Sunday, 1 June 2014

सूक्त - 17

[ऋषि- असित काश्यप । देवता- पवमान सोम । छन्द- गायत्री ।]

7838
प्र निम्रेनेव सिन्धवो घ्नन्तो वृत्राणि भूर्णयः। सोमा असृग्रमाशवः॥1॥

परमात्मा  अज्ञान  मिटा - कर  प्रोत्साहित  सब  को  करता  है ।
यम नियम  मार्ग से जो चलते हैं उनका ध्यान सदा रखता है॥1॥

7839
अभि सुवानास इन्दवो वृष्ट्यः पृथिवीमिव । इन्द्रं सोमासो अक्षरन्॥2॥

जैसे  पावस  धरा  भिगो - कर  अन्न  अ‍ॅकुरित  करती  है ।
वैसे ही प्रभु कृपा मनुज-मन में अन्वेषण गुण भरती है॥2॥

7840
अत्यूर्मिर्मत्सरो मदः सोमः पवित्रे अर्षति । विघ्नन्रक्षांसि देवयुः॥3॥

कर्म - मार्ग का पथिक सदा ही प्रभु - कृपा - पात्र बन जाता है ।
उस  सतत  अनुग्रह  होता  प्रभु  से अपना - पन  पाता  है ॥3॥

7841
आ कलशेषु धावति पवित्रे परि षिच्यते । उक्थैर्यज्ञेषु वर्धते ॥4॥

जब  समवेत  स्वरों  से  साधक  वेद - ऋचा का करते गान ।
ऐसा  प्रतीत  होता  है  मानो  सन्मुख  बैठे  हैं  भगवान ॥4॥

7842
अत्ति त्री सोम रोचना रोहन्न भ्राजसे दिवम् । इष्णन्त्सूर्यं न चोदयः॥5॥

सर्व - व्याप्त है वह परमात्मा बिखराते सूर्य - चन्द्र आलोक ।
नीति - नियम से सभी  बँधे हैं प्रभु हरते हैं सबका शोक ॥5॥

7843
अभि विप्रा अनूषत मूर्धन्यज्ञस्य कारवः। दधानाश्चक्षसि प्रियम्॥6॥

अनुष्ठान  अति  आवश्यक  है  इससे  ही  मन  होता  है  पावन ।
सुमिरन हर साधक करता है यह क्षण होता है मन - भावन॥6॥

7844
तमु त्वा वाजिनं नरो धीभिर्विप्रा अवस्यवः। मृजन्ति देवतातये॥7॥

साधक  जब  पूजा  करता  है  वाक् - अर्थ  पर  रहता  ध्यान ।
भाव  का  भूखा  है  परमेश्वर  वह  ही  देता  है  समाधान ॥7॥

7845
मधोर्धारामनु क्षर तीव्रः सधस्थमासदः। चारुरृताय पीतये ॥8॥

सत्पथ पर हम चलें निरन्तर प्रभु - सामीप्य  हमें  मिल जाए ।
वरद - हस्त रखना प्रभु मुझ पर झूम - झूम मेरा मन गाए॥8॥

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