Thursday, 2 October 2014

अपना कवच बनाओ

मन  में   जिजीविषा   हो  पर्यावरण  बचाओ
जलवायु स्वच्छ रखो अपना गगन बचाओ ।

रखो   विचार  ऊँचा   यह   है   कवच  हमारा
वाणी   मधुर  हो   भाई  पर्यावरण  बचाओ ।

नित यज्ञ करो घर में परिआवरण का रक्षक
इस यज्ञ - होम से तुम ओज़ोन को बचाओ ।

सत राह पर है चलना सब सीख लें तो बेहतर
गंदी - गली  से अपने अस्तित्व को बचाओ ।

तरु हैं हमारे रक्षक रोपो  'शकुन' तुम उनको
इस  वृक्ष के कवच से अपना वतन बचाओ ।

शकुन्तला शर्मा , भिलाई , मो. 09302830030

4 comments:

  1. सुविचार और आह्वान

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (03.10.2014) को "नवरात महिमा" (चर्चा अंक-1755)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।दुर्गापूजा की हार्दिक शुभकामनायें।

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  3. धन्यवाद राजेन्द्र जी !

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  4. सबसे बड़ा कवच यही है !

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