Saturday, 17 May 2014

सूक्त - 43

[ऋषि- मेध्यातिथि काण्व । देवता- पवमान सोम । छन्द- गायत्री ।]

8003
यो अत्य इव गोभिर्मदाय हर्यतः। तं गीर्भिर्वासयामसि ॥1॥

सर्वोपरि  है वह परमात्मा विद्युत - सम है फिर भी ग्राह्य है ।
अनुष्ठान से  वह  मिलता है उपासना से सहज प्राप्य है ॥1॥

8004
तं नो विश्वा अवस्युवो गिरःशुम्भन्ति पूर्वथा । इन्दुमिन्द्राय पीतये॥2॥

वह आलोक - पुञ्ज परमात्मा मानव को देता  है  परितोष ।
हम  उनकी  पूजा  करते  हैं  वे  हमको  देते  हैं  सन्तोष ॥2॥

8005
पुनानो याति हर्यतः सोमो गीर्भिः परिष्कृतः। विप्रस्य मेध्यातिथेः॥3॥

जो ज्ञान - मार्ग पर चलते हैं वे ज्ञान - ज्योति  सँग  रहते हैं ।
मन - मन्दिर में दीप जलाते परमेश्वर का दर्शन करते हैं॥3॥

8006
पवमान विदा रयिमस्मभ्यं सोम सुश्रियम् । इन्दो सहस्त्रवर्चसम्॥4॥

सबको  पावन  करने  वाला  वह  प्रभु  प्रोत्साहित  करता  है ।
साधक सद्- गति पाता है आनन्द-रस-पान वही करता है॥4॥

8007
इन्रदुत्यो न वाजसृत्कनिक्रन्ति पवित्र आ । यदक्षारति देवयुः॥5॥

सज्जन के मन के मन्दिर में प्रभु की ज्योति सदा जलती  है ।
पावन - मन में प्रभु बसता है जहॉ निर्मल सरिता बहती है॥5॥

8008
पवस्व वाजसातये विप्रस्य गृणतो वृधे । सोम रास्व सुवीर्यम्॥6॥

उद्योगी को सब कुछ  मिलता  है  परमेश्वर  देते  हैं आनन्द । 
यश - वैभव वह ही पाता  है वह  ही  देते  हैं  परमानन्द ॥6॥ 

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