Monday, 12 May 2014

सूक्त - 51

[ऋषि- उचथ्य आङ्गिरस । देवता- पवमान सोम । छन्द- गायत्री ।]

8047
अध्वर्यो अद्रिभिः सुतं सोमं पवित्र आ सृज । पुनीहीन्द्राय पातवे॥1॥

प्रभु  के  करीब  यदि  जाना  हो  अपने -  मन  का  रखो  ध्यान  ।
प्रभु को पावन-मन ही प्रिय है आरम्भ करें अब यह अभियान॥1॥

8048
दिवः पीयूषमुत्तमं सोममिन्द्राय वज्रिणे । सुनोता मधुमुत्तमम्॥2॥

जिसको  मन  की  तृप्ति  चाहिए  जिसको  पाना  है  सन्तोष ।
वह  उपासना  करे  निरन्तर  पा  जाएगा  वह परि - तोष ॥2॥

8049
तव त्य इन्दो अन्धसो देवा मधोर्व्यश्नते । पवमानस्य मरुतः॥3॥

परमेश्वर  पावन  मन  में  रहता  साधक  पाता  है  परमानन्द । 
आनन्द  हेतु  बल  नहीं चाहिए सरल - सहज है ब्रह्मानन्द ॥3॥

8050
त्वं हि सोम वर्धयन्त्सुतो मदाय भूर्णये । वृषन्त्स्तोतारमूतये॥4॥

वेद - ज्ञान  की  महिमा  अद्भुत  अपरा - परा  का   यह भण्डार ।
परमात्मा - सान्निध्य यहीं  है सब विषयों का यह आगार ॥4॥

8051
अभ्यर्ष विचक्षण पवित्रं धारया सुतः। अभि वाजमुत श्रवः ॥5॥

तुम अनन्त बल के स्वामी हो आओ अन्तर्मन में  बस जाओ ।
यश - वैभव का दान हमें दो मोक्ष - द्वार तक तुम पहुँचाओ॥5॥
 

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