Friday, 6 December 2013

सूक्त - 100

[ऋषि- दुवस्यु वान्दन । देवता- विश्वेदेवा । छन्द-  जगती-त्रिष्टुप् ।]

9952
इन्द्र दृह्य मघवन्त्वावदिद्भुज इह स्तुतः सुतपा बोधि नो वृधे ।
देवेभिर्न: सविता प्रावतु श्रुतमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥1॥

हे  परम - मित्र  हे  परमेश्वर  तुम  ही  हो जग के पालन-हार ।
मनो -  कामना  पूरी  करना  भोग - मोक्ष -  इच्छानुसार ॥1॥

9953
भराय  सु  भरत  भागमृत्वियं  प्र  वायवे शुचिपे  क्रन्ददिष्टये ।
गौरस्य यःपयसःपीतिमानश आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥2॥

पावन-पवन-देव-प्राञ्जल हैं  हम  प्राण - पवन  उनसे  पाते हैं ।
हम हवि - भोग उन्हें देते हैं वे ध्वनि सँग आते और जाते हैं॥2॥

9954
आ  नो  देवः सविता  साविषद्वय ऋजूयते यजमानाय  सुन्वते ।
यथा  देवान्प्रतिभूषेम  पाकवदा  सर्वतातिमदितिं वृणीमहे ॥3॥

आदित्य -  देव  आदर्श  हमारे  सबका  ध्यान  वही  रखते  हैं ।
प्रकृति  हमारी  माता - सम  है  हम  उनकी स्तुति करते हैं ॥3॥

9955
इन्द्रो अस्मे सुमना अस्तु विश्वहा राजा सोमःसुवितस्याध्येतु नः।
यथा - यथा  मित्रधितानि  संदधुरा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥4॥

हे   प्रभु   मन   प्रसन्न  रखना  हम  पर  वरद -  हस्त   रखना ।
जन - हित जीवन का ध्येय बने यही अनुग्रह हम पर करना ॥4॥

9956
इन्द्र   उक्थेन   शवसा   प्ररुर्दधे   बृहस्पते   प्रतरीतास्यायुषः ।
यज्ञो मनुः प्रमतिर्न:पिता हि कमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥5॥

हे  परमेश्वर  दीर्घायु  बना  दो  श्रेष्ठ -  कर्म  हम  करें  निरन्तर ।
मति - मन  दोनों अनुकूल  रहे  यह  जीवन हो जाए सुखकर॥5॥

9957
इन्द्रस्य  नु  सुकृतं  दैव्यं  सहोSग्निर्गृहे  जरिता मेधिरः कविः ।
यज्ञस्य भूद्विदथे चारुरन्तम आ स स्र्वतातिमदितिं वृणीमहे॥6॥

हे  अग्नि - देव  तुम  आ  जाओ  तुम  हो  मेरे अत्यन्त निकट ।
तुम  पूजनीय  तुम  ही  वरेण्य  हो  हरते  रहो  सतत संकट ॥6॥

9958
न  वो  गुहा  चकृम  भूरि  दुष्कृतं नाविष्ट्यं वसवो देवहेळनम् ।
माकिर्नो देवा अनृतस्य वर्पस आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥7॥

प्रच्छन्न - रूप - में  प्रभु - प्रकटे  हम  श्रध्दा  से  स्वीकार  करें ।
प्रकृति - पावनी - पूज्या  को  पर  सिर - माथे-पर सदा धरें ॥7॥

9959
अपामीवां  सविता  साविषत्र्यत्र्य1ग्वरीय  इदप  सेधन्त्वद्रयः ।
ग्रावा  यत्र  मधुषुदुच्यते  बृहदा  सर्वतातिमदितिं  वृणीमहे ॥8॥

पूजनीय   है   ज्ञानी   जग   में   ज्ञान - दान  वे   ही   करते  हैं ।
सूर्य - देवता  स्वस्थ  बनाते  जग  का  ताप  मेघ  हरते  हैं ॥8॥

9960
ऊर्ध्वो ग्रावा  वसवोSस्तु  सोतरि  विश्वा  द्वेषांसि सनुतर्युयोत ।
स नो देवः सविता पायुरीड्य आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥9॥

 हे यज्ञ- देव तुम शुभ - चिन्तक हो राग - द्वेष से हमें बचाओ ।
सूर्य - देव  सबके  रक्षक  हैं प्रकृति-पावनी पास आ जाओ ॥9॥

9961
ऊर्जं गावो यवसे पीवो अत्तन ऋतस्य या: सदने कोशे अङ्ध्वे।
तनूरेव  तन्वो अस्तु  भेषजमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥10॥

गो - मॉं  कब  से  भूखी  बैठी  है  चारा  उसे  मिले  भर - पूर ।
गो-रस सोम-सदृश बन जाए मनुज-प्रकृति से हो न दूर ॥10॥

9962
क्रतुपावा  जरिता  शश्वतामव इन्द्र इद्भद्रा प्रमतिः सुतावताम् ।
पूर्णमूधर्दिव्यं यस्य सिक्तय आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे॥11॥

नया - वस्त्र  एक  दिन  फट  जाता इस जग को खाता है काल ।
हे  सूर्य - देव  तुम  रक्षा  करना  प्रकृति-पूजनीया है ढाल ॥11॥

9963
चित्रस्ते भानुःक्रतुप्रा अभिष्टिःसन्ति स्पृहो जरणिप्रा अ अधृष्टा:।
रजिष्ठया  रज्या  पश्व   आ   गोस्तूतूर्षति   पर्यग्रं  दुवस्युः ॥12॥

हे   परम - पिता   हे  परमेश्वर   तेरा   प्रकाश   प्रभु - पावन  है ।
तुमसे  हम बहुत प्रभावित हैं तेरा सुमिरन मन - भावन है ॥12॥  
   

              
        

No comments:

Post a comment