Thursday, 31 October 2013

सूक्त - 142

[ऋषि-शार्ङ्गा-जरिता-द्रोण-सारिसृक्व-स्तम्बमित्र। देवता-अग्नि।त्रिष्टुप-जगती-अनुष्टुप्।]

10327
अयमग्ने जरिता त्वे अभूदपि सहसः सूनो नह्य1न्यदस्त्याप्यम् ।
भद्रं  हि शर्म त्रिवरूथमस्ति त आरे हिंसानामप दिद्युमा कृधि ॥1॥

तुम्हीं   हमारे  ध्येय - श्रेय   हो  हम  तुमसे  विनती  करते   हैं ।
नहीं  तुम्हारे  सिवा  है  कोई   प्रभु  रक्षा  करो  यही  कहते  हैं ॥1॥

10328
प्रवत्ते  अग्ने  जनिमा  पितूयतः  साचीव  विश्वा भुवना न्यृञ्जसे ।
प्र सप्तयः प्र सनिषन्त नो धियः पुरश्चरन्ति  पशुपाइव त्मना ॥2॥

हे  ज्योति - पुञ्ज  हे  अग्नि- देव  तुम्हीं  बन्धु  हो  सखा  हमारे ।
तुम  जब  हविष्यान्न  लेते  हो  परिपोषित  होते  प्राण हमारे ॥2॥

10329
उत   वा  उ  परि  वृक्षणि   बप्सद् बहोरग्न   उलपस्य  स्वधावः ।
उत  खिल्या  उर्वराणां  भवन्ति  मा  ते हेतिं तविषीं चुक्रुधाम ॥3॥

क्रोध   कभी   न  करना   भगवन   तुम  अतुलित  बलशाली  हो ।
भूमि  सदा  ही  उर्वर  रखना  हर  खेत  में  धान  की बाली हो ॥3॥

10330
यदुद्वतो    निवतो    यासि    बप्सत्पृथगेषि    प्रगर्धिनीव   सेना ।
यदा   ते  वातो  अनुवाति  शोचिर्वप्तेव  श्मश्रु  वपसि  प्र  भूम ॥4॥

हे  अग्नि - देव  तुम  इस  पृथ्वी  की  सदा - सदा  रक्षा  करना ।
जग  में  कहीं  जले  न  जंगल  सब के सुख का ध्यान रखना ॥4॥

10331
प्रत्यस्य    श्रेणयो    ददृश्र    एकं    नियानं    बहवो    रथासः ।
बाहू    यदग्न    अनुमर्मृजानो   न्यङ्ङुत्तानामन्वेषि   भूमिम् ॥5॥

हे  अग्नि- देव  धधके  न  धरती  मातृभूमि  की  करो  सुरक्षा ।
हे  प्रभु  प्राञ्जल  पावन  पावक  करना  जीव जगत की रक्षा ॥5॥

10332
उत्ते  शुष्मा  जिहतामुत्ते  अर्चिरुत्ते   अग्ने  शशमानस्य  वाजा: ।
उच्छ्व्ञ्चस्व नि नम वर्धमान आ त्वाद्य विश्वे वसवः सदन्तु ॥6॥

हे  अग्नि - देव  बस  यह  विनती  है  कृपा-दृष्टि  हरदम  रखना ।
क्रोध   तुम्हारा   सह्य   नहीं   है   शान्त - भाव   में  ही  रहना ॥6॥

10333
अपामिदं           न्ययनं               समुद्रस्य            निवेशनम्  ।
अन्यं    कृणुष्वेतः     पन्थां     तेन     याहि      वशॉं      अनु ॥7॥

हे  प्रभु  जल - थल  दोनों  में  ही  उग्र - रूप  नहीं  धारण  करना ।
जल- थल- नभ-जड-जीव सभी को सदा सुरक्षित तुम रखना ॥7॥

10334
आयने        ते         परायणे       दूर्वा         रोहन्तु       पुष्पिणीः ।
ह्रदाश्च         पुण्डरीकाणि          समुद्रस्य         गृहा         मे  ॥8॥

हे   अग्नि - देव   है   यही  प्रार्थना  वनस्पतियों  की  रक्षा  करना ।
सरोवरों  में  कमल  खिला  हो  अपनी-ऑंच से बचा के रखना ॥8॥  


     

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