Saturday, 10 May 2014

सूक्त - 56

[ऋषि- अवत्सार काश्यप । देवता- पवमान सोम । छन्द- गायत्री ।]

8069
परि सोम ऋतं बृहदाशुः पवित्रे अर्षति । विघ्नन्रक्षांसि देवयुः॥1॥

प्रभु  कर्मानुरूप  फल  देता  सत्कर्म  सदा  ही   श्रेयस्कर है ।
साधन से मन पावन होता शुभ- कर्म सदा ही रुचिकर है॥1॥

8070
यत्सोमो वाजमर्षति शतं धारा अपस्युवः। इन्द्रस्य सख्यमाविशन्॥2॥

कोई  भी  प्रभु  का  मित्र  नहीं  है और  न  कोई  है  दुश्मन ।
जो  सत्-पथ  पर  चलते  हैं  प्रभु के प्यारे हैं वे सज्जन ॥2॥

8071
अभि त्वा योषणो दश जारं न कन्यानूषत । मृज्यसे सोम सातये॥3॥

सहज  रूप  से  ही  प्रकाश  में  अग्नि  समाई  रहती  है ।
वैसे ही मन प्रभु को भजता प्रभु से डोर बँधी रहती है॥3॥

8072
त्वमिन्द्राय विष्णवे स्वादुरिन्दो परि स्त्रव । नृन्त्स्तोतृन्पाह्यंहसः॥4॥

ज्ञान - मार्ग  पर  जो  चलते  हैं  प्रभु  का  पाते  हैं  सान्निध्य ।
खट् - रागों   से  वही  बचाता परमेश्वर है अतिशय - भव्य ॥4॥

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