Monday, 14 October 2013

सूक्त - 177

[ ऋषि - पतङ्ग प्राजापत्य । देवता- मायाभेद । छन्द - जगती, त्रिष्टुप ।]

10505
पतङ्गमक्तमसुरस्य     मायया   हृदा    पश्यन्ति   विपश्चितः ।
समुद्रे अन्तः कवयो वि चक्षते मरीचीनां पदमिच्छन्ति वेधसः॥1॥

माया  की  महिमा  अद्भुत  है  कवि  उसका  अनुभव  करते हैं ।
पर  ज्ञानी - जन  उस  प्रकाश में प्रभु का ही  अनुभव  करते हैं ॥1॥

10506
पतङ्गो  वाचं  मनसा  बिभर्ति  तां  गन्धर्वोSवदद् गर्भे अन्तः ।
तां  द्योतमानां  स्वर्यं  मनीषामृतस्य  पदे  कवयो  नि  पान्ति ॥2॥

संप्रेषित  करता  प्राण  शब्द  को मन - वाणी से जीव जुडता है ।
विस्तारित  होती  वाणी  नभ में फिर पवन सुरक्षित रखता है ॥2॥

10507
अपश्यं   गोपामनिपद्यमानमा  च   परा  च  पथिभिश्चरन्तम्  ।
स   सध्रीचीः  स  विषूचीर्वसान  आ   वरीवर्ति     भुवनेष्वन्तः ॥3॥

अमर-आत्मा भी भिन्न योनि में कर्मानुसार विचरण करती है ।
 यह  बारम्बार  जन्म  लेती  है  उत्तम - अधम   देह  धरती  है ॥3॥



 

1 comment:

  1. माया, जीव ईश्वर, एक समन्वय।

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