Tuesday, 15 April 2014

सूक्त - 82

[ऋषि- वसु भारद्वाज । देवता- पवमान सोम । छन्द- जगती - त्रिष्टुप् ।]

8402
असावि सोमो अरुषो वृषा हरी राजेव दस्मो अभि गा अचिक्रदत् ।
पुनानो वारं पर्येत्यव्ययं  श्येनो  न  योनिं  घृतवन्तमासदम् ॥1॥

वह  परमात्मा  दर्शनीय  है  कण-कण  से  ध्वनित  हो  रहा  है ।
भक्तों  को  वह  दर्शन दे कर फिर चरैवेति चुपके  से  कहा  है ॥1॥

8403
कविर्वेधस्या  पर्येषि  माहिनमत्यो  न  मृष्टो  अभि  वाजमर्षसि ।
अपसेधन्दुरिता सोम मृळय घृतं वसानःपरि यास निर्णिजम्॥2॥

वह  सर्वज्ञ  समर्थ  बहुत  है  सज्जन  ही  उसको  पा सकते   हैं ।
खट्-रागों  से  वही  बचाते  सबको  सुख  देने आते  रहते  हैं ॥2॥

8404
पर्जन्यः पिता महिषस्य पर्णिनो नाभा पृथिव्या गिरिषु क्षयं दधे ।
स्वसार आपो अभि गा उतासरन्त्सं ग्रावभिर्नसते वीते अध्वरे॥3॥

परमेश्वर  ही  सुख - वैभव    देते  हम  सबकी  रक्षा  करते  हैं ।
यश  देते  प्रेरित  करते  हैं  धान  से  सबका  घर  भरते  हैं ॥3॥

8405
जायेव पत्यावधि शेव मंहसे पज्राया  गर्भ  श्रृणुहि ब्रवीमि  ते ।
अन्तर्वाणीषु  प्र चरा सु जीवसेSनिन्द्यो वृजने सोम जागृहि॥4॥

सत् - पथ  पर  वे  ही  पहुँचाते  कर्तव्य - बोध  सिखलाते  हैं ।
जागो  उठो  और  सब  पाओ  यही  मँत्र  दे  कर  जाते  हैं ॥4॥

8406
यथा पूर्व्येभ्यः शतसा अमृधः सहस्त्रसा: पर्यया वाजमिन्दो ।
एवा पवस्व सुविताय  नव्यसे  तव व्रतमन्वापः सचन्ते ॥5॥

कई  जन्म  से  आना  जाना  होता  रहा  जगत  में  अपना ।
अब जीवन सार्थक हो जाए वरद-हस्त तुम सिर पर रखना॥5॥

 

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