Wednesday, 7 May 2014

सूक्त - 61

[ऋषि- अमहीयु आङ्गिरस । देवता- पवमान सोम । छन्द- गायत्री ।]

8089
अया वीती परि स्त्रव यस्त इन्दो मदेष्वा । अवाहन्नवतीर्नव॥1॥

हे  सेनापति  तुम  दुश्मन  पर  नरम - गरम  रुख  अपनाओ ।
यदि वह तुमको ललकारे तो अपनी विधि से तुम समझाओ॥1॥

8090
पुरःसद्य इत्थाधिये दिवोदासाय शम्बरम् । अध त्यं तुर्वशं यदुम्॥2॥

सेनापति यदि कर्म - कुशल हो वह किला शत्रु का ध्वस्त करे ।
अपनी सीमा रखे सुरक्षित दुश्मन से कभी  तनिक  न डरे ॥2॥

8091
परि णो अश्वमश्वविद्गोमदिन्दो हिरण्यवत् । क्षरा सहस्त्रिणीरिसः॥3॥

कर्म - मार्ग पर चलने वाला विविध - विधा से सुख पाता है ।
सुख   के साधन  स्वतः ढूँढता औरों को  भी बतलाता है ॥3॥

8092
पवमानस्य ते वयं पवित्रमभ्युन्दतः । सखित्वमा वृणीमहे॥4॥

जो  हम  पर  निर्भर  हैं उनको  प्रोत्साहित  हमको  करना  है ।
हे प्रभु सख्य - भाव से आओ मुझको तुमसे कुछ कहना है॥4॥

8093
ये ते पवित्रमूर्मयोSभिक्षरन्ति धारया । तेभिर्नः सोम मृळय॥5॥

कर्म - मार्ग  को  हम अपनायें  हे  प्रभु  तुम  ही  साथ  निभाना ।
उद्यम - पथ पर चलें निरन्तर मुझे लक्ष्य तक तुम पहुँचाना ॥5॥

8094
स नःपुनान आ भर रयिं वीरवतीमिषम् । ईशानःसोम विश्वतः॥6॥

विद्त् - जन विद्या के बल से सुख का करते अनुसन्धान ।
विद्यावान प्रणम्य सदा  है वह अविरल देता अनुदान ॥6॥

8095
एतमु त्यं दश क्षिपो मृजन्ति सिन्धुमातरम् । समादित्येभिरख्यत॥7॥

दस इन्द्रिय यह सिखलाती है कर्म - मार्ग  पथ  दिखलाती  है ।
आत्म-ज्ञान पथ वही बताती सद्-गति पथ पर ले जाती है॥7॥

8096
समिन्द्रेणोत वायुना सुत एति पवित्र आ । सं सूर्यस्य रश्मिभिः॥8॥

कर्म - मार्ग है सुखद सुसंस्कृत सब कुछ सम्भव हो जाता है ।
उद्यम  से  कार्य  सिध्द  होता  है साधक जो चाहे पाता है ॥8॥

8097
स नो भगाय वायवे पूष्णे पवस्व मधुमान् । चारुर्मित्रे वरुणे च॥9॥

कर्म - मार्ग  पथ  पर  ले  जाना उद्योगी  तुम  मुझे  बनाना ।
मैं भी सुख-वैभव को जानूँ आत्म-ज्ञान का मार्ग बताना॥9॥

8098
उच्चा ते जातमन्धसो दिवि षद्भूम्या ददे । उग्रं शर्म महि श्रवः॥10॥

कर्म - मार्ग अत्यन्त मधुर है वसुधा को मिलता वरदान ।
अनुसन्धान कोई करता है पर पाता है  हर इन्सान ॥10॥

8099
एना विश्वान्यर्य आ द्युम्नानि मानुषाणाम् । सिषासन्तो वनामहे॥11॥

आदर्श  हेतु  हम  रहें समर्पित मेहनत से अपना काम करें ।
इसका प्रतिफल भी मिलता है इस धरती का ताप हरें ॥11॥

8100
स न इन्द्राय यज्यवे वरुणाय मरुद्भ्यः। वरिवोवित्परि स्त्रव॥12॥

अम्बर - अवनि श्रोत हैं सुख के कर्म - मार्ग से मिलता फल ।
कर्म - मार्ग पर चलते रहना  निश्चित पाओगे प्रतिफल ॥12॥

8101
उपो षु जातमप्तुरं गोभिर्भङ्गं परिष्कृतम् । इन्दुं देवा अयासिषुः॥13॥

सत् - संगति  है  बहुत  ज़रूरी  यही  अभ्युदय का है  मन्त्र ।
बिखरे पडे हैं सुख साधन के यहीं लगा दो अपना तन्त्र॥13॥

8102
तमिद्वर्धन्तु नो गिरो वत्सं संशिश्वरीरिव । य इन्द्रस्य हृदंसनिः॥14॥

आदर्शों  के  साथ  जियें  हम  कभी  न  छोडें  उसका  साथ ।
सत्कर्म-गली में चलें निरन्तर अपनों के हाथों में हो हाथ॥14॥

8103
अर्षा णः सोम शं गवे धुक्षस्व पिप्युषीमिषम् । वर्धा समुद्रमुक्थ्यम्॥15॥

यदि  वैभव  की  चाह  तुम्हें  हो  कर्म - योग  के  पथ   पर आओ ।
सुख कर जीवन जियो उम्र भर उद्यम से तुम सब कुछ पाओ॥15॥

8104
पवमानो अजीजनद्दिवश्चित्रं न तन्यतुम् । ज्योतिर्वैश्वानरं बृहत्॥16॥

कर्म - मार्ग में सुख - साधन है  मेहनत कर पाओ आनन्द ।
देश को भी समृध्द बनाओ यहॉ न हो कोई निरानन्द ॥16॥

8105
पवमानस्य ते रसो मदो राजन्नदुच्छुनः। वि वारमव्यमर्षति॥17॥

प्रभु  उपासना  जो  करता  है  जीवन  में  सब  कुछ  पाता  है ।
यश - वैभव उसको मिलता है जीवन पारस बन जाता है॥17॥

8106
पवमान रसस्तव दक्षो हि राजति द्युमान् । ज्योतिर्विश्वं स्वर्दृशे॥18॥

हर मानव में दिव्य - शक्ति है पर इससे हम होते अनभिज्ञ ।
देव - भाव  से  भरे  हैं हम सब यही बताते रहते विज्ञ ॥18॥

8107
यस्ते मदो वरेण्यस्तेना पवस्वान्धसा । देवावीरघशंसहा॥19॥

परमेश्वर  सज्जन  के  रक्षक  दुष्टों  को  वे  दण्डित  करते  हैं ।
हे आनन्द-रस आनन्द देना बार - बार विनती करते  हैं ॥19॥

8108
जघ्निर्वृत्रममित्रियं सस्निर्वाजं दिवेदिवे । गोषा उ अश्वसा असि॥20॥

दुष्ट - दलन अति आवश्यक  है सज्जन का तुम रखना ध्यान ।
सत्पथ पर तुम लेकर चलना दया - दृष्टि रखना भगवान ॥20॥

8109
सम्मिश्लो अरुषो भव सूपस्थाभिर्न धेनुभिः। सीदञ्छ्येनो न योनिमा॥21॥

विद्युत  सदृश  शक्ति  है  उसकी  अति अद्भुत  है अतुलनीय  है ।
सकारात्मक उपयोग करें हम तब सुखकर है श्लाघनीय है॥21॥

8110
स पवस्व य आविथेन्द्रं वृत्राय हन्तवे । वव्रिवांसं महीरपः॥22॥

तुम  अनन्त  बल  के  स्वामी  हो  रक्षा  करना  सदा  हमारी ।
सत्पथ पर मुझको ले चलना तुम पर है यह जिम्मेदारी ॥22॥

8111
सुवीरासो वयं धना जयेम सोम मीढ्वः। पुनानो वर्ध नो गिरः॥23॥

हे  सुख - वर्धक  हे  परमेश्वर   हमको वाणी का वैभव देना ।
सत्संगति में रहें निरन्तर तुम हमको भी अपना लेना॥23॥

8112
त्वोतासस्तवावसा स्याम वन्वन्त आमुरः। सोम व्रतेषु जागृहि॥24॥

हे  प्रभु  तुम्हीं  सुरक्षा  देना  हमको  तुम  सन्मार्ग  दिखाना ।
राह भूल - कर भटक न जायें सही राह पर तुम ले आना॥24॥

8113
अपघ्नन्पवते मृधोSप सोमो अराव्णः। गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम्॥25॥

अपनी आय से कुछ निकाल कर  देश  को  भी  देना  पडता  है ।
हर जागरूक नर 'कर' देता है इससे समाज आगे बढता है ॥25॥

8114
महो नो राय आ भर पवमान जही मृधः। रास्वेन्दो वीरवद्यशः॥26॥

राज - धर्म  अति आवश्यक  है  यह  है  हम  सबका दायित्व ।
इससे प्रजा सुरक्षित होती खिल उठता सबका व्यक्तित्व ॥26॥

8115
न त्वा शतं चन ह्रुतो राधो दित्सन्तमा मिनन्।यत्पुनानो मखस्यसे॥27॥

जो  समाज  हेतु  'कर'  लेता  है  नहीं  है  वह कोई अपराध ।
इससे देश अभ्युदय पाता सब कुछ चलता है निर्बाध ॥27॥

8116
पवस्वेन्दो वृषा सुतः कृधी नो यशसो जने।विश्वा अप द्विषो जहि॥28॥

मनो - कामना  पूरी  करना  तुम  हम  सबकी  रक्षा  करना । 
यश - वैभव हमको देना प्रभु  हम सबकी विपदा हरना॥28॥

8117
अस्य ते सख्ये वयं तवेन्दो द्युम्न उत्तमे । सासह्याम पृतन्यतः॥29॥

हे  परम -  मित्र  हे  परमेश्वर  आओ  तुम  सख्य  भाव  से  आओ । 
तुम यश - वैभव के स्वामी हो अज्ञान- तिमिर से मुझे बचाओ॥29॥

8118
या ते भीमान्यायुधा तिग्मानि सन्ति धूर्वणे।रक्षा समस्य नो निदः॥30॥

हे सेनापति तुम अस्त्र - शस्त्र  से  सदा  सुसज्जित  ही रहना ।
आयुध करते हैं देश की रक्षा आयुध तीक्ष्ण सदा रखना ॥30॥    
        

No comments:

Post a comment