Tuesday, 13 May 2014

सूक्त - 48

[ऋषि- कवि भार्गव । देवता- पवमान सोम । छन्द- गायत्री ।]

8032
तं त्वा नृम्णानि बिभ्रतं सधस्थेषु महो दिवः। चारुं सुकृत्ययेमहे॥1॥

नभ  में  कितनी  नभ - गंगायें  भू - सम्पदा  भरी  धरती  पर ।
अद्भुत  है  यह दुनियॉ प्रभु - वर जाने कैसा होगा परमेश्वर ॥1॥

8033
संवृक्तधृष्णुमुक्थ्यं महामहिव्रतं मदम् । शतं पुरो रुरुक्षणिम्॥2॥

धर्म  -  मार्ग  ही  पूजनीय  है  सब  निर्भय  हो -  कर  चलते  हैं ।
उपासना अति - आवश्यक है  प्रभु  सबको  प्रेरित  करते  हैं ॥2॥

8034
अतस्त्वा रयिमभि राजानं सुक्रतो दिवः। सुपर्णो अव्यथिर्भरत्॥3॥

हे  परम - मित्र  हे  परमात्मा  सम्पूर्ण  धनों  के  तुम  भण्डार ।
कण - कण में  है  वास  तुम्हारा अविरल करते हो उपकार ॥3॥

8035
विश्वस्मा इत्स्वर्दृशे साधारणं रजस्तुरम् । गोपामृतस्य निर्भरत्॥4॥

सत - रज- तम  से  प्रकृति  बनी  है  पर रज - गुण की है प्रधानता ।
सतचितआनन्द प्रभु के गुण हैं पर चित की रहती सदा प्रबलता॥4॥

8036
अधा हिन्वान इन्द्रियं ज्यायो महित्वमानशे । अभिष्टिकृद्विचर्षणिः॥5॥

परमेश्वर  हम  सब  के  प्रेरक  अति - अद्भुत  है  उनकी  महिमा ।
सर्व - व्याप्त  है  वह  परमेश्वर अभीष्ट - प्रदाता की  है गरिमा ॥5॥

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