Thursday, 24 April 2014

सूक्त - 72

[ऋषि- हरिमन्त आङ्गिरस । देवता- पवमान सोम । छन्द- जगती ।]

8340
हरिं  मृजन्त्यरुषो न युज्यते सं धेनुभिः कलशे सोमो अज्यते ।
उद्वाचमीरयति हिन्वते मती पुरुष्टुतस्य कति चित्परिप्रियः॥1॥

परमेश्वर  पावन  मन  देते  हैं  साधक  को  प्रेरित  करते  हैं ।
सज्जन के ध्यान में वे आते हैं प्रभु उसके मन में रहते हैं ॥1॥

8341
साकं  वदन्ति  बहवो  मनीषिण  इन्द्रस्य  सोमं जठरे यदादुहुः ।
यदी मृजन्ति सुभगस्तयो नरःसनीळाभिर्दशभिःकाम्यं मधु॥2॥

जब योगी प्रभु - दर्शन पाता सामाजिक -तन्द्रा होती ध्वस्त ।
जागरूक  हो  जाता  मानव  हर  कोई  बन  जाता  भक्त  ॥2॥

8342
अरममाणो  अत्येति  गा  अभि  सूर्यस्य  प्रियं  दुहितुस्तिरो  रवम् ।
अन्वस्मै जोषमभरद्विनंगृसःसं द्वयीभिःस्वसृभिःक्षेति जामिभिः॥3॥

ऐसी  जागरूक आत्मा  का  हर  समाज  करता अभिनन्दन ।
सबको सीढी मिल जाती है मिट जाता है मन का क्रन्दन॥3॥

8343
नृधूतो  अद्रिषुतो  बर्हिषि  प्रियः  पतिर्गवां   प्रदिव इन्दुरृत्वियः ।
पुरन्धिवान्मनुषो यज्ञसाधनः शुचिर्धिया पवते सोम इन्द्र ते॥4॥

जब  अदृश्य  ईश्वर  से  कोई  अपना  परिचित  हो  जाता  है ।
लगता है दिल्ली दूर नहीं है मन अद्भुत आन्न्द पाता  है ॥4॥

8344
नृबाहुभ्यां चोदितो धारया सुतोSनुष्वधं  पवते  सोम  इन्द्र  ते ।
आप्रा:क्रतून्त्समजैरध्वरे मतीर्वेर्न द्रुषच्चम्वो3रासदध्दरिः॥5॥

धीर - वीर  निर्भय  मानव  ही  दुष्टों -  पर  पडता  है  भारी ।
धर्म - युध्द तुम लडो परस्पर राम-राज्य की हो तैयारी ॥5॥

8345
अंशुं दुहन्ति स्तनयन्तमक्षितं कविं कवयोSपसो मनीषिणः ।
समी गावो मतयो यन्ति संयत ऋतस्य योना सदने पुनर्भुवः॥6॥

बुध्दि - शस्त्र  से  रण  जीतो  तुम  बारम्बार  करो  अभ्यास ।
परमात्मा को जानो समझो वह यहीं है तेरे आस - पास ॥6॥

8346
नाभा पृथिव्या धरुणो महो दिवो3Sपामूर्मौ सिन्धुष्वन्तरुक्षितः ।
इन्द्रस्य वज्रो वृषभो विभूवसुः सोमो हृदे पवते चारु मत्सरः॥7॥

प्रभु  पर  जिनकी अटल - भक्ति  है   वही मनुज आनन्द पाते हैं ।
अहंकार है सुख का दुश्मन इसको तज-कर हम  मुस्काते  हैं॥7॥

8347
स तू पवस्व परि पार्थिवं रजः स्तोत्रे शिक्षन्नाधून्वते च सुक्रतो ।
मा नो निर्भाग्वसुनःसादनस्पृशो रयिं पिशङगं बहुलं वसीमहि॥8॥

हे  प्रभु  पावन  मुझे  बना  दो  अन्न - धान  का  दे  दो  दान ।
वसुन्धरा का सब सुख देना साहस सुमति और सम्मान ॥8॥

8348
आ  तू  न  इन्दो  शतदात्वश्रृयं  सहत्रदातु  पशुमध्दिरण्यवत् ।
उप मास्व बृहती रेवतीरिषोSधि स्तोत्रस्य पवमान नो गहि॥9॥

कर्म- योग का पथिक निरन्तर बिना कामना करता ध्यान ।
वह है सच्चा - साधक उसको निश्चित अपनाते भगवान ॥9॥   

2 comments:

  1. सुन्दर प्रस्तुति...

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  2. प्रभु पर जिनकी अटल - भक्ति है वही मनुज आनन्द पाते हैं ।
    अहंकार है सुख का दुश्मन इसको तज-कर हम मुस्काते हैं॥7॥

    हे प्रभु, तेरे आनंद में हम डूबते उतराते रहें..

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