं सुप्रपाणं शुभस्पती अथाणुं पथेष्ठामप दुर्मतिं हतम्॥13॥

हे  प्रभु  तुम  धन  वैभव  देना  सुख - सन्तति  देना  भर - पूर ।
पति - गृह  में सब सुखी रहें प्रभु रोग--शोक हो कोसों दूर ॥13॥

9223
क्व  स्विदद्य  कतमास्वश्विना  विक्षु दस्त्रा मादयेते शुभस्पती ।
क ईं नि येमे  कतमस्य जग्मतुर्विप्रस्य वा यजमानस्य वा गृहम्॥14॥

अभी  है  कहॉ  बसेरा  प्रभु-वर  किसे  मिला है यह सौभाग्य ।
प्रेम- डोर में कहॉ बँधे हो किसे मिला यह सुख-साम्राज्य॥14॥        
 
             

Monday, 3 February 2014

सूक्त - 41

[ऋषि- सुहस्त्य धौषेय । देवता- अश्विनीकुमार । छन्द- जगती ।]

9224
समानमु त्यं पुरुहूतमुक्थ्यं1 रथं त्रिचक्रं सवना गनिग्मतम् ।
परिज्मानं  विदथ्यं  सुवृक्तिभिर्वयं  व्युष्टा उषसो हवामहे ॥1॥

अन्वेषण  अति  आवश्यक  है  नित - नूतन  अन्वेषण  हो ।
अन्य  ग्रहों  की  हलचल  जानें  सदा  सफल प्रक्षेपण हो ॥1॥

9225
प्रातर्युजं  नासत्याधि  तिष्ठवः प्रातर्यावाणं  मधुवाहनं  रथम् ।
विशो येन गच्छथो यज्वरीर्नरा कीरेश्चिद्यज्ञं होतृमन्तमश्विना॥2॥

मन  की गति से चले रथ मेरा हम चाहे जहॉ निकल जायें ।
वैज्ञानिक नित नई खोज में अन्य ग्रहों का पता लगायें॥2॥

9226
अध्वर्युं वा मधुपाणिं सुहस्त्यमग्निधं वा धृतदक्षं दमूनसम् ।
विप्रस्य वा यत्सवनानि गच्छथोSत आ यातं मधुपेयमश्विना॥3॥

विश्व  आज  ऑंगन  जैसा  है  अब  आगे  भी  हो  विस्तार ।
अन्य-ग्रहों पर भ्रमण करें हम वैज्ञानिक पर है यह भार ॥3॥   

 

Sunday, 2 February 2014

सूक्त - 42

[ऋषि- -कृष्ण आङ्गिरस । देवता- इन्द्र । छन्द- त्रिष्टुप् ।]

9227
अस्तेव  सु  प्रतरं   लायमस्यन्भूषन्निव प्र भरा स्तोममस्मै ।
वाचा विप्रास्तरत वाचमर्यो नि रामय जरितःसोम इन्द्रम्॥1॥

लक्ष्य- भेद  करता  धनु-धारी  वैसे  ही प्रभु-प्रसाद हम पायें ।
परमात्मा को सखा मान-कर सस्वर वेद-ऋचा को गायें॥1॥

9228
दोहेन  गामुप  शिक्षा  सखायं  प्र बोधय जरितर्जारमिन्द्रम् ।
कोशं  न  पूर्णं  वसुना  न्यृष्टमा च्यावय मघदेयाय शूरम्॥2॥

बार - बार  अभ्यास  करें  हम  वेद-ऋचा  को  समझें  जानें ।
मैं  आत्मा  हूँ  इस  चिन्तन  से अपने-आप को पहचानें॥2॥

9229
किमङ्ग त्वा मघवन्भोजमाहुःशिशीहि मा शिशयं त्वा शृणोमि।
अप्नस्वती मम धीरस्तु शक्र वसुमिदं भगमिन्द्रा भरा नः ॥3॥

हे  यश-धन  के  मालिक  मेरे  तुम  ही  जगती  के  पालक हो ।
कार्य-कुशल तुम मुझे बना दो तुम्हीं कर्म के संस्थापक हो ॥3॥

9230
त्वां  जना  ममसत्येष्विन्द्र  सन्तस्थाना  वि ह्वयन्ते समीके ।
अत्रा युजं कृणुते यो हविष्मान्नासुन्वता  सख्यं  वष्टि शूरः॥4॥

मम  सत्यं  का  राग  व्यर्थ  है  हम सबका ही सच पर हक़ है ।
सत्य बपौती नहीं किसी की अशुभ न हो बस यही कसक है॥4॥

9231
धनं न स्पन्द्रं बहुलं यो अस्मै तीव्रान्सोमॉं आसुनोति प्रयस्वान्।
तस्मै शत्रून्त्सुतुकान्प्रातरह्नो नि स्वष्ट्रान्युवति हन्ति वृत्रम्॥5॥

हे  परम - मित्र  हे  परमेश्वर  तुम  मनोकामना  पूरी  करना ।
सदा  अन्न - धन   देना  प्रभु  जी सतत सुरक्षा देते रहना॥5॥

9232
यस्मिन्वयं  दधिमा  शंसमिन्द्रे  यः  शिश्राय  मघवा  काममस्मे ।
आराच्चित्सन्भयतामस्य शत्रुर्न्यस्मै द्युम्ना जन्या नमन्ताम्॥6॥

हे  पावन  पूजनीय  परमेश्वर  तुम  यश - वैभव  देते  रहना ।
प्रभु रिपु-दल से रक्षा करना तुम हम सबकी पीडा हरना ॥6॥

9233
आराच्छत्रुमप  बाधस्व  दूरमुग्रो  यः  शम्बः  पुरुहूत  तेन ।
अस्मे धेहि यवमद्गोमदिन्द्र कृधी धियं जरित्रे वाजरत्नाम्॥7॥

सब  साधक  तुम्हें  बुलाते  हैं  रिपु-दल  तुमसे  घबराते  हैं ।
जौ  अन्न  धान फल देना तुम हम तेरी महिमा गाते हैं ॥7॥

9234
प्र यमन्तर्वृषसवासो  अग्मन्तीव्रा:  सोमा  बहुलान्तास  इद्रम्।
नाह दामानं मघवा नि यंसन्नि सुन्वते वहति भूरि वामम्।॥8॥

हम  सब  भली-भॉति  यह  जानें  हर जन का हक़ है आज़ादी ।
हक़  न  छीनो  कभी  किसी  का  वरना  होगी बस बरबादी॥8॥

9235
उत प्रहामतिदीव्या जयाति कृतं यच्छ्वघ्नी विचिनोति काले ।
यो देवकामा न धना रुणद्धि समित्तं राया सृजति स्वधावान्॥9॥

दुष्ट - दमन  अति  आवश्यक है सज्जन का पालन-पोषण हो ।
सभी  सुखी  हों  सभी निरोगी सद्-भाव का बीजारोपण हो॥9॥

9236
गोभिष्टरेमामतिं   दुरेवां   यवेन   क्षुधं   पुरुहूत   विश्राम् ।
वयं राजभिः प्रथमा धनान्यस्माकेन वृजनेना जयेम॥10॥

गो-रस सञ्जीवनी सम होता है हम सबको स्वस्थ बनाता है।
जौ  का  सेवन  करो बढो तुम लक्ष्य सामने मुस्काता है॥10॥

9237
बृहस्पतिर्नः   परि   पातु   पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः ।
इन्द्रःपुरस्तादुत मध्यतो नःसखा सखिभ्यो वरिवःकृणोतु॥11॥

हे  प्रभु  रक्षा  करो   हमारी  परम - सखा  हो  तुम्हीं  हमारे ।
मेरा  अभीष्ट  तुम  देना प्रभुवर हम कब से खडे हैं तेरे द्वारे ॥11॥            

Saturday, 1 February 2014

सूक्त - 43

[ऋषि- कृष्ण आङ्गिरस । देवता- इन्द्र । छन्द- जगती- त्रिष्टुप् ।]

9238
अच्छा म इन्द्रं मतयः स्वर्विदः सध्रीचीरर्विश्वा उशतीरनूषत ।
परि ष्वजन्ते जनयो यथा पतिं मर्यं न शुन्ध्युं मघवानमूतये॥1॥

हे प्रभु तुम्हीं आत्मबल देना ध्येय मेरा मुझको समझाना ।
पत्नी का आश्रय पति बनता वैसे ही तुम मेरे बन जाना ॥1॥

9239
न  घा  त्वद्रिगप  वेति मे मनस्त्वे इत्कामं पुरुहूत शिश्रय ।
राजेव दस्म नि षदोSधि बर्हिष्यस्मिन्त्सु सोमेSवपानमस्तु ते॥2॥ 

हे   पूजनीय   हे   परमेश्वर   तुम   मेरे   मन   में   रहते  हो ।
तुम ही मेरी अभिलाशा हो अब तुम्हीं कहो क्या कहते हो॥2॥

9240
विषूवृदिन्द्रो  अमतेरुत  क्षुधः  स  इद्रायो  मघवा वस्व ईशते ।
तस्येदिमे प्रवणे सप्त सिन्धवो वयो वर्धन्ति वृषभस्य शुष्मिणः॥3॥

प्रभु  तुम  सदा  अन्न-धन  देना  मेरे  आस-पास  ही  रहना ।
तुम यश-वैभव के मालिक हो तुम सदा हमारी रक्षा करना॥3॥

9241
वयो न वृक्षं सुपलाशमासदन्त्सोमास इन्द्रं मन्दिनश्चमूषदः।
प्रैषामनीकं शवसा दविद्युतद्विदत्स्व1र्मनवे ज्योतिरार्यम्॥4॥

पंछी  पेडों  पर  पलना  पाते  आदित्य-देव आलोक  लुटाते ।
यह सब कुछ कितना सुन्दर है सूर्य-देवता तमस मिटाते॥4॥

9242
कृतं न श्वघ्नी वि चिनोति देवने संवर्ग यन्मघवा सूर्यं जयत्।
न तत्ते अन्यो अनु वीर्यं शकन्न पुराणो मघवन्नोत नूतनः॥5॥

सूर्य - देव संस्कार  सिखाते  वे  कर्म-योग  का  पाठ  पढाते ।
रिमझिम बरसात वही देते हैं आत्मीय मान वे हीअपनाते॥5॥

9243
विशंविशं मघवा पर्यशायत जनानां धेना अवचाकशद्वृषा ।
यस्याह शक्रःसवनेषु रण्यति स तीव्रैःसोमैःसहते पृतन्यतः॥6॥

प्रभु तुम जन-जन में बसते हो हम सबकी बातें सुनते हो ।
षड्-रिपु से तुम हमें बचाते सबका सुख गुनते बुनते हो॥6॥

9244
आपो न सिन्धुमभि यत्समक्षरन्त्सोमास इन्द्रं कुल्याइव हृदम्।
वर्धन्ति विप्रा महो अस्य सादने यवं न वृष्टिर्दिव्येन दानुना॥7॥

रिमझिम फुहार हरियाली लाती अन्न-फूल-फल  हम  पाते हैं ।
सरितायें  सागर  में  जाती  हैं  प्रभु  ही  सबको  अपनाते हैं ॥7॥

9245
वृषा  न  क्रुध्दः पतयद्रजः स्वा यो अर्यपत्नीरकृणोदिमा अपः ।
स सुन्वते मघवा जीरदानवेSविन्दज्ज्योतिर्मनवे हविष्मते॥8॥

कर्म-योग  की  गरिमा अद्भुत  सब  कुछ  संभव  हो जाता है ।
उद्देश्य मनुज को मिल जाता है सत्कर्मों का फल पाता है॥8॥

9246
उज्जायतां परशुरर्ज्योतिषा सह भूया ऋतस्य सुदुघा पुराणवत्।
वि रोचतामरुषो भानुना शुचिः स्व1र्ण शुक्रं शुशुचीत सत्पतिः॥9॥

कर्म - योग  के  शाश्वत - विग्रह आदित्य - देव  अति  अद्भुत  हैं ।
वह  आराम  नहीं  करते  हैं  निशि-दिन  सेवा  में  प्रस्तुत  हैं ॥9॥

9247
गोभिष्टरेमामतिं  दुरेवां  यवेन  क्षुधं  पुरुहूत  विश्राम ।
वयं राजभिः प्रथमा धनान्यस्माकेन वृजनेना जयेम ॥10॥

हे  वाक् - देवी  हमको  वर दो हम भी वाणी का वैभव पायें ।
जीवन-में सत्कर्म करें प्रभु हम भी वेद-ऋचा को गायें॥10॥

9248
बृहस्पतिर्नः  परि  पातु  पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः ।
इन्द्रः पुरस्तादुत मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरिवः कृणोतु॥11॥

हमें  सुरक्षा  देना  प्रभु  वर तुम्हीं  मात्र  हो  मीत  हमारे ।
धन-वैभव देते रहना प्रभु हम सेवक है सदा तुम्हारे ॥11॥