Saturday, 2 November 2013

सूक्त - 139

[ऋषि- विश्वावसु देवगन्धर्व । देवता- सविता । छन्द- त्रिष्टुप ।]

10309
सूर्यरश्मिर्हरिकेशः    पुरस्तात्सविता    ज्योतिरुदयॉं     अजस्त्रम् ।
तस्य पूषा प्रसवे याति विद्वान्त्सम्पश्यन्विश्वा भुवनानि गोपा: ॥1॥

हरी   वनस्पतियों   से  ही  तो  प्राणि - मात्र   जीवित   रहता   है ।
सूर्य - देवता   तमस   मिटाते   पावन - पवन  सतत  बहता  है ॥1॥

10310
नृचक्षा  एष  दिवो  मध्य आस्त आपप्रिवान्  रोदसी अन्तरिक्षम् ।
स   विश्वाचीरभि    चष्टे   घृताचीरन्तरा   पूर्वमपरं   च   केतुम् ॥2॥

आदित्य  अविरल  आलोक  लुटाता  जगती  में प्रकाश  भरता है ।
सौ-सौ  बार  नमन सविता  को सबका आश्रय वह ही बनता है ॥2॥

10311
रायो   बुध्नः  सङ्गमनो   वसूनां   विश्वा  रूपाभि  चष्टे  शचीभिः ।
देवइव   सविता   सत्यधर्मेन्द्रो  न  तस्थौ   समरे   धनानाम् ॥3॥

अग्नि - देव  सम  सूर्य- देव  भी  सत्य - धर्म  पर  ही  चलते  हैं ।
सबको  सम्पदा  देते  सविता  समीर  सदृश ही गति रखते हैं ॥3॥

10312
विश्वावसुं    सोम    गन्धर्वमापो    ददृशुषीस्तदृतेना    व्यायन् ।
तदन्ववैदिन्द्रो  रारहाण  आसां  परि  सूर्यस्य परिधीरपश्यत् ॥4॥

बादल  को  तुम  ही  जल  देते  हो जल विविध रूप में बहता है ।
जल  ही तो जीवन है भगवन हर प्राणी यह अनुभव करता है ॥4॥

10313
विश्वावसुरभि   तन्नो   गृणातु   दिव्यो  गन्धर्वो  रजसो  विमानः ।
यद्वा घा सत्यमुत यन्न विद्म धियो हिन्वानो धिय इन्नो अव्या:॥5॥

हे   पर्जन्य - देव   विनती   है   पावन   भोज्य - वस्तु   ही   देना ।
जीवन   भर   सत्कर्म   करें   हम   तुम   हमें   प्रेरणा   दे   देना ॥5॥

10314
सस्निमविन्दच्चरणे     नदीनामपावृणाद्दुरो       अश्मव्रजानाम् ।
प्रासां   गन्धर्वो  अमृतानि  वोचदिद्रो  दक्षं  परि  जानादहीनाम् ॥6॥

नभ  पर  काले  बादल  बिखरे  हैं  श्याम - मेघ झुक-झुक जाता है ।
इन्द्र - देव   जल   बरसाते   हैं   मानव   झूम - झूम   गाता   है ॥6॥  
 

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