Monday, 19 May 2014

सूक्त - 39

[ऋषि- बृहन्मति आङ्गिरस । देवता- पवमान सोम । छन्द- गायत्री ।]

7979
आशुरर्ष बृहन्मते परि प्रियेण धाम्ना । यत्र देवा इति ब्रवन्॥1॥

सर्वत्र  व्याप्त  है  वह परमात्मा उसकी गति भी अति अद्भुत है ।
दिव्य - गुणों का वह निधान है  सर्वत्र सदा वह अच्युत  है ॥1॥

7980
परिष्कृण्वन्ननिष्कृतं जनाय यातयन्निषः। वृष्टिं दिवः परि स्त्रव॥2॥

परमात्मा  की रचना अद्भुत आदित्य - अनिल  हैं सुख के श्रोत ।
अत्यन्त सुखद है यह वसुधा भी कौतूहल से  है ओत - प्रोत॥2॥

7981
सुत एति पवित्र आ त्विषिं दधान ओजसा । विचक्षाणो विरोचयन्॥3॥

सर्व - व्याप्त  है  वह  परमात्मा  सन्त - हृदय  में  वह  रहता  है ।
सम्पूर्ण  धरा  का  वह  द्रष्टा  है  वह  सबकी  विपदा हरता है ॥3॥

7982
अयं स यो दिवस्परि रघुयामा पवित्र आ । सिन्धोरूर्मा व्यक्षरत्॥4॥

परमेश्वर की  गति  अद्भुत  है  वह  नभ  से  भी ऊपर  रहता  है ।
कण - कण में वह विद्यमान है पर सज्जन-मन में बसता है॥4॥

7983
आविवासन्परावतो अथो अर्वावतः सुतः। इन्द्राय सिच्यते मधु॥5॥

आनन्द - उत्स  है  वह  परमेश्वर एक - मात्र वह ही अपना है ।
हम सबको वह सुख देता  है शेष  सभी  केवल  सपना  है ॥5॥

7984
समीचीना अनूषत हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः। योनावृतस्य सीदत्॥6॥

सत्कर्म - मार्ग पर जो चलता है प्रभु दिव्य - गुणों का देते दान ।
यश - वैभव  वह  ही  पाता  है  वह ही पाता है आत्म- ज्ञान ॥6॥

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