Thursday, 9 January 2014

सूक्त - 66

[ऋषि- वसुकर्ण वासुक्र । देवता- विश्वेदेवा । छन्द- जगती- त्रिष्टुप् ।]

9493
देवान्हुवे बृहच्छ्रवसः स्वस्तये ज्योतिष्कृतो अध्वरस्य प्रचेतसः।
ये  वावृधुः प्रतरं  विश्ववेदस  इन्द्रज्येष्ठासो अमृता ऋतावृधः ॥1॥

प्रचुर अन्न-जल  ज्योति-सृजेता  हे  परम पिता  तुम  ही तो हो ।
जग - कल्याण  हेतु हे प्रभुवर जीवन-पथ के पाथेय तुम्हीं हो॥1॥

9494
इन्द्रप्रसूता  वरुणप्रशिष्टा  ये  सूर्यस्य  ज्योतिषो  भागमानशुः ।
मरुद्गणे  वृजने  मन्म  धीमहि माघोने यज्ञं जनयन्त सूरयः॥2॥

कर्म - योग  है  मानुष - जीवन  वरुण - देव  जीना  सिखलाते ।
पवन - देव  परहित समझाते आदित्य-देव आलोक-बिछाते॥2॥

9495
इन्द्रो वसुभिः परि पातु नो गयमादित्यैरर्नो अदितिः शर्म यच्छतु ।
रुद्रो रुद्रेभिर्देवो मृळयाति नस्त्वष्टा नो ग्नाभिः सुविताय जिन्वतु॥3॥

हे  रुद्र - देव  सुख - सन्तति  देना  हे  प्रभु  सदा  सुरक्षित  रखना ।
शुभ - चिन्तन  हो  लक्ष्य  हमारा  सत्पथ  पर  हमको  ले चलना॥3॥

9496
अदितिर्द्यावापृथिवी   ऋतं   महदिन्द्राविष्णू   मरुतः   स्वर्बृहत् ।
देवॉ आदित्यॉ अवसे हवामहे वसून् रुद्रान्त्सवितारं सुदंससम्॥4॥

अवनि  अनल  और  अनिल  यहॉ  पर  अपनी महिमा से ठहरे हैं ।
सूरज   और   गगन   पानी  भी  पर - उपकारी   रूप   धरे   हैं ॥4॥

9497
सरस्वान्धीभिर्वरुणो  धृतव्रतः  पूषा  विष्णुर्महिमा  वायुरश्विना ।
ब्रह्मकृतो  अमृता  विश्ववेदसः शर्म  नो  यंसन  त्रिवरुथमंहसः॥5॥

कर्म - योग  है  गति  का  सूचक  वरुण - देवता  जल-दायक  हैं ।
आदित्य-अनिल और अवनि सभी सुधा-सदृश फल-दायक हैं॥5॥

9498
वृषा यज्ञो वृषणः सन्तु यज्ञिया वृषणो देवा वृषणो हविष्कृतः।
वृषणा द्यावापृथिवी ऋतावरी वृषा पर्जन्यो वृषणो वृषस्तुभः॥6॥

हे  विश्व - देव  तुम  पूजनीय  हो  मनो - कामना  पूरी  करना ।
हम हविष्यान्न अर्पित करते हैं पथ का पाथेय तुम्हीं बनना॥6॥

9499
अग्नीषोमा  वृषणा  वाजसातये  पुरुप्रशस्ता  वृषणा  उप ब्रुवे ।
यावीजिरे वृषणो देवयज्यया ता नःशर्म त्रिवरूथं वि यंसतः॥7॥

हे  सोम  देव  तुम  अन्न  हमें  दो  अभिलाषायें  पूरी  करना ।
प्रभु  तुम  हमें  सुरक्षा  देना  सबके  मन  की  पीडा  हरना ॥7॥

9500
धृतव्रता: क्षत्रिया यज्ञनिष्कृतो बृहद्दिवा अध्वराणामभिश्रियः।
अग्निहोतार  ऋतसापो  अद्रुहोSपो  असृजन्ननु  वृत्रतूर्ये ॥8॥

हे  प्रभु  कर्म-धर्म  में  रुचि  हो  कर्मों का हो समुचित निर्वाह ।
प्रभु  जी  द्वेष-रहित  जीवन  हो  पर-सेवा  ही हो मेरी राह ॥8॥

9501
द्यावापृथिवी जनयन्नभि व्रताप ओषधीर्वनिनानि यज्ञिया ।
अन्तरिक्षं स्व1रा पप्रुरूतये वशं देवासस्तन्वी3 नि मामृजु॥9॥

हे विश्व-देव शुभ चिन्तन देना शुभ-कर्मों का देना अनुदान ।
सबके हित में मेरा हित हो देना सुन्दर समुचित-ज्ञान ॥9॥

9502
धर्तारो दिव ऋभवः सुहस्ता वातापर्जन्या महिषस्य तन्यतोः।
आप ओषधी: प्र तिरन्तु नो गिरो भगो रातिर्वाजिनो यन्तु मे हवम्॥10॥

पर्जन्य - देव  तुम  पूजनीय  हो  सदा  हमारी  रक्षा करना ।
हम हवि-भोग तुम्हें देते हैं तुम अन्न-धान देते रहना ॥10॥

9503
समुद्रः  सिन्धू  रजो  अन्तरिक्षमज  एकपात्तनयित्नुरर्णवः ।
अहिर्बुध्न्यः शृणवद्वचांसि मे विश्वे देवास उत सूरयो मम॥11॥

हे अन्तरिक्ष आदित्य अवनि हे मेघ-देव और मध्यम- बानी ।
हे विश्व-देव सागर-समेत सब तक पहुँचाओ मेरी ज़ुबानी॥11॥

9504
स्याम वो मनवो देववीतये प्राञ्चं नो यज्ञं प्र णयत साधुया ।
आदित्या रुद्रा वसवः सुदानव इमा ब्रह्म शस्यमानानि जिन्वत॥12॥

हम  सभी  सदा  सत्कर्म  करें हम सब हैं मनु की संतान ।
त्याग-सहित उपभोग करें हम हो परम्परा का परिज्ञान ॥12॥

9505
दैव्या होतारा प्रथमा पुरोहित ऋतस्य पन्थामन्वेमि साधुया ।
क्षेत्रस्य पतिं प्रतिवेशमीमहे विश्वान्देवॉ अमृतॉ अप्रयुच्छतः॥13॥

आदित्य अग्नि हैं श्रेष्ठ-पुरोहित देवों का करते हैं आवाहन ।
परमेश्वर से धन-धान मॉगते अर्पित करते हैं हविष्यान्न ॥13॥

9506
वसिष्ठासः  पितृवद्वाचमक्रत  देवॉ  इळाना  ऋषिवत् स्वस्तये ।
प्रीता  इव  ज्ञातयः काममेत्यास्मे  देवासोSव धूनुता वसु ॥14॥

ऋषि  ने  पूजन-अर्चन  करके  सबके  हित  की  बात  कही  है ।
हे प्रभु तुम ही परममित्र हो तुम वह करना जो बात सही है॥14॥

9507
देवान्वसिष्ठो  अमृतान्ववन्दे  ये  विश्वा  भुवनानि  प्रतस्थुः ।
ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिःसदा नः॥15॥

हे  अद्वितीय  हे  अविनाशी  जीवन  बन  जाए  देव - समान ।
सदा  सुरक्षा  देना  प्रभुवर  देते  रहना  धन  और  धान ॥15॥ 
            
  

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