Tuesday, 20 May 2014

सूक्त - 38

[ऋषि- रहूगण आङ्गिरस । देवता- पवमान सोम । छन्द- गायत्री ।]

7973
एष उ स्य वृषा रथोSव्यो वारेभिरर्षति । गच्छन् वाजं सहस्त्रिणम्॥1॥

परमेश्वर - महिमा  पाती  है  विद्वत् - जन  द्वारा  विस्तार ।
ज्ञान की पूजा सब करते हैं ज्ञानी पर  है ज्ञान - प्रभार ॥1॥

7974
एतं त्रितस्य योषणं हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः। इन्दुमिन्द्राय पीतये॥2॥

सत - रज - तम से बनी है माया जो दिखती वह सब माया है ।
माया - रहित  है वह परमात्मा वह अदृश्य  है जैसे छाया ॥2॥

7975
एतं तं हरितो दश मर्मृज्यन्ते अपस्युवः। याभिर्मदाय शुम्भते॥3॥

दस - इन्द्रिय  का  आकर्षण  वह  है जो  प्रभु  हमसे  ही अदृश्य  है ।
जिस साधक का मन उज्ज्वल है प्रभु साधक का परम लक्ष्य है॥3॥

7976
एष स्य मानुषीष्या श्येनो न विक्षु सीदति । गच्छञ्जारो न योषितम्॥4॥

शीतल  शशी  की  शान्त  चॉदनी  मन  को आह्लादित  करती  है ।
वैसी ही प्रभु की संगति भी सबको पुलकित करती रहती  है ॥4॥

7977
एष स्य मद्यो रसोSव चष्टे दिवः शिशुः। य इन्दुर्वारमाविशत्॥5॥

जगती  का  द्रष्टा  परमेश्वर  ही  एक - मात्र  है  सगा  हमारा ।
शेष  सभी  सामान्य  मनुज  हैं परमात्मा है मात्र सहारा ॥5॥

7978
एष स्य पीतये सुतो हरिरर्षति धर्णसिः। क्रन्दन्योनिमभि प्रियम्॥6॥

शब्द -  ब्रह्म  है  वह  परमात्मा  घट - घट  में  वह  ही  बसता  है ।
आकृति  पाती  विविध कलायें रोम - रोम  में  वह  रमता  है ॥6॥   

2 comments:

  1. शीतल शशी की शान्त चॉदनी मन को आह्लादित करती है ।
    वैसी ही प्रभु की संगति भी सबको पुलकित करती रहती है ॥4॥
    प्रभु शीतलता का सागर है

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